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आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में (मिचिको आओयामा) - लघु समीक्षा सह परिचय - समीक्षक विशाल चंद

पुस्तक समीक्षा :आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में

लेखिका : मिचिको आओयामा | प्रकाशक : पेंगुइन स्वदेश

टोक्यो की एक शांत-सी सामुदायिक लाइब्रेरी पर आधारित उपन्यास, आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में केवल किताबों की कहानी नहीं है, बल्कि उन इंसानों की कथा है जो अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर ठहर गए हैं।

इस लाइब्रेरी की रहस्यमयी लाइब्रेरियन सायूरी कोमाची पाठकों को सिर्फ़ किताबें नहीं देतीं, बल्कि उनके भीतर छिपे सवालों और उलझनों को पढ़ लेती हैं। अक्सर वह ऐसी किताब थमा देती हैं, जिसकी ज़रूरत सामने वाले को होती है—भले ही उसे खुद इसका एहसास न हो।

यह उपन्यास पाँच अलग-अलग पात्रों की कहानियों के माध्यम से आगे बढ़ता है। कोई अपने काम से ऊब चुका है, कोई मातृत्व और अपने अधूरे सपनों के बीच झूल रहा है, तो कोई जीवन के अगले अर्थ की तलाश में भटक रहा है। ये सभी पात्र अपने जीवन के ऐसे पड़ाव पर खड़े हैं जहाँ एक छोटा-सा बदलाव, एक सही सवाल या एक किताब उनका सोचने का नज़रिया बदल देती है।

कहानी में जीवन को ‘merry-go-round’ यानी झूले की तरह दिखाया गया है—जहाँ हर इंसान किसी और की स्थिति से ईर्ष्या करता है, जबकि असल में सुख की कोई स्थायी अवस्था होती ही नहीं। यह विचार बड़े सरल और सहज ढंग से जीवन की गहरी सच्चाइयों को सामने रखता है, बिना किसी भारी दर्शन के।

पढ़ते समय महसूस होता है कि किताब की गति काफ़ी शांत है। कहीं-कहीं विचारों में दोहराव भी लगता है और तेज़ रफ्तार कहानी पसंद करने वाले पाठकों को इसका धीमापन खटक सकता है। लेकिन जो पाठक ठहरकर, मन से पढ़ना पसंद करते हैं, उनके लिए यह किताब एक सुकून भरा अनुभव बन जाती है।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताक़त इसकी "we" feeling यानी “हम” की भावना है—छोटे-छोटे रिश्ते, अजनबियों के बीच पनपती दयालुता, और संवाद की अहमियत

किताब यह याद दिलाती है कि जीवन हमेशा हमारी योजनाओं के अनुसार नहीं चलता, लेकिन कई बार अनपेक्षित मोड़ हमें ठीक वहीं पहुँचा देते हैं, जहाँ हमें होना चाहिए।

कुल मिलाकर, आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में एक हल्की, संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली किताब है। यह जीवन बदल देने का दावा नहीं करती, लेकिन पढ़ते-पढ़ते मन को थोड़ा शांत ज़रूर कर देती है—और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है।

" पढ़ें, समझें, बात करें और साझा भी "         

शुभकामनाएं 

विशाल चन्द  @reading_owl.3

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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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परख (जैनेन्द्र कुमार): एक लघु समीक्षा सह परिचय - समीक्षक संजय सिंह 'अवध' 

“परख” इसे जिसने केवल प्रेम संबंधी रचना समझा, वो इसके असली मर्म को समझ ही नहीं पाया।

हमारे जीवन में ये प्रायः होता है कि हम जिसके सबसे नज़दीक होते हैं उसे हम वास्तव में परख ही नहीं पाते। जैसे कि इस कृति मे पिताजी ने अपने पुत्र बिहारी को और सत्य ने कट्टो को परखने में भूल की, किंतु बिहारी और कट्टो जो एक दूजे से कुछ क्षण को मिले और परख पाये कि दोनों एक दूजे के लिए उपयुक्त हैं। 

परख लालच और पैसों से कभी नहीं होती, सेवाभावी से होती है ,और यह भाव निश्छल, निष्कपट प्रेम माँगता है। शुरुआत में महसूस होता है कि कट्टो और सत्य की प्रेमकथा है, किंतु वास्तव में यह उपन्यास बिहारी और कट्टो के उन अनछुए पहलुओं के बारे में है जो समय आने पर ही दिखते हैं। 

अपितु इस कहानी का केंद्रबिंदु कट्टो है किंतु कट्टो के गँवरपन (शहरी लोगों के अनुसार) में व्यक्तित्व की असली परख छुपी हुई है, ठीक उसी तरह जिस तरह बिहारी की अपव्ययता के चर्चों में उसका वास्तविक कारण। 

 

"दर्शन, उपन्यास के रूप मे|"

यदि कालजयी से भी ऊपर कोई शब्द है तो इस उपन्यास को उस श्रेणी में रखना सर्वथा उचित है, क्योंकि इसकी प्रासंगिकता जो तब थी जब यह लिखा गया, वही आज भी है |

 

तो क्या ख्याल है ?, कब पढ़ रहे इस कृति को ? 

जरूर पढ़िये, साझा करिए और परिचर्चा भी 

शुभकामनायें

 

 

- संजय सिंह 'अवध' 

ईमेल- green2main@yahoo.co.in

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समीक्षक, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।

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कगार की आग (हिमांशु जोशी): पुस्तक समीक्षा सह परिचय - समीक्षक शीतल

"कगार की आग" महिलाओं के शोषण की कहानी कहती किताब

यह किताब हिमांशु जोशी द्वारा 1975 में लिखा गया एक बहुत ही मार्मिक और हृदयविदारक उपन्यास है। जिसमें पहाड़ी पृष्ठभूमि की एक ऐसी महिला की कहानी है,जिसका शोषण और उत्पीड़न उसके ही अपने लोगों द्वारा किया गया।कहानी की मुख्य पात्र गोमती है। जो अपने मानसिक रूप से अस्वस्थ पति और एक छोटे बेेेटे कुन्नू के साथ रहती है।कहानी उस समय लिखी गई है जब पहाड़ में पितृसत्ता,रूढ़िवाद,जातिवाद चरम पर था। महिलाओं को तब सिर्फ घर का काम करने वाली , पति की इच्छा पूरी करने वाली तथा संतान पैदा करने वाली के तौर पर ही देखा जाता था।

जहाँ उसकी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान "नहीं" थी। उसके जीवन से जुड़े सारे फैसले उसका पति या घर का पुरुष लेता था। कहानी एक दलित महिला गोमती की है।जो अचानक से रात को भागकर अपनी माँ के पास इसलिए आ गई है कि उसके ककिया ससुर ने उसे इस तरह बेरहमी से किड़मोड़े की लकड़ी से मारा है कि उसके शरीर में नीले निशान रह गए है। उसपे आरोप यह कि उसके घर के बाहर पुरुषों के साथ संबंध है, वह भी बस इसलिए कि जानवरों के डॉक्टर से वह अपने बीमार पति के लिए दवाई मांगती है।

जंगल वह घास, लकड़ी लेने सभी महिलाओं के साथ जाती है, फिर भी जंगल के चौकीदार के साथ संबंध होने की अफवाह हैं। जिसके शक में वह उसे बुरी तरह मारते हैं, उसके चरित्र पर सवाल उठाते हुए उसे बहुत बुरी गालियां भी देते हैं।

पहाड़ी महिला के जीवन संघर्ष को बयां करती कहानी:

कहानी की मुख्य किरदार गोमती है, जो साहसी और विद्रोही है। जब उसका ककिया ससुर उससे सम्बन्ध बनाने की फिराक में आए दिन रात को उसके दरवाजे में आ जाता था, एक दिन जब उसने देखा कि ककिया ससुर दरवाजे के एकदम पास आ गया है तो उसे कुछ नहीं सुझा,अपने सिराने पड़ी हशिया उठाकर दे मारी। जिससे वह चला गया। बीमार पति की देखरेख और रोज का गोमती का अपने ही करीब के सम्बन्धों से चलता संघर्ष, जो कभी उसके पति को ठीक से काम न करने में पीट देते थे, कभी गोमती को चरित्रहीन बताते  हुए उसे अपमानित करते थे।

"गरीबी भुखमरी और उत्पीड़न के बीच पलता जीवन"

हिमांशु जोशी का लेखन बहुत गंभीर और मार्मिक है। उनके लिखने में वह दर्द झलकता है,जो एक आम इंसान की व्यथा है।गोमती और उसके परिवार का जीवन बहुत ही दयनीय है। उसका बीमार पति लोगों के फायदे के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी है। वह उसे अवैध कार्यों में अपने साथ ले जाते हैं, जहां पुलिस के छापा मारने में उसे जेल भेज देते है, और वह आसानी से सब कुछ कबूल कर लेता जो आरोप उस पर लगाए जाते। अपने खिलाफ होते शोषण के खिलाफ गोमती अकेले ही बोलती, बहुत बार वह बुरी तरह से टूट जाती थी। एक दिन का हो तो कोई सहे लेकिन उसके खिलाफ होने वाले शोषण में कमी नहीं आ रही थी, उसका देवर भी उसके साथ यौन उत्पीड़न करता है, जिससे तंग आकर वह नदी में कूदने जाती है, लेकिन उसके भीतर की मां उसे मरने नहीं देती।इस तरह कहानी स्त्री मन की व्यथा और समाज द्वारा उसे सिर्फ एक देह समझे जाने की है।

"स्त्री जीवन और दुख की कहानी"

मरने का फैसला स्थगित कर वह जिस इंसान के साथ रहने लगती है, गोमती की सुंदरता देख वह भी उससे आकर्षित हो जाता है, जहां वह उसे अपने साथ रख लेता है| सबको लगता है कि गोमती मर गई, लेकिन वह खुशाल नाम के इंसान के साथ रह रही होती है। जिसकी पहले से दो पत्नियां हैं, जिनसे उसे संतान का सुख प्राप्त नहीं हो पाया है। खुशाल उसे बहुत प्रेम करता है,अच्छे गहने बनाता है ,नए कपड़े दिलाता है। हर तरह से उसे खुश रखने की कोशिश करता है, लेकिन उसका मन तब भी अपने बच्चे के लिए दुखी रहता है। सब कुछ होने के बाद भी कुछ था जो गोमती को कचोटता था, उसका मन दुखी रहता,अपने नन्हे बच्चे कुन्नू के बारे में सोच सोच मन बैठ जाता।  खुशाल ने उसे 400रूपये देकर अपने पास रखा था। जो उस समय एक बड़ी रकम थी।जब उसका स्त्री मन किसी भी तरह अपने बेटे से नहीं हटा तो खुशाल ने भी उसे बुरी तरह पीट दिया ,उसके चरित्र का हवाला देकर उसे गालियां दी।

 "महिलाओं को देह के रूप में देखता समाज"

यह कहानी समाज की उस सच्चाई को सामने रखती है, जिसे वर्षों से ढकने की कोशिश की गई है। जिस समाज ने महिलाओं को चुप रहकर सहना सिखाया है।वह अपनी इस क्रूरता से पर्दा हटाना कभी नहीं चाहेगा। जहां एक भयावह चेहरा स्त्री देह को ही उसकी पहचान समझता है, उसी के हिसाब से उसे अपने लिए उपयोगी समझता है।

यह कहानी मानव समाज में महिलाओं में होने वाले दुखद शोषण को ही नहीं दिखाती, यह बताती है कि कैसे एक औरत जीवन भर उत्पीड़न का शिकार होती है। किसी ने भी स्त्री मन को नहीं जानना चाहा कि उसके अंतर्द्वंद्व क्या है। बल्कि उस पर अपना पुरुषत्व दिखाते रहें। गोमती न सिर्फ अंत तक संघर्ष करती हुई दिखती है, वह दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करके खुशाल को 400रुपए वापिस कर अपने घर अपने बच्चे कुन्नू के पास वापिस लौटती है।

हिमांशु जोशी की लेखनी सरल है। पहाड़ी जीवन को करीब से देखा है और उसकी सच्चाई को लिखा है। उनके लेखन में वह पहाड़ झलकता है,जिसके दर्द की कहानी उनके भीतर कुलबुलाती है। उनके लेखन में उन्होंने कुमाऊंनी शब्दों का जो उपयोग किया है वह कहानी को जीवंत बना देता है। "कगार की आग पाठक को झकझोरकर रख देती है", जो सोचने में मजबूर करती है कि महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में सिर्फ एक दैहिक और संतान सुख तक सीमित थी, आज की स्थिति का आंकलन मै पाठकों पर छोड़ती हूँ 

शीतल 


शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।

किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही  नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |


इस आशा के साथ कि शीतल जी की समझ और लेखनी, सुधी पाठकों की समझ को एक नया आयाम देकर उसको विस्तार देगी और एक संवेदनशील इंसान बनने का मार्ग प्रशस्त करेगी, ढेरों शुभकामनायें

सम्पादक

लवकुश कुमार 


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दीवार में एक खिड़की रहती थी ( साधारण जीवन की असाधारण संवेदनाएँ ) : पुस्तक समीक्षा सह परिचय - विशाल चंद

उपन्यास - दीवार में एक खिड़की रहती थी

लेखक- विनोद कुमार शुक्ल 

विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी” हिन्दी साहित्य में साधारण जीवन की असाधारण संवेदनाओं को उजागर करने वाली एक महत्वपूर्ण कृति है। यह उपन्यास किसी बड़े घटनाक्रम, तीव्र संघर्ष या नाटकीय मोड़ों पर आधारित नहीं है, बल्कि मध्यमवर्गीय जीवन की रोज़मर्रा की सच्चाइयों, सीमाओं और छोटी-छोटी खुशियों को बहुत सहजता से प्रस्तुत करता है।

      कहानी एक नवविवाहित मध्यमवर्गीय दंपत्ति रघुवर प्रसाद और सोनसी के इर्द-गिर्द घूमती है। रघुवर प्रसाद एक महाविद्यालय में गणित के अध्यापक हैं और शादी के बाद वे एक कमरे के छोटे से मकान में अपनी गृहस्थी बसाते हैं। इसी छोटे से कमरे में उनके सपने, चिंताएँ, आदतें और छोटी-छोटी खुशियाँ धीरे-धीरे आकार लेती हैं। उपन्यास पढ़ते हुए पाठक अनायास ही उनके जीवन से जुड़ने लगता है, मानो वे कोई काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि हमारे आस-पड़ोस में रहने वाले लोग हों। इस एक कमरे के मकान में भीतर की ओर बनी एक खिड़की "उपन्यास की आत्मा" बन जाती है। 

          यह खिड़की केवल रोशनी या हवा का रास्ता नहीं है, बल्कि यह रघुवर और सोनसी के "मन की दुनिया" से जुड़ने का माध्यम है। यही खिड़की उन्हें एक सीमित जीवन के भीतर भी सपने देखने, सोचने और उम्मीद बनाए रखने का अवसर देती है। प्रकृति और आसपास के वातावरण का चित्रण भी इसी खिड़की के सहारे बड़ी सहजता से कथा में घुल-मिल जाता है।

उपन्यास में दीवार जीवन की उन सीमाओं का प्रतीक है, जो हर आम आदमी के हिस्से में आती हैं—कम जगह, कम साधन और अनकही मजबूरियाँ। लेकिन उसी दीवार में बनी खिड़की यह भरोसा देती है कि सीमाओं के बीच भी उम्मीद के रास्ते मौजूद होते हैं। यही वजह है कि इस किताब को पढ़ते हुए पाठक अपने जीवन की दीवारों और उनमें छिपी खिड़कियों को देखने लगता है।

            इस उपन्यास की भाषा बेहद सरल, शांत और आत्मीय है। इसमें जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को बड़े सलीके से महत्व दिया गया है। लेखक बिना किसी उपदेश के यह बात कह जाते हैं कि सच्चा सुख भव्यता में नहीं, बल्कि साधारण पलों को जीने की क्षमता में छिपा होता है। रघुवर और सोनसी की सादगी, उनका रहन-सहन और उनका आपसी संबंध पाठक के मन में एक गहरा अपनापन जगा देता है।

           हालाँकि यह उपन्यास तेज़ गति से आगे नहीं बढ़ता। कहानी की चाल धीमी है और इसमें कोई बड़ा मोड़ या चौंकाने वाली घटना नहीं मिलती। जो पाठक तेज़ रफ्तार या केवल मनोरंजन की अपेक्षा से किताब उठाते हैं, उन्हें यह थोड़ी भारी लग सकती है। लेकिन जो पाठक "जीवन को ठहरकर देखने और महसूस करने का धैर्य" रखते हैं, उनके लिए यह कृति खास बन जाती है।

         कुल मिलाकर, “दीवार में एक खिड़की रहती थी” एक ऐसा उपन्यास है जो शोर नहीं करता, बल्कि चुपचाप दिल के पास बैठ जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि "सुख एक कमरे के छोटे से घर में भी पाया जा सकता है, बस ज़रूरत है उस दीवार में बनी खिड़की को देखने की।"

ही इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी और इसकी सबसे गहरी मानवीय सच्चाई है।

" पढ़ें, समझें, बात करें और साझा भी "         

शुभकामनाएं 

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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


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तुम पहले क्यों नहीं आये: पुस्तक समीक्षा सह परिचय - विशाल चंद

पुस्तक : तुम पहले क्यों नहीं आए? 

लेखक : कैलाश सत्यार्थी

 प्रकाशन : राजकमल पेपरबैक्स

        तुम पहले क्यों नहीं आए नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी द्वारा लिखी गई उन बच्चों की सच्ची कहानियों का संग्रह है, जिन्हें उन्होंने अपने संगठन बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से गुलामी और बाल श्रम से मुक्त कराया। यह किताब पढ़ते हुए बार-बार मन भारी हो जाता है और मन में क‌ई सवाल उठते हैं।

         इस पुस्तक में 12 बच्चों की जीवन कथाएँ हैं, जो पत्थर की खदानों, ईंट भट्ठों, घरेलू मजदूरी, कालीन कारखानों और तस्करी जैसे अमानवीय हालात से निकलकर आज़ादी की रोशनी तक पहुँच पाए। ये कहानियाँ किसी कल्पना की उपज नहीं, बल्कि हमारे समाज का कड़वा सच हैं और हर कहानी एक चुप चीख जैसी लगती है। शीर्षक कहानी देवली की है, जो तीसरी पीढ़ी से बंधुआ मजदूरी में जकड़ी हुई थी। जब उसे आज़ादी मिली तो उसके मुँह से निकला सवाल—

“तुम पहले क्यों नहीं आए?”

यह सवाल सिर्फ लेखक से नहीं, बल्कि हम सभी से किया गया सवाल बन जाता है। 

       किताब में प्रदीप, कालू, भावना और साहिबा जैसे बच्चों की कहानियाँ भी हैं, जिनके साथ अंधविश्वास, हिंसा, यौन शोषण और अमानवीय व्यवहार हुआ। इन किस्सों को पढ़ते हुए कई जगह शब्द साथ छोड़ देते हैं और सन्नाटा बोलने लगता है।इन्हें पढ़ते हुए कई बार मन करता है किताब बंद कर दूँ, लेकिन फिर लगता है—अगर हम पढ़ ही नहीं पाए, तो वे जिए कैसे होंगे? 

      हालाँकि यह किताब सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि उम्मीद भी देती है। बचाए गए कई बच्चे आगे चलकर पढ़े-लिखे, आत्मविश्वासी बने और आज दूसरों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। "यही इस किताब की सबसे बड़ी ताकत है।" कुल मिलाकर, तुम पहले क्यों नहीं आए एक झकझोर देने वाली, लेकिन ज़रूरी किताब है। यह हमें असहज करती है, सोचने पर मजबूर करती है और यह एहसास दिलाती है कि बच्चों की आज़ादी सिर्फ कानूनों से नहीं, हमारी संवेदना से संभव है।

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जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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The 10X Rule by Grant Cardone : Book Review Cum Intro (Gunjan Samant)

Book Review: The 10X Rule by Grant Cardone Stop Surviving, Start Thriving But Don’t Forget You’re Human

Every new year begins with fresh energy and fresh promises. We tell ourselves, this year will be different. Yet we also laugh at how resolutions rarely survive beyond January. That contradiction makes you pause—are we afraid of disappointing others?, or are we quietly breaking promises to ourselves? Are we entering a new year with new goals, but the same old mindset?

That question is what led me to The 10X Rule by Grant Cardone. I came across this book through a workshop recommendation. Before reading it, I was curious but skeptical. My first reaction was genuine surprise. The book is bold, intense, and unapologetically demanding. It energizes you—but it can also feel overwhelming. With time, though, I realized something important: a book should be used, not obeyed. And The 10X Rule is no exception.

At its core, the book argues that people don’t fail because they lack talent or intelligence, but because they massively underestimate the amount of action required for success in particular task or objective. Cardone repeatedly points to the gap between intention and execution—the space where most dreams quietly fade. He urges readers to stop operating in survival mode and instead aim for abundance through massive action.

In his framework, success isn’t luxury; it’s freedom and security—the ability to choose. One of the most practical ideas in the book is the concept of the four degrees of action: doing nothing, retreating, taking normal action, or taking massive action. As a student, this resonated deeply with me. I could see my own struggles with consistency, fear of failure, and even overworking reflected here. The exercises at the end of each chapter also encourage pause and reflection, making the book more interactive than purely motivational.

But this is also where my critical engagement begins. The book often assumes that everything can be controlled if you try hard enough. While I value its emphasis on responsibility, it sometimes overlooks very real human limits—emotional fatigue, burnout, and the need for rest. Obsession is framed as a gift rather than a disease. I agree to an extent, but obsession without boundaries can quietly become harmful. For me, rest is not laziness. It is guilt-free, productive rest—taking time to breathe, reflect, acknowledge small wins, and recognize how far you’ve come.

Reflection isn’t slowing down; it’s recalibration. A more humane 10X mindset would normalize emotional disruption instead of dismissing it. A simple example is competitive exam preparation. Many students, especially in classes 11 and 12, begin with extreme intensity. They go all in without understanding what truly deserves priority. Without clarity, effort becomes exhausting instead of empowering.

"Action matters—but direction matters just as much."

Where the book truly shines is in how it reframes fear as a sign of growth and failure as feedback. I personally connect with this. Failure, for me, has never been something to feel guilty about—it’s information. Still, not every reader may have the self-awareness to filter the book’s intensity in a healthy way.

That’s why The 10X Rule works best for beginners and highly ambitious individuals—but it may overwhelm those who struggle with self-compassion. I would recommend it with awareness. "Don’t follow it blindly". Let it support you, not pressure you.

If a book leaves you more drained than directed, something isn’t right. What we can control is our effort, mindset, and response. What we cannot control is life itself. Not every outcome bends to hard work, and acceptance doesn’t mean giving up—it means continuing without breaking yourself.

In the end, The 10X Rule isn’t a secret formula. It’s a lens. Used wisely, it can be powerful. Used rigidly, it can be exhausting. For me, "success is incomplete without sustainability". "Thriving should never come at the cost of being human"

Books like The 10X Rule push you to act. But before acting harder—pause. Who are you when you push like this? What drives you? What drains you? What does success mean to you? Maybe the next step isn’t more intensity, but more consciousness.

Do let me know your feedback/reflections.

Reading, Understanding & Excel.

Best Wishes

Gunjan Samant


Editorial Comments by Lovekush Kumar:

  • Our promise to accomplish some work has strength in the fact of the actual necessity of the work and our mindset towards the work.

  • Understand the difference between obsession and passion (or understanding the need) and align to more inclusice and actual need based choice.

  • Emotional disruption may be caused by valuing other’s opinion whose work and priorities are completely different, who doesn’t understand importance and need of our works (Center of our priorities)

  • Instead of controlling life one may try to set one’s priorities based on one’s actual need, like freedom from greed fear and illusions, self dependence and excellence in works and life with a healthy body, time for sports, time for reading good books, time to travel to explore and understand our surrounding, our nature.

  • In short “center or intention behind our decisions and priorities matters the most”


    Gunjan is a life sciences undergraduate student from Pithoragarh, who believes that learning goes far beyond exams and degrees. She completed her schooling at Don Bosco Senior Secondary School, Pithoragarh, where her years as a student shaped not only academic discipline but also a growing curiosity about life itself. Early on, she became aware that "education does more than build careers—it quietly shapes how we think, feel, and understand the world around us."

  • Gunjan believes that as young people who will soon become adults, it is important to reflect deeply and grow consciously—so that when younger minds seek guidance, they are met with empathy, clarity, and realism rather than confusion or unrealistic ideals.

    Through her writing, she invites readers to slow down and sit with themselves. She views life as a series of seasons, each carrying its own lessons, and believes that nothing goes in vain—not struggle, not grief, not pauses.

  • Her work explores quieter, often unspoken emotions and encourages acknowledging them rather than suppressing them, reminding readers that "understanding what we feel is not weakness, but the beginning of living with awareness and purpose".


    Input/feedback or refelections may be submitted by email to gunjansamant648@gmail.com or through contact form 

  • If you also have something that you wish to share with people, then write to us by typing it from the link given below or by writing it by hand and emailing the photo of the page to Lovekushchetna@gmail.com.

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बाल जिज्ञासा (एक पुस्तिका जिसमे विज्ञान और साहित्य का संगम है ) - लवकुश कुमार

संपादक की कलम से माता पिता को संबोधित

“ हर फूल सुंदर होता है यदि उसे ध्यान से देखा जाए “
“हर बीज मे पौधा और फिर पेड़ बनने की संभावना होती
है जरूरत है तो उसे सही परवरिश और माहौल उपलब्ध कराने की ”

बच्चे देश का भविष्य है, यही आगे चलकर शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, व्यापारी, वकील,
साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार, नेता, अधिकारी, वैज्ञानिक इत्यादि बनेंगे।
ये बच्चे आगे चलकर एक संवेदनशील इंसान बन सकें ताकि ये दूसरों की दिक्कतों को समझ सकें, सच
का साथ दे लोगों के साथ न्याय कर सकें, उसके लिए जरूरी है कि वो पहले एक विस्तृत सोच का
इंसान बने जो काबिल हो, जीविका आर्जित कर सकें अपने क्षेत्र में तथा अन्य लोगों और पेशों को
समझ सकें, उनके महत्व को जान सकें, अपने लिए अलग-2 क्षेत्रों के विकल्प ढूँढ सकें।
इसी उद्देश्य से इस पुस्तिका में साहित्यिक लेखों के साथ विज्ञान के तथ्य है जो बच्चों की सोच को
विस्तार देंगे और उनकी जिज्ञासा को बढ़ाकर उन्हें कार्य-कारण सिद्धांत से वैज्ञानिक चेतना की
तरफ अग्रसर करेंगे।

ऐसी शख्शियतों के नाम भी दिये गए हैं जिन्होने अपने काम के बल पर नाम कमाया और अपना
जीवन सफल बनाया ताकि बच्चे अपने सीमित दायरे से बाहर निकल इन महान लोगों के बारे मे
जान सकें और जीवन मे एक्सीलेन्स हासिल करने के लिए प्रेरित हो सके, ये भी हो सकता है कि
फिर बच्चे अन्य ऐसे महान लोगों के बारे मे जानने की जिज्ञासा व्यक्त करें |
“किसी काम को करते वक़्त, मिलने वाला आनंद ही वास्तव मे उस काम को करने का पुरस्कार है|”

पुस्तक से कुछ अंश :

शुभकामनाएं

-लवकुश कुमार


लेखक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से भौतिकी मे स्नातक और आई आई टी दिल्ली से भौतिकी मे परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

लेखक के विजन के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।


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समीक्षा:  “रोशनी के डोंगे (लघुकथा- रजनी शर्मा बस्तरिया)- डॉ. रौशन शर्मा.

 

रजनी शर्मा बस्तरिया की कहानी “रोशनी के डोंगे” भारतीय लोकजीवन, विशेषतः छठ पर्व की आध्यात्मिक आभा और ग्रामीण संवेदना को अत्यंत काव्यात्मक भाषा में रूपायित करती है। यह कहानी मात्र एक पर्व का दृश्य नहीं रचती, बल्कि उसमें निहित नारी के तप, जिजीविषा, सौंदर्य और विश्वास की सांस्कृतिक गाथा प्रस्तुत करती है।

भावभूमि और संवेदना:

कहानी का आरंभ एक शहर की बालकनी से होता है — एक ऐसा स्थान जहाँ लेखक स्वयं को ‘देहाती अंदाज़’ में टिकाए हुए है। यही बालकनी ग्रामीण स्मृतियों और शहरी वास्तविकताओं के बीच संवेदनात्मक सेतु बन जाती है। कथा का परिवेश धीरे-धीरे छठ पर्व की प्रतीक्षा और उल्लास से भर उठता है — “कानों में छठ के गीत हक जमाती आ रही थी।” यह पंक्ति पूरे वातावरण में श्रद्धा और लोक-उत्सव की गंध बिखेर देती है।

 प्रतीकात्मकता और बिंब-योजना:

कहानी की भाषा चित्रमयी है। लेखक ने रोशनी, धूप, सूरज, घाट, टिकुली, दीपशिखा, अंजोर आदि प्रतीकों के माध्यम से जीवन, संघर्ष और आशा की सततता को दिखाया है।

“चँदा टिकुली का डूबते सूरज से भिड़ंत होना” — यह दृश्य नारी-सौंदर्य और प्रकृति के संगम का अद्भुत बिंब है। “घाट पर रोशनी के डोंगे, और उम्मीद की पतवार” — यहाँ दीप सिर्फ़ पूजा का साधन नहीं, बल्कि जीवन-संघर्ष में उम्मीद का रूपक बन जाता है।

कहानी का शीर्षक “रोशनी के डोंगे” भी इसी प्रतीकात्मक अर्थ का विस्तार है — जीवन रूपी अंधकारमय सागर में तैरती विश्वास की ज्योति।

नारी और लोकजीवन:

लेखिका ने छठ पर्व को ‘व्रती साम्राज्ञियों’ का साम्राज्य कहा है। यह दृष्टि विशेष रूप से स्त्री-केन्द्रित है।

वे स्त्रियाँ केवल सजने-सँवरने वाली नहीं, बल्कि त्याग, अनुशासन और श्रद्धा की प्रतीक हैं। लेखक की दृष्टि में वे इस लोकविश्वास की असली वाहक हैं, जो अंधकार में भी अंजोर जगाती हैं।

शैली और शिल्प:

कहानी का शिल्प काव्यात्मक गद्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। भाषा में लय, ध्वनि, और दृश्यात्मकता है। “बादलों का टुकड़ा आकर मेरे पास  लुढ़क जाता है”, “हवाएँ अखबार के बाल सँवारने की ज़िद करती हैं।”

ऐसे बिंब कहानी को संवेदना और सौंदर्य के सम्मिलन तक पहुँचा देते हैं।

विदुषी लेखिका रजनी जी ने ग्रामीण संस्कृति को आधुनिक नगर जीवन के संदर्भ में रखकर ‘सांस्कृतिक पुनर्स्मरण’ का प्रभाव उत्पन्न किया है।

अन्तर्निहित दर्शन:

कहानी अंततः उम्मीद, संघर्ष और जिजीविषा की कथा है।

छठ का पर्व यहाँ आस्था का सामाजिक रूपक है। ‘रोशनी के डोंगे’ — वे दीप हैं जो हर स्त्री अपने विश्वास से जलाती है, ताकि जीवन की अंधेरी लहरों में भी दिशा बनी रहे।

इसप्रकार, “रोशनी के डोंगे” एक संवेदना-संपन्न, सौंदर्यपूर्ण और प्रतीक-प्रधान कथा है, जिसमें लोक और शहरी जीवन के बीच आस्था की एक उजली लकीर खिंचती है।

रजनी शर्मा बस्तरिया ने इस कहानी में छठ पर्व की आत्मा, भारतीय नारी की सहनशीलता, और मनुष्य की जिजीविषा को बड़ी सहजता से शब्दों में बाँधा है। यह कहानी पाठक के भीतर भी एक दीप जलाती है —

“जुगजुगाता अंजोर…” —

यानी आशा की वह ज्योति, जो हर युग में, हर मन में, जलती रहनी चाहिए।

 

-डॉ. रौशन शर्मा.

दिल्ली विश्वविद्यालय


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बच्चों का मोबाइल फोन के प्रति आकर्षण कम करने के कुछ उपाय: एक प्रयास

फोन के प्रति आकर्षण कम करना है तो उससे भी आकर्षक या कम से कम उसके टक्कर की किसी चीज़ की व्यवस्था करें

  • पहले तो खुद भी फोन का इस्तेमाल कम से कम करने 
  • पढ़ने के लिए प्रिंटेड संस्करण इस्तेमाल करे, पढ़ने के बाद उसे साझा करें
  • आपको पढ़ता देख बच्चा भी पढ़ेगा 
  • घर मे एक रंग बिरंगे कागज वाली रुचिकर किताबें रखे, कहानी, कविता, रंग भरने वाली, जीवनी। चुट्कुले
  • maple press और firstcry जैसे मंच पर एक से एक बेहतर किताबें हैं, 
  • बच्चों को रचनात्मक कार्यों मे लगायें 
  • इन्हे गायन, वादन या अभिनय, स्टोरी टेल्लिंग जैसी कार्यशाला मे ले जाएंगे
  • उन्हे विज्ञान से जुड़ा हुआ भ्रमण कराएं ताकि उनके जिज्ञासु मन मे सवाल रहें नाकी फोन की याद 
  • घर मे एक पुस्तकों को प्रदर्शित हुयी अलमिराह रखें ताकि बच्चे किताबें देखकर उनकी तरफ आकर्षित हो सकें
  • पेन ड्राइव के थ्रू कहानियों को स्पीकर सिस्टम पर प्ले कर सकते हैं, शांत और मनमोहक background म्यूजिक वाली कहानी  download करने का लिंक साझा कर रहा हूँ -हिन्दी की चुनिन्दा लघु कहानियाँ यहां से सुन सकते हैं-लघु कहानियाँ, इस लिंक को भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से भी एक्सेस किया जा सकता है- राजभाषा की वैबसाइट के लिए यहाँ क्लिक करें
  • ये कुछ प्रयास हैं|आप भी अपने इनपुट भेज सकते हैं 

आपकी राय  आमंत्रित है नीचे दिए गए लिंक से टाइप कर भेज दीजिये | या फिर lovekush@lovekushchetna.in पर ईमेल कर दीजिये 

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'तृषित' : एक जीवन यात्रा- पुस्तक परिचय

डॉ॰ प्रीति अग्रवाल द्वारा लिखित यह प्यारी सी पुस्तक, आदरणीय डॉ॰ विजय अग्रवाल सर के जीवन, संघर्ष, कार्यों और अनुभवों पर आधारित है, प्रकाशक बेनतेन बुक्स के शब्दों मे - " यह एक पिछड़े छोटे से गांव में निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे डॉ. विजय अग्रवाल के जीवन की सच्ची कहानी है। यह उस किसी भी ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो अपनी विपरीत परिस्थितियों से हार मानने से इंकार करके अपनी ज़िन्दगी में निरंतर अग्रसर होता जाता है। इसको पढ़ते समय इसमें आपको कई जगह अपनी झलक दिखाई दे सकती है। इस पुस्तक मे आपकी मुलाक़ात केवल घटनाओं से ही नहीं होगी बल्कि उन घटनाओं को जन्म एवं स्वरूप देने वाले जीवन के सूत्रों से भी होगी | 'तृषित' यानि प्यासा | यह आपके लिए  ' जीवन के जलकुंड '  का भी काम कर सकती है, आपके जीवन से जुड़े कुछ प्रश्नो के उत्तर देकर   "


मैंने क्या बेहतरी महसूस की इस पुस्तक को पढ़कर:

  • अपने आदरणीय डॉ॰ विजय अग्रवाल सर के शुरुआती जीवन को जानने का मौका मिला जहां से चलकर वह ऐसे इंसान बने जिन्होने अपने छात्र प्रेम और देश प्रेम के चलते युवाओं को संबोधित कर कई किताबें लिखी जिनके केंद्र मे, युवाओं के जीवन मे संवेदनशीलता, तार्किकता, कर्मठता, साहस, स्पष्टता और समझ को उचित स्थान देना रहा, सिविल सेवा परीक्षा मे सफलता के साथ-साथ डॉ॰ साहब की किताबें पाठकों को एक संयत, संतुलित, शांतिमय और सफल जीवन जीने के सूत्र प्रदान करती हैं |
  • ये जानने और समझने का अवसर मिला कि एक विनम्र पृष्ठभूमि से आने वाला एक आम युवक जिसने बचपन मे ही अपने पिता को खो दिया हो, कैसे देश की प्रतिष्ठित सेवाओं मे जगह बनाई और समाज मे चल रही दहेज पृथा जैसी कई बुराइयों को टक्कर देते हुये आगे बढ़ा और अपने काम और कौशल के दम पर लोगों के दिलों मे जगह बनाई | इनके वृत्तान्त से स्पष्टता और साहस दोनों मिलते हैं |
  •  साहित्य मे, अग्रवाल साहब का एक विशेष नाम है, उनकी यहाँ तक की यात्रा और विकास की झलक मिली और एक रास्ता भी अपनी साहित्यिक यात्रा को आगे बढ़ाने का |
  • ये जाना कि कैसे आप अपने काम के प्रति समर्पण और दूसरों के सहयोग को उचित मान देकर आप दूसरों का, अफ्नो का अनवरत सहयोग हासिल कर सकते हैं |
  • ये जाना कि एक लेखक और समाजसेवी के जीवन मे सहयोगी पत्नी का कितना अहम योगदान होता है |
  • ये जाना कि कैसे आप अपने बड़ों के स्नेह का पात्र बन सकते हैं | 
  • ये जानने का अवसर मिला कि आज जो AFEIAS.COM द्वारा, सिविल सेवा परीक्षा के साथ साथ जीवन प्रबंधन पर तार्किक सामग्री और नियमित सम्बोधन का जो अनवरत सिलसिला चलाया जा रहा है वो कैसे शुरू हुआ, ये समझ मेरे जीवन मे उपयोगी साबित होगी ऐसा मेरा विश्वास है |

 

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय डॉ॰ प्रीति अग्रवाल को कि उन्होने इस पुस्तक को लिखकर हमारे जैसे युवाओं को अपने अजीज डॉ॰ विजय अग्रवाल सर को और बेहतर तरीके से जानने समझने का मौका दिया |

 

मुझे पूरा विश्वास है कि पाठक इस पुस्तक को पढ़कर  बहुत कुछ बेहतरी की तरफ बढ़ सकते हैं फिर चाहे वो जीवन का मामला हो या प्रातियोगी परीक्षाओं की तैयारी का मामला हो |

शुभकामनायें

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