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पैसा, डर और विडंबना

एक तरफ भ्रष्टाचार करके संपत्ति अर्जित करने वाले, समाज और तंत्र को खोखला कर रहे हैं तो दूसरी तरफ उसी समाज के रिस्तेदार और दोस्त लालचवश ऐसे भ्रष्ट लोगों को बड़ा सम्मान और आदर दे रहे हैं, यहीं तक नहीं, ऐसे लोगों को अपना आदर्श मान रहे हैं चोरी छिपे ही सही।

-- पैसा इंसान के लिए बनाया गया था अब बहुतायत में ऐसे इंसान हैं जो पैसे के लिए ही जीवन जी रहे हैं फिर भले इसके लिए उन्हें उसी हवा (तंत्र) को क्यों न गंदा करना पड़ जाए जिसमें वो सांस ले रहे हैं।

-- कारण साफ है अंदर से खोखला इंसान बाहर से झूठी इज्जत चाह रहा है, खुद की नजरों में गिरा हुआ दूसरों से पैसे के बल पर सम्मान चाह रहा।

कोई बीमारी उम्र न कम कर दें इस डर से अथाह पैसे की भूख जो भ्रष्ट आचरण तक ले जा रही है।

अंदर की अशांति को बाहर की विलासिता से भरने की कोशिश।

कोई असहमत होकर अहंकार को चोट न कर दे, पैसे के दम से झूठी सहमति खरीदने की कोशिश।

-लवकुश कुमार

 

लेखक भौतिकी में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली से परास्नातक हैं और वर्तमान में भारत मौसम विज्ञान विभाग में अराजपत्रित अधिकारी हैं।

 

ऊपर व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार जिनका उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी है।

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