लोग अंधविश्वास में क्यों फंसते हैं?
लोकल न्यूजपेपर में पढ़ते हुए कि एक पिता ने बेटे की चाह में बेटी की बलि दे दी, इसे पढ़ते हुए मन दुःख के साथ-साथ आश्चर्य से भी भर गया, ख्याल आया कि कैसे अशिक्षित और असंवेदनशील लोग है!
इस अंधविश्वास का कारण क्या हो सकता है?
एक कारण जो मैं समझ पा रही हूं, हो सकता है कि जब हम दुखी होते हैं, तब हमारा मन आशा की किरण ढूंढता हैं। उस समय किसी को वो एक किरण मिल जाती है या एक भ्रम कि उस समय कुछ लोगों को उम्मीद नहीं दिखती है तो वो बाबाओं के पास जाते हैं, दरअसल होता ये है, हम उस घोर दुःख की घड़ी में जो हमारे साथ खड़ा होता है उसे हम अपना भगवान समझ लेते हैं और ये वक्त की बात है कि उस समय हमें कैसा इंसान मिलता है, उसी इंसान का हम अनुसरण करते है। इस विश्वास के साथ की हमारी दिक्कतें दूर हो जायेंगी लेकिन अगर ये विश्वास तर्कहीन हो और हम संवेदना और करूणा भूलकर केवल स्वार्थ के वशीभूत हो जायें तो यही विश्वास अंधविश्वास में बदल जाता है, एक सात्विक इंसान का साथ हमें प्रेममयी बनाता है जबकि एक पाशविक प्रवृत्ति के स्वकेंद्रित इंसान का साथ हमें स्वार्थी और संवेदनाहीन बना देता है।
इसीलिए जरूरी है कि ये अज्ञान खत्म हो लेकिन उसमें समय लगेगा। लेकिन जब भी आप किसी संकट से गुजर रहे हों उस वक्त या तो आप खुद की अंतरात्मा पर यकीन करे या उस समय भी आप सही इंसान इस आधार पर चुने कि क्या वह अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरों का अहित करने की बात तो नहीं कर रहा, उसके जीवन में सच कितना है, इस तरह एक चुनाव आपकी जिंदगी बदल सकता है सकारात्मक या नकारात्मक आपके चुनाव पर निर्भर करता है।
दिक्कतें आती जाती रहती हैं, विकल्प मौजूद रहते हैं, दिक्कत के समय में सच्चे इंसान को ही चुनें और दिक्कतों के ऊपर इंसानियत को रखें, खुद से पहले समष्टि को रखें, अपने हित के लिए कोई ग़लत उदाहरण पेश न करें।
आपकी राय क्या है जरूर अवगत करायें।
शुभकामनाएं
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
जीवन में बहुत से संयोग होते हैं, सुखद भी और दुखद भी, ऐसा ही एक संयोग मेरे साथ हुआ। सड़क दुर्घटना में मेरे बाएं हाथ की कालर बोन टूट गयी,हालत ये हुई कि, कुछ देर लेटना, कुछ देर बैठना। ऐसे ही एक दिन पत्नी मुझे बिस्तर पर लिटाकर गई और मेरा फोन चार्जिंग पर मुझसे कुछ दूरी पर लगा हुआ था, फोन की घण्टी बजती है। पत्नी मेरे बेटे को मुझे मोबाइल देने के लिए भेजती है पर जब तक बेटा आता है, फोन कट जाता है। इसीलिए बेटा मोबाइल मेरे पास रखकर चल देता है, मैं अपना मोबाइल उठाने की कोशिश में अपना हांथ बेड पर इधर उधर रख रहा था पर दोनों कंधों में क्लैविकल ब्रेस बंधा होने के चलते मेरे हाथ की गति ठीक से नहीं हो पा रही थी, मैं बस कोशिश कर रहा था, इतने में खेलने के लिए वापस जाते हुए मेरे बेटे ने अपने पिता को देख, दिक्कत को समझ लिया, वह आता है और मोबाइल को बेड से उठाकर मेरे हाथ में रखकर फिर खेलने चला जाता है। मैं अपने 6 साल के बेटे की संवेदनशीलता, तत्परता को देख मुग्ध हो जाता हूँ और सोचता हूँ कि क्या संवेदनएं हममें जन्म से होती हैं शायद जरूरत है तो सही माहौल और प्रोत्साहन देकर इन्हें बनाए रखने की, शायद बच्चों की संवेदनाओं को सामाजिक व्यवहार ही भ्रष्ट कर देता है। सच ही कहा जाता है कि अपने बच्चे को कुछ भी बड़ा बनाने से पहले उसे नेक इंसान बनाएं। वह समाज के साथ साथ आपके भी काम आएगा, हां अगर आपने उसे मतलबी बना दिया तो हो सकता है कि जरूरत निकल जाने पर वो आपसे भी परायों की तरह व्यवहार करें।
- लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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चलो जवानी की गलियों में,
बचपन की मुस्कानखोजने,
चालाकी से भरे स्वरों में,
वो मासूम ज़ुबान खोजने,
"आँखों में" खिलते सपनों से,
नींदें जो भी टूट गई थी,
चलो आज फिर उन
"नींदों में" फिर से
वही उड़ान खोजने।
- संजय सिंह 'अवध'
ईमेल- green2main@yahoo.co.in
उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।
कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।
कविता में 'ज़ुबान खोजने' का क्या अर्थ है?
'ज़ुबान खोजने' का अर्थ है, बचपन की भोली-भाली बातों और मासूमियत को वापस पाना। यह उन शब्दों और भावनाओं को खोजने की बात करता है जो हम बड़े होते हुए खो देते हैं।
इस कविता का केंद्रीय विचार क्या है?
इस कविता का केंद्रीय विचार जीवन के सफर में बचपन की यादों को संजोना, सपनों को पुनर्जीवित करना और फिर से उड़ान भरने की प्रेरणा लेना है।
इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।
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हाल ही में मैंने एक मूवी देखी - "धनक"
पता नहीं क्यों पर उस मूवी की शुरुआत से ही जो दिख रहा था उसे मैंने अलग तरीके से लिया।
परी उसमें मुझे ईश्वर की तरह लगती है और हम जैसा होता है उसका भाई। परी के भाई की आंखें नहीं होती और वो आँखों को पाना चाहता है, उसका आंखों को पाने का जो रास्ता है वो जिंदगी में किसी बड़े लक्ष्य को पाने का रास्ता है। जब हम जिंदगी में कुछ बड़ा पाना चाहते है तो सफर में कुछ लोग अच्छे साथी की तरह मिलते है, कुछ आगे का रास्ता बताते है कुछ उसमें बाधा भी डालते है। कुछ लोग हमें उन बाधाओं से निकालते भी है। जिससे हमारी बड़ी इच्छा पूरी हो जाए उसे हम ईश्वर जैसा मानने लगते है, इस फिल्म में शाहरुख खान अभिनीत पात्र वो ईश्वर है।
लेकिन जिंदगी में कभी कभी ठहरने का मन करता है जैसे वो शादी वाला घर था उस फिल्म में और कभी-कभी पैरों के नीचे तपती रेत हमें तेज चलने को मजबूर करती है।
उस फिल्म का हर पात्र कुछ देर में चला जाता है, ये हमें सिखाता है कि लोग सिर्फ हमें आगे के रास्ते के बारे में बताने के लिए ही आते है, पूरी जिंदगी के लिए एक स्थाई सहारा ईश्वर ही होते है, जैसे उसमें परी होती है,लेकिन कभी-कभी ईश्वर भी हमारी परीक्षा लेने के लिए हमारा साथ छोड़ देते है, जैसे उसे आंखे मिलने से पहले परी बेहोश हो जाती है और उसका छोटा भाई उसे उठाते हुए बेहोश हो जाता है, ईश्वर भी यही चाहते है कि हम अपनी आखिरी साँस तक लड़े फिर वही होगा जो सही होगा उसमें उस बच्चे को आंखें मिल जाती है, हमें हमारी सही मंजिल मिल जाएगी।
उसमें कई बार वो लड़की ऐसी जगह पहुँचती है जहां पर वो उस मुकाम को मंजिल समझ सकती थी जैसे शादी वाले घर में जब उसको और उसके भाई को हमेशा के लिए रखने की और उसकी शादी की बात होती है पर वो विनम्रता से मना कर देती है क्योंकि उसके लिए उसके भाई की आंखे ही जरूरी और पहली प्राथमिकता थी।इसी तरह से हमें जीवन में किसी मंजिल को पाने के लिए छोटे छोटे स्वार्थों को त्यागना होता है तब हम वो बड़ी चीज पाते है जिसकी हमने ज्वलंत इच्छा की थी।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
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अक्षिता विस्मित भाव से, चेतना मैं तुम्हारी एक बात से चौंक जाती हूँ कि तुम अपरिचित लोगों से भी इतने खुलेपन के साथ कैसे बात कर लेती हो, तुम्हें डर नहीं लगता कि इससे कोई हानि भी हो सकती है या लोग तुम्हें ग़लत समझ सकते हैं?
चेतना मुस्कुराते हुए देखो अक्षिता, अपना तो सिंपल फंडा है जो वास्तव में हो वही दिखो जब मैं नए लोगों से फ्रैंकनेस से पेश आती हूँ तो सामने से भी मैं ऐसी ही उम्मीद रखती हूँ। इससे हम दोनों मुखौटे के साथ नहीं मिलते, मैं इससे लोगों से सच्चाई से मिलती हूं और जो मुझसे इत्तेफाक रखेंगे वही मिलेंगे, जो मेरे काम के महत्व को समझेंगे, किसी खास मौके पर हम मिले तो हम वही रहेंगे जो पहली बार में थे। हमारी ईमानदारी ही हमारे एसोसिएशन की मजबूत नींव बनेगी। इसीलिए मैं अपरिचित लोगों से ऐसे ही सच्चाई से मिलती हूँ। अगर हम खुद ही मुखौटा लगा लेंगे तो सामने वाले से सच्चा होने की उम्मीद नहीं कर सकते।अगर बाद में कलई खुलने पर कोई साथ छूटना है तो अभी वो जुड़े ही क्यों?
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
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गरिमा - आभा एक बात तो बता जरा।
आभा - हाँ गरिमा, पूछो?
गरिमा - संपादक महोदय जब मुझे लेखिका महोदया बुलाते हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है जबकि नाम से जब वो बुलाते हैं तो इतना अच्छा नहीं लगता, ऐसा क्यों?
आभा - तू जवाब जानती है, फिर भी मुझसे पूछ रही है। लेखिका तो तू है, तुझे पता होना चाहिए और आभा हंसने लगती है।
गरिमा मुस्कुराते हुए- तू ऐसा ही समझ ले, अब बता।
आभा - इस संबोधन में तुम्हारे काम (लेखन) को महत्व दिया जा रहा है, जो तुम्हारा भी महत्व है, हर व्यक्ति खुद को महत्वपूर्ण समझना चाहता है और इसके संबोधन में तो तुम्हारे काम व तुम्हे दोनों को महत्व मिलता है, इसीलिए अच्छा लगता है दूसरे शब्दों में
'लेखिका' शब्द गरिमा तुम्हारे पेशे और पहचान का प्रतीक है। जब संपादक तुम्हे 'लेखिका' कहते हैं, तो वह तुम्हारे काम को मान्यता देते हैं और तुम्हे यह महसूस कराते हैं कि तुम एक पेशेवर हो और तुम सम्मानित महसूस कराती हो।
ठीक है न लेखिका महोदया ? और दोनों हंसने लगती हैं।
© सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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आप इतना खुलकर कैसे बात कर लेते है, क्या आपको डर नहीं लगता? कि सामने वाला आपके बारे में गलत सोच सकता है?
नहीं मुझे लोगों का डर नहीं लगता क्योंकि मैंने शराफत का लबादा नहीं ओढ़ रखा है।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
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बच्चों को इन महान विभूतियों के बारें में पढ़ायें और उन्हें गुणवान तथा उच्च आदर्शों वाला इंसान बनाये, फिर वो ना छोटी बातों पर परेशान होंगे और ना ही छोटी बातों में फंसेंगे, फिर उनके उद्देश्य भी बड़े होएँगे और उनके काम में उत्कृष्टता दिखेगी और साथ ही वो दूसरों की दिक्कत के प्रति संवेदनशील भी होंगे और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाकर सही और त्वरित निर्णय ले पाएंगे |
अच्छा हो कि इनकी जीवनी पर आधारित पुस्तकें एक डिस्प्ले रैक में लगा दें बच्चों के अध्ययन कक्ष में |

स्वयं भी पढ़ें और बच्चों के साथ प्रेरणादायक प्रसंग साझा करें |
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वीर दुर्गा दास - दुर्गादास एक ऐसे नायक थे, जिनका सारा कर्तृत्व, कर्तव्य और संपूर्ण जीवन परस्वार्थ, परसेवा और परोपकार की पवित्र वेदी पर बलिदान होता रहा । वे न राजा थे और न राजकुमार । न उनका कोई पैतृक राज्य था और न बाद में ही उन्होंने कोई भू-खंड अपने अधिकार में करके उस पर अपना राजतिलक कराया । जबकि उन्होंने अपने बाहुबल और बुद्धिबल से मारवाड़ को स्वतंत्र कराया, मुगलों से तमाम जागीरें छीन ली, दिल्ली के बादशाह औरंगजेब को नीचा दिखाकर आर्य धर्म की पताका ऊँची कर दी । |
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सुभाष चंद्र बोस - स्वाधीनता के पुजारी |
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दादाभाई नौरोजी -स्वाधीनता के मंत्र- द्रष्टा |
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जानकी मैया- समाज - सुधार और जनसेवा मे संलग्न |
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जमशेद जी टाटा - आर्थिक पुनर्निर्माण के अग्रदूत |
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द्वारकानाथ घोष - धन, मन और चरित्र के धनी |
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7 |
पंजाब- केसरी लाला लाजपत राय - भारतीय स्वाधीनता को करने में जिन शिल्पियों का आदरणीय योगदान रहा है, पंजाब- केसरी लाला लाजपत राय का अन्यतम स्थान है |
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8 |
स्वामी विवेकानन्द - धर्म और संस्कृति के महान उन्नायक |
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स्वामी रामकृष्ण परमहंस- युग चेतना के सूत्रधार |
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कार्ल मार्क्स - समानता के पक्षकार |
इन जीवनियों को आप किफायती लागत में गायत्री परिवार की वेबसाइट से भी प्राप्त कर सकते हैं |
आज एक साथी से बात चल रही थी कि कैसे बड़ों द्वारा मिला प्रोत्साहन हमारी ऊर्जा बढ़ा देता है, आत्मविश्वास बढ़ा देता है इस तरह कि दिन बहुत बढ़िया जाता है |
अपने पुराने दिनो की बात याद करूँ तो एक दिन की बात है कि मेरे मामाजी जोकि वन विभाग मे अधिकारी थे उस समय, हमारे घर आए हुये थे अपने कुछ सहकर्मियों के साथ उस वक़्त मै ग्यारहवीं मे था, क्योंकि मेरे माता पिता सम्मान करते थे मामा जी का तो, उनकी बात का बड़ा महत्व था मेरे लिए या कह लीजिये कि मै अपने माता-पिता के चश्मे से से देखता था मै लोगों को, जैसा कि ज़्यादातर बच्चे करते हैं, मुद्दे कि बात पर आता हूँ, हुआ ये कि मैंने भौतिकी (वही विषय जिसमे मैंने बाद मे परास्नातक किया ) के ग्यारहवीं और बारहवीं दोनों (जी हाँ उस काल मे बोर्ड परीक्षा मे ग्यारहवीं और बारहवीं दोनों का पाठ्यक्रम आता था ) के सूत्र को दो बड़े से चार्ट्स पर स्केच पेन से लिखकर बैठक कि दीवार पर लगा रखे थे, वही मेरे बैठने कि जगह थी,
जैसे ही मेरे मामा के सहकर्मी ने मेरे चार्ट्स पर कुछ टिप्पड़ी कि मेरे मामा ने तुरंत ये बात कही कि ये लड़का आगे चलकर आईएएस बनेगा, उस वक़्त मै आईएएस के बारे मे इतना जानता था कि ये उच्च स्तर कि प्रतियोगी परीक्षा से बनते हैं, वैसे मेरा उस वक़्त आईएएस बनने के लिए पढ़ाई करने का कोई इरादा न था लेकिन क्योंकी बड़े मामा ने ये बात कही तो मै अपनी क्षमताओं को लेकर आश्वस्त हो गया कि मतलब दम और बुद्धि है मुझमे वैसी, हालांकि मै आईएएस तो नहीं बना लेकिन उस बढ़े हुये आत्मविश्वास के चलते अपना बेस्ट दे पाया हर उस काम मे जो मैंने अपने हांथ मे उठाया, बाकी चीज़ें तो समय और परिस्थिति पर निर्भर करती हैं लेकिन "अपनी क्षमताओं पर विश्वास हों बहुत जरूरी है अपना बेस्ट दे पाने और फोकस होकर काम कर पाने के लिए" |
ऐसे ही मेरे पापा के फुफेरे भाई जोकि एक बैंक मे प्रबन्धक थे मेरी नज़र मे सम्मानीय हैसियत रखते थे ने मेरे दसवीं के परीक्षा परिणाम को देखा और, मुझसे देश की आईआई टी पर बात कर रहे थे उस एक पल ने भी मुझे अपनी क्षमताओं और योग्यताओं पर विश्वास दिलाया था हालांकि नीव बढ़िया न हो पाने और अन्य परिस्थितियाँ अनुकूल न होने के चलते मै ग्रेजुएशन के लिए आईआई टी मे प्रवेश न पा सका और बाद मे पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए आईआई दिल्ली मे प्रवेश सुनिश्चित किया, ताऊ जी ने जो लायक होने का इशारा दिया उसने भरपूर रोल अदा किया |
ऐसे ही हमारे मुहल्ले के एक पत्रकार ताऊ जी ने मेरे दसवीं के रिज़ल्ट पर जो पूछताछ की थी मुझसे कि मै खुद को आम से खास मानने लगा था |
बाल मन ठहरा, बचपन मे रिज़ल्ट के साथ मिली एक प्लेट भी बहुत माने रखती थी, पुरस्कार तो प्रतीक होते हैं उनका आकार और कीमत मायने नहीं रखती |
"यहाँ एक बात पाठकों के मन मे आ सकती है कि क्या सारा आत्मविश्वास दूसरों के बताने पर ही आया कि कुछ खुद का भी था, मै बताए देता हूँ कि खुद से भी विश्वास था कि जब मै पुस्तक के प्रश्न हल कर ले रहा हूँ या बीएचयू मे आए हुये पिछले साल के पेपर सॉल्व कर ले रहा हूँ तो असल परीक्षा मे तो अच्छा करूंगा ही, और साथ मे मुझे अपने नियमित अभ्यास पर भी भरोसा था, लेकिन जब बड़े तारीफ करते हैं तो आश्वस्त हो जाते हैं आप क्योंकि आप कहीं भी रहो एक दो लोग ऐसे जरूर मिल जाते हैं जो छोटी छोटी सतही चीजों पर आपको नीचा महसूस कराते हैं और आत्मविश्वास को तोड़ने का प्रयास करते हैं, मेरे आस पास भी कुछ ऐसे लोग थे जो मुझे नीचा दिखाया करते थे केवल इस बात के लिए कि मै अपने पापा के काम मे हांथ बंटाने और स्कूल कोचिंग के अलावा दुनियादारी के बाकी पचड़ों मे इंटरेस्ट नहीं लेता था, भला ये भी कोई नीचा दिखाने की बात हुयी ! हाहाहाहा !"
ऐसे ही एक बार अँग्रेजी के शिक्षक ने कहा था कि लवकुश तुम पत्रकार बन सकते हो छोटी सी बात को डीटेल मे लिख देते हो, back in the mind उनकी वो बात है कहीं |
मेरे एक करीबी दोस्त शुभांशु भाई के वहाँ जब भी जाना होता था तो उनके घर मे सब लोग बड़े आत्मीय तरीके से मिलते थे चाहे वो अंकल-आंटी लोग हों या दीदी लोग, अंकल पोस्ट ऑफिस मे अकाउंटेंट थे और मै अपने दोस्त और दीदी लोगों की समझ से हमेशा प्रभावित रहा, नतीजा उनका भी मुझे मान देना मेरी सेल्फ स्टीम को बढ़ाता रहा , इन मुलाकातों और रेकोग्निसन का अमूल्य योगदान होता है मेरे जैसे किसी भी इंसान के जीवन मे |
सरकारी सेवा मे शामिल होने पर पहली तैनाती सिक्किम जैसे खूबसूरत प्रदेश मे हुयी वहाँ सर्विस के शुरुआती दिनो मे ही प्रभारी विज्ञानी द्वारा मेरे हर रिपोर्ट मे डिटेल्स को शामिल करने कि आदत को सराहा गया और मैंने और अधिक मन ( माने ज्यादा समर्पण भाव से ) से अपना काम किया और प्रयास किया लोग मुझे मेरे व्यवहार से बाद मे मुझे मेरे काम से पहले याद रखें|
मेरे बाबा को भी मेरी पढ़ाई पर गर्व था और वो इसे व्यक्त भी करते थे नतीजा यही हुआ कि जो कुछ पाया और सीखा हूँ अपनी पढ़ाई के बल पर, ये आत्मनिर्भर जीवन भी, मेरी लाइफलाइन रहा है बड़ों से मिला प्रोत्साहन, सबको प्रणाम इस नेक कार्य के लिए जिसमे ज्यादा समय न लगा बस लगा तो दया के भाव से किसी के प्रयासों को देखना, आप जरूर प्रोत्साहित करें लोगों को उनके अच्छी नियत से किए गए कार्यों के लिए |
संस्कृत मे परास्नातक और शादी के बाद, हिन्दी मे परास्नातक कर रही आरती जी अपने बचपन को याद करती हुयी कहती हैं कि जब वो पढ़ने बैठती थीं तो उनकी लगन देखकर उनके पिता जी उन्हे शाबाशी देते और कहते कि तुम अच्छा करोगी और प्रोत्साहन के तौर पर क्लास से पहले ही काफी कुछ पढ़ा देते थे जिसने उन्हे और अधिक प्रोत्साहित किया पढ़ने को और हमेशा एक कदम आगे रहने के प्रयास को |
प्रशंसा के कमाल के संबंध मे इस वैबसाइट से जुड़ी हुयी कवयित्री, सौम्या गुप्ता जी अपने अनुभव याद करते हुये कहती हैं कि
बचपन से ही मेरी पढाई को लेकर बहुत प्रशंसा हुई और मेरी मौसी, मेरे मामा और टीचर तक मेरी बहुत तारीफ करते थे क्योंकि टीचर्स के अथक प्रयास ( जिसमे मुझे मार भी खानी पड़ी हाहाहा !) मेरी Maths बहुत अच्छी हो गई थी।
मुझे भजन, सोहना देवीगीत, जिसे लोकगीत कहते है भी अच्छे से आते थे, मेरे भजन के कारण मेरी नानी और चाची, ताई ने भी बहुत तारीफ की।
एक तारीफ जिसका मेरे जीवन में बहुत ज्यादा महत्व है, मैं डा. विजय अग्रवाल सर के भेजे आर्टिकल को सारांश में बदलती हूँ, उन्होंने मुझे ये ये काम सौंपा उसके एक साल बाद तक मैं उनसे डांट सुनती रही क्योंकि मेरी हिंदी भाषा और आर्टिकल लिखने की शैली स्तरीय नहीं थी। वो मेरे लिए Best teacher है उन्होंने भले डांटकर ही सही पर मुझे बहुत सिखाया, उन्होंने छोटी होली के दिन मेरे आर्टिकल पर “Excellent, इतना भेजा। Keep it up your hard work” पूरे तीन दिन होली में मैं भले ही दोस्तों से न मिल पायी, घर मे ही रही लेकिन सर की इतनी लाइन ही मेरी होली को खुशनुमा बनाने के लिए काफी थी क्योंकि आप जब खुश होते है तो खुश रहने के रास्ते बाहर नहीं खोजने पड़ते, बस अंदर ही आपके काम को लेकर खुशी आपको ऊर्जा देती रहती है
मैंने अपनी लेखनी को विकसित करने के लिए डा. विजय अग्रवाल सर के भेजे गए लेखों को सारांशित किया, इसका फायदा मुझे आज तक मिल रहा है|
सौम्या जी आगे याद करती हुयी लिखती हैं कि एक प्रशंसा और आशीर्वाद जिसने उनके जीवन को बदल दिया, उनके शब्दों मे
" एक बार मैंने प्रीति मैम को अपनी इच्छा को बताने के लिए एक कविता भेजी और उन्होने वो कविता अपने दोस्तों भी भेजी, जिसके लिए मुझे ma'am कि सर कि और उनके दोस्तों कि तरफ से खूब तारीफ मिली और मैंने उसके बाद अपने कविता लेखन को और बल दिया,
ma'am मुझे पहले सिखाती है, न सीखने पर डांटती है, और फिर सीख लेने पर प्रशंसा भी करती है, इस प्रशंसा को पाने के लिए मुझे हमेशा आत्मसुधार, आत्मचिंतन व मनन पर ध्यान देना होता है, जिससे बहुत सुधार हुआ है।
मेरी हिंदी व्याकरण की गलतियाँ, DP बनाते समय होने वाली गलतियाँ, यहाँ तक की मेरी सोच की सकारात्मकता के लिए सबसे ज्यादा योगदान उनका रहा है।
सौम्या जी इस बात पर ज़ोर देती हैं कि
"प्रशंसा हमेशा सच्ची होनी चाहिए,सही काम के लिए होनी चाहिए। प्रशंसा से आत्म बल बढ़ना चाहिए पर प्रशंसा की चाह एक आदत नहीं होनी चाहिए। अगर आप कोई ऐसा काम कर रहे है जो बहुत जरूरी है और उसके लिए आपका अंतर्मन आपसे कह रहा हो तो उसे कोई भी प्रसंशा न मिलने पर भी करना चाहिए बस आपका काम समाज के हित में हो।"
इनकी एक कविता भी है प्रशंसा को लेकर जिसके माध्यम से इन्होने कई लोगों की आवाज को हम तक पहुंचाया है :
समाज के पैमाने पर
सुंदरता की प्रशंसा पाने के लिए
मैंने बहुत इच्छा की
पर समाज को चाहिए
गोरा रंग, आकर्षक काया
इसीलिए कभी वो प्रशंसा
मैं पा न सकीं
फिर खुद को देखा मैंने
खुद को संवारने की कोशिश छोड़कर
ज्ञान पाने के लिए प्रयास किए
छोड़ दी अपेक्षाएं उसकी प्रशंसा पाने की
जो समय के साथ चला जाना है
फिर पाया सच्चा ज्ञान और मिली सच्ची प्रशंसा
जो शरीर की नहीं, थी मन की, ज्ञान की,
समाज के द्वारा नहीं, कुछ सच्चे लोगों से,
जो समझते है भौतिकता से आगे की बातें।
अगर आपके पास भी कोई कहानी है प्रोत्साहन से कमाल की तो लिख भेजिये हमे नीचे दिए गए लिंक से क्या पता उसे पढ़कर कोई और भी प्रोत्साहित हो जाए और देश समाज या स्वयं के काम आ जाए | या फिर lovekush@lovekushchetna.in पर ईमेल कर दीजिये
लेख मे शामिल सभी लेखकों की तरफ से ढेरों शुभकामनायें
बच्चों को इन महान विभूतियों के बारें में पढ़ायें और उन्हें गुणवान तथा उच्च आदर्शों वाला इंसान बनाये, फिर वो ना छोटी बातों पर परेशान होंगे और ना ही छोटी बातों में फंसेंगे, फिर उनके उद्देश्य भी बड़े होएँगे और उनके काम में उत्कृष्टता दिखेगी और साथ ही वो दूसरों की दिक्कत के प्रति संवेदनशील भी होंगे और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाकर सही और त्वरित निर्णय ले पाएंगे |
अच्छा हो कि इनकी जीवनी पर आधारित पुस्तकें एक डिस्प्ले रैक में लगा दें बच्चों के अध्ययन कक्ष में |

स्वयं भी पढ़ें और बच्चों के साथ प्रेरणादायक प्रसंग साझा करें |
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1 |
टॉल्स्टॉय- मानव जीवन के भाष्यकार |
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रानी दुर्गावती - स्वतंत्रता के लिए प्राण अर्पण करने वाली, युद्ध लड़ने वाली विरंगना |
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3 |
पंडित-मदन-मोहन-मालवीय : बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक |
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श्रीमती सरोजिनी नायडू - मातृभूमि की सच्ची सेविका |
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5 |
महारानी अहिल्याबाई - उदारता और महानता की प्रतिमूर्ति |
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6 |
स्वामी श्रद्धानंद - भारतवर्ष के प्राचीन आदर्श, गुरुकुल |
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कर्मयोगी केशवानंद - साधु- संन्यासियों |
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8 |
समर्थ गुरु रामदास - भक्ति और शक्ति के समन्वयी |
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9 |
वीर शिवाजी - शौर्य और धर्मनिष्ठा के प्रतीक |
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रवीन्द्र नाथ टैगोर - साहित्यिक ऋषि, नोबल पुरस्कार |
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गुरु गोविंद सिंह- भक्ति और शौर्य के अमर साधक |
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गणेश शंकर विद्यार्थी- त्याग और बलिदान के आराधक |
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देशबंधु चितरंजनदास - वकालत का अपूर्व आदर्श |
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श्री विश्वेश्वरैया - स्वावलंबन द्वारा उच्च शिक्षा • सार्वजनिक लाभ के निर्माण कार्य जन जीवन में शिक्षा की महत्ता • राष्ट्रीय चरित्र का विकास, कैसा भी अवसर क्यों न हो, मनुष्य को अपना स्तर नहीं घटाना चाहिये ।। ऊँचा स्तर रखने से उसका प्रभाव अच्छा ही पड़ता है और आज नहीं तो कल लोग उसकी तरफ आकर्षित होते ही हैं |
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राजा राम मोहन राय - एक ब्रह्मोपासना का प्रचार उन्नीसवीं सदी का समय भारतवर्ष के इतिहास में महान् परिवर्तनों का था |
इन जीवनियों को आप किफायती लागत में गायत्री परिवार की वेबसाइट से भी प्राप्त कर सकते हैं |