Recent Articles Related To स्त्री विमर्श

कगार की आग (हिमांशु जोशी): पुस्तक समीक्षा सह परिचय - समीक्षक शीतल

"कगार की आग" महिलाओं के शोषण की कहानी कहती किताब

यह किताब हिमांशु जोशी द्वारा 1975 में लिखा गया एक बहुत ही मार्मिक और हृदयविदारक उपन्यास है। जिसमें पहाड़ी पृष्ठभूमि की एक ऐसी महिला की कहानी है,जिसका शोषण और उत्पीड़न उसके ही अपने लोगों द्वारा किया गया।कहानी की मुख्य पात्र गोमती है। जो अपने मानसिक रूप से अस्वस्थ पति और एक छोटे बेेेटे कुन्नू के साथ रहती है।कहानी उस समय लिखी गई है जब पहाड़ में पितृसत्ता,रूढ़िवाद,जातिवाद चरम पर था। महिलाओं को तब सिर्फ घर का काम करने वाली , पति की इच्छा पूरी करने वाली तथा संतान पैदा करने वाली के तौर पर ही देखा जाता था।

जहाँ उसकी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान "नहीं" थी। उसके जीवन से जुड़े सारे फैसले उसका पति या घर का पुरुष लेता था। कहानी एक दलित महिला गोमती की है।जो अचानक से रात को भागकर अपनी माँ के पास इसलिए आ गई है कि उसके ककिया ससुर ने उसे इस तरह बेरहमी से किड़मोड़े की लकड़ी से मारा है कि उसके शरीर में नीले निशान रह गए है। उसपे आरोप यह कि उसके घर के बाहर पुरुषों के साथ संबंध है, वह भी बस इसलिए कि जानवरों के डॉक्टर से वह अपने बीमार पति के लिए दवाई मांगती है।

जंगल वह घास, लकड़ी लेने सभी महिलाओं के साथ जाती है, फिर भी जंगल के चौकीदार के साथ संबंध होने की अफवाह हैं। जिसके शक में वह उसे बुरी तरह मारते हैं, उसके चरित्र पर सवाल उठाते हुए उसे बहुत बुरी गालियां भी देते हैं।

पहाड़ी महिला के जीवन संघर्ष को बयां करती कहानी:

कहानी की मुख्य किरदार गोमती है, जो साहसी और विद्रोही है। जब उसका ककिया ससुर उससे सम्बन्ध बनाने की फिराक में आए दिन रात को उसके दरवाजे में आ जाता था, एक दिन जब उसने देखा कि ककिया ससुर दरवाजे के एकदम पास आ गया है तो उसे कुछ नहीं सुझा,अपने सिराने पड़ी हशिया उठाकर दे मारी। जिससे वह चला गया। बीमार पति की देखरेख और रोज का गोमती का अपने ही करीब के सम्बन्धों से चलता संघर्ष, जो कभी उसके पति को ठीक से काम न करने में पीट देते थे, कभी गोमती को चरित्रहीन बताते  हुए उसे अपमानित करते थे।

"गरीबी भुखमरी और उत्पीड़न के बीच पलता जीवन"

हिमांशु जोशी का लेखन बहुत गंभीर और मार्मिक है। उनके लिखने में वह दर्द झलकता है,जो एक आम इंसान की व्यथा है।गोमती और उसके परिवार का जीवन बहुत ही दयनीय है। उसका बीमार पति लोगों के फायदे के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी है। वह उसे अवैध कार्यों में अपने साथ ले जाते हैं, जहां पुलिस के छापा मारने में उसे जेल भेज देते है, और वह आसानी से सब कुछ कबूल कर लेता जो आरोप उस पर लगाए जाते। अपने खिलाफ होते शोषण के खिलाफ गोमती अकेले ही बोलती, बहुत बार वह बुरी तरह से टूट जाती थी। एक दिन का हो तो कोई सहे लेकिन उसके खिलाफ होने वाले शोषण में कमी नहीं आ रही थी, उसका देवर भी उसके साथ यौन उत्पीड़न करता है, जिससे तंग आकर वह नदी में कूदने जाती है, लेकिन उसके भीतर की मां उसे मरने नहीं देती।इस तरह कहानी स्त्री मन की व्यथा और समाज द्वारा उसे सिर्फ एक देह समझे जाने की है।

"स्त्री जीवन और दुख की कहानी"

मरने का फैसला स्थगित कर वह जिस इंसान के साथ रहने लगती है, गोमती की सुंदरता देख वह भी उससे आकर्षित हो जाता है, जहां वह उसे अपने साथ रख लेता है| सबको लगता है कि गोमती मर गई, लेकिन वह खुशाल नाम के इंसान के साथ रह रही होती है। जिसकी पहले से दो पत्नियां हैं, जिनसे उसे संतान का सुख प्राप्त नहीं हो पाया है। खुशाल उसे बहुत प्रेम करता है,अच्छे गहने बनाता है ,नए कपड़े दिलाता है। हर तरह से उसे खुश रखने की कोशिश करता है, लेकिन उसका मन तब भी अपने बच्चे के लिए दुखी रहता है। सब कुछ होने के बाद भी कुछ था जो गोमती को कचोटता था, उसका मन दुखी रहता,अपने नन्हे बच्चे कुन्नू के बारे में सोच सोच मन बैठ जाता।  खुशाल ने उसे 400रूपये देकर अपने पास रखा था। जो उस समय एक बड़ी रकम थी।जब उसका स्त्री मन किसी भी तरह अपने बेटे से नहीं हटा तो खुशाल ने भी उसे बुरी तरह पीट दिया ,उसके चरित्र का हवाला देकर उसे गालियां दी।

 "महिलाओं को देह के रूप में देखता समाज"

यह कहानी समाज की उस सच्चाई को सामने रखती है, जिसे वर्षों से ढकने की कोशिश की गई है। जिस समाज ने महिलाओं को चुप रहकर सहना सिखाया है।वह अपनी इस क्रूरता से पर्दा हटाना कभी नहीं चाहेगा। जहां एक भयावह चेहरा स्त्री देह को ही उसकी पहचान समझता है, उसी के हिसाब से उसे अपने लिए उपयोगी समझता है।

यह कहानी मानव समाज में महिलाओं में होने वाले दुखद शोषण को ही नहीं दिखाती, यह बताती है कि कैसे एक औरत जीवन भर उत्पीड़न का शिकार होती है। किसी ने भी स्त्री मन को नहीं जानना चाहा कि उसके अंतर्द्वंद्व क्या है। बल्कि उस पर अपना पुरुषत्व दिखाते रहें। गोमती न सिर्फ अंत तक संघर्ष करती हुई दिखती है, वह दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करके खुशाल को 400रुपए वापिस कर अपने घर अपने बच्चे कुन्नू के पास वापिस लौटती है।

हिमांशु जोशी की लेखनी सरल है। पहाड़ी जीवन को करीब से देखा है और उसकी सच्चाई को लिखा है। उनके लेखन में वह पहाड़ झलकता है,जिसके दर्द की कहानी उनके भीतर कुलबुलाती है। उनके लेखन में उन्होंने कुमाऊंनी शब्दों का जो उपयोग किया है वह कहानी को जीवंत बना देता है। "कगार की आग पाठक को झकझोरकर रख देती है", जो सोचने में मजबूर करती है कि महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में सिर्फ एक दैहिक और संतान सुख तक सीमित थी, आज की स्थिति का आंकलन मै पाठकों पर छोड़ती हूँ 

शीतल 


शीतल जी, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव भट्टयूडा से आती हैं। आपने अपना परास्नातक, भूगोल विषय में लक्ष्मण सिंह मेहर कैंपस पिथौरागढ़ से किया है। आप सामाजिक खांचों में फिट नहीं होना चाहती, इसे इस परिप्रेक्ष्य मे देखें कि आप हर वह रिवाज नकारना चाहती हैं जो आपको एक लड़की होने का हवाला देकर कम आंकते हो।

किताबें संवेदनशील ,सामाजिक ,निर्भय और वैज्ञानिक चेतना देती हैं, अतः किताबें पढ़ना, नया जानते रहकर अपनी समझ को विस्तार देते रहना आपकी आदत मे शुमार है। आपको फिल्में देखना पसंद है, और घूमना भी। भूगोल आपको अपनी ओर खींचती है साथ ही  नए और रचनात्मक लोगों के साथ बात करने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहती हैं |


इस आशा के साथ कि शीतल जी की समझ और लेखनी, सुधी पाठकों की समझ को एक नया आयाम देकर उसको विस्तार देगी और एक संवेदनशील इंसान बनने का मार्ग प्रशस्त करेगी, ढेरों शुभकामनायें

सम्पादक

लवकुश कुमार 


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More