Recent Articles Related To पुस्तक समीक्षा

क्यों शामिल हों पुस्तक परिचर्चा मे ? कुछ जरूरी जो पाया जा सकता है, एक दृष्टि |

सबसे पहले बात कि कौन-कौन  शामिल होता है

"कुछ समन्वयक, सुधी पाठक, वरिष्ठ लेखक और समाज के अध्येता"

क्या होता है?

समन्वयक अपनी मन बांध लेने वाली भाषा शैली में सभी को संबोधित करते हैं फिर शामिल पाठक स्वयं द्वारा पढ़ी हुयी पुस्तक पर चर्चा करने की इच्छा व्यक्त करते हैं और समन्वयक उनसे बारी-बारी से आग्रह करते हैं अपनी पुस्तक पर अवलोकन, अनुभव और सीख साझा करने को |

क्या-क्या मिल सकता है जो आपके लिए उपयोगी हो

सबसे पहले उन्हे संबोधित करता हूँ जो किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, उन्हे लग सकता है कि प्रतियोगी परीक्षा मे इन साहित्यिक किताबों का क्या महत्व :महत्व है, खूब महत्व है

सोंच व्यापक होगी, एक से एक मेहनती और त्यागशील, न्यायशील और बहादुर लोगों के बारे मे पढ़कर और सुनकर जो स्पष्टता आएगी वो आपको बेहतर और नियमित तैयारी के लिए प्रेरित करेगी

अगर आपके जीवन मे संघर्ष हैं तो हो सकता है कि आप ऐसे इंसान के बारे मे पढ़ लें या सुन लें जिन्होने विकट परिस्थितियों मे भी हिम्मत बांधकर मेहनत की और अपने साथ दूसरों का भी भला कर सके, माने फिर आपको अपनी दिक्कतें छोटी लगने लगेंगी|

हो सकता है कि आपको जीवन उद्देश्यहीन लग रहा हो, सब कुछ खत्म सा दिख रहा हो, तब भी आपको अपने जीवन को अर्थ देने के कई तरीके मिल सकते हैं

हो सकता है कि पढ़ाई के दौरान भी जीवन या पढ़ाई से जुड़ी कोई बात आपके पढ़ाई के हिस्से का वक़्त जाया कर रही हो, उस अवस्था मे एक अच्छी किताब के साथ बिताए नियमित  कुछ मिनट्स आपके मन को शांति प्रदान कर आपकी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर/दक्ष कर सकते हैं

हो सकता है कि किसी उधेड़बुन मे हों और आपको कोई रास्ता दिखाने वाली पुस्तक का नाम मिल जाए

हो सकता है कि आप कोई निर्णय न ले पा रही हों और कोई ऐसी पुस्तक के बारे मे चर्चा हो जाए जो आपको उस विषय पर स्पष्टता दे सके

हो सकता है कि आप कोई नया काम करना चाहते हों, तरीका न सूझ रहा हो और आपको किसी ऐसे इंसान कि पुस्तक के बारे मे पता चले जो उसी काम पर अपने अनुभव साझा किए हों |

एक जागरूक, जिम्मेदार और शिक्षित नागरिक के तौर पर आपका ध्यान जरूरी मुद्दों की तरफ जाएगा, जो हमारे परिवेश या हमारे लोगों को / उनके मन को प्रभावित करते हों 

विभिन्न परिप्रेक्ष्य मे चीजों को समझने के लिए अलग अलग किताबों के बारे मे जानने का मौका

उम्र भर के अनुभवों का निचोड़ होता है किताबों में, आप उस समझ को हासिल कर लोगों के साथ बेहतर ताल मेल बैठा कर कार्य कर सकते/सकती  हैं |

हम सबके जीवन मे कोई दोस्त होता है जिसका साथ अच्छा लगता है, क्योंकि उसकी बातें रुचिकर लगती हैं, कितना अच्छा हो कि इतिहास के किसी महान इंसान का आपको साथ मिल पाये, उनकी किताब पढ़कर |

एक समूह से परिचय होगा जो आपकी ही तरह साहित्य अध्ययन को अपनी दिनचर्या मे स्थान देकर, समाज की एक समवेशी छवि चाहता है अपने मन मे, लोगों को उनके संघर्षों और आकांक्षाओं के साथ स्वीकार करना चाहता है, कुछ बदलाव की बात और फिर अपने स्तर पर काम ताकि लोगों के जीवन मे गरिमा, स्वतन्त्रता, उत्कृष्टता और संपन्नता मिल पाये और ज्यादा से ज्यादा लोग देश के विकास और स्थायित्व मे अपने योगदान दे सकें |

और क्या सीख सकते हैं आपमें क्या बेहतरी हो सकती है पुस्तक परिचर्चा के बाद इसके लिए मेरा ये एक लेख पढ़ा जा सकता है, लिंक नीचे है :

किताबों से हम क्या पा सकते हैं : Book Meet ( पुस्तकों पर चर्चा ) एक सार्थक प्रयास और जरूरी भी

एक रोचक लेख विशाल चंद जी की तरफ से - आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में (मिचिको आओयामा) - लघु समीक्षा सह परिचय - समीक्षक विशाल चंद

मिलते हैं परिचर्चा मे |

शुभकामनायें

-लवकुश कुमार


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

वेबसाइट के उद्देश्य के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।


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आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में (मिचिको आओयामा) - लघु समीक्षा सह परिचय - समीक्षक विशाल चंद

पुस्तक समीक्षा :आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में

लेखिका : मिचिको आओयामा | प्रकाशक : पेंगुइन स्वदेश

टोक्यो की एक शांत-सी सामुदायिक लाइब्रेरी पर आधारित उपन्यास, आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में केवल किताबों की कहानी नहीं है, बल्कि उन इंसानों की कथा है जो अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर ठहर गए हैं।

इस लाइब्रेरी की रहस्यमयी लाइब्रेरियन सायूरी कोमाची पाठकों को सिर्फ़ किताबें नहीं देतीं, बल्कि उनके भीतर छिपे सवालों और उलझनों को पढ़ लेती हैं। अक्सर वह ऐसी किताब थमा देती हैं, जिसकी ज़रूरत सामने वाले को होती है—भले ही उसे खुद इसका एहसास न हो।

यह उपन्यास पाँच अलग-अलग पात्रों की कहानियों के माध्यम से आगे बढ़ता है। कोई अपने काम से ऊब चुका है, कोई मातृत्व और अपने अधूरे सपनों के बीच झूल रहा है, तो कोई जीवन के अगले अर्थ की तलाश में भटक रहा है। ये सभी पात्र अपने जीवन के ऐसे पड़ाव पर खड़े हैं जहाँ एक छोटा-सा बदलाव, एक सही सवाल या एक किताब उनका सोचने का नज़रिया बदल देती है।

कहानी में जीवन को ‘merry-go-round’ यानी झूले की तरह दिखाया गया है—जहाँ हर इंसान किसी और की स्थिति से ईर्ष्या करता है, जबकि असल में सुख की कोई स्थायी अवस्था होती ही नहीं। यह विचार बड़े सरल और सहज ढंग से जीवन की गहरी सच्चाइयों को सामने रखता है, बिना किसी भारी दर्शन के।

पढ़ते समय महसूस होता है कि किताब की गति काफ़ी शांत है। कहीं-कहीं विचारों में दोहराव भी लगता है और तेज़ रफ्तार कहानी पसंद करने वाले पाठकों को इसका धीमापन खटक सकता है। लेकिन जो पाठक ठहरकर, मन से पढ़ना पसंद करते हैं, उनके लिए यह किताब एक सुकून भरा अनुभव बन जाती है।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताक़त इसकी "we" feeling यानी “हम” की भावना है—छोटे-छोटे रिश्ते, अजनबियों के बीच पनपती दयालुता, और संवाद की अहमियत

किताब यह याद दिलाती है कि जीवन हमेशा हमारी योजनाओं के अनुसार नहीं चलता, लेकिन कई बार अनपेक्षित मोड़ हमें ठीक वहीं पहुँचा देते हैं, जहाँ हमें होना चाहिए।

कुल मिलाकर, आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में एक हल्की, संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली किताब है। यह जीवन बदल देने का दावा नहीं करती, लेकिन पढ़ते-पढ़ते मन को थोड़ा शांत ज़रूर कर देती है—और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है।

" पढ़ें, समझें, बात करें और साझा भी "         

शुभकामनाएं 

विशाल चन्द  @reading_owl.3

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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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परख (जैनेन्द्र कुमार): एक लघु समीक्षा सह परिचय - समीक्षक संजय सिंह 'अवध' 

“परख” इसे जिसने केवल प्रेम संबंधी रचना समझा, वो इसके असली मर्म को समझ ही नहीं पाया।

हमारे जीवन में ये प्रायः होता है कि हम जिसके सबसे नज़दीक होते हैं उसे हम वास्तव में परख ही नहीं पाते। जैसे कि इस कृति मे पिताजी ने अपने पुत्र बिहारी को और सत्य ने कट्टो को परखने में भूल की, किंतु बिहारी और कट्टो जो एक दूजे से कुछ क्षण को मिले और परख पाये कि दोनों एक दूजे के लिए उपयुक्त हैं। 

परख लालच और पैसों से कभी नहीं होती, सेवाभावी से होती है ,और यह भाव निश्छल, निष्कपट प्रेम माँगता है। शुरुआत में महसूस होता है कि कट्टो और सत्य की प्रेमकथा है, किंतु वास्तव में यह उपन्यास बिहारी और कट्टो के उन अनछुए पहलुओं के बारे में है जो समय आने पर ही दिखते हैं। 

अपितु इस कहानी का केंद्रबिंदु कट्टो है किंतु कट्टो के गँवरपन (शहरी लोगों के अनुसार) में व्यक्तित्व की असली परख छुपी हुई है, ठीक उसी तरह जिस तरह बिहारी की अपव्ययता के चर्चों में उसका वास्तविक कारण। 

 

"दर्शन, उपन्यास के रूप मे|"

यदि कालजयी से भी ऊपर कोई शब्द है तो इस उपन्यास को उस श्रेणी में रखना सर्वथा उचित है, क्योंकि इसकी प्रासंगिकता जो तब थी जब यह लिखा गया, वही आज भी है |

 

तो क्या ख्याल है ?, कब पढ़ रहे इस कृति को ? 

जरूर पढ़िये, साझा करिए और परिचर्चा भी 

शुभकामनायें

 

 

- संजय सिंह 'अवध' 

ईमेल- green2main@yahoo.co.in

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समीक्षक, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।

समीक्षक के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।


इस लघु समीक्षा सह परिचय  पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।

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कगार की आग (हिमांशु जोशी): पुस्तक समीक्षा सह परिचय - समीक्षक शीतल

"कगार की आग" महिलाओं के शोषण की कहानी कहती किताब

यह किताब हिमांशु जोशी द्वारा 1975 में लिखा गया एक बहुत ही मार्मिक और हृदयविदारक उपन्यास है। जिसमें पहाड़ी पृष्ठभूमि की एक ऐसी महिला की कहानी है,जिसका शोषण और उत्पीड़न उसके ही अपने लोगों द्वारा किया गया।कहानी की मुख्य पात्र गोमती है। जो अपने मानसिक रूप से अस्वस्थ पति और एक छोटे बेेेटे कुन्नू के साथ रहती है।कहानी उस समय लिखी गई है जब पहाड़ में पितृसत्ता,रूढ़िवाद,जातिवाद चरम पर था। महिलाओं को तब सिर्फ घर का काम करने वाली , पति की इच्छा पूरी करने वाली तथा संतान पैदा करने वाली के तौर पर ही देखा जाता था।

जहाँ उसकी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान "नहीं" थी। उसके जीवन से जुड़े सारे फैसले उसका पति या घर का पुरुष लेता था। कहानी एक दलित महिला गोमती की है।जो अचानक से रात को भागकर अपनी माँ के पास इसलिए आ गई है कि उसके ककिया ससुर ने उसे इस तरह बेरहमी से किड़मोड़े की लकड़ी से मारा है कि उसके शरीर में नीले निशान रह गए है। उसपे आरोप यह कि उसके घर के बाहर पुरुषों के साथ संबंध है, वह भी बस इसलिए कि जानवरों के डॉक्टर से वह अपने बीमार पति के लिए दवाई मांगती है।

जंगल वह घास, लकड़ी लेने सभी महिलाओं के साथ जाती है, फिर भी जंगल के चौकीदार के साथ संबंध होने की अफवाह हैं। जिसके शक में वह उसे बुरी तरह मारते हैं, उसके चरित्र पर सवाल उठाते हुए उसे बहुत बुरी गालियां भी देते हैं।

पहाड़ी महिला के जीवन संघर्ष को बयां करती कहानी:

कहानी की मुख्य किरदार गोमती है, जो साहसी और विद्रोही है। जब उसका ककिया ससुर उससे सम्बन्ध बनाने की फिराक में आए दिन रात को उसके दरवाजे में आ जाता था, एक दिन जब उसने देखा कि ककिया ससुर दरवाजे के एकदम पास आ गया है तो उसे कुछ नहीं सुझा,अपने सिराने पड़ी हशिया उठाकर दे मारी। जिससे वह चला गया। बीमार पति की देखरेख और रोज का गोमती का अपने ही करीब के सम्बन्धों से चलता संघर्ष, जो कभी उसके पति को ठीक से काम न करने में पीट देते थे, कभी गोमती को चरित्रहीन बताते  हुए उसे अपमानित करते थे।

"गरीबी भुखमरी और उत्पीड़न के बीच पलता जीवन"

हिमांशु जोशी का लेखन बहुत गंभीर और मार्मिक है। उनके लिखने में वह दर्द झलकता है,जो एक आम इंसान की व्यथा है।गोमती और उसके परिवार का जीवन बहुत ही दयनीय है। उसका बीमार पति लोगों के फायदे के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी है। वह उसे अवैध कार्यों में अपने साथ ले जाते हैं, जहां पुलिस के छापा मारने में उसे जेल भेज देते है, और वह आसानी से सब कुछ कबूल कर लेता जो आरोप उस पर लगाए जाते। अपने खिलाफ होते शोषण के खिलाफ गोमती अकेले ही बोलती, बहुत बार वह बुरी तरह से टूट जाती थी। एक दिन का हो तो कोई सहे लेकिन उसके खिलाफ होने वाले शोषण में कमी नहीं आ रही थी, उसका देवर भी उसके साथ यौन उत्पीड़न करता है, जिससे तंग आकर वह नदी में कूदने जाती है, लेकिन उसके भीतर की मां उसे मरने नहीं देती।इस तरह कहानी स्त्री मन की व्यथा और समाज द्वारा उसे सिर्फ एक देह समझे जाने की है।

"स्त्री जीवन और दुख की कहानी"

मरने का फैसला स्थगित कर वह जिस इंसान के साथ रहने लगती है, गोमती की सुंदरता देख वह भी उससे आकर्षित हो जाता है, जहां वह उसे अपने साथ रख लेता है| सबको लगता है कि गोमती मर गई, लेकिन वह खुशाल नाम के इंसान के साथ रह रही होती है। जिसकी पहले से दो पत्नियां हैं, जिनसे उसे संतान का सुख प्राप्त नहीं हो पाया है। खुशाल उसे बहुत प्रेम करता है,अच्छे गहने बनाता है ,नए कपड़े दिलाता है। हर तरह से उसे खुश रखने की कोशिश करता है, लेकिन उसका मन तब भी अपने बच्चे के लिए दुखी रहता है। सब कुछ होने के बाद भी कुछ था जो गोमती को कचोटता था, उसका मन दुखी रहता,अपने नन्हे बच्चे कुन्नू के बारे में सोच सोच मन बैठ जाता।  खुशाल ने उसे 400रूपये देकर अपने पास रखा था। जो उस समय एक बड़ी रकम थी।जब उसका स्त्री मन किसी भी तरह अपने बेटे से नहीं हटा तो खुशाल ने भी उसे बुरी तरह पीट दिया ,उसके चरित्र का हवाला देकर उसे गालियां दी।

 "महिलाओं को देह के रूप में देखता समाज"

यह कहानी समाज की उस सच्चाई को सामने रखती है, जिसे वर्षों से ढकने की कोशिश की गई है। जिस समाज ने महिलाओं को चुप रहकर सहना सिखाया है।वह अपनी इस क्रूरता से पर्दा हटाना कभी नहीं चाहेगा। जहां एक भयावह चेहरा स्त्री देह को ही उसकी पहचान समझता है, उसी के हिसाब से उसे अपने लिए उपयोगी समझता है।

यह कहानी मानव समाज में महिलाओं में होने वाले दुखद शोषण को ही नहीं दिखाती, यह बताती है कि कैसे एक औरत जीवन भर उत्पीड़न का शिकार होती है। किसी ने भी स्त्री मन को नहीं जानना चाहा कि उसके अंतर्द्वंद्व क्या है। बल्कि उस पर अपना पुरुषत्व दिखाते रहें। गोमती न सिर्फ अंत तक संघर्ष करती हुई दिखती है, वह दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करके खुशाल को 400रुपए वापिस कर अपने घर अपने बच्चे कुन्नू के पास वापिस लौटती है।

हिमांशु जोशी की लेखनी सरल है। पहाड़ी जीवन को करीब से देखा है और उसकी सच्चाई को लिखा है। उनके लेखन में वह पहाड़ झलकता है,जिसके दर्द की कहानी उनके भीतर कुलबुलाती है। उनके लेखन में उन्होंने कुमाऊंनी शब्दों का जो उपयोग किया है वह कहानी को जीवंत बना देता है। "कगार की आग पाठक को झकझोरकर रख देती है", जो सोचने में मजबूर करती है कि महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में सिर्फ एक दैहिक और संतान सुख तक सीमित थी, आज की स्थिति का आंकलन मै पाठकों पर छोड़ती हूँ 

शीतल 


शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।

किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही  नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |


इस आशा के साथ कि शीतल जी की समझ और लेखनी, सुधी पाठकों की समझ को एक नया आयाम देकर उसको विस्तार देगी और एक संवेदनशील इंसान बनने का मार्ग प्रशस्त करेगी, ढेरों शुभकामनायें

सम्पादक

लवकुश कुमार 


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शुभकामनाएं

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दीवार में एक खिड़की रहती थी ( साधारण जीवन की असाधारण संवेदनाएँ ) : पुस्तक समीक्षा सह परिचय - विशाल चंद

उपन्यास - दीवार में एक खिड़की रहती थी

लेखक- विनोद कुमार शुक्ल 

विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी” हिन्दी साहित्य में साधारण जीवन की असाधारण संवेदनाओं को उजागर करने वाली एक महत्वपूर्ण कृति है। यह उपन्यास किसी बड़े घटनाक्रम, तीव्र संघर्ष या नाटकीय मोड़ों पर आधारित नहीं है, बल्कि मध्यमवर्गीय जीवन की रोज़मर्रा की सच्चाइयों, सीमाओं और छोटी-छोटी खुशियों को बहुत सहजता से प्रस्तुत करता है।

      कहानी एक नवविवाहित मध्यमवर्गीय दंपत्ति रघुवर प्रसाद और सोनसी के इर्द-गिर्द घूमती है। रघुवर प्रसाद एक महाविद्यालय में गणित के अध्यापक हैं और शादी के बाद वे एक कमरे के छोटे से मकान में अपनी गृहस्थी बसाते हैं। इसी छोटे से कमरे में उनके सपने, चिंताएँ, आदतें और छोटी-छोटी खुशियाँ धीरे-धीरे आकार लेती हैं। उपन्यास पढ़ते हुए पाठक अनायास ही उनके जीवन से जुड़ने लगता है, मानो वे कोई काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि हमारे आस-पड़ोस में रहने वाले लोग हों। इस एक कमरे के मकान में भीतर की ओर बनी एक खिड़की "उपन्यास की आत्मा" बन जाती है। 

          यह खिड़की केवल रोशनी या हवा का रास्ता नहीं है, बल्कि यह रघुवर और सोनसी के "मन की दुनिया" से जुड़ने का माध्यम है। यही खिड़की उन्हें एक सीमित जीवन के भीतर भी सपने देखने, सोचने और उम्मीद बनाए रखने का अवसर देती है। प्रकृति और आसपास के वातावरण का चित्रण भी इसी खिड़की के सहारे बड़ी सहजता से कथा में घुल-मिल जाता है।

उपन्यास में दीवार जीवन की उन सीमाओं का प्रतीक है, जो हर आम आदमी के हिस्से में आती हैं—कम जगह, कम साधन और अनकही मजबूरियाँ। लेकिन उसी दीवार में बनी खिड़की यह भरोसा देती है कि सीमाओं के बीच भी उम्मीद के रास्ते मौजूद होते हैं। यही वजह है कि इस किताब को पढ़ते हुए पाठक अपने जीवन की दीवारों और उनमें छिपी खिड़कियों को देखने लगता है।

            इस उपन्यास की भाषा बेहद सरल, शांत और आत्मीय है। इसमें जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को बड़े सलीके से महत्व दिया गया है। लेखक बिना किसी उपदेश के यह बात कह जाते हैं कि सच्चा सुख भव्यता में नहीं, बल्कि साधारण पलों को जीने की क्षमता में छिपा होता है। रघुवर और सोनसी की सादगी, उनका रहन-सहन और उनका आपसी संबंध पाठक के मन में एक गहरा अपनापन जगा देता है।

           हालाँकि यह उपन्यास तेज़ गति से आगे नहीं बढ़ता। कहानी की चाल धीमी है और इसमें कोई बड़ा मोड़ या चौंकाने वाली घटना नहीं मिलती। जो पाठक तेज़ रफ्तार या केवल मनोरंजन की अपेक्षा से किताब उठाते हैं, उन्हें यह थोड़ी भारी लग सकती है। लेकिन जो पाठक "जीवन को ठहरकर देखने और महसूस करने का धैर्य" रखते हैं, उनके लिए यह कृति खास बन जाती है।

         कुल मिलाकर, “दीवार में एक खिड़की रहती थी” एक ऐसा उपन्यास है जो शोर नहीं करता, बल्कि चुपचाप दिल के पास बैठ जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि "सुख एक कमरे के छोटे से घर में भी पाया जा सकता है, बस ज़रूरत है उस दीवार में बनी खिड़की को देखने की।"

ही इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी और इसकी सबसे गहरी मानवीय सच्चाई है।

" पढ़ें, समझें, बात करें और साझा भी "         

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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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तुम पहले क्यों नहीं आये: पुस्तक समीक्षा सह परिचय - विशाल चंद

पुस्तक : तुम पहले क्यों नहीं आए? 

लेखक : कैलाश सत्यार्थी

 प्रकाशन : राजकमल पेपरबैक्स

        तुम पहले क्यों नहीं आए नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी द्वारा लिखी गई उन बच्चों की सच्ची कहानियों का संग्रह है, जिन्हें उन्होंने अपने संगठन बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से गुलामी और बाल श्रम से मुक्त कराया। यह किताब पढ़ते हुए बार-बार मन भारी हो जाता है और मन में क‌ई सवाल उठते हैं।

         इस पुस्तक में 12 बच्चों की जीवन कथाएँ हैं, जो पत्थर की खदानों, ईंट भट्ठों, घरेलू मजदूरी, कालीन कारखानों और तस्करी जैसे अमानवीय हालात से निकलकर आज़ादी की रोशनी तक पहुँच पाए। ये कहानियाँ किसी कल्पना की उपज नहीं, बल्कि हमारे समाज का कड़वा सच हैं और हर कहानी एक चुप चीख जैसी लगती है। शीर्षक कहानी देवली की है, जो तीसरी पीढ़ी से बंधुआ मजदूरी में जकड़ी हुई थी। जब उसे आज़ादी मिली तो उसके मुँह से निकला सवाल—

“तुम पहले क्यों नहीं आए?”

यह सवाल सिर्फ लेखक से नहीं, बल्कि हम सभी से किया गया सवाल बन जाता है। 

       किताब में प्रदीप, कालू, भावना और साहिबा जैसे बच्चों की कहानियाँ भी हैं, जिनके साथ अंधविश्वास, हिंसा, यौन शोषण और अमानवीय व्यवहार हुआ। इन किस्सों को पढ़ते हुए कई जगह शब्द साथ छोड़ देते हैं और सन्नाटा बोलने लगता है।इन्हें पढ़ते हुए कई बार मन करता है किताब बंद कर दूँ, लेकिन फिर लगता है—अगर हम पढ़ ही नहीं पाए, तो वे जिए कैसे होंगे? 

      हालाँकि यह किताब सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि उम्मीद भी देती है। बचाए गए कई बच्चे आगे चलकर पढ़े-लिखे, आत्मविश्वासी बने और आज दूसरों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। "यही इस किताब की सबसे बड़ी ताकत है।" कुल मिलाकर, तुम पहले क्यों नहीं आए एक झकझोर देने वाली, लेकिन ज़रूरी किताब है। यह हमें असहज करती है, सोचने पर मजबूर करती है और यह एहसास दिलाती है कि बच्चों की आज़ादी सिर्फ कानूनों से नहीं, हमारी संवेदना से संभव है।

" पढ़ें, समझें, बात करें और साझा भी "         

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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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OK Physics - एक तरीका यह भी ( लवकुश कुमार ) - पुस्तक परिचय

यह मेरे लिए खुशी की बात है कि जिस पुस्तक के लिए, इतने महीनो से प्रयास चल रहा है वह जल्द ही पाठकों के लिए उपलब्ध होगी, उससे पहले मुख्य पुस्तक का एक अंश आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत है, परिचय और आपकी प्रतिक्रिया के लिए, जरुर भेजें ईमेल - KCPHYQA@GMAIL.COM

नाम जो उद्देश्य के अनुरूप है :

लेखक का परिचय जरूरी है और प्रासंगिक भी, पुस्तक की सामग्री के आंकलन में 

ये किताब क्यों खरीदें, अन्य किताबों से यह किस तरह अलग हो सकती है? कुछ बातें इस पर :

स्टूडेंट्स के लिए है अतः स्टूडेंट्स की कुछ समस्याएँ जिन्हें संबोधित किया गया है :

कुछ बातें जिनके चलते इस पुस्तक को लिखने की जरुरत पड़ी:

अंत में एक सन्देश जो किताबों के महत्त्व पर है, मोबाइल फ़ोन और शॉर्ट्स की दुनिया में किताबों से दोस्ती करने की बात पर जोर देते हुए :

किताब अपने उद्देश्यों पर कितनी खरी उतरी जरुर बताएं, उससे पहले अपनी प्रति book कराएँ या अपने निकटतम पुस्तक विक्रेता द्वारा डिमांड सबमिट करवाएं (पुस्तक के लिए अपने पते का फॉर्म भरें )

शुभकामनाएं 

आपका

लवकुश कुमार

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पुस्तक समीक्षा ( तुम्हारे लिए - हिमांशु जोशी) - समीक्षक : विशाल चंद

पुस्तक समीक्षा | तुम्हारे लिए

✍️ लेखक: हिमांशु जोशी

📝 प्रकाशक: किताबघर प्रकाशन

 

• “तुम्हारे लिए” हिमांशु जोशी की एक अतुलनीय और अत्यंत संवेदनशील कृति है। यह उपन्यास मात्र एक प्रेमकथा नहीं है, न ही कोई साधारण पत्र—बल्कि यह उन अनकहे एहसासों का दस्तावेज़ है, जिन्हें नायक नायिका के रहते हुए कभी शब्द नहीं दे पाया। यह किताब नैनीताल की धरती पर पनपी विराग और अनुमेहा की तरुण, कोमल और अधूरी प्रेमगाथा है।

•उपन्यास की पृष्ठभूमि नैनीताल है और लेखक ने इस शहर को सिर्फ़ एक स्थान की तरह नहीं बल्कि एक जीवित अनुभूति की तरह रचा है। पहाड़, झील, रास्ते, मौसम—सब कुछ ऐसा वर्णित है कि पाठक स्वयं को उसी वातावरण में चलता हुआ महसूस करता है। यह वही नैनीताल है जो कभी शांत, आत्मीय और अपना था—और वही नैनीताल भी जो समय के साथ बदलता चला गया।

• विराग और अनुमेहा का रिश्ता किसी नाटकीय घटना से नहीं बल्कि ट्यूशन जैसी साधारण परिस्थिति से शुरू होता है। पढ़ाते-पढ़ाते उपजा यह आकर्षण धीरे-धीरे गहरे भावनात्मक जुड़ाव में बदलता है। 

पाठक समझते हैं कि किसी रिश्ते की विश्वसनीयता और उम्र उस आधार पर निर्भर करती है जिस पर वह आधारित होता है।

• कहानी की एक बड़ी ताक़त इसके सह-पात्र हैं।

डॉ. दत्ता और श्रीमती दत्ता का नायक के प्रति अपनापन,

सुहास का नायिका के प्रति आकर्षण,

और नायक की निम्न पारिवारिक-आर्थिक स्थिति—ये सभी तत्व कहानी को एक सामाजिक यथार्थ प्रदान करते हैं।

नायक का यह द्वंद्व कि पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ और प्रेम/चाहत, दोनों के बीच संतुलन शायद उससे बन ही नहीं पाया या कहिए कि परिस्थितियां ही अनुकूल न थीं—कहानी को और गहरा एवं पेंचीदा बना देता है।

• उपन्यास में कई ऐसे क्षण हैं जहाँ सुख और दुख की रेखा धुंधली हो जाती है। लेखक के शब्दों में—

कुछ स्मृतियां ऐसी होती हैं जो एक साथ ही दुख की अनुभूति भी देती हैं, सुख की भी। वास्तव में एक बिंदु पर आकर दुख-सुख का भेद ही समाप्त हो जाता है। पीड़ा में भी एक तरह के सुख की अनुभूति होती है—असीम संतुष्टि की।”

यह पंक्तियाँ पूरी किताब की आत्मा को समेट लेती हैं।

• जब नायिका जनजातीय बाहुल्य क्षेत्र में काम कर रही होती है और वहाँ नायक उससे मिलता है, तब गरीबी पर हुआ संवाद झकझोर देता है—

“रोगियों की संख्या यहाँ बहुत दिखती है… कौन-सी बीमारी अधिक है?”

“एक ही बीमारी है—सबसे संक्रामक।”

“कौन-सी?”

गरीबी… बताइए, इससे भयंकर और कौन-सा रोग है इस संसार में।”

यह संवाद उपन्यास को केवल प्रेमकथा नहीं रहने देता, बल्कि उसे सामाजिक चेतना से जोड़ देता है।

• उपन्यास का अंत आते-आते कहानी एक भावनात्मक और कुछ हद तक फिल्मी मोड़ लेती है। नायिका का चले जाना, और नायक का स्मृतियों के सहारे जीते रह जाना—पाठक को भीतर तक खाली कर देता है। अंतिम पृष्ठ कहानी को समाप्त नहीं करता, बल्कि पाठक के भीतर एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव छोड़ जाता है।

लेकिन यहीं इशारा मिलता है परिस्थितियों की बुनावट का, जीवन की वास्तविकता की बात करें तो हमें अंततः शांति को चुनना होता है और अपने लिए आजादी, आत्मनिर्भरता और उत्कृष्टता को जीवन के केंद्र में रखना होता है ताकि इस शरीर की असीम संभावनाओं को पाया जा सके समय का सदुपयोग किया जा सके।

• कुल मिलाकर, "तुम्हारे लिए" एक शांत, पीड़ादायक, सुंदर और  मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं से परिचय कराने वाला उपन्यास है। यह किताब एक सवाल जगाती है कि क्या हम वास्तव में जानते हैं कि जीवन में सबसे जरूरी क्या है ? क्योंकि इस सवाल का जवाब जाने बिना हम अपने जीवन की प्राथमिकताएं निर्धारित नहीं कर पाते और कब क्या पकड़ना और कब क्या छोड़ना यह निश्चित नहीं कर पाते।

 

यह उपन्यास आपका परिचय करा सकता है अधूरे रह गए एहसासों की गूँज का—जो पढ़ने के बाद भी देर तक मन में बनी रहती है और बना सकता है, आपको लोगों के मनोभावों और प्राथमिकताओं, स्थितियों को बेहतर समझने के काबिल।

कोई सवाल हो तो लिख भेजिए, फेसबुक लिंक या ईमेल से।

शुभकामनाएं 

विशाल चन्द 

https://www.facebook.com/vishal.chandji

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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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खिलेगा तो देखेंगे ( विनोद कुमार शुक्ल )- पुस्तक परिचय सह समीक्षा - सुरसेन सिंह बहादुर

विनोद कुमार शुक्ल जी का यह उपन्यास 'खिलेगा तो देखेंगे' अपने-आप में अद्भुत उपन्यास है। इसकी एक-एक पंक्ति कविता की तरह लगती है। और सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह उपन्यास पूरी तरह से कथानक पर निर्भर नहीं होते हुए भी एक कथा दृश्य बना देता है अर्थात् कोई ऐसा काथा-सूत्र नहीं है जो उपन्यास के केन्द्र में हो, बावजूद इसके ग्रामीण और सामूहिक जीवन का चित्रण बड़े ही रोचक ढंग से किया गया है। इस उपन्यास में गाँव भी है, गरीबी भी है, पीड़ा भी है और प्रसन्नता भी है। यह उपन्यास पाठकों के बीच उपन्यासों की दुनिया में एक नया अनुभव प्रदान करता है। नये पाठकों को थोड़ा कम अच्छा लगे ऐसा हो सकता है लेकिन इसकी एक-एक पंक्ति हमें गंभीर चिंतन की ओर प्रेरित करती है।

सुरसेन 


युवा साहित्यकार सुरसेन सिंह बहादुर जी, इस बात में विश्वास रखते हैं कि " भोजन, कपड़ा, मकान पैसा सब जरुरी है, सब देना, तुम मुझे कुछ देना चाहो, तो किताबें सबसे पहले देना "

 

आप एक शिक्षक हैं और देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षित हैं, आपने काव्य संग्रह -" विरोध चुप्पियों का " की रचना की है।

"यह संग्रह केवल शब्दों का संचयन नहीं है बल्कि यह उन विसंगतियों के विरुद्ध एक वैचारिक युद्ध है जिन्हें हमारा समाज अक्सर 'मौन' रहकर स्वीकार कर लेता है" - साहित्यकार संतोष पटेल जी

सुरसेन सिंह बहादुर जी का फेसबुक प्रोफाइल लिंक


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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किताबों से हम क्या पा सकते हैं : Book Meet ( पुस्तकों पर चर्चा ) एक सार्थक प्रयास और जरूरी भी : पहाड़ी वोकल्स - अजीम प्रेमजी फाउंडेशन पिथौरागढ़

एक शाम ऐसी भी जब  पिथौरागढ़ में स्थित अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में पहाड़ी वोकल्स के युवाओं द्वारा आयोजित बुक मीट में शिरकत करने का मौका मिला| कई जिज्ञासु और सुधी  पाठकों ने अपने द्वारा पढ़ी गई बेहतरीन पुस्तकों पर चर्चा की|

उन पुस्तकों के महत्व के बारे में बताया उन पुस्तकों को पढ़ कर हम किन सवालों के जवाब पा सकते हैं और किन मानवीय  संवेदनाओं और भावनाओं को समझ सकते हैं इस पर बात की गई| कई लोगों ने बताया की कैसे एक  किताब ने उनके सोचने के  नजरिये  को बदल दिया, कैसे वह अपने पॉइंट ऑफ व्यू से हटकर दूसरों  के नजरिए  से भी दुनिया समाज और लोगों को देख पाने में सक्षम हुए हैं, कैसे उनके पूर्वाग्रह खंडित हुए और सबसे बड़ी बात उन्होंने बात की उस सुकून की जो किताबों को पढ़कर मिलती है हालांकि हमेशा ऐसा नहीं होता कुछ किताबें हमे सवालों से घेर लेती हैं और हमे मानव जीवन के संघर्षों और मार्मिक पहलुओं की तरफ ध्यान खींच ले आती हैं तब सुकून नहीं एक उत्कंठा पैदा होती है, इस पर अलग से बात करेंगे |

 

कुछ लोगों के लिए किताब पढ़ना एक दूसरी दुनिया में जाने जैसा है जैसे कुछ अच्छी मूवीज हमें तुरंत की तकलीफों से दूर कर देती हैं और हम शांतचित्त होकर समझ पाते हैं और एक उम्मीद और उत्साह के साथ दोबारा अपने काम में लग पाते हैं, वैसे ही कुछ बेहतरीन किताबें भी आपको आपकी समस्याओं को दूर से देखने का मौका देती हैं और फिर आपको उन समस्याओं की पीछे के कारण भी समझ आते हैं और वह अपेक्षाकृत छोटी भी लगती हैं साथ ही यदि आप बेहतर किताबों की संगति में हैं तो आपको हल्का महसूस कराएंगी और आपको आजादी के लिए प्रेरित करेंगी, आपको उदार बना सकती हैं बाकि आप किस तरह की किताबों की संगति में हैं यह निर्भर करता है

किसी पाठक ने बताया कि शुकून मिलता है, कोई कहती हैं कि जीवन और दुनिया को बेहतर समझ सकते हैं, किसी का विश्वास है कि इससे हमारे पूर्वाग्रह टूटते हैं, किसी को आत्मविश्वास मिल रहा तो किसी को स्पष्टता, कोई कहता है कि कोई बदलाव लाना है तो बेहतर तरीके और अनुभव का खजाना है किताबों में, तो कोई कहता है कि किताबें बात करती हैं और किसी के लिए किताबें लोगों को और उनकी अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को समझने में मदद करती हैं, कोई लोगों की भावनाओं को समझाने को तो कोई खुद में संवेदनाओं जगाने को किताबों का सहारा लेता है।

अन्य सुधी पाठकों ने बताया की किताबें मानो हमेशा साथ देने वाले दोस्त हो जब कोई आपसे बात करने को ना हो तो किताबें बात करती हैं किताबें आपके काम को और बेहतर करने के लिए स्पष्टता देती हैं|

 एक से एक बेहतरीन किताबों की चर्चा हुई और उनमे से कुछ  के नामों का यहां पर उल्लेख  कर रहा हूं और जल्द ही इनमें से कुछ किताबों पर आपको उनही पाठकों में से कुछ के लेख मिलेंगे जिससे आप और बेहतर समझ पाएंगे संबंधित  किताब के बारे में|  

मंटो की  सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ

Crime and Punishment

  • Novel by Fyodor Dostoevsky

 

 

डार से बिछुड़ी - कृष्णा सोबती

 

Becoming by Michelle Obama

अग्नि की उड़ान – डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम

Invincible Thinking by Ryūhō Ōkawa

 

 

पचपन खम्भे लाल दीवारें-  Usha प्रियंवदा


 

 

The art of being alone by

तुम्हारे लिए -  हिमांशु जोशी

THE ART OF BEING ALONE: Solitude is My Home Loneliness was My Cage by Renuka Gavrani

गबन – मुंशी प्रेमचंद

Gone Girl

Novel by Gillian Flynn

 

चश्मिश – मानवी

Courage to be disliked - Fumitake Koga and Ichiro Kishimi

 

सूरज का सातवाँ घोडा- धर्मवीर भारती

यार पापा – दिव्यप्रकाश दुबे                               

अक्टूबर जंक्शन - दिव्यप्रकाश दुबे

 

 इब्नेबतूती - दिव्य प्रकाश दुबे

 

इस तरह इस बात को बेहतर तरीके समझ पाना आसान होगा कि किसी पुस्तक की थीम क्या है, आपको  इससे क्या मिल सकता है, और इस पुस्तक का साहित्य के क्षेत्र में क्या योगदान और महत्व है यह भी आप जान पाएंगे|


एक बार धन्यवाद आदर्श जी और उनकी टीम  का जिन्होंने इस परिचर्चा को आयोजित किया और इसे रुचिकर बनाया|

इसी परिचर्चा में मुलाकात हुई श्री करण तिवारी जी से जो देवल थल में एक लाइब्रेरी चलाते  हैं जिसमें वहां के कई ग्राम सभाओं के बच्चे पढ़ते हैं और काफी कुछ सीखते हैं|
एक बात और की पहाड़ी वोकल्स में युवा अपना समय और प्रयास बहुत ही जरूरी कार्यों  में दे रहे हैं इसके लिए मैं उन्हे  साधुवाद और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के प्रति भी आभार कि उन्होंने ऐसे प्रयासों के लिए संसाधन उपलब्ध कारये  यह  एक प्रेरणादायक कार्य है इस तरह की परिचर्चा  देश के और भी शहरों/ जगहों में होनी चाहिए ताकि हमारे युवा साहित्य से जुड़ सकें और देश दुनिया में स्थायित्व और बेहतर शांति  ला  सकें|

कुछ लिंक 

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किताबें पढ़ना जारी रखिए, समझते रहिए और संवाद भी जारी रखिए |

 शुभकामनाएं

लवकुश कुमार


 

लेखक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से भौतिकी मे स्नातक और आई आई टी दिल्ली से भौतिकी मे परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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