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आधार(लघुकथा) - लवकुश कुमार

सजग (चाय की चुस्कियाँ लेते हुए) - प्रतिभा, मुझे तुमसे कुछ पूछना है।

प्रतिभा - हाँ सजग, पूछिए आपको क्या पूछना है?

सजग - मुझे कभी-2 यह डर लगता है कि हमारी दोस्ती कब तक चलेगी या चलेगी भी या नहीं?

प्रतिभा - आप ऐसा क्यों सोचते हैं जब तक हम एक-दूसरे की प्रगति, स्वतंत्रता व स्पष्टता में सहायक रहेंगे, यह दोस्ती चलती रहेगी। किसी एक का साथ भी अगर दूसरे की प्रगति में सहायक होगा तो हमारी दोस्ती बनी रहेगी। एक मित्र की उन्नति होगी तो वो दूसरे मित्र को भी तो आगे बढ़ाएगा।

सजग - धन्यवाद प्रतिभा इस स्पष्टता के लिए।

©लवकुश कुमार


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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बेहतरीन किताबें, कहानियां, उपन्यास पढने का भी समय नहीं तो सारांश ही सुन लीजिये - (स्वर जो ध्यान बाँध ले)
जिनावर - चित्रा मुगदल https://www.youtube.com/watch?v=2xj4XDVv6aE सारांश 3 मिनट के बाद शुरू होता है |

दौड़ लघु उपन्यास- ममता कालिया

https://www.youtube.com/watch?v=AKruXIgPdvA एक लघु उपन्यास 
कामायनी - जयशंकर प्रसाद  https://www.youtube.com/watch?v=9PFfsgicNw4 स्वर कृतिम बुद्धिमत्ता 
मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी - मंत्र https://www.youtube.com/watch?v=9WmyGjf739w पूरी कहानी 

निर्मोही-ममता कालिया की कहानी

https://www.youtube.com/watch?v=AypnekxuCaI अपनी रचनाओं में ममता कालिया जी न केवल महिलाओं से जुड़े सवाल उठाती हैं, बल्कि उन्होंने उनके उत्तर देने की भी कोशिश की हैं।

 

आनंद लीजिये इन रचनाओं का और अपनी सोच को विस्तार दीजिये |

धन्यवाद की पात्र हैं वह लेखिका/लेखक जिन्होंने ये कहानियां लिखी और वह वक्ता जिन्होंने अपनी आवाज में इनके सारांश को हमारे लिए और सुलभ तथा रोचक  बनाया|

बोलते तो सब हैं एक बोलना ये भी है कि आप किसी चेतना को छूने वाली कहानी को आवाज दें |


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दिल को छू लेने वाली कुछ कहानियां (स्वर नम्रता सिंह)
परिंदा - सुनीता त्यागी  https://www.youtube.com/watch?v=BWUyL5xtPGU
तस्कीं को हम न रोयें - ममता कालिया https://www.youtube.com/watch?v=B_mpmpd5VeA
थोड़ा सा प्रगतिशील - ममता कालिया  https://www.youtube.com/watch?v=0tdKgYiLTqs
परली पार - ममता कालिया https://www.youtube.com/watch?v=MaXpAwVXnOc
पंडिताइन - ममता कालिया https://www.youtube.com/watch?v=JgJW0VmNNlU

आनंद लीजिये इन कहानियों का चेतना को छूने वाली कथावस्तु और मन को बाँधने वाली आवाज में |

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खुलती गिरहें ( कहानी ) - सविता मिश्रा 'अक्षजा'

पत्नी और माँ के बीच होते झगड़े से तंग आकर बेटा माँ को ही नसीहतें देने लगा| सुनी-सुनाई बातों के अनुसार माँ से बोला- "बहू को बेटी बना लो मम्मा, तब खुश रहोगी|"
"बहू बेटी बन सकती है?" पूछ अपनी दुल्हन से|" माँ ने भौंह को चढ़ाते हुए कहा|
"हाँ, क्यों नहीं?" आश्वस्त हो बेटा बोला|
"बहू तो बन नहीं पा रही, बेटी क्या खाक बन पाएगी वह|" माँ ने गुस्से से जवाब दिया|

"कहना क्या चाहती हैं आप माँजी, मैं अच्छी बहू नहीं हूँ?" सुनते ही तमतमाई बहू कमरे से निकलकर बोली|
"बहू तो अच्छी है, पर बेटी नहीं बन सकती|"
"माँजी, मैं बेटी भी अच्छी ही हूँ| आप ही सास से माँ नहीं बन पा रही हैं|"
"मेरे सास रूप से जब तुम्हारा यह हाल है, माँ बन गयी तो तुम मेरा जीना ही हराम कर देगी।" सास ने नहले पर दहला दे मारा|
"कहना क्या चाह रही हैं आप?" अब भौंह तिरछी करने की बारी बहू की थी|
"अच्छा ! फिर तुम ही बताओ, मैंने तुम्हें कभी सुमी की तरह मारा, कभी डाँटा, या कभी कहीं जाने से रोका!" सास ने सवाल छोड़ा|
"नहीं तो !" छोटा-सा ठंडा जवाब मिला|
बेटा उन दोनों की स्वरांजली से आहत हो बालकनी में पहुँच गया|

"यहाँ तक कि मैंने तुम्हें कभी अकेले खाना बनाने के लिए भी नहीं कहा| न ही तुम्हें अच्छा-खराब बनाने पर टोका, जैसे सुमी को टोकती रहती हूँ|" उसे घूरती हुई सास बोली|
"नहीं माँजी, नमक ज्यादा होने पर भी आप सब्जी खा लेती हैं!" आँखें नीची करके बहू बोली|

"फिर भी तुम मुझसे झगड़ती हो! मेरे सास रूप में तो तुम्हारा ये हाल है| माँ बन, सुमी जैसा व्यवहार तुमसे किया, तो तुम तो मुझे शशिकला ही साबित कर दोगी।" बहू पर टिकी सवालिया निगाहें जवाब सुनने को उत्सुक थीं।

कमरे से आती आवाजों के आरोह-अवरोह पर बेटे के कान सजग थे| चहलकदमी करता हुआ वह सूरज की लालिमा को निहार रहा था|

"बस करिए माँ! मैं समझ गयी| मैं एक अच्छी बहू ही बनके रहूँगी|" सास के जरा करीब आकर बहू बोली|
"अच्छा!"
"मैंने ही सासू माँ नाम से अपने दिमाग में कँटीली झाड़ियाँ उगा रखी थीं| सब सखियों के कड़वे अनुभवों ने उन झाड़ियों में खाद-पानी का काम किया था|"

"सुनी क्यों! यदि सुनी भी तो गुनी क्यों?"

बेटे ने बालकनी में पड़े गमले के पौधे में कली देखी तो उसे सूरज की किरणों की ओर सरका दिया|

"गलती हो गई माँ! आज से उन पूर्वाग्रह रूपी झाड़ियों को समूल नष्ट करके, अपने दिमाग में प्यार का उपवन सजाऊँगी| आज से क्यों, अभी से| अच्छा बताइए, आज क्या बनाऊँ मैं, आपकी पसंद का ?" बहू ने मुस्कुराकर कहा |

"दाल भरी पूरी..! बहुत दिन हो गए खाए हुए।" कहते हुए सास की जीभ, मुँह से बाहर निकल होंठों पर फैल गई|

धूप देख कली मुस्कुराई तो, बेटे की उम्मीद जाग गयी| कमरे में आया तो दोनों के मध्य की वार्ता, अब मीठी नोंकझोंक में बदल चुकी थी|

सास फिर थोड़ी आँखें  तिरछी करके बोली- "बना लेगी...?"
"हाँ माँ, आप रसोई में खड़ी होकर सिखाएँगी न!" मुस्कुराकर चल दी रसोई की ओर|

बेटा मुस्कुराता हुआ बोला, "माँ, मैं भी खाऊँगा पूरी|"

माँ रसोई से निकल हँसती हुई बोली, "हाँ बेटा, जरूर खाना ! आखिर मेरी बिटिया बना रही है न|" 

© सविता मिश्रा 'अक्षजा' 

ईमेल-2012.savita.mishra@gmail.com


अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों प्रकाश डालते हुए या कहें की ध्यान खींचते हुए एक  शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपने  लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि विधाओं में ढेरों रचनाएं साहित्य कोश को अर्पण की हैं, आपकी 'रोशनी के अंकुर' एवं  'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा  ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह के साथ  अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हैं और 'खाकीधारी'  2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन}  'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश} का सम्पादन भी किया, आप लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता  विधा में कई बार पुरस्कृत हैं|  आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|


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