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दुल्हन- एक लघुकथा

 

५ वर्ष का यथार्थ अपनी दादी के साथ शाम को मोहल्ले की खाली रोड पर टहल रहा है|

स्वच्छ हवा और शांत माहौल में उसके मन में एक पुराना सवाल कौंध आता है और वह अपनी जिज्ञासा हेतु अपनी दादी से पूछता है कि दादी, पलक बुआ कि शादी में जब वो दुल्हन बनी होती हैं तो दूसरी बुआ लोग उनके आगे फूल क्यों डालती हैं ?

 

ताकि बुआ को ऐसा महसूस हो कि वो खास हैं, राजकुमारी हैं हालांकि वो न तो खास हैं और न ही राजकुमारी, दादी का जवाब आता है।

 

- लवकुश कुमार

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ड्राइवर का खाना - एक लघुकथा

एक सरकारी कार्यालय का दृश्य, कर्मचारी अपने अपने काम में लगे हैं।

 

धीमी आवाज में, पदासीन अधिकारी हरीश जी के फोन पर रिंगटोन बजती है, " नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जाएगा "

 

हैलो, सामने से आवाज आती है 

 

 

हैलो सचेत भाई कैसे हो, और कैसी चल रही है पहाड़ की यात्रा, हरीश जी पूछते हैं ।

 

बढ़िया चल रही है हरीश भाई, एक बात बताओ यार ये ड्राइवर को खाना खिलाने की बात हुई थी क्या, ये तो तीनों डाइट क्लेम कर रहा है जबकि मैंने तो ब्रेकफास्ट भी कराया और २०० रुपये भी दिए, सचेत निश्चिंत होना चाहते हैं, हरीश भाई, ऐसी कोई बात हुई थी क्या, अगर हुई है तो मैं दे देता हूं पैसे।

 

सचेत, हरीश के मित्र हैं और उत्तर भारत के पर्वतों की सैर के लिए ४ दिन के दौरे पर हैं, क्योंकि हरीश इसी पर्वतीय राज्य में केंद्रीय सेवा में हैं अतः दौरे की व्यवस्था इनके हांथ में और खर्चा दोस्त के हांथ में है ।

 

यथा नाम तथा गुण

 

सचेत, सचेत हैं कि जब बात नहीं हुई तो पैसे क्यों दें और हरीश, हरीश निकले कि जब बात केवल १००-२०० की हुई थी तो ज्यादा खर्चे के लिए अपने दोस्त को बोलें तो कैसे बोलें हालांकि वो चाहते थे कि ड्राइवर को खाने के लिए उचित भुगतान कर दिया जाए, क्योंकि कम दिहाड़ी में पहाड़ का अपेक्षाकृत महंगा खाना, ड्राइवर की जेब ही खाली कर सकता है।

 

क्योंकि बात १००-२०० की ही हुई थी इसीलिए हरीश ने सचेत से कह दिया कि वह सारी डाइट्स का भुगतान करने को बाध्य नहीं।

 

बात आई गई हो गयी हो गई लेकिन हरीश के संवेदनशील मन में विचार और सवाल आने लगे कि जब ड्राइवर को खाना, पार्टी ही खिलाती है तो उसने पहले क्यों नहीं कहा खुलकर, कहा भी तो गाड़ी मालिक ने १००-२०० की बात कही, और फिर झूठ क्यों बोला कि बात हुई है?

एक और बात कौंध गई कि ड्राइवर द्वारा खाने के लिए बोले गए झूठ को तो पकड़ लिया लेकिन उन आनलाइन शापिंग कंपनीज के झूठ का क्या जो १२०० की कीमत की चीज की कीमत को २५०० लिखकर उसे ४०% छूट के साथ १५०० का बेंच देती हैं?

क्या हम इस संगठित झूठ का विरोध कर पाते हैं?

 

 

- लवकुश कुमार

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पिता – एक लघुकथा

क्या हुआ विभू ? इतना परेशान क्यों लग रहा है ? मम्मी ने मुरझाया सा मुह लेकर बैठे अपने बेटे से पूंछा |

कुछ नहीं मम्मी, लग रहा है की मै जेईई की कोचिंग के लिए दिल्ली नहीं जा पाउँगा |

ऐसा क्यों कह रहे हो बेटा, पापा प्रयास कर रहे हैं न, फिर तुम्हे स्कालरशिप भी तो मिली है |

हाँ मम्मी स्कालरशिप तो मिली है फिर भी फीस काफी ज्यादा है, और आजकल तो पापा का काम भी बढ़िया नहीं चल रहा |

माँ, विभू के बाल सहलाती हुयी बोली, बेटा तेरी कोचिंग वाली बात तो तेरे पापा को तब से याद है जब तू 11th में ही था, आखिर

उनका भी तो सपना है की तुझे बेहतर से बेहतर शिक्षा मिले, भले ही हम तुझे बड़े स्कूल में न पढ़ा सके, लेकिन तेरी लगन देखकर

तेरे पापा कह रहे थे की एक साल की तो बात है करा देंगे कोचिंग | दरवाजे से पापा की आवाज आई, माँ दरवाजा खोलने गयी, पिता

ने अपनी जेब से बड़ी सावधानी से एक हरे रंग का नोट के आकर का कागज़ निकाला और बड़े गर्व से पत्नी के हाँथ में देते हुए बोले की

विभू की माँ विभू की तैयारी की व्यवस्था हो गयी है ! माँ समझ न पाई की ये कैसा कागज़ है, पापा ने बताया ये डीडी है विभू की कोचिंग

की फीस के लिए | महेश भाई साहब से बात हो गयी है, विभू पीतमपुरा में उनके घर ही रुककर तैयारी करेगा |

माँ पापा की बात सुन विभू ऐसे खुश हो गया जैसे उसे पंख लग आये हों अथाह आकाश में उड़ने को, बेटा पिता की

उपस्थिति में बहुत सुरक्षित महसूस कर रहा था |

पापा ने अपने काम में सहयोग के लिए एक पुरानी लोडर खरीदने के लिए जो पैसा जमा किया था

उसे निकाल अपने बेटे को बेहतर अवसर मुहैया कराने को खर्च कर दिया क्योकि वो अच्छे से समझते थे

की लोडर तो दो साल बाद भी आ जाएगी लेकिन विभू दो साल बाद जेईई में न बैठ पायेगा |

 

लवकुश कुमार

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सियाटिका- एक लघुकथा

यही दिन देखने को रह गए थे, पोंछा नहीं लगा सकती! भारी सामान नहीं उठा सकती !, वैभव की 65 वर्षीय माता जी ने अपनी सियाटिका दर्द के चलते डाक्टर द्वारा सुझाए परहेज़ को लेकर अपनी खिन्नता व्यक्त की।

 

वैभव को पहले तो यह सुनकर तकलीफ़ हुई कि अम्मा परहेज़ नहीं करना चाहती, फिर कुछ सोचकर मुस्कुराने लगे और बोले अम्मा कुछ 2-4 काम नहीं कर सकती उसका अफसोस करने के बजाय ये सोचो कि बहुत से जरूरी काम तो अभी भी कर सकती हो‌।

 

वैभव समझ चुके थे कि अम्मा की तकलीफ़ परहेज़ नहीं, देहभाव से जुड़ा अहंकार था, जिसे अब चोट लग रही थी क्योंकि अब उनका शरीर एक स्वस्थ व्यक्ति जैसा नहीं रहा था, जबकि शरीर तो एक साधन है और कई ऐसे महत्वपूर्ण कार्य अभी भी किए जा सकते हैं जिनमें शारीरिक रूप से पूर्ण सशक्तता आवश्यक नहीं होती।

 

- लवकुश कुमार

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मलबा- एक लघुकथा

धड़ाम- धड़ाम, तेजी से आवाज आ रही है, एक लापरवाह मजदूर, ईंटों को ढंग से रखने के बजाय उन्हें लापरवाही से फेंक रहा है, जो एक पुराने दरवाजे को शिफ्ट करने के लिए तोड़ी गई दीवार से निकलीं हैं।

 

जयंत जी के घर में रिनोवेशन और कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा है।

उनकी बूढ़ी माता जी, देख रहीं हैं कि कैसे उनके और उनके स्वर्गवासी पति के खून पसीने से बनाए गए मकान के कुछ हिस्सों को तोड़कर बदल दिया जा रहा है नए ढांचों से।

एक आम इंसान यादों में जीता है, वो ईंट, सीमेंट का मकान अम्मा की हर याद और संघर्ष का गवाह है इसीलिए उसके किसी हिस्से का टूटना उन्हें वैसे ही तकलीफ़ दे रहा है मानो उनके शरीर का कोई जीवित हिस्सा काटकर अलग किया जा रहा हो।

 

तोड़ने फोड़ने का सिलसिला पिछले १०-१२ दिनों से जारी है, नौसिखिया मिस्री से कराए गए काम में कई कमियां निकल रहीं हैं और अड़चनें पैदा हो रही हैं सो तोड़ फोड़ मजबूरी नहीं जरूरी हो गई है।

आज भी १२ बोरी मलबा इकट्ठा हो गया, बूढ़ी अम्मा उस मलबे की बोरियों को देख परेशान हैं और बड़बड़ा रही हैं कि ये मलबे का ढेर उनकी आंखों को दिक्कत दे रहा है, आज फिर इतना मलबा! अम्मा ने कहा।

 

उनके बेटे जयंत उन्हें समझाते हैं कि अम्मा अगर पुरानी गलतियों को सही करना है तो कुछ तोड़ फोड़ तो होगी है, जब सोच ही लिया है कि अब बेहतर डिजाइन से काम करवाना है तो मलबे से परहेज़ क्यों, ये तो पार्ट आफ द प्रोसेस है।

 

वैसे भी पुराने वक्त में आप या पापा और उस वक्त काम कर रहा मिस्री अपने हिसाब से सही ही किए होंगे, दूरदर्शिता तब नहीं थी तो गुस्सा आज क्यों?ये चिढ़ आज क्यों?

 

-लवकुश कुमार

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रूममेट - एक लघुकथा

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ह्रदय क्षेत्र वी.टी. ( विश्वनाथ टेम्पल ) के पीछे आम के पेड़ों से घिरे हुये

आर० के० हॉस्टल के वार्डन-ऑफिस के सामने हॉल में 15-20 लड़के खड़े हैं इधर उधर,

कोई ऑफिस के गेट के पास, कोई सीढ़ी के पास तो कोई हॉस्टल गेट के पास, क्या चल रहा है ?

लोग आपस में अपने लिए एक मुफीद रूममेट की तलाश में हैं, रूम अलाटमेंट की प्रक्रिया चल रही है |

विपुल भी अपने लिए एक अच्छे रूममेट की तलाश में है जो डिस्टर्बिंग भी न हो और यदि पढाई में सहयोग कर सके

तो सोने पे सुहागा |  एक से एक लड़के हैं, कोई बात करने में एक्सपर्ट तो कोई देखने सुनने में प्रभावशाली,

कोई मजाकिया है तो कोई अति गंभीर की जैसे बोलना ही न जानते हो |

इन सब आकर्षणों/विकर्षणों के बीच विपुल अपने पुराने निर्णय को री-कंसीडर कर रहा है

क्योंकि वो तो पहले ही कानपुर में कोचिंग के वक़्त के अपने एक बैचमेट ध्रुव को

रूममेट बनने के लिए बोल चुका है, इन सब उधेड़ बुन से दूर ध्रुव शांत और निश्चिंत भाव से

अपना डोजिअर फॉर्म भरने में लगा है |

 

अंततः विपुल सारे आकर्षणों को किनारे कर ध्रुव को चुन लेता है उसकी साफगोई (साफ़ बात कहना) और मेधा के चलते|

 

 

साल दर साल आगे बढे, हॉस्टल बदले , कमरा नंबर बदले लेकिन वो दोनों एक दूसरे के रूममेट रहे |

तीन साल के कोर्स में केवल एक पेपर की क्लासेज ही उन्हें साथ करने का मौका मिला |

आखिर कोर्स पूरा होने पर रूम के दरवाजे पर दोनों की सहमती से दर्ज हुआ “ बेस्ट रूममेट ”

 

-लवकुश कुमार

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तबादला - एक लघुकथा

 

जानव, एक सरकारी कार्यालय में बैठा पिछले दिन से चले आ रहे

एक प्रपोजल के मसौदे को अंतिम रूप देने में लगा था कि

उसका फोन बजता है, भावना का फोन था, उसकी ग्रेजुएशन के वक्त से दोस्त। 

 

कुछ दिनों पहले ही भावना अपनी माँ की ह्दयाघात से मृत्यु के सदमें से गुजरी थी,

इस बात को ध्यान में लेकर जानव ने तुरंत ही अपना काम रोककर भावना की काल अटेंड की। 

 

जानव कल मैं राजधानी गई थी जीएम से मिलने, अपने गृहनगर में तबादले की अर्जी लेकर,

भावना ने चिंतित स्वर में कहा। 

अच्छा किया जो व्यक्तिगत रूप से मिलकर अपनी परिस्थिति की जानकारी दी,

जानव ने जवाब दिया |

जानव मेरा तबादला हो जाएगा न, जी०एम०  सर कह तो रहे थी कि

अगले रोस्टर में नाम डाल देंगे आपका, भावना ने कुछ आशा पाने की उम्मीद में कहा। 

 

सरकारी विभाग में कई साल बिता चुके जानव ने सारी संभावनाओं

पर विचार करते हुए कहा कि, भावना तुम्हारा केस जेन्युइन है, इसलिए

तुम्हे तबादला मिलना चाहिए ताकि तुम अपने बीमार पिताजी का ख्याल रख सको, 

लेकिन वादा करने और एक्जीक्यूशन में अंतर है, कई फैक्टर्स चेक करने होते हैं जैसे

कि तुम्हारा रिप्लेसमेंट तैयार करना होगा आदि आदि, इसीलिए वक्त भी लग सकता है। 

 

ये सुनकर भावना दुखी हो गई क्योंकि वो अपना दिमाग उस तरफ लगाने की हालत में

खुद को नहीं पाती थी कि जब उसके तबादले में देरी के चलते उसके बीमार पिताजी कि

देखभाल की कुछ व्यवस्था करनी होगी, आखिर आफिस से छुट्टी भी तो एक लिमिट तक ही मिलेंगी। 

 

-लवकुश कुमार

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ब्लड रिपोर्ट - एक लघुकथा

हैलो

 

नमस्ते दादा

 

नमस्ते भइया, कैसे हो ?

ठीक हूं दादा, आज जा रहा हूं रिपोर्ट लेनें, दिल्ली 

पता नहीं क्या निकलेगा रिपोर्ट में, वैसे सब कुछ ठीक ही होना चाहिए, है न दादा

 

हां सब कुछ ठीक ही होना चाहिए, बाकी तुम परेशान न हों, कोई अगर थोड़ी बहुत दिक्कत होगी भी तो मेडिकल साइंस बहुत आगे है, डाक्टर ठीक कर देंगे, आनंद ने अपने छोटे भाई आशीष को हिम्मत देते हुए कहा।

 

ठीक है दादा नमस्ते, इतना कहकर आशीष ने फोन काट दिया।

 

आशीष को आनंद दादा कि ये बात बुरी लग गयी कि " थोड़ा बहुत कुछ दिक्कत होगी तो......." 

क्योंकि उसने तो ये सुनने के लिए फोन किया था कि ," तुम परेशान न हों रिपोर्ट नार्मल आएगी "

 

इधर अचानक से फोनकाल पूरी होने से, आनंद दादा को भी शंका हुई कि उनका प्रयास, छोटे भाई को हर परिस्थिति के लिए तैयार करने का था, लेकिन असर तो कुछ और ही हो गया शायद!

 

-लवकुश कुमार 

 

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अजीब - एक लघुकथा

क्या बात है कनिष्क किन यादों में डूबे हो ? 

निशीथ ने अपने रूममेट से पूंछा।

 

यही कि लोग कितने अजीब हैं, जो लोग उन्हें तरह तरह के झूठ बोलकर अंधेरे में रखते हैं,

असहमत होने पर भी अपनी असहमति व्यक्त नहीं करते और पीठ पीछे बुराई करते हैं

और तो और ऐसे लोग उनसे अपने मन मुताबिक काम भी करवा लेते हैं, ऐसों से तो वो

बहुत नज़दीक रहते हैं और मेरे जैसे लोग ( गहरी सांस लेते हुये )

जो उनका भला चाहते हैं, उनकी सुविधा असुविधा का ख्याल रखते हैं

उनसे वो दूरी बना लेते हैं क्या केवल इसलिए कि मैं उनकी बात से

सहमत न होने पर तुरंत अपना पक्ष रख देता हूं, कितना अजीब है न ?

 

हां अजीब तो है, निशीथ ने एक लंबी सांस लेते हुए कहा।

 

ये और भी अजीब होगा अगर तुम ऐसे " अंधेर-पसंद " इंसान से मेल जोल न बढ़ पाने पर

दुखी होते रहोगे जो सामने वाले से हर बात में केवल

" हां बिल्कुल सही " सुनना चाहते हैं और सामने वाले के "जीवन में सत्य के स्थान" के

बजाय अपने प्रति "तथाकथित समर्पण" को ही मानदंड मानते हैं।

 

यह सुन कनिष्क कमरे से बाहर निकल आया और हास्टल की बालकनी पर खड़ा हो

नीचे से गुलाब के फूलों की महक से सनी ठंडी हवा के झोंके को अपने गालों पर महसूस

करते हुए अपनी पसंद की समीक्षा करने लगा।

 

-लवकुश कुमार

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