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उभरते सवाल 24.11.2025

 लगातार बारिश से हो रहे भूस्खलनों ने इंडोनेशिया और वियतनाम में दर्जनों लोगों की जान ले ली है। पुर्तगाल एक बवंडर की चपेट में आया और नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन से पता चलता है कि मुंबई में मॉनसून के दौरान होने वाली मौतों में से 8 फीसदी से अधिक बारिश की वजह से होती हैं। इनसे ज्यादातर कमजोर वर्ग के लोग प्रभावित होते हैं। इस वर्ष की पहली छमाही में ही मौसम संबंधी दिक्कतों के कारण 100 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ। यह भविष्य का जोखिम नहीं बल्कि यह बदलती जलवायु की कठोर हकीकत है।

- राज्यों में अधिक ऋण से सामान्य सरकारी ऋण और उधारी की जरूरतें बढ़ जाती हैं, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था के लिए धन की लागत प्रभावित होती है। राज्यों के बीच आय अंतर को कम करना और ऊंचे स्तर के ऋण मसले का समाधान करना प्रमुख नीतिगत चुनौतियां हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि वित्त आयोग इन मुद्दों से कैसे निपटता है।


विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।

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जानकारी 24.11.2025

यूके की आतंरिक खुफिया एजेंसी एमआई ने अपने देश के सांसदों को चीनी छद्म-नियोक्ताओं से आगाह किया है। एजेंसी को खबर मिली है कि दरअसल ये चीनी जासूस हैं, जो ब्रिटेन सहित कई बड़े देशों में सांसदों व अन्य प्रभावशाली लोगों को किसी काम के बहाने भारी राशि देते हैं और उनसे खुफिया जानकारी लेते हैं। चीन ने इसी स्कीम के तहत पिछले 20 वर्षों में जहां दुनिया के अनेक गरीब देशों को एक ट्रिलियन डॉलर (भारत के बजट से दूना) दिए हैं, वहीं अमेरिका और ब्रिटेन को भी इतना ही पैसा दिया है। लेकिन इन्हें देने का तरीका छद्म है। इस योजना के तहत चीनी बैंक पहले चीनी टेक कंपनियों को कर्ज देती है। फिर ये कंपनियां अमेरिकी टेक कंपनियों से समझौता करती हैं। ताकि उनकी टेक्नोलॉजी हासिल हो सके। शोध संस्था एड्सडाटा के अनुसार अमेरिका की कई कंपनियां इसे सामान्य व्यापारिक समझौता समझकर अपनी टेक्नोलॉजी चीनी कंपनियों से शेयर कर देती हैं, जिसके जरिए चीन अपने टेक ज्ञान को आगे संवर्धित करता है। जबकि ट्रम्प ने अमेरिकी कंपनियों को अपने बेहतरीन सेमी-कंडक्टर्स और जीपीयू को चीन को बेचने से मना किया है। लेकिन चीन मध्यम दर्जे के सेमीकंडक्टर्स के सहारे भी डीपसीक एआई बनाने में सक्षम रहा। चीनी मंसूबों से हमें भी सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि चीनी चिप्स भारतीय सुरक्षा में सेंध लगा सकते हैं।- दैनिक भास्कर संपादकीय 21.11.2025

- सोलहवें वित्त आयोग ने इस सप्ताह अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। रिपोर्ट को अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, हालांकि उम्मीद है कि इसे 2026 के बजट सत्र में संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। सोलहवें वित्त आयोग की अनुशंसाएं अप्रैल 2026 से शुरू होने वाले पांच वर्ष के लिए होंगी। ये अनुशंसाएं केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व के वितरण को आकार देने के अलावा विभिन्न श्रेणियों के तहत राज्यों के बीच फंड आवंटन से संबंधित होंगी

- एक संघीय ढांचे में हमेशा यह उम्मीद रहेगी कि जो राज्य पिछड़ रहे हैं उन्हें मदद पहुंचाई जाएगी और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अधिक समतापूर्ण विकास संभव हो सके। इसके अलावा आंकड़े दिखाते हैं कि प्रति व्यक्ति आधार पर दक्षिण भारत के राज्यों के संसाधन बेहतर हैं।

- चालू वर्ष में केरल की प्रति व्यक्ति व्यय 86,000 रुपये से अधिक है, बिहार में यह केवल 24,000 रुपये के करीब है। ध्यान देने वाली बात है कि 2020-21 और 2025-26 के बीच देश के सबसे गरीब राज्यों में प्रति व्यक्ति व्यय आय बढ़कर करीब दोगुना हो गया है। हालांकि इसका आधार कम रहा है जबकि अमीर दक्षिण भारतीय राज्यों में यह समेकित स्तर पर 59 फीसदी तक बढ़ा है।

- यद्यपि, व्यय में तेज वृद्धि आय में तेज वृद्धि में परिवर्तित नहीं हुई है। दक्षिणी राज्यों की औसत प्रति व्यक्ति आय 2009-10 में गरीब राज्यों की तुलना में 2.1 गुना थी, जो अब बढ़कर 2.8 गुना हो गई है। इससे संकेत मिलता है कि गरीब राज्यों को विकास कार्य करने में सक्षम बनाने के लिए कर बंटवारे में अधिक हिस्सेदारी आवश्यक हो सकती है, लेकिन यह तीव्र आर्थिक वृद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। तीव्र आर्थिक वृद्धि ही प्रति व्यक्ति आय बढ़ाकर इस अंतर को कम करने में मदद कर सकती है।

- केंद्र और राज्यों के समक्ष एक और चुनौती है। कुछ राज्यों पर बहुत अधिक ऋण है, जो विकास की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 19 राज्यों में बकाया देनदारियां सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 30 फीसदी से अधिक हैं, जिनमें केरल भी शामिल है। पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में यह जीएसडीपी के 40 फीसदी से भी अधिक है।


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समझ - 23.11.2025

 इतिहास शायद ही ऐसी संस्थाओं को पुरस्कृत करता है, जो बदलाव इनकार करती हों।
- सत्ताधारी दल चाहे जितना ताकतवर या योग्य हो, संतुलन बनाए रखने के लिए उसके सामने एक मजबूत विपक्ष होना ही चाहिए। लोकतंत्र सिर्फ चुनावी गणित नहीं। इसका अर्थ विकल्पों का लगातार बने रहना भी है। अगर एक धुरी जरूरत से अधिक ताकतवर हो जाए तो दूसरी ढह जाती है और लोकतंत्र की जीवंतता बनाए रखने वाला संतुलन खत्म हो जाता है। मजबूत विपक्ष की मौजूदगी ही सरकार को आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है। उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करती है। 
- स्वच्छ हवा का अधिकार और प्रदूषण रहित वातावरण हमारा मूल अधिकार है और न्यायालय स्वयं बार-बार इस बात की पुष्टि कर चुका है
- पर्यावरण संरक्षण को सुविधा के लिए छोड़ा नहीं जा सकता। सतत या टिकाऊ विकास कोई बाधा नहीं है। यह एकमात्र वैध मार्ग है जो नागरिकों के अधिकारों और भारत के पर्यावरणीय भविष्य दोनों का सम्मान करता है।
- जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता से दूर जाने के खाने पर कोई भी चर्चा बारीकी से होनी चाहिए, न कि कठोर आदेशों जैसी ब्राजील के राष्ट्रपति लुइस इनासियो लूला दा सिल्या ने इसकी आवश्यकता पर बात करते हुए 'निर्भरता का उल्लेख किया जो यह दर्शाता है कि यह केवल 'गंदी' बनाम 'स्वच्छ ऊर्जा' का साधारण द्वैत नहीं है निर्भरता में नौकरियां, सार्वजनिक वित्त और पूरे क्षेत्रीय अर्थ तंत्र शामिल हैं।
- अचानक बदलाव सामाजिक अस्थिरता का जोखिम पैदा करता है
- एक मजबूत संघीय ढांचे में भी हर हाल में लोकतंत्र के जीवन के लिए शक्तियों और उसकी सीमा को लेकर स्पष्टता बनी रहनी चाहिए। साथ ही संवैधानिक पदों पर बैठे लोग अगर संविधान की मर्यादा का खयाल रखें, तो इससे लोकतंत्र को भी मजबूती मिलेगी।


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लेह और मौसमवीर - मनीष कुमार गुप्ता

पल भर में है धूप खिली, अगले पल छाया अंधकार।
कुछ पल में ही तेज हवा, लगता है जैसे चमत्कार।।
गर्मी में यहाँ फूल खिलें, स्वर्ग सा मौसम बन जाता है।
देश विदेश के सैलानियों को ये लद्दाख बहुत भाता है।।

सर्दी में तापमापी का पारा, ऋणात्मक बीस भी जाता है।
ऊपर से तेज हवा का झोंका, कभी कभी सताता है।।
पश्चिमी विक्षोभों से अधिकतर, वर्षा और बर्फबारी है।
समुद्रतल से 3500 मीटर ऊपर कर्मभूमि हमारी है ।।

सर्दी में जम जाता आर्द्र बल्ब, गर्म पानी से उसे उठाना है।
गर्म कपड़ों में सीलबंद होकर, वेधशाला में जाना है।।
समुद्र तल से ऊँचाई पर, ताप और दाब घट जाता है।
कम ऑक्सीजन के चलते यहाँ रक्त दाब बढ़ जाता है।।

अधिक ठंड और कम आर्द्रता के संयोग का विज्ञान।
ट्रॉस हिमालय की गोद में बसा लेह लद्दाख महान।।
पर्यावरण और प्रकृति का यहाँ संगम होता निराला है।
पहाड़ों की बर्फ के परावर्तन से, होता तेज उजाला है।।

जब सूरज तेजी से चमके, ठंड का नहीं होता अहसास।
बार बार ही गला सूखता, बुझती नहीं है प्यास ।।
कम आर्द्रता के कारण, स्थिर आवेश प्रभाव दिखाता है।
किसी चीज को छूने से, यदाकदा झटका लग जाता है।।

बढ़ने लगती आर बी सी और घटने लग जाती है भूख।
कितना भी करो आप जतन, त्वचा जाती है बिल्कुल सूख ।।
जब जब सर्दी में तापमान, माइनस में चला जाता है।
बंद होता नलकूप और सीवरेज, पानी भी जम जाता है।।

बर्फ तोड़कर, आग सेक कर फिर पानी मिल पाता है।
मुश्किल है यहाँ सर्दी का जीवन, कैसे कोई सह पाता है।।
बड़े दयालु 'सोनम' सर जी, यहाँ कहलाते "मौसमपीर"।
इन्हीं के मार्गदर्शन में, रहते हैं हम सब मौसमवीर।।

​​​मनीष कुमार गुप्ता जयपुर, राजस्थान 


मनीष जी भारत सरकार के भारत मौसम विज्ञान विभाग में सेवारत हैं और लेह में अपनी सेवाएं दे चुके हैं वह अपनी कई कविताओं से मौसम विज्ञान विभाग के सफर, उसके योगदान और महत्व पर प्रकाश डाल चुके हैं।


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जानकारी 18.11.2025

 

- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूटान यात्रा ने दो असमान शक्तियों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों के एक मॉडल को प्रतिबिंबित किया
-- नेपाल के विपरीत, वर्ष 2008 में भूटान के चुनावी लोकतंत्र में परिवर्तन ने भारत के साथ संबंधों को अस्थिर नहीं किया है।
- वर्ष  2007 में भूटान में राष्ट्रीय परिषद के लिए पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव हुए थे। उस समय भारत- भूटान संधि में एक महत्त्वपूर्ण संशोधन किया गया और उस उपबंध को बदल दिया गया जिसमें कहा गया था कि भारत विदेशी मामलों में भूटान का 'मार्गदर्शन करेगा। उसकी जगह लिखा गया कि दोनों देश 'एक दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान' करेंगे। दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ अपने क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं करने देने पर भी सहमत हुए। इस उपबंध का परीक्षण साल 2017 में भूटान के डोकलाम क्षेत्र पर चीन के कब्जे के दौरान हुआ था।
- मोदी ने भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड द्वारा निर्मित और भारत की वित्तीय मदद से तैयार 1,020 मेगावॉट की पुनात्सांग - 2 जलविद्युत परियोजना का उद्घाटन किया और देश में नई ऊर्जा परियोजनाओं के लिए 4,000 करोड़ रुपये के ऋण देने की घोषणा की। 


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समझ 18.11.2025

 

- भूटान ने वर्ष 2023 से सीमा यातां पर सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर कर, दलाई लामा से दूरी बनाए रखते हुए, तथा तिब्बत के संदर्भ में औपनिवेशिक अर्थ को बदलते हुए चीन की चिंताओं को दूर करने का प्रयास किया है। इस वर्ष, चीनी नववर्ष का जश्न भूटान की राजधानी थिम्पू में मनाया गया ये कदम भले ही भूटान की व्यवहारिकता से प्रेरित हों, लेकिन ये भारत के लिए सतर्कता बरतने का एक संकेत हैं। इस लिहाज से मोदी की यात्रा को एक आवश्यक उपाय के रूप में देखा जा सकता है।

-- न्याय और नीति यही कहती है कि आरक्षण की व्यवस्था को इस तरह लागू किया जाए कि पात्र लोगों को ही उसका लाभ मिलना सुनिश्चित हो सके।

- एससी -एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्यवस्था बनाए जाने के पक्ष में न्यायाधीश गवई ने यह बिल्कुल सही कहा कि आइएएस और गरीब मजदूर के बेटों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

- ध्यान रखा जाना चाहिए कि आरक्षण का उद्देश्य वंचित एवं पिछड़े तबकों के उन लोगों के उत्थान के विशेष प्रयत्न किए जाना है, जो वास्तव में सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं। आम तौर पर सामाजिक रूप से ऐसे पिछड़े लोग आर्थिक रूप से भी कमजोर होते हैं। आरक्षण में क्रीमी लेयर के सिद्धांत को लागू करने के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि आरक्षित वर्ग के किसी व्यक्ति के उच्च पद पर पहुंच जाने के बाद भी कई बार उसे उपेक्षा या भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

-- भारत में भ्रष्टाचार कोई नई घटना नहीं है और न ही यह केवल भारत तक सीमित है बल्कि वास्तव में, भ्रष्टाचार दुनिया भर में पाया जाता है। हालांकि, जैसे-जैसे देश विकास की सीढ़ी पर चढ़ते हैं, भ्रष्टाचार आमतौर पर कम होता जाता है। भारत आजादी की अपनी 100वीं वर्षगांठ मनाने के वक्त तक एक विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा भी रखता है इसलिए उसे इस स्थानिक समस्या से निपटना ही होगा। यह देश की विकास की आकांक्षाओं को जो नुकसान पहुंचा रहा है, उसे अनदेखा करना बहुत बड़ी भूल होगी।

- 1990 के दशक से, कई शोधकर्ताओं ने भ्रष्टाचार के देश की आर्थिक वृद्धि पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया है। अध्ययनों से यह बात साबित हुई है कि भ्रष्टाचार वास्तव में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने, निजी निवेश, रोजगार सृजन और आय समानता के लिए कितना हानिकारक है। कुछ शोधकर्ताओं ने दिखाया है कि कैसे भ्रष्टाचार खराब गुणवत्ता वाले उत्पादों और सेवाओं, नागरिकों के लिए जीवन की निम्न गुणवत्ता और कुछ कंपनियों के ताकतवर समूह के दबदबे को बढ़ावा देता है।

- यह सर्वविदित है कि अधिकांश विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बहुत कम भ्रष्टाचार है, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि क्या विकास स्वचालित रूप से कम भ्रष्टाचार की स्थिति पैदा करता है या कम भ्रष्टाचार किसी देश को विकास की सीढि़यों की ओर ले जाता है। सहज ज्ञान कहता है कि बाद वाला अधिक संभावित है

- भ्रष्टाचार को कैसे कम किया जाए? कुछ विद्वान और प्रभावशाली व्यक्ति कहते हैं कि शिक्षा में, खासकर प्राथमिक स्तर से ही नैतिकता और सदाचार की एक मजबूत नींव, इस दिशा में मददगार साबित हो सकती है। हालांकि यह भी एक परिकल्पना ही है।

- आपके इस स्तंभकार का मानना है कि तीन चीजें भ्रष्टाचार को कम करने में मदद कर सकती हैं। पहला, नियामकीय जटिलता को हर क्षेत्र में सरल बनाना, चाहे वह भूमि अधिग्रहण हो या सीमा शुल्क से जुड़ा वर्गीकरण हो। इससे अफसरशाही की मदद लेने के अवसर कम होंगे।

- मजबूत सुरक्षा कवच कम करना होगा जिसका लाभ अफसरशाह, खासकर वरिष्ठ अधिकारी, जांच और मुकदमे के खिलाफ उठाते हैं। आज, जब तक सरकार मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं देती है तब तक कोई भ्रष्ट अधिकारी भी काफी हद तक सुरक्षित रहता है और सतर्कता विभागों को अक्सर ऐसी मंजूरी हासिल करना बहुत कठिन लगता है।
- हालांकि  ये सुरक्षा अच्छे इरादों से तय की गई थी ताकि अफसरशाहों को उनके पेशेवर कर्तव्यों के दौरान लिए गए निर्णयों के लिए गलत तरीके से दोषी ठहराए जाने से बचाया जा सके। लेकिन समय के साथ इनका विपरीत प्रभाव पड़ा है। शायद अब एक आय और संपत्ति ऑडिट की आवश्यकता है जो हर 10 साल में किया जाना चाहिए और यह उन अधिकारियों के खिलाफ स्वचालित जांच और मुकदमे को मंजूरी दे जिनकी संपत्ति का स्रोत आय, निवेश रिटर्न या विरासत के आधार पर साबित न किया जा सके
- अंत में  में, कानूनी प्रणाली में बड़े बदलाव की आवश्यकता है ताकि भ्रष्टाचार के मामले तीन दशक या उससे अधिक समय तक न खिंचें। भारत यदि एक विकसित देश बनना चाहता है तो इसे भ्रष्टाचार से निपटना होगा, लेकिन इसके लिए केंद्र और राज्य स्तर पर सरकारों को कठिन फैसले लेने होंगे भले ही वे राजनीतिक रूप से जोखिम भरे हों


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समझ 16.11.2025

 यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि अब सेवा निर्यात के क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में भारत के सेवा निर्यात में तेजी लाने के लिए सेवाओं की गुणवत्ता, दक्षता, उत्कृष्टता तथा सुरक्षा को लेकर और अधिक प्रयास करने होंगे
- अब हमें साफ्टवेयर निर्यात के लिए अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करनी होगी और सेवा निर्यात की संभावनाओं वाले अन्य देशों में कदम बढ़ाने होंगे। हमें नए दौर की तकनीकी जरूरतों और उद्योग की अपेक्षाओं के अनुरूप कौशल प्रशिक्षण से नई पीढ़ी को सुसज्जित करना होगा। सेवा निर्यात बढ़ाने के लिए शोध, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के मापदंडों पर आगे बढ़ना होगा। देश के कोने-कोने खासकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों को भी सेवा क्षेत्र से जोड़ने के प्रयास करने होंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसे प्रयासों से देश का सेवा क्षेत्र और सेवा निर्यात रफ्तार पकड़ेगा तथा इससे भारत को वर्ष 2027 तक दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और वर्ष 2047 तक विकसित देश बनाने के बड़े लक्ष्य को हासिल करने में भी मदद मिलेगी।
- गतिशीलता में भी चीन आगे है। उसने इलेक्ट्रिक वाहनों पर वर्चस्व स्थापित कर लिया है। 2024 में चीन ने वैश्विक इलेक्ट्रिक कार बिक्री का लगभग दो-तिहाई हिस्सा अपने नाम किया। घरेलू बाजार में हर महीने बेची जाने वाली आधी कारें इलेक्ट्रिक हैं और दुनिया के शीर्ष 10 इलेक्ट्रिक वाहन के ब्रांडों में से छह अब चीनी हैं। चीन के वाहन अब उभरते बाजारों पर कब्जा कर रहे हैं। चीन में 100 से अधिक कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहन बनाती हैं। एआइ के नए माडल बनाने में अब भी अमेरिका आगे है, लेकिन जब एआइ का फोकस “नवाचार” से “विस्तार” पर शिफ्ट हो रहा है, तो असली जीत सिर्फ माडल की बेंचमार्क से नहीं, बल्कि कंप्यूटर के लिए ऊर्जा, डाटा की उपलब्धता, नियामक गति और एप्लीकेशन अपनाने की दर से तय होगी।

-- ड्रोन विशेषज्ञ बाबी सकाकी के अनुसार, “डीडेआइ हर साल लाखों ड्रोन बना सकता है, जो अमेरिका की तुलना में सौ गुना अधिक है।” अमेरिका सबसे उन्नत युद्ध ड्रोन बनाता है, लेकिन उनकी कीमत 6 से 13 मिलियन डालर तक होती है। युद्ध के सिद्धांत अब सस्ते ड्रोन, मानव रहित विमान की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें चीन उत्कृष्ट है। इसी बीच अमेरिका के एफ-35 कार्यक्रम की कुल लागत 1.58 ट्रिलियन डालर तक पहुंच गई है, जिससे भविष्य के रक्षा निवेशों के लिए जगह घट गई है।

- वैश्विक स्तर पर बन रही इस स्थिति में प्रासंगिक बने रहने के लिए भारत को अपनी विकास रणनीति को तीन बातों पर केंद्रित करना चाहिए- बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन, अपने घरेलू बाजार से परे निर्यात बाजार की खोज और अग्रणी तकनीक तक पहुंच। इन तीनों में चीन का वर्चस्व है। भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” रणनीति समझदारी भरी है, लेकिन अब गणित कहता है कि थोड़ा झुकाव जरूरी है। जहां चीन के साथ गठबंधन भारत के हित में हो, वहां वह साझेदारी करे और बाकी मुद्दों को अलग रखे। इसका अर्थ चीन के अधीन होना नहीं है, बल्कि उन विशिष्ट मुद्दों पर सहयोग है, जो भारत की राष्ट्रीय क्षमताओं को मजबूत करें।

- भारत के तटीय क्षेत्र, पारिस्थितिकी रूप से सबसे नाजुक क्षेत्रों में से हैं।

- एआई के लिए डेटा केंद्र 

इन संयंत्रों की पानी की जरूरतें बहुत ज्यादा होती हैं क्योंकि इनके कूलिंग तंत्र हर साल लाखों लीटर पानी इस्तेमाल कर सकते हैं। ज्यादातर इनकी स्थापना उन क्षेत्रों में हो रही है जहां पानी की कमी है, जैसे मुंबई और चेन्नई । कुछ परिचालक अब हवा से ठंडी करने वाली या क्लोज्ड लूप सिस्टम अपना रहे हैं, लेकिन ये विकल्प अब भी सीमित हैं। कई केंद्र अब भी पानी की बहुत खपत करने वाले वाष्पीकरण कूलिंग पर निर्भर हैं। डेटा केंद्र बड़ी मात्रा में बिजली की भी खपत करते हैं। वैश्विक अनुमान बताते हैं कि वर्ष 2030 तक, वे दुनिया की 8 फीसदी तक बिजली उपयोग कर सकते हैं। भारत में, इस क्षेत्र की बढ़ती बिजली की मांग ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव डालती है। भारत का ग्रिड अब भी काफी हद तक जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है, जिससे कार्बन उत्सर्जन को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।

- दुनिया भर की समाचार रिपोर्ट (ब्राजील, ब्रिटेन, चिली, आयरलैंड, मलेशिया, मेक्सिको, नीदरलैंड, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और स्पेन से ) यह दर्शाती हैं कि जैसे-जैसे तकनीकी कंपनियां एआई को आगे बढ़ाने के लिए डेटा सेंटर बना रही हैं, वैसे ही कमजोर समुदायों को बिजली कटौती और पानी की कमी का सामना करना पड़ा है। इन गैर-टिकाऊ पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले तरीकों को लगातार जारी रखने से रोकने के लिए, भारत को डेटा केंद्र विस्तार के हर चरण में पर्यावरणीय स्थिरता को शामिल करना होगा। इसका मतलब है कि अक्षय बिजली स्रोतों का उपयोग करना, ऊर्जा कुशल बुनियादी ढांचा अपनाना और साथ ही, अत्याधुनिक कूलिंग तथा पानी को रिसाइक्लिंग करने वाली प्रणालियां लागू करना जरूरी है।

- डिजाइन और संचालन में टिकाऊपन को शामिल कर भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि डेटा संचालित उसकी यह वृद्धि आर्थिक और तकनीकी लक्ष्यों का समर्थन करे और साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी करे तथा कार्बन उत्सर्जन कम करे। हरित बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित कर, कुशल जल प्रबंधन और अक्षय ऊर्जा को अपनाकर, भारत खुद को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार डिजिटल विकास में एक वैश्विक अगुआ के रूप में स्थापित कर सकता है।


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जानकारी 15.11.2025

जानकारी 15.11.2025

- हाल में आए एक आंकड़े से पता चला कि चीन अमेरिका की तुलना में 2.5 गुना ज्यादा बिजली उत्पन्न करता है और उसका लक्ष्य हर साल “एक जर्मनी” के बराबर बिजली उत्पादन जोड़ने का है। एलन मस्क का भी कहना है कि अगले तीन-चार वर्षों में चीन में सौर ऊर्जा का उत्पादन अमेरिका के सभी स्रोतों से संयुक्त रूप से अधिक होगा। वास्तव में भविष्य को आकार देने वाली तकनीक के युग में चार तकनीकें तय करेंगी कि कौन आगे रहेगा- ऊर्जा, गतिशीलता (मोबिलिटी), एआइ और युद्ध की रणनीति (वारफेयर)।
- 2024 में चीन ने 14.4 गीगावाट हाइड्रोपावर जोड़ी, जो कई देशों के कुल उत्पादन से अधिक है और 58.7 गीगावाट पंप्ड-स्टोरेज हाइड्रो तक पहुंच गया है एवं 200 गीगावाट से अधिक निर्माणाधीन है। वह परमाणु ऊर्जा में भी सक्रिय है, जहां 30 रिएक्टर निर्माणाधीन हैं। कम वाणिज्यिक बिजली दरों और विशाल विनिर्माण की बदौलत बैटरी क्षेत्र में चीन ने फिर से ग्लोबल सप्लाई-चेन रैंकिंग में पहला स्थान हासिल किया है। सौर विनिर्माण की हर अवस्था में चीन की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक है। ऊर्जा वह कच्चा माल है, जो बाकी सभी मूलभूत तकनीक को चलाएगा। चीन इसमें में काफी आगे निकल चुका है और उन कीमतों पर, जिनसे कोई मुकाबला नहीं कर सकता।
-- सच्चाई यह है कि जहां अमेरिका बेहतर माडल बनाने का जश्न मना रहा है, वहीं चीन ने यह सुलझा लिया है कि उन्हें वास्तव में चलाएगा कौन। पिछले कुछ वर्षों में युद्ध का स्वरूप भी बदल गया है। अब युद्ध सस्ते ड्रोन और घूमने वाले गोला-बारूद से लड़े जा रहे हैं, न कि महंगे टैंकों और विमानों से। ड्रोन निर्माण में चीन का वर्चस्व है। उसकी कंपनी डीडेआइ के पास वैश्विक ड्रोन बाजार का 70 प्रतिशत हिस्सा है। इसके मैविक ड्रोन के माडल 300 से 5,000 डालर के बीच आते हैं।


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उम्मीद 15.11.2025

सेवा निर्यात की मौजूदा प्रगति देश में हो रहे संरचनात्मक सुधारों, तकनीकी विकास और नई पीढ़ी की उच्च कौशल युक्त क्षमताओं का परिणाम है। गौरतलब है कि सेवा निर्यात में सूचना प्रौद्योगिकी, वाणिज्य, बैंकिंग, वित्त, बीमा, पर्यटन, आतिथ्य, शिक्षा, चिकित्सा और कृत्रिम मेधा जैसी सेवाओं का निर्यात शामिल है
- भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) खोलने में आई तेजी से भी सेवा निर्यात बढ़ रहा है। नैसकाम और जिनोव की ओर से जारी इंडिया जीसीसी-लैडस्केप रपट के मुताबिक, जीसीसी के लिए भारत दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बन रहा है।
- फिलहाल देश में 1800 से अधिक जीसीसी हैं, जिनसे 21 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। दुनिया के करीब पचास फीसद जीसीसी सिर्फ भारत में हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जीसीसी का योगदान 1.5 फीसद से अधिक है, जो वर्ष 2030 तक 3.5 फीसद हो जाएगा। जीसीसी प्रमुख रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, उपभोक्ता सेवाएं, वित्त, मानव संसाधन और अनुसंधान एवं विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

- यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि भारत में कृत्रिम बुद्धिमता और डेटा विश्लेषण जैसे क्षेत्रों में शोध एवं विकास तथा नवउद्यम के अनुकूल माहौल से अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने केंद्र यहां खोलना चाहती हैं।
- इसमें दोराय नहीं कि सेवा निर्यात भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अहम पहलू बन गया है। इससे न केवल विदेशी व्यापार घाटे को थामे रखने में मदद मिल रही है, बल्कि देश में रोजगार निर्माण में भी इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। नीति आयोग की नई रपट में कहा गया है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान 55 फीसद से अधिक है और लगभग 18.8 करोड़ लोगों को यह रोजगार से जोड़ता है। सेवा क्षेत्र ने पिछले छह वर्षों में चार करोड़ अतिरिक्त रोजगार पैदा किए हैं। देश का सेवा निर्यात 14.8 फीसद की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ रहा है, जो वस्तु निर्यात के 9.8 फीसद से कहीं ज्यादा है।


विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।

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जानकारी 14.11.2025

पिछले कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन का भारत समेत पूरी दुनिया में प्रभाव साफ दिखने लगा है। ब्राजील के बेलेम में आयोजित काप 30 सम्मेलन में बुधवार को जारी 'जलवायु जोखिम सूचकांक-2026' की रपट में कहा गया है कि जलवायु आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित देशों में भारत नौवें स्थान पर है। पिछले तीन दशकों में देश में जलवायु आपदाओं के कारण करीब अस्सी हजार लोगों की जान जा चुकी है। 
- अगर वैश्विक स्तर पर बात करें तो पिछले तीन दशकों में नौ हजार से अधिक मौसमी आपदाओं ने आठ लाख से ज्यादा लोगों की जिंदगी लील ली है। यह बात छिपी नहीं है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर उन्हीं विकासशील देशों को झेलना पड़ रहा है, जिनकी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भागीदारी सबसे कम है। विकासशील देश कमजोर सहन क्षमता और अनुकूलन के सीमित संसाधनों के कारण ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
- भारत सहित कई विकासशील देशों में जलवायु आपदाएं सामान्य स्थिति बनती जा रही हैं, जिसके लिए तत्काल और व्यापक वित्त पोषित अनुकूलन उपायों की जरूरत है। यह जगजाहिर है कि कार्बन उत्सर्जन के मामले में विकसित देशों का योगदान सबसे ज्यादा है, इसलिए अनुकूलन उपायों को लेकर उनकी जिम्मेदारी भी अधिक होनी चाहिए। उनकी भूमिका सिर्फ वित्तीय सहायता और तकनीकी सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कार्बन उत्सर्जन में कमी और कमजोर देशों के अनुकूलन प्रयासों का समर्थन करना भी शामिल है।
- भारत सेवा निर्यात में भले ही नई ऊंचाई हासिल करते हुए वैश्विक सेवा निर्यात का एक प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, मगर इस मामले में उसके सामने चुनौतियां भी कम नही हैं। इनमें सेवाओं की गुणवत्ता, दक्षता, सभी क्षेत्रों में कारोबार बढ़ाने, ग्रामीण और छोटे शहरों में शोध एवं नवाचार के साथ-साथ युवाओं में कृत्रिम मेधा (एआइ) जैसे कौशल विकसित करने की चुनौतियां प्रमुख हैं। 
- सेवा निर्यात की मौजूदा प्रगति देश में हो रहे संरचनात्मक सुधारों, तकनीकी विकास और नई पीढ़ी की उच्च कौशल युक्त क्षमताओं का परिणाम है। गौरतलब है कि सेवा निर्यात में सूचना प्रौद्योगिकी, वाणिज्य, बैंकिंग, वित्त, बीमा, पर्यटन, आतिथ्य, शिक्षा, चिकित्सा और कृत्रिम मेधा जैसी सेवाओं का निर्यात शामिल है
- भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) खोलने में आई तेजी से भी सेवा निर्यात बढ़ रहा है। नैसकाम और जिनोव की ओर से जारी इंडिया जीसीसी-लैडस्केप रपट के मुताबिक, जीसीसी के लिए भारत दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बन रहा है।
- - फिलहाल देश में 1800 से अधिक जीसीसी हैं, जिनसे 21 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। दुनिया के करीब पचास फीसद जीसीसी सिर्फ भारत में हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जीसीसी का योगदान 1.5 फीसद से अधिक है, जो वर्ष 2030 तक 3.5 फीसद हो जाएगा। जीसीसी प्रमुख रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, उपभोक्ता सेवाएं, वित्त, मानव संसाधन और अनुसंधान एवं विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- ओपन एआइ के प्रमुख सैम आल्ट मैन के मुताबिक, कृत्रिम बुद्धिमता के लिए दुनिया में भारत दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। वहीं, गुगल के सीईओ सुंदर पिचाई का मानना है कि भारत इस क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व कर सकता है। इस समय भारत में कृत्रिम बुद्धिमता पारिस्थितिकी तंत्र का काफी तेजी से विस्तार हो रहा है। इस वर्ष भारत का कृत्रिम बुद्धिमता का बाजार 13.05 अरब डालर मूल्य की ऊंचाई पर है, जिसका आकार वर्ष 2032 में 130.63 अरब डालर तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। भारत में प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमता पारिस्थितिकी तंत्र में वर्तमान में साठ लाख से अधिक लोग कार्यरत हैं। देश में लगभग 1.8 लाख नवउद्यम हैं और पिछले वर्ष शुरू किए गए नवउद्यमों में से करीब 89 फीसद ने अपने उत्पादों या सेवाओं में कृत्रिम बुद्धिमता का उपयोग किया है।
-इसमें दोराय नहीं कि सेवा निर्यात भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अहम पहलू बन गया है। इससे न केवल विदेशी व्यापार घाटे को थामे रखने में मदद मिल रही है, बल्कि देश में रोजगार निर्माण में भी इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। नीति आयोग की नई रपट में कहा गया है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान 55 फीसद से अधिक है और लगभग 18.8 करोड़ लोगों को यह रोजगार से जोड़ता है। सेवा क्षेत्र ने पिछले छह वर्षों में चार करोड़ अतिरिक्त रोजगार पैदा किए हैं। देश का सेवा निर्यात 14.8 फीसद की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ रहा है, जो वस्तु निर्यात के 9.8 फीसद से कहीं ज्यादा है।
- ऐसे में भारत को सेवा क्षेत्र को और मजबूत करते हुए सेवा निर्यात में तेजी लाने की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। इस बात पर ध्यान देना होगा कि अभी भी भू-राजनीतिक रूप से भारत का सेवा क्षेत्र देश की व्यापक आर्थिक असमानता को दर्शाता है। देश में कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और तमिलनाडु उच्च मूल्य वाली सेवाओं मसलन- सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त और अचल संपत्ति में दबदबा रखते हैं
- इसमें कोई संदेह नहीं हैं कि देश अपने संरचनात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, और अर्थव्यवस्था के औपचारिक एवं शहरीकृत होने के साथ-साथ सेवा क्षेत्र में और भी ज्यादा कर्मचारियों को शामिल करने की क्षमता मौजूद है।
- सेवा क्षेत्र में लैंगिक समानता पर भी ध्यान देना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 10.5 फीसद महिलाएं सेवा क्षेत्र में कार्यरत हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 60 फीसद है।
- यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि अब सेवा निर्यात के क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में भारत के सेवा निर्यात में तेजी लाने के लिए सेवाओं की गुणवत्ता, दक्षता, उत्कृष्टता तथा सुरक्षा को लेकर और अधिक प्रयास करने होंगे


विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।

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