मैंने एक बार कहीं पढ़ा था, श्रंगार करती हुई स्त्रियों से ज्यादा सुंदर लगती है संघर्ष करती हुई स्त्रियाँ। ये लाइन मुझे इसलिए पसंद है क्योंकि मैं भी हार नहीं मानती, संघर्ष करती हूं और हर महिला करती है, किसी का संघर्ष जारी रहकर उसे ऊँचाइयों पर ले जाता है और कुछ का संघर्ष बस चार दीवारी में ही खत्म हो जाता है।
आज एक मूवी देखी Mission Over Mars, मुझे लगता है ये उन लोगों को जरूर देखनी चाहिए, जो हार नहीं मानना चाहते और लड़ना चाहते हैं अपनी आखिरी उम्मीद तक।
आप इसमें, कैसे हर मुश्किल का रास्ता निकाला जाता है देख सकते हैं। कैसे डर को भी हथियार बनाया जाता है। मंगल पर जाने वाले मिशन में एक टीम मेंबर को बुरे सपने आते है, और उनकी टीम लीडर उन सपनों को आधार पर जो गलत हो सकता था, उसका तोड़ निकाल लेती है।
जब वो महिलाएँ मिशन के सिवा कुछ नहीं सोचती हो तो किसी को कैसे कम बजट में काम कर सकते है, कैसे अपने पहले के रिसोर्स का उपयोग कर सकते हैं, कैसे मुश्किल में अनजाने ही भगवान हमारे मददगार बन जाते है या प्रकृति का संयोग हमारे पक्ष में होकर हितकारी हो जाता है? आखिरी क्षण जब हमें लगता है कि कुछ नहीं हो सकता तब कुछ ऐसा अचानक से दिख जाता है और लगता है कि ये किया जा सकता है। कैसे यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि कैसे एक मिशन फेल भी हो सकता है, जब आपको सटीक गणना से पता चलता है, तभी आप सब सही कर पाते हैं, माने हमारे पास जानकारी और आंकड़े होने चाहिए बेहतर निर्णय निर्माण के लिए, कैसे हम सीमित संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं, जब हमारे पास काम के लिए सही जुनूनी लोग हो। इससे सीखा जा सकता है, आशा कभी मत खोए, हमेशा नजर समाधान की ओर हो। आपकी काम के प्रति सच्ची भावना आपको सफल बनाती ही है।
देर किस बात की आप भी देख डालिए इस फिल्म को और दे दीजिए एक समावेशी विस्तार अपनी समझ और दृष्टिकोण को।
Happy Movie Watching!
- सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |
शुभकामनाएं
क्रास्ना होरकाई → 2025 (साहित्य नोबेल पुरस्कार विजेता)
जब नोबेल कमेटी द्वारा इनसे पूछा गया कि आपके लेखन की प्रेरणा क्या है तो इनका उत्तर था *समाज की कड़वाहट*।
बड़ा ही अलग सा उत्तर था ये क्योंकि लोग प्रेम के कारण लिखते है, दर्द के कारण लिखते है पर कड़वाहट का प्रेरणा बनना विचारने योग्य बिंदु है। लेकिन यदि हम भारतीय दर्शन देखे तो महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वेदव्यास, तुलसीदास, सूरदास ने भी समाज के दिए गए जहर को पीकर अमृत देने का काम किया और ऐसा किया जा सकता है।
क्रास्ना होरकाई अपने कई -2 पन्नों तक चलने वाले वाक्यों का कारण बताते हुए कहते है कि
विचार अंतहीन होते है, जब हम पूर्ण विराम लगाते है तो हमारे विचारों का अबाध प्रवाह बाधित होता है, पूर्णविराम को इंसान तय नहीं करता है, ईश्वर तय करता है, मानवीय अनुभव कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते। इसे छोटे या टूटे हुए वाक्यों में कैद नहीं किया जा सकता, जीवन अखंड प्रवाह है, केवल ईश्वर जो संपूर्णता का प्रतीक हैं वही किसी चीज को पूर्ण रूप से खत्म करने का अधिकार रखता है, मनुष्य होने के नाते हम सिर्फ प्रवाह को ही अनुभव कर सकते है।
इसीलिए हम सबको जीवन में आने वाले वो पल जिनमें हम अवसाद से घिर जाते है, हमें किसी से कहना चाहिये और न कह सके तो लिखना चाहिए, खुद के अंदर की, समाज से मिली कड़वाहट को खत्म करने का ये बहुत अच्छा तरीका हो सकता है, जिन लोगों को नहीं सुना गया, उन्होंने लिखा है और ऐसा लिखा है कि हज़ारों साल पहले लिखा गया हम आज भी पढ़ते है, महाभारत के रचयिता व्यास जी भी सबको अपनी बात बताना चाहते थे पर किसी ने नही सुना और भारत को यह अमूल्य धरोहर मिली।
जब कभी जीवन को खत्म करने का विचार भी मन में आये तो एक बार जरूर सोचिये कि यह जिसे आप खत्म करने की बात कर रहे है क्या आपका है, मेरी मत सुनिए, इतने बड़े साहित्यकार की बात पर तो विचार कर लीजिए।
शुभकामनाएं।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
"दुनिया, समाज सब बहुमत पर ही चलता है पापा, जिसकी ज्यादा सँख्या ज्यादा हो, उसी की तूती बोलती है' नमन पिता से कह रहा था, "अल्पमत को कोई नहीं पूछता।"
"नहीं बेटा" बाहर कम्पाउंड की ओर देखते प्रथमेशजी बोले, "हमेशा ऐसा नहीं होता, एक अकेला प्रखर बुद्धि, तेजस्वी इंसान भी अपने संकल्प को लेकर दृढ़ हो तो अन्याय की भीड़ को हरा सकता है। दीपक को देखा है न। दिये को। दीया, एक अकेला दीपक, जब प्रकाशित होता है कैसे घनघोर अंधेरे के बहुमत को हरा देता है? वो देखो, बाहर।"
उनकी बातें सुन मुस्कुराती, बाहर अंधेरे कम्पाउंड में खड़ीं मालिनी जी ने तभी दीपक जलाया तो उनके चेहरे के साथ ही *उजले वातावरण ने भी दमक कर* प्रथमेश जी की बात का समर्थन कया।
*और उस रात हार गया अंधेरे का बहुमत।*
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
अभी हाल ही में अपने देश के एक विश्वविद्यालय से दुखी करने वाली खबर आई कि इंजीनियरिंग के पहले वर्ष के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली और तथाकथित रूप से उसने अपने स्यूसाइड नोट में इसका कारण अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई के चलते आने वाली दिक्कतों को बताया!
युवा और पढ़ाई, ऐसी ही कुछ खबरें राजस्थान के कोटा से भी आयीं थी कुछ वक़्त पहले कि वहाँ अध्ययनरत कुछ बच्चे पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव और सामाजिक दबाव के चलते अवसाद का शिकार हुये और उनमे से कुछ ने आत्महत्या जैसे दुखद कदम उठा लिए |
इन दुखद खबरों के बीच कुछ सवाल हैं, जिन पर मेरी नजर में विचार करना जरूरी हो जाता है हर उस जिम्मेदार इंसान के लिए जो या तो अभिभावक है, या इस देश के भविष्य की चिंता करने वाला नागरिक या खुद कोई युवा, कोई विद्यार्थी |
उन्हे अपने माता पिता और प्रियजनों की इतनी चिंता तो होती है कि स्यूसाइड नोट छोड़ जाते हैं लेकिन खुद के जीवन से इतना निराश क्यों हो जाते हैं ?
कहीं ऐसा तो नहीं कि दुनिया को इतनी ज्यादा अहमियत दे देते हैं कि उसका सामना नहीं कर पाते ! और स्वयं कि असीम संभावना को भूल जीवन को खत्म कर लेते हैं |
कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने अपनी आज़ादी को चाहने वाली चेतना के बजाय लोगों द्वारा हमे दिये गए सर्टिफिकेट को ज्यादा मान दे दिया है ! हमारे उपनिषद और आध्यात्मिक साहित्य हमसे कहते हैं कि जीवन का मुख्य उद्देश्य है डर, लालच और मोह से मुक्ति है लेकिन ये क्या हमने मुक्ति कि तरफ बढ्ने के बजाय खुद को और ज्यादा बांध लिया लोगों कि हमसे अपेक्षाओं से और लोगों को अधिकार दे दिया कि वो हमारा आंकलन करें सतही चीजों पर !
किसी भी इंसान का आंकलन केवल एक बात पर हो कि उसके जीवन मे सच्चाई का क्या स्थान है, रही बात परीक्षा मे परिणाम कि तो उसमे ये हमारा व्यक्तिगत निर्णय होना चाहिए कि हम अपनी जीविका ( जो आत्मनिर्भरता और उत्कृष्टता का साधन है ) के लिए कौन सा काम चुनना चाहते हैं, इसमे ये नहीं होना चाहिए कि दुनिया वाले ज्यादा मान किस काम को देते हैं, दुनिया को ज्यादा मान देने से बचो,
इस बड़ी सी दुनिया मे हर तरह के लोग हैं, बाहरी दिखावा देख प्रभावित होने वाले (मोटी बुद्धि के लोग) और आपके काम की उत्कृष्टता और आपके जीवन मे सच्चाई की स्थान देखने वाले गहरी दृष्टि के लोग भी, इसीलिए काम ऐसा चुनिये जिसमे डूबने का दिल करे, जिसे आप कम पैसे या बिना पैसे मिले भी कर सको फिर फर्क ही नहीं पड़ता कि दुनिया वाले तारीफ कर रहे या नहीं, अगर आपका काम वाकई दुनिया के कुछ लोगों के भी काम का है तो आप न भूखे रहोगे और नहीं गुमनाम, काम मे मज़ा आपको आ ही रही, बाकी रही बात अन्य जरूरतों कि तो वो भी पूरी ही जानी है, पहली जरूरत तो उत्कृष्टता और आज़ादी ही है, रोटी कि व्यवस्था हो जाती है अगर आप वो काम कर रहे जो दुनिया के मतलब का है, बाकी उस काम को आप कितना महत्व दिलवा पाते हो ये भी आपकी काबिलियत है |
"पेशे से बैंककर्मी अंशिङ्का शर्मा जी कहती हैं कि जीवन आपका है इसके इन-चार्ज आप खुद हो, इसे एक उपयोगी काम मे लगाकर खुद को उत्कृष्टता और आत्मनिर्भरता की मंजिल तक ले जाने का जिम्मा आपका है, लोगों के अनावश्यक सवालों के जवाब देने कि जरूरत नहीं, जरूरत है होश मे काम चुनकर उसमे सही मेहनत करने की |"
-----------------अंशिङ्का शर्मा जी की शैक्षिक पृष्ठभूमि इंजीनियरिंग की है और वह पेशे से बैंककर्मी हैं |
नहीं, बस जरूरत है इसे समय देकर सीखने की, मेहनत करने की |
अमूमन ऐसा देखा गया है कि बारहवीं तक हिन्दी या अन्य माध्यम के जो बच्चे बारहवीं के बाद अँग्रेजी माध्यम वाले कोर्स मे दाखिला लेते ही अँग्रेजी से आतंकित हो जाते हैं उनकी अँग्रेजी और उस विषय दोनों की समझ उस स्तर कि नहीं होती कि वह विषय वो अँग्रेजी मे समझ सकें इसका एक उपाय ये हो सकता है कि अगर ऐसे बच्चे बारहवीं के बाद अँग्रेजी माध्यम मे पढ़ाई को इच्छुक हैं तो पहले ही अपनी अँग्रेजी पर पकड़ को शॉर्ट स्टोरीज की किताब से और उस विषय की महत्वपूर्ण परिभाषाओं और शब्दों का अँग्रेजी रूपान्तरण साथ मे ही मजबूत करें ताकि बारहवीं के बाद अचानक बोझ न बने और इसके बाद भी अगर कक्षा मे दिक्कत आए तो अपने शिक्षक को अपनी दिक्कत से अवगत कराएं और उनसे मदद मांगे और शिक्षक भी संवेदनशीलता के साथ इस देश के कर्णधार हमारे युवाओं की दिक्कत को समझते हुये उचित व्यवस्था और उपाय करें, लेकिन किसी भी हालत अँग्रेजी या कोई भी विषय न आने पर खुद को हीन न माने, मै फिर इस बात को दोहराता हूँ कि आपकी महत्ता आपकी विषय विशेषज्ञता से नहीं आपके जीवन मे सच्चाई और आपकी आत्मनिर्भरता से होनी है इसीलिए किसी को अधिकार न दें आपको नीचा या इंफीरियर महसूस करने का जब तक आपके जीवन मे सच्चाई और आत्मनिर्भरता है आप ठसक से सीना तानकर चलिये, अपने पैरों पर खड़े हो सकें इसके लिए कोई काम सीखें, कोई ज्ञान हंसिल करें, परंपरागत या गैर परंपरागत इस नेक काम के लिए किसी कि मदद लेनी पड़े तो संकोच न करें, माता-पिता भी बच्चों को ज्ञानवान और काबिल बनाने के लिए पूरे प्रयत्न करें लेकिन दबाव न बनाए बच्चे पर कोई ऐसा कोर्स करने पर जिसमे उसे रुचि न हो, जो कुछ अभिभावक जानते हैं वो बच्चे को जरूर बताएं, फायदे नुकसान, तथ्यों के साथ और इस तरह मदद करें उसकी सही डिसीजन लेने मे और रखेँ गुंजाइश इस बात की कि उनका बच्चा अपनी असहजता पर खुलकर बोल सके,
“हमें लोगों की नजर में नहीं स्वयं कि नज़र मे ऊंचा उठने की जरूरत है सच्चाई और एक सीमा के बाद के आत्मनिर्भरता लाकर “
“लोग तो अपनी जरूरत और मूड के हिसाब से मान देते हैं ऐसे मान को मान नहीं भी दोगे तो चलेगा लेकिन जीवन मे ईमानदारी रखना, न स्वयं से और न ही दूसरों से कोई झूठ, सच बोलिए चीजों को बेहतर व्यक्त करना सीखिये अभ्यास और विश्लेषण से |”
हम सबके भीतर दिव्यता है अपने काम मे उत्कृष्टता लाकर उसे मैनीफेस्ट कीजिये, “जो आनंद काम को बेहतर तरीके से करने, और तकलीफ मे या वाकई के जरूरतमंद जीव की मदद मे है वो बड़े बड़े मनोरंजन मे नहीं |”
जीवन मे अफसोस कि सिचुएशन से बचा जा सकता है पहला तो चीजों को गहराई मे समझ कर और खुद के लिए कुछ भी चुनने से पहले दूसरों की नकल करने के बजाय पहले खुद को फिर खुद कि असली जरूरतों को जानकार और निर्णय के आधार मे सच्चाई को रखकर नकि कोई डर या लालच को रखकर |
जब जरूरत हो कोई इंसान चुनने कि तब उस इंसान से जीवन कि गहराई पर बात कर लें, अगर उस इंसान मे जीवन को गहराई से समझने का रुझान होगा तो वो आपके साथ रिश्ते मे भी गहराई ल पाएगा/पाएगी |
- लवकुश कुमार, भौतिकी मे परास्नातक हैं और सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन अपना दायित्व समझते हैं और दृढ़ विश्वास रखते हैं कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं :-
उनके शब्दों मे :
तीसरा प्रमुख कारण है बढ़ता भौतिकवाद -> ऐसा देखने को मिला है कि कुछ लोगों द्वारा आज संतोष और शांति जैसे मूल्यों को बहुत नकारात्मकता के साथ लिया जाता है, और ऐसे लोगों को संख्या संक्रामक रोग की तरह तेजी से बढ़ रही है। अगर हम अपनी सच्ची जरूरतों की बात करे तो वो है रोटी, कपड़ा, मकान, ज्ञान ( इंटरनेट/ किताबें )। इन जरूरतों के लिए हमें करोड़ो - लाखों के पैकेज की जरूरत नहीं होती। हाँ लेकिन अगर आप इतने महत्वाकांक्षी हैं कि स्वयं की आज़ादी और जीवन मे सच्चाई से ज्यादा बाहरी सम्मान को ही सब कुछ समझते हैं तो ये अवसाद का एक कारण बन जाता है। अन्यथा भारतीय चेतना हमेशा से ही इतना चाहती है कि आत्मनिर्भता, सचाई और ईमानदारी बनी रहे जीवन मे और हम अच्छे से जीवन यापन कर सके।
आज के संदर्भ में कहीं इसका सबसे बड़ा कारण हमारे हाथ में छोटी सी device मोबाइल का होना और फिर इस पर अत्यधिक निर्भरता तो नहीं ? इसी मोबाइल की वजह से आज न हमारे पास अपने साथ के लोगों के साथ बैठ चर्चा का समय है और न ही चीजों को सूक्ष्मता मे देख पाने का धैर्य, बस लगें हैं सतही मनोरंजन मे और उस ज्ञान को पाने मे जो चार लोगों के बीच शेखी बघारने मे तो काम आ सकता है लेकिन असल जीवन और कार्यक्षेत्र मे किसी काम का नहीं | नतीजा ये कि जब उच्च साहित्य से संपर्क नहीं रहा तो हमारी संवेदनशीलता भी कम हो गयी और हम दूसरों की तकलीफ के प्रति कम संवेदनशील हो गए इसीलिए उन्हे हल करने के प्रयास भी कम हो गए और दूसरों कि तकलीफ कम करके जो आनंद मिलता है उससे भी हम अछूते रह गए, पास क्या रह गया उथला मनोरंजन !
दूसरा ये कि वो ये जान पाएंगे कि जीवन का असली और टिकाऊ आनंद है अपने काम की उत्कृष्टता और जरूरतमंद लोगों के लिए काम करना है, लोगों का जीवन आसान और सुविधाजनक हो सके इसके लिए काम करने मे, लोगों के जीवन मे गरिमा, बंधुता और आत्मनिर्भरता के लिए काम करने मे है |
बाजारवाद और वाणिज्यवाद आजकल के जीवन में कई तरह के नुकसान लाते हैं। ये हमें भौतिक सुखों के पीछे भागने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे हम अपनी असली ज़रूरतों और मूल्यों से दूर हो जाते हैं। अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा और असमानता बढ़ती है, जिससे सामाजिक तनाव और असंतोष पैदा होता है। इसके अलावा, ये हमारी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालते हैं, क्योंकि हम लगातार दूसरों से तुलना करते रहते हैं और तनाव में जीते हैं।
मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग कई नकारात्मक प्रभाव डालता है। यह हमारी नींद को बाधित करता है, जिससे थकान और एकाग्रता की कमी होती है। सोशल मीडिया और अन्य ऐप्स पर लगातार लगे रहने से हमारा ध्यान भटकता है और हम वास्तविक दुनिया से कट जाते हैं। शारीरिक निष्क्रियता और आंखों की समस्याएँ भी बढ़ती हैं। इसके अलावा, मोबाइल फोन की लत हमें सामाजिक रूप से अलग कर सकती है और हमारी अन्य लोगों के साथ तालमेल बैठा पाने कि क्षमता को प्रभावित कर सकती है जिससे तनाव आ सकता है जो हमारे सोंचने समझने की क्षमता ओर नकारात्मक प्रभाव डालता है और हम घातक कदम उठाने कि तरफ बढ़ सकते हैं |
आध्यात्मिकता हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह हमें आंतरिक शांति, संतोष और उद्देश्य की भावना प्रदान करती है। यह हमें तनाव और चिंता से दूर रहने में मदद करता है, जिससे हमारी मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है। आध्यात्मिकता हमें नैतिक मूल्यों और सही-गलत की समझ देती है, जिससे हम बेहतर इंसान बनते हैं। यह हमें दूसरों के प्रति सहानुभूति और दयालुता विकसित करने में भी मदद करता है, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं।
आप एक बार अपना सच्चा विश्लेषण कीजिए कि आपके हाथों में मोबाइल है ? या आप मोबाइल के हाथों में है ?आप 24 घंटे के लिए अपना मोवाइल Switch off करके रख दीजिए और उस समय अपने मस्तिष्क पर प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
दयानंद सरस्वती ने कहा था 'वेदों की और लौटो', आप सीधे वेद नहीं पढ़ पा रहे तो कम से कम अन्य सरलीकृत आध्यात्मिक साहित्य से (गायत्री परिवार वैबसाइट लिंक) अध्यात्म को जान लीजिए। इंटरनेट पर ब्रम्हाकुमारी, गायत्री परिवार जैसे बहुत से संस्थानों के प्रोग्राम आते है, आप उनसे सीख सकते है।
आप महात्वाकांक्षी बनिए। लेकिन टार्गेट मे इस दुनिया की किसी चीज के बजाय सबसे पहले उत्कृष्टता, ईमानदारी और आत्मनिर्भरता को रखिए, इतना कर लेने के बाद आपको एहसास हो जाएगा कि दुनिया मे ऐसा बहुत कुछ या कहिए ज़्यादातर चीज़ें ऐसी हैं जिनको टैस्ट करने या हांसिल करने की बिलकुल भी जरूरत नहीं हैं |
न ही जरूरत से ज्यादा पाने की आशा रखिए। महत्व देना है तो चेतना को दीजिए, शरीर को नहीं। जरूरी नहीं है कि बाजारवाद के नाम पर आपको जो परोसा जाए वो सब आप कंज्यूम ही कर लें |
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ सामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन की आदत भी रखती हैं |
इस आशा के साथ कि यह लेख पाठकों को स्पष्टता देगा|
बातों को तर्क और व्यावहारिकता की कसौटी पर परखें और संतुष्ट होने पर ही लागू करें |
शुभकामनाओं के साथ |
इस तरह की वेबसाइट पहले ही कई हैं जिसमे अपना अनुभव या ज्ञान साझा करते हैं लोग, उसी तरह यह भी एक वेबसाइट है बस अंतर इस बात का है कि इंसान के अनुभवों मे जो कुछ अंतर होता है वो होता है अलग-अलग परिस्थितियों के चलते, इसीलिए यहाँ मै अपने तरीके से अपने अनुभव व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ जो उनके लिए तो उपयोगी होंगे ही जिन्हे वही माहौल मिल रहा जो मुझे मिल रहा और उनके लिए भी उपयोगी हो सकता है जो अन्य माहौल से हैं और अपनी समझ को और समावेशी करना चाहते हैं |
जैसे एक ही बात को कहने के तरीके अलग अलग होते हैं, कोई कविता, कोई शायरी, कोई व्यंग तो कोई सपाट लेख लिखकर व्यक्त करता है अपने विचार और संदेश वैसे ही पाठक भी कई तरह के होते हैं कोई कविता तो कोई कोई लेख या कोई और किसी अन्य साहित्यिक विधा मे बात सुनना/पढ़ना पसंद करता/करती है, मुझे विश्वास है कुछ पाठक/श्रोता ऐसे भी होंगे जिन्हे मेरी लेखन शैली प्रभावित करेगी और मेरी बात और संदेश/अनुभव को सही परिप्रेक्ष्य मे समझ सकेंगे, जिन पाठकों को कोई बात अजीब लगे, निसंकोच मुझे लिख भेजे ( वेबसाइट पर दिये कांटैक्ट फॉर्म से ) |
एक समय था जब मेरे युवा और संवेदनशील मन में समाज और स्वयं को लेकर बहुत सवाल थे और मेरे समय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इन बातों पर मंथन पर खर्च होता था, लोगों और स्वयं के मन को समझने के लिए मै लोगों से बात करता था, कभी लोग न मिलें तो किताबें पढ़ता था और कभी ये ही न पता हो कि इस मामले के लिए कौन सी पुस्तक पढ़नी है तो ऐसे ही स्वयं सोचना, विचारना और वस्तुस्थिति का विश्लेषण करता था।
कुछ किताबों को पढ़कर मानो ऐसा लगा जैसे मेरे लिए ही लिखी गयी हों, मेरा भी ऐसा ही कुछ प्रयास है की कोई दुविधा और बेचैनी मे फंसा हुआ इंसान मेरे लेख, मेरे अनुभव या संदेश पढे और उसे लगे की अरे ये तो लग रहा कि उसके लिए ही लिखा हुआ लेख है|
मेरा प्रयास है कि जो युवा एक सीधा, सरल और समृद्ध जीवन जीना चाहते हैं मै इस मंच से उनकी जिज्ञासाओं को हल कर पाऊँ, मै अपने प्रयास मे कितना सफल रहा यह तो आप पाठक ही निर्धारित कर पाएंगे, प्रयास जारी रहेगा |
खासकर वो लोग जो सीधा और सरल जीवन जीना चाहते हैं लेकिन उन्हें इधर उधर से सुनने को मिलता है कि दुनिया में सीधा और सरल रहकर जीना मुश्किल है और लोग तमाम तरह के झूठ बोलने को उकसाते हैं और तरह तरह के दिखावे करने को बोलते हैं।
"जबकि बात केवल इतनी सी है कि सीधा और सरल होने के साथ हमें समझदार होना है और काबिल ( कौशल युक्त, सजग और जागरूक ) भी ताकि स्पष्टता रहे और हम अपनी क्षमताओं के अनुरूप आत्मनिर्भर बन सकें |"
एक बात स्पष्ट रूप से समझनी होगी कि आप अगर बात - बात पर झूठ बोलते हैं तो आपके लिए सच असहनीय हो जाता है और नतीजतन सच्चे लोग आपसे दूर होने लगते हैं और आप झूठे लोगों से घिर जाते हैं।
जो इंसान स्वयं ही झूठे बहाने बनाता हो उसके लिए झूठे और सच्चे इंसान में फर्क करना मुश्किल हो जाता है और किसी पर यकीन करना भी, या फिर कोई लंबे अरसे तक झूठे लोगों के बीच रहे जो बार-बार वादा करके तोड़ते हों या फिर कहते कुछ हों और करते कुछ इस तरह की परिस्थितियों का भुक्तभोगी इंसान भी किसी पर जल्द यकीन नहीं कर पाता |
"अगर इंसान जीवन में एक सही उद्देश्य, सही काम को पकड़ ले तो उसे बाहरी परिस्थितियां और लोगों की बातें उस सीमा तक प्रभावित नहीं कर पाती कि वह अशांत हो जाए |"
क्रोध आपकी मजबूरी और आपके ऊपर दबाव (अपेक्षाओं का, डर का या आकांक्षाओं का ) को व्यक्त करने कि प्रक्रिया है, आपका जीवन जितना दबावमुक्त होगा और आप जितना खुलकर अपना पक्ष रखते होंगे उतना ही आपके अंदर क्रोध कम पनपता है, क्रोध अंदर ही होता है उसे भड़काने का काम करती हैं बाहर कि घटनाएँ, जरूरत है स्वयं पर नज़र रखने की|
दुनिया से धोखा तब मिलता है जब हम या तो डर या लालचवश या फिर अशांत अवस्था मे कोई कदम उठाते हैं या फिर कोई चुनाव ( पसंद/नापसंद ) करते हैं, ज्ञान और स्पष्टता के माध्यम से हम डर, लालच और मोह से मुक्त हो सकते हैं और अभ्यास से खुद को संयत रख सकते हैं ताकि अशांति की अवस्थाएँ कम हों और हम ठगे जाने से बच सकें |
ध्यान रखें की जब हमारे निर्णयों के केंद्र मे डर या लालच के बजाय असली जरूरत होगी तो ठगे जाने की संभावना कम होगी |
ये सब कुछ हमे सीखने, जानने को मिलता है आत्मवलोकन, साहित्य और आध्यात्मिक साहित्य के अध्ययन से, जिसके महत्व को रेखांकित करके यहाँ अध्ययन के लिए लोगों को प्रेरित करने का प्रयास किया जा रहा है |
"हमारी समझ और स्पष्टता के साथ हमारे आदर्श, चुनाव और पसंद-नापसंद ही हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं |"
इन्हीं सब बातों के दृष्टिगत, मैंने यह वेबसाइट बनाई ताकि युवाओं से अपने अनुभव साझा कर सकूं जिससे ज्यादा से ज्यादा युवा, फिजूल कार्यों, दिखावों और सतही समस्याओं से उलझे बिना खुद की ऊर्जा और संसाधनों को स्वयं की और देश की समृद्धि में लगा सकें।
कई रास्ते हो सकते हैं ऐसा करने के, कुछ आपने सोंचे/देखे होंगे
एक रास्ते की बात मै करना चाहता हूँ, शायद आपको पसंद आ जाये:
एक संयत और ठसक वाला संतुलित जीवन जीकर आप एक आदर्श पेश कर सकते हो
इससे क्या होगा ? इससे ये हो सकता है कि
तो मानसिक शांति और उत्कृष्टता हांसिल होगी |
3. ईमानदारी के साथ ठसक (बिना किसी अनुचित दबाव में आये ) वाला जीवन जीकर आप एक आदर्श जीवन की मिशाल बन सकते हैं
आपको और आपके जीवन की शांति को देख और लोग भी प्रेरित हो सकते हैं |
4. जब आप अपने जीवन में ईमानदार होते हो माने कथनी और करनी में एक होते हो और अपने हर एक निर्णय के पीछे के केंद्र पर नज़र रखते हो तो उत्कृष्टता आती है जीवन में / कार्यों में जो दूसरों के लिए प्रेरणा बनती है |
इस तरह आपके काम में नए लोगों का साथ भी जुड़ सकता है और अगर लोगों का साथ मिलने में वक़्त भी लगा तो कम से कम आप एक प्रेरणादायक जीवन जी पाओगे और
इतनी संतुष्टि रहेगी की आपने किसी अव्यवस्था को बढ़ाने में सहयोग नहीं किया, बाकि संयोग होते चले गये और जरूरी कौशल विकसित होते गये तो कारवां आगे बढेगा लोग जुड़ते जायेंगे
आखिरकार समाज के लिए काम करना है तो आगे बढ़ते रहेंगे जैसा समाज का साथ मिलेगा वैसी गति रहेगी, किसी भी हालत में एक बेहतर जीवन जीना है जिसका ध्येय उच्च मानक स्थापित करना हो, लोगों का साथ या पहचान मिले या न मिले, हाँ अपने काम को बड़े मंच पर लाकर हम इसे ज्यादा लोगों की नज़र में ला सकते हैं, इससे ज्यादा लोगों का साथ मिलने की गुंजाइश बन जाएगी |
यहाँ पर मै साहिर लुधियानवी साहब की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगा :
माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके कुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम
चर्चा के लिए राय जरूर साझा करें - lovekush@lovekushchetna.in
शुभकामनायें
-लवकुश कुमार
इन उक्तियों को मैंने अपने बेटे और भतीजे के जन्मदिन वाले वीडियो मे डाला था, ज्यों का त्यों आपके सामने प्रस्तुत है
बेटे आज तुम्हारे जन्मदिन पर मेरी तरफ से मेरी समझ और मेरे अनुभव से कुछ बातें-
जो भयानक है, वो कुछ छीन नहीं सकता
और जो आकर्षक है, वो कुछ दे नहीं सकता
जन्मदिन की शुभकामनाएं और बधाई बेटा
संदर्भ - आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं और अन्य आध्यात्मिक साहित्य के साथ स्वयं की अनुभवजनित समझ पर आधारित
इन उक्तियों को मैंने अपने बेटे और भतीजे के जन्मदिन वाले वीडियो मे डाला था, ज्यों का त्यों आपके सामने प्रस्तुत है
बेटे आज तुम्हारे जन्मदिन पर मेरी तरफ से मेरी समझ और मेरे अनुभव से कुछ बातें-
जन्मदिन की शुभकामनाएं और बधाई बेटा
संदर्भ - आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं और अन्य आध्यात्मिक साहित्य के साथ स्वयं की अनुभवजनित समझ पर आधारित
इन उक्तियों को मैंने अपने बेटे और भतीजे के जन्मदिन वाले वीडियो मे डाला था, ज्यों का त्यों आपके सामने प्रस्तुत है
बेटे आज तुम्हारे जन्मदिन पर मेरी तरफ से मेरी समझ और मेरे अनुभव से कुछ बातें-
जन्मदिन की शुभकामनाएं और बधाई बेटा
संदर्भ - आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं और अन्य आध्यात्मिक साहित्य के साथ स्वयं की अनुभवजनित समझ पर आधारित
आज 09 मई को स्व० रवि भाई की पुण्य तिथि है,
आज ही के दिन रवि भाई 2019 में अपनी यादें और काम पीछे छोड़ निकल गये अगले जन्म के लिए किन्ही और लोगों के हक़ की लड़ाई लड़ने, उन्हें हंसाने, हौंसला बढ़ाने और बेहतरी के लिए तैयार करने |
रवि भाई की याद आते ही उनका दिलदार स्वभाव और हर मौके पर साथ खड़े होने और दिक्कत में ढाल बनने के लिए तत्पर रहने की आदत याद आती है और याद आता है उनका मुस्कुराता हुआ चेहरा, ऐसा इंसान जो बीमारी की हालत में खुद से ज्यादा अपने भैया और परिवार की चिंता करता हो और खुद ही अपने इलाज़ के लिए मजबूती से आगे बढ़ रहा हो पूरी आशा के साथ |
ऐसे लोग कम ही होते हैं जो किसी की बेपटरी होती जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए हर संभव प्रयास करते हों, इस बात को वही लोग महसूस कर सकते हैं जो उनके साथ रहे हों |
उनके बड़े भाई अनिल भैया आज भी उन्हें याद करते हैं तो उनकी काबिलियत की तारीफ करते हुए और एक आह भरते हुए यही कहते हैं की आज वो होते तो दिन कुछ और ही होते और लोगों का रवैया कुछ और ही होता उनके परिवार की तरफ |
रवि भाई को उनके घर में प्यार से सब मुनीम कहते थे, उनके जितना पढ़ा लिखा और काबिल इंसान उनके गाँव में शायद ही कोई होता, एक और रिकॉर्ड था उनके नाम, 24 वर्ष की उम्र से पहले ही भारत सरकार के भारत मौसम विज्ञान विभाग में समूह ख के अराजपत्रित अधिकारी की सेवा (नौकरी) पाने का रिकॉर्ड, जिसके चलते वो स्थानीय लोगों और रिस्तेदारी में प्रेरणा का पात्र बन गये |
रवि भाई के रूममेट रहे राहुल भाई उन्हे याद करते हुये लिखते हैं –
“बात 2015 की है ,जब हम रूम पार्टनर थे. शाम का समय था। रवि कई दिनों बाद घर से थका हुआ आया (खेती किसानी के काम के बाद ) और तुरंत सो गया । जब जगा तो मुझे मेरे बैग में कुछ सामान रखते हुए देखा तो पूछा कि "राहुल कहाँ जा रहे हो? मैं उदास और मायूस चेहरे से बोला दिल्ली (इससे पहले मैं ट्रेन से कभी सफर नहीं किया था )", उसने बिना मेरे कुछ कहे कहा चलो चलता हूँ मैं भी क्योंकि तुम कभी अकेले नहीं गए हो। मैं कुछ नहीं बोल पाया क्योंकि मैं भी तो यही चाहता था कि वह मेरे साथ चले, लेकिन उसके चेहरे की थकान मुझे कुछ उससे कहने की इजाज़त नहीं दे रही थी …….हम दोनों साथ दिल्ली गए और अपना काम करके खुशी खुशी वापस भी आए ..आप यही सोच रहे हैं न कि मैं आपको यह सब क्यों बता रहा हूं ?..........बताता हूँ ... "मेरे पास में खाने तक का पैसा नहीं था, और मैं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति से बेहतर वाकिफ था। तो मैं अपने परिवार से भी नहीं कह पा रहा था कि मैं किन परिस्थितियों से गुजर रहा हूँ । हमारे हॉस्टल के मेस का 3 महीने के बकाया जो कि लोग एक महीने तक नहीं बकाया रखते, मेरे exam की fee और भी बहुत सी ऐसे क्रियाकलाप जो अब या तो पैसों से हो सकते थे या मुझे बी०एच०यू० छोड़कर वापस घर जाना पड़ता, क्योंकि मेरे परिवार के ऊपर 80 हजार का कर्ज हो चुका था शायद ही कोई हमारे संपर्क में रहा हो जिनसे मां ने पैसे न मांगा हो। ..हमारे पास पैसे के सारे रास्ते बंद हो गए थे। ..मैं शांत ,मायूस ,उदास और हताश होकर बैठता था। सब कुछ जैसे बिखर सा रहा था। मेरी मां का समर्पण,पिता जी का संघर्ष और मेरे ख्वाब ।. लेकिन कहते है न कि जब लगे कि सब कुछ खत्म हो रहा है तभी कुछ नया होता है । अगले ही दिन 7 अप्रैल 2015 को मेरे बैंक अकाउंट में एक मैसेज आता है कि "your account ……..is credited with 120000rs . "मुझे तो भरोसा ही नहीं हो रहा था ।एक पल में सब कुछ बदल गया। मां ने पिछले सभी वर्षों में जितना कर्जा मेरी शिक्षा के लिए लिया था और भी कर्जा सब खत्म ..जो सब कुछ बिखर सा गया था सब सवर सा गया ।" अब आप सोच रहे होंगे यह कहा से आ गया ?? बताता हूं .. मेरा चयन 2013 में डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी की INSPIRE स्कीम में हुआ था ।..जो हर साल चयनित छत्रों/छात्राओं को फेलोशिप देती है। मेरा चयन तो हुआ था लेकिन मेरा एक भी साल का पैसा नहीं आया था। मेरे साथ के सभी दोस्तों का पैसा आ गया था । इसका मुख्यालय दिल्ली में है और मैं इसी काम से दिल्ली गया था ।अगर रवि भाई उस दिन नहीं रहा होता तो मैं दिल्ली नहीं जा पाता और दिल्ली नहीं जा पाता तो मेरे पैसे नहीं मिलते ,और अगर उस दिन पैसे नहीं मिले होते तो शायद..... आज मैं यह लिख भी नहीं रहा होता ।।आप समझ गए होंगे मैं क्या कहना चाहता हु। मैं मानसिक रूप से यह कदम भी उठा सकता था जिसमें जीवन ..आप समझ गए होंगे ।..आज मै जो कुछ भी हूँ उसमें मेरे रवि भाई का बहुत योगदान है ।यह तो एक छोटा सा हिस्सा है ।.रवि भाई दुनिया से चला गया लेकिन जब तक मैं जिंदा हूं वह मेरी यादों में हमेशा जिन्दा रहेगा ।। लव यू पार्टनर(हम एक दूसरे को प्यार से यही बुलाते थे पार्टनर)”
----------------------------------------------------------
रवि भाई के गाँव से ही उनके भतीजे मिथिलेश उन्हे याद करते हुये क्या लिखते हैं, आपके सामने है :
“आदरणीय चाचा जी के बारे में लिखना मेरे लिए आसान नहीं है, क्योंकि उनके योगदान और स्नेह को शब्दों में बाँध पाना नामुमकिन-सा लगता है। कुछ लोग ज़िंदगी में ऐसी सीख और दिशा देते हैं, जो जीवन भर साथ रहती है। चाचा जी मेरे लिए ऐसे ही एक व्यक्ति रहे — और शायद हमेशा रहेंगे।
मुझे आज भी वो दिन याद है, जब वे मुझे मेरे घर से वाराणसी लेकर आए थे ताकि मैं आगे की पढ़ाई कर सकूं। उस समय मैं एक अपरिपक्व और दिशाहीन लड़का था। मुझे तो ये भी नहीं पता था कि जीवन में आगे क्या करना है। लेकिन चाचा जी ने न सिर्फ मेरे भविष्य की चिंता की, बल्कि मेरे घरवालों को भी इसके लिए तैयार किया।
उन दिनों में जब मुझे इंटरनेट, गूगल या सुंदर पिचाई के बारे में कुछ नहीं पता था, तब चाचा जी मुझसे इन विषयों पर बातें करते थे, मुझे दुनिया और अवसरों की झलक दिखाते थे। उन्होंने मुझे अलग-अलग क्षेत्रों के बारे में सोचने की प्रेरणा दी।
वे ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के सच्चे प्रतीक थे। मदद करना उनके स्वभाव में था। कोई भी उनसे सहायता माँगता, तो वे बिना संकोच उसे सहयोग देने को तैयार रहते। मुझे आज भी हैरानी होती है कि वे इतने सारे काम, ज़िम्मेदारियाँ और रिश्तों को इतने सहजता से कैसे निभा लेते थे।
जब मैं बी.एच.यू. वापस लौटा, तब मुझे समझ आया कि उनके जीवन में कितनी चुनौतियाँ थीं। लेकिन उन्होंने कभी किसी के सामने अपनी तकलीफ़ का ज़िक्र नहीं किया। जब भी मुझसे मिलते, चेहरे पर वही आत्मीय मुस्कान होती और ऐसा व्यवहार करते मानो सब कुछ ठीक है। अक्सर वे एक बात कहते थे —
"Life is full of sorrow, but you can change it." — और फिर मुस्कुरा देते थे।
उन्होंने अपने जीवन में कई जिम्मेदारियों को निभाया — चाहे वो परिवार के लिए हो या समाज के लिए।
चाचा जी न सिर्फ एक मार्गदर्शक थे, बल्कि मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत भी रहे। आज जब वो हमारे बीच नहीं हैं, तब भी उनकी बातें, उनके मूल्य और उनकी मुस्कान मेरे साथ हैं।”
मिथिलेश आज बी०एच०यू० से कम्प्यूटर साइन्स मे एमएससी कर रहे हैं |
--------------------------------------------------------
रवि भाई लोगों के चहेते थे, हों भी क्यूँ न, कई खूबियाँ थी रवि भाई में जो उन्हें लोगों का चहेता बनाती थीं और लोग उनसे दोस्ती करना चाहते थे, उनके साथ वक़्त बिताना चाहते थे, मसलन:
1. खिलंदड स्वभाव – हँसते खिलखिलाते अंदाज में बात कह देना, जवाब दे देना |
2. दोस्तों की जरुरत पर तैयार रहने वाला इंसान- काम अगर बूते का है तो बंदा भले ही रात देर से सोया हो, आपके साथ चल देगा |
3. मानव मन की सटीक समझ वाला इंसान – बचपन से ही तरह तरह के लोगों से संपर्क में रहने के चलते, मानव मन या मनो विज्ञान की बेहतर समझ थी, एक वाक्या याद आता है मै और रवि भाई एक दोपहर, सर सुन्दरलाल अस्पताल के पीछे अन्नपूर्णा कैंटीन में खाना खा रहे थे, उसी टेबल पर सामने की कुर्सी पर एक भैया जोकि किसी मरीज की तीमारदारी के लिए आये होंगे बैठे खाना खा रहे थे कि धोखे से उनके हाँथ से मेरी दाल का गिलास लुढ़क गया ( हाँ गिलास, वहां दाल गिलास में मिलती थी उसे प्लेट में उड़ेल कर खाना होता था ) दाल मेज पर फ़ैल गयी और मै खीज गया लेकिन कुछ कहा नहीं, बैरे को आवाज दी और खाना खाकर बाहर आ गये| बाहर आते है रवि भाई से कहा , “देखो यार उस आदमी से दाल गिर गयी और उसने सॉरी भी नहीं कहा ”, उस बात पर रवि भाई का जवाब था कि, “ हर कोई सॉरी नहीं कह पाता, क्या तुमने उसकी आँखें नहीं देखी, क्या उनमें छिपा खेद का भाव नहीं देखा ”, ऐसे थे रवि भाई |
4. किसी के साथ गलत हो रहा हो तो उसके साथ खड़े होने को तैयार – वर्ष 2014 की बात है मै बी.एस.सी सेकंड इयर में था और फर्स्ट इयर के PMK बैच वालों को फ्रेशर पार्टी देनी थी, मै पहली बार कोई स्पीच देना चाहता था,
उडती-2 खबर मिली कि लवकुश की स्पीच को प्रोग्राम में शामिल नहीं किया जा सकता, ये बात रवि भाई से कही गयी तो रवि भाई और सूर्यप्रकाश भाई ने एक साथ कहा कि फ्रेशर पार्टी के लिए वित्तीय अनुदान केवल लवकुश का ही नहीं हम तीनो का है इसीलिए देखते हैं की कैसे स्पीच नहीं देने देते हालाँकि बाद में ये कहने की जरुरत न पड़ी, पहले आयोजक मंडली के एक अग्रणी सदस्य ने स्पीच के बजाय, बैच की ही एक साथी मोहतरमा के साथ एंकरिंग करने को कहा तो मैंने सोंचा की ऐसे ही सही अपनी बात ही तो पहुंचानी है जूनियर्स के बीच लेकिन अज्ञात कारणों से अभ्यास के दौरान ही उन मोहतरमा ने मेरे साथ एंकरिंग करने से मना कर दिया, और मेरा स्पीच देना अबाध रूप से निर्धारित हो गया और मैंने जीवन की पहली स्पीच दी, स्टेज की स्पीच से पहले रवि भाई और अन्य दोस्तों के सामने कई बार अभ्यास किया ताकि आत्मविश्वास आ सके की स्टेज पर बोल सकूँ| हाँ वो मोहतरमा बाद में मेरी दोस्त बनीं लेकिन ये न बताया की उस दिन मेरे साथ एंकरिंग करने से मना क्यों किया और मैंने भी जोर देकर जवाब पाने के जरुरत न समझी |
5. मेरी शादी मेरे गाँव फत्तेपुर जिला लखीमपुर से होनी थी ये 2016 की बात है मै बीएससी फाइनल इयर में था, पापा की तबियत ठीक न थी इसिलए आयोजन मध्यम ही रखा गया, रवि भाई के साथ कुछ और दोस्तों को बरात में शामिल होने का न्योता दिया, 8-9 लोग आये बनारस से लखीमपुर, बाद में एक अन्य करीबी मित्र से पता चला कि रवि भाई ने सब दोस्तों को राजी करने के लिए कहा , “ क्योंकि लवकुश भाई के पापा की तबियत ख़राब है इसीलिए हम सबको चलना चाहिए लवकुश भाई का मनोबल बढ़ाने के लिए, जरुरत पड़ी तो काम में हाँथ भी बंटा लेंगे ”
ऐसे दिलदार और सूझ-बूझ वाले थे रवि भाई |
6. एक समझदार और धैर्यवान व्यक्ति – एक बार जब मै अपनी एम.एस.सी की पढ़ाई के लिए दिल्ली रहता था तब की बात है कि एक दोस्त की बहन की शादी थी मै उसके आयोजन में कुछ पैसे से मदद करना चाहता था लेकिन मेरी माली हालत ठीक न थी, ये विवशता मैंने रवि भाई को बताई और उधर से एक शांति प्रदान करने करने वाला जवाब आता है –“लवकुश भाई मदद करने के मौके फिर आयेंगे, दिल छोटा न करो, मन में इच्छा है तो एक दिन समर्थ भी हो जाओगे, और फिर मौके पड़े और मैंने मदद भी की, ऐसे ही चलती है दुनिया एक दूसरे से मिलकर और एक दूसरे की मदद से और इससे बढ़ता है अपनापन और व्यवहार में मिठास क्योकि अमूमन ऐसा देखा गया है कि जिन लोगों को लगता है की उन्हें किसी की मदद की जरुरत न होगी या वो अपने सारे काम बिना मदद के ही करेंगे उनके व्यबहार में एक रूखापन आने की संभावना बढ़ जाती है |”
रवि भाई के साथ जो सबसे बड़ी सुरक्षा महसूस होती थी वह यही थी मुझसे ज्यादा समझदार कोई है जो मुझे दुनियादारी के निर्णय लेने मे मदद कर सकता है, कालांतर मे मैंने डॉक्टर विजय अग्रवाल द्वारा लिखित पुस्तक – “ सही निर्णय कैसे लें” पढ़ी और वस्तुस्थिति का विश्लेषण करके तत्परता से निर्णय लेने की तरफ कदम बढ़ाया |
इंसान गुणों की खान हो सकता है अगर वो अपने पराये की भावना से ऊपर उठ जाए और दूसरों के बिगड़े काम बनाने के लिए प्रयासरत हो जाये |
रवि भाई के एक बात अक्सर याद रहेगी कि कितने भी बड़े बन जाना अपने गाँव मोहल्ले के उन लोगों का साथ न छोड़ना जिनके साथ बचपन बीता हो |
मेरा भी प्रयास है की क्या बचपन क्या जवानी अगर किसी के मौके पर खड़ा हो सकूँ उसके काम में मदद कर सकूँ, सही काम में उसका हौंसला बढ़ा सकूँ तो खुद को धन्य मानूंगा|
विनम्र श्रद्धांजलि |