हम अक्सर सुनते हैं, कि अगर आधा रास्ता या आधे से ज्यादा रास्ता तय हो गया है तो आप हमेशा आगे बढ़िये क्योंकि मंजिल तक पहुचने के लिए भी उतना ही रास्ता तय करना है जितना पीछे लौटने के लिए। लेकिन इस पंक्ति पर सोचने की जरूरत है,
हम किसी परीक्षा की तैयारी शुरू करते हैं और लगभग एक निश्चित समय में अगर ठीक से पढ़ें तो हम 50 से 75 % पाठ्यक्रम पढ़ लेते हैं, फिर भी कई लोग उसके बाद भी कई साल लगे रहते है और सेलेक्ट नहीं होते (किसी नौकरी या प्रवेश परीक्षा को ही लें )।
अब ये सोचने की बात है कि क्या सच में हमने आधा रास्ता तय किया था?
पहली बात कि आपने पढ़ते वक्त क्या सच में जो तरीका मुफीद और लाभकारी है वो अपनाया था, जैसे पाठ्यक्रम को समझना, सवाल समझना, महत्वपूर्ण टॉपिक्स को रेखांकित करना आदि|
दूसरी बात कि आपने कितने मन से पढ़ा था, क्योंकि सिर्फ पढ़ाई ही काफी नहीं होती, आपने कितना समझा है, उसके बाद आपके दिमाग ने उसे कितना याद रखा है ये भी जरूरी है।
जो सबसे जरूरी बात है कि 50% रास्ता तय हुआ या नहीं इसके जो मानक या बेंचमार्क या पैमाना होना चाहिए जिन पर आप अपनी तैयारी का आंकलन करेंगे, वो हैं आपकी प्रश्न पत्र को हल करने कि क्षमता, जैसे तैयारी शुरू करने के समय आप 10% प्रश्न हल कर पा रहे थे, तैयारी करते हुए एक साल बाद अगर 30% हल हो पा रहे तब ये 30 कब 60 में बदल रहा है उसका सही आकलन बहुत जरूरी है..............
लेकिन सालों तक अगर बढ़ोत्तरी नहीं हो रही तो आत्मनिर्भर होने के लिए कुछ skills सीखिए, अगर score नहीं बढ़ रहा है, दूसरी परीक्षाओं में भी बैठने के विकल्प पर विचार करिए |
अपनी जिंदगी ये कह कर मत निकाल दीजिए कि कुछ तो सीखेंगे ही, हो सकता है उस कुछ की जगह आप और बहुत कुछ कर सकते हो दूसरे बेहतर विकल्प को अपनाकर, रही बात कुछ सीखने की तो आप अगर सच मे सीखना चाहते है तो सीखने के लिए और भी क्षेत्र हैं, उन पर भी विचार कर सकते हैं |
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
Gunjan is a life sciences undergraduate student from Pithoragarh, who believes that learning goes far beyond exams and degrees. She completed her schooling at Don Bosco Senior Secondary School, Pithoragarh, where her years as a student shaped not only academic discipline but also a growing curiosity about life itself. Early on, she became aware that "education does more than build careers—it quietly shapes how we think, feel, and understand the world around us."
Her journey through competitive exam preparation, especially NEET, became a turning point in her growth. The years of preparation exposed her to pressure, comparison, emotional fatigue, and phases of detachment—experiences that many students go through but rarely speak about.
Writing began during this phase as a way to process those emotions honestly. Over time, it grew into a "responsibility".
Gunjan believes that as young people who will soon become adults, it is important to reflect deeply and grow consciously—so that when younger minds seek guidance, they are met with empathy, clarity, and realism rather than confusion or unrealistic ideals.
Through her writing, she invites readers to slow down and sit with themselves. She views life as a series of seasons, each carrying its own lessons, and believes that nothing goes in vain—not struggle, not grief, not pauses.
She writes from lived experience: as a woman, as a young learner, as a "listener and observer", as both a student and a teacher in becoming, and above all, as a conscious human being.
Her work explores quieter, often unspoken emotions and encourages acknowledging them rather than suppressing them, reminding readers that "understanding what we feel is not weakness, but the beginning of living with awareness and purpose".
With best wishes and an attempt to impart clarity about things met so far.
Note- feedback, queries and comments may be submitted through contact form.
यथार्थ सवाल करता है, यार प्रेम तुम अपनी वेबसाइट पर इतने आर्टिकल, लघुकथा व अन्य चीजें डालते रहते हो जबकि बहुत से लोग इन विषयों पर पहले ही लिख चुके है फिर तुम इन पर क्यों लिखते हो?
प्रेम गहरी साँस लेकर फिर मुस्कुराते हुए उत्तर देता है, तुम सही कर रहे हो यथार्थ कि इन विषयों पर पहले भी लिखा जा चुका है लेकिन उसकी पहुंच सीमित है क्योंकि एक वक्त जब मुझे ऐसी ही चीजों की जरूरत थी, एक स्पष्टता की जरूरत थी तब मुझे ये सब नहीं मिल पाया, कितना अच्छा होता अगर ये मुझे किसी स्थानीय स्तर पर मिल जाता और आसानी से मिल जाता, उसी कमी को भरने को मैं अपने तरीके से लोगों तक और उन छात्रों तक इसकी सरल पहुँच बनाना चाहता हूँ जिससे कि जिस स्पष्टता की कमी का सामना मैंने किया है उसे दूसरे न महसूस करे। अगर ये चीजें किसी एक के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकी तो मैं इस काम को सार्थक समझूँगा।
यथार्थ गर्व की अनुभूति के साथ कहता है, वाह यार तुमने तो एक आदर्श प्रस्तुत कर दिया, शिकायत ही नहीं काम करके कमी को भरने का प्रयास! प्रेम के हाव भाव से विनम्रता और संतुष्टि का भाव झलक रहा था।
-लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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रंजना - स्तुति तुम ये क्या लेखन के काम में लगी रहती हो, न जॉब है अभी, न जिंदगी में स्थायित्व (स्तुति की सहेली उलाहना देते हुए कहती है)!
स्तुति- (मुस्कुराते हुए) रंजना, मैं अपनी जॉब के लिए प्रयासरत हूँ, जिसके लिए मैं अपनी पढ़ाई भी करती हूँ। फिर इतना पढ़ने के बाद मूकदर्शक की भाँति सिर्फ शिकायतें करना नहीं पसंद करती। इससे इतर लोगों को स्पष्टता, सार्थकता व निडरता देने के लिए काम करना चाहती हूँ। मैं ऐसा करके ऐसे व्यक्तियों का सहयोग भी कर रही हूँ जो इसी काम में लगे हुए हैं, इस सहयोग के साथ मैं खुद के समय को नियमित सार्थक कार्य में लगा पाती हैं।
रंजना, जो अब तक स्तुति को एक एवरेज इंसान मानकर उलाहना दे रही थी, उसकी बातों सुनकर उस पर गर्व महसूस करके मुस्कुरा रही थी।
-सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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अद्वैत तुम अपने लिए काम करने वाले सहकर्मी के हर एक मैसेज पर जवाब या प्रतिक्रिया देते हो! सान्निध्य ने अद्वैत से पूछा।
अद्वैत - हाँ मैं ऐसा करता हूं क्योंकि मैं उसे बताना चाहता हूँ कि इवरी एफर्ट काउंट्स , हाँ उसकी सारी बातें ,अच्छी नहीं हो सकती, किसी की नहीं होती, पर मेरा उस साथी को प्रोत्साहन देने का तरीका है ये, मैं अपने कम्युनिकेशन में एक निरंतरता और सजीवता लाने को ऐसा करता हूं ताकि कम्युनिकेशन गैप की संभावना कम रहे।
वाह अद्वैत वाह, सानिध्य गर्व महसूस करता है अपने दोस्त पर।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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मीरा उस लड़के के पीछे दौड़ी जिसको उसने अपने सिर पर मोर पंख सजाये हुए देखा था, उसका हाथ पकड़ कर रोकते हुए मीरा ने कहा- तुम्हारा नाम क्या है?
उस लड़के ने कहा- कृष्णा
मीरा - माथे पर मोर पंख लगाने से और हाथों में बांसुरी पकड़ने से कोई कृष्ण नहीं बन जाता, कृष्ण बनने के लिए न जाने कितने राक्षसों का वध करना पड़ता है, सबकुछ जो प्रिय हो उसे छोड़ने का साहस होना चाहिए, धर्म की स्थापना करनी होती है। कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाली मीरा ने कहा।
कृष्णा( जो एक साधारण लड़का था) उसने कहा...पता है मुझे मैं कृष्ण नहीं हूं और इतना कृष्ण को तुम जानती हो तो ये भी जानती होगी कि कृष्ण को एक बहेलिये ने बाण मारा था जिससे उनकी मृत्यु हुई थी।
मीरा ने उदास और भरी हुई आँखों से हाँ में जवाब दिया।
उस साधारण लड़के ने कहा.....कृष्ण गए थे पर कृष्णत्व आज भी है।
मीरा ने प्रश्न भरी आँखों से कृष्णा की ओर देखा।
कृष्णा-आज अगर हम भगवद्गीता के अनुसार काम करे तो कृष्णत्व को ही जीवित रखने का काम कर रहे है और इससे कहीं न कहीं कृष्ण भी हमें हमारे बीच महसूस होंगे
मीरा ने कहा......हम कहाँ से कृष्ण की बातों को जी सकेंगे, उनके कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग को मान सकेंगे, वो तो भगवान थे।
कृष्णा- कृष्ण ने ये सब किया इसीलिए वो भगवान बने, लेकिन हम यही समझते है कि वो भगवान थे इसीलिए ये सब किया।
आज मीरा की आंखें खुल चुकी थी, वो साधारण कृष्णा उसके लिए कृष्ण बन चुका था। कृष्ण और कृष्णत्व को समझकर आज वो अपने आराध्य के प्रति पहले से ज्यादा श्रद्धा भाव से भर गयी थी, उसने अपना जीवन भी सच्चे अर्थों में कृष्ण भक्त के रूप में बिताया।
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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यह श्रेणी, मैंने डॉ विजय अग्रवाल सर से प्रेरित होकर बनायीं है, उनका कहना है की जैसे हर गाना गाने वाला इंसान गायन की बारीकियों को नहीं समझता, वैसे ही हर जीने वाला शख्स, जीवन की बारीकियों को नहीं समझता, प्रयास रहेगा की डॉक्टर साहब द्वारा जीवन प्रबंधन पर ऑडियो लेक्चर के लिंक को टॉपिक के अनुसार यहाँ उपलब्ध कराया जाये |
उदाहरण के लिए जीवन दर्शन विषय पर डॉक्टर साहब के एक कमेंट वाले ऑडियो का लिंक यहाँ दिया जा रहा है जिसमे वह अपनी एक स्टूडेंट सौम्य गुप्ता जी के सवाल का जवाब दे रहे हैं : LM 22-09-25
शुभकामनाएं
घर के बड़े बुजुर्गों के मुह से सुनी हुयी कथा :
एक *चूहा* एक व्यापारी के घर में बिल बना कर रहता था।
एक दिन *चूहे* ने देखा कि उस व्यापारी और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं। चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है।
उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक *चूहेदानी* थी।
ख़तरा भाँपने पर उस ने पिछवाड़े में जा कर *कबूतर* को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है।
कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या? मुझे कौनसा उस में फँसना है?
निराश चूहा ये बात *मुर्गे* को बताने गया।
मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा… जा भाई.. ये मेरी समस्या नहीं है।
हताश चूहे ने बाड़े में जा कर *बकरे* को ये बात बताई… और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा।
उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई, जिस में एक ज़हरीला *साँप* फँस गया था।
अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर उस व्यापारी की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डस लिया।
तबीयत बिगड़ने पर उस व्यक्ति ने वैद्य को बुलवाया। वैद्य ने उसे *कबूतर* का सूप पिलाने की सलाह दी।
कबूतर अब पतीले में उबल रहा था।
खबर सुनकर उस व्यापारी के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन *मुर्गे* को काटा गया।
कुछ दिनों बाद उस व्यापारी की पत्नी सही हो गयी, तो खुशी में उस व्यक्ति ने कुछ अपने शुभचिंतकों के लिए एक दावत रखी तो *बकरे* को काटा गया।
*चूहा* अब दूर जा चुका था, बहुत दूर ……….।
_*अगली बार कोई आपको अपनी समस्या बतायेे और आप को लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है, तो रुकिए और दुबारा सोचिये।*_
*_अपने-अपने दायरे से बाहर निकलिये। स्वयं तक सीमित मत रहिये ।*
आपकी राय चाहे वो भिन्न क्यों ना हो आमंत्रित है नीचे दिए गए लिंक से टाइप कर भेज दीजिये | या फिर lovekush@lovekushchetna.in पर ईमेल कर दीजिये
फीडबैक या प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, इस फार्म को भर सकते हैं
आपकी राय के इंतज़ार में
आपका
लवकुश कुमार
धन्यवाद
इस तरह की वेबसाइट पहले ही कई हैं जिसमे अपना अनुभव या ज्ञान साझा करते हैं लोग, उसी तरह यह भी एक वेबसाइट है बस अंतर इस बात का है कि इंसान के अनुभवों मे जो कुछ अंतर होता है वो होता है अलग-अलग परिस्थितियों के चलते, इसीलिए यहाँ मै अपने तरीके से अपने अनुभव व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ जो उनके लिए तो उपयोगी होंगे ही जिन्हे वही माहौल मिल रहा जो मुझे मिल रहा और उनके लिए भी उपयोगी हो सकता है जो अन्य माहौल से हैं और अपनी समझ को और समावेशी करना चाहते हैं |
जैसे एक ही बात को कहने के तरीके अलग अलग होते हैं, कोई कविता, कोई शायरी, कोई व्यंग तो कोई सपाट लेख लिखकर व्यक्त करता है अपने विचार और संदेश वैसे ही पाठक भी कई तरह के होते हैं कोई कविता तो कोई कोई लेख या कोई और किसी अन्य साहित्यिक विधा मे बात सुनना/पढ़ना पसंद करता/करती है, मुझे विश्वास है कुछ पाठक/श्रोता ऐसे भी होंगे जिन्हे मेरी लेखन शैली प्रभावित करेगी और मेरी बात और संदेश/अनुभव को सही परिप्रेक्ष्य मे समझ सकेंगे, जिन पाठकों को कोई बात अजीब लगे, निसंकोच मुझे लिख भेजे ( वेबसाइट पर दिये कांटैक्ट फॉर्म से ) |
एक समय था जब मेरे युवा और संवेदनशील मन में समाज और स्वयं को लेकर बहुत सवाल थे और मेरे समय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इन बातों पर मंथन पर खर्च होता था, लोगों और स्वयं के मन को समझने के लिए मै लोगों से बात करता था, कभी लोग न मिलें तो किताबें पढ़ता था और कभी ये ही न पता हो कि इस मामले के लिए कौन सी पुस्तक पढ़नी है तो ऐसे ही स्वयं सोचना, विचारना और वस्तुस्थिति का विश्लेषण करता था।
कुछ किताबों को पढ़कर मानो ऐसा लगा जैसे मेरे लिए ही लिखी गयी हों, मेरा भी ऐसा ही कुछ प्रयास है की कोई दुविधा और बेचैनी मे फंसा हुआ इंसान मेरे लेख, मेरे अनुभव या संदेश पढे और उसे लगे की अरे ये तो लग रहा कि उसके लिए ही लिखा हुआ लेख है|
मेरा प्रयास है कि जो युवा एक सीधा, सरल और समृद्ध जीवन जीना चाहते हैं मै इस मंच से उनकी जिज्ञासाओं को हल कर पाऊँ, मै अपने प्रयास मे कितना सफल रहा यह तो आप पाठक ही निर्धारित कर पाएंगे, प्रयास जारी रहेगा |
खासकर वो लोग जो सीधा और सरल जीवन जीना चाहते हैं लेकिन उन्हें इधर उधर से सुनने को मिलता है कि दुनिया में सीधा और सरल रहकर जीना मुश्किल है और लोग तमाम तरह के झूठ बोलने को उकसाते हैं और तरह तरह के दिखावे करने को बोलते हैं।
"जबकि बात केवल इतनी सी है कि सीधा और सरल होने के साथ हमें समझदार होना है और काबिल ( कौशल युक्त, सजग और जागरूक ) भी ताकि स्पष्टता रहे और हम अपनी क्षमताओं के अनुरूप आत्मनिर्भर बन सकें |"
एक बात स्पष्ट रूप से समझनी होगी कि आप अगर बात - बात पर झूठ बोलते हैं तो आपके लिए सच असहनीय हो जाता है और नतीजतन सच्चे लोग आपसे दूर होने लगते हैं और आप झूठे लोगों से घिर जाते हैं।
जो इंसान स्वयं ही झूठे बहाने बनाता हो उसके लिए झूठे और सच्चे इंसान में फर्क करना मुश्किल हो जाता है और किसी पर यकीन करना भी, या फिर कोई लंबे अरसे तक झूठे लोगों के बीच रहे जो बार-बार वादा करके तोड़ते हों या फिर कहते कुछ हों और करते कुछ इस तरह की परिस्थितियों का भुक्तभोगी इंसान भी किसी पर जल्द यकीन नहीं कर पाता |
"अगर इंसान जीवन में एक सही उद्देश्य, सही काम को पकड़ ले तो उसे बाहरी परिस्थितियां और लोगों की बातें उस सीमा तक प्रभावित नहीं कर पाती कि वह अशांत हो जाए |"
क्रोध आपकी मजबूरी और आपके ऊपर दबाव (अपेक्षाओं का, डर का या आकांक्षाओं का ) को व्यक्त करने कि प्रक्रिया है, आपका जीवन जितना दबावमुक्त होगा और आप जितना खुलकर अपना पक्ष रखते होंगे उतना ही आपके अंदर क्रोध कम पनपता है, क्रोध अंदर ही होता है उसे भड़काने का काम करती हैं बाहर कि घटनाएँ, जरूरत है स्वयं पर नज़र रखने की|
दुनिया से धोखा तब मिलता है जब हम या तो डर या लालचवश या फिर अशांत अवस्था मे कोई कदम उठाते हैं या फिर कोई चुनाव ( पसंद/नापसंद ) करते हैं, ज्ञान और स्पष्टता के माध्यम से हम डर, लालच और मोह से मुक्त हो सकते हैं और अभ्यास से खुद को संयत रख सकते हैं ताकि अशांति की अवस्थाएँ कम हों और हम ठगे जाने से बच सकें |
ध्यान रखें की जब हमारे निर्णयों के केंद्र मे डर या लालच के बजाय असली जरूरत होगी तो ठगे जाने की संभावना कम होगी |
ये सब कुछ हमे सीखने, जानने को मिलता है आत्मवलोकन, साहित्य और आध्यात्मिक साहित्य के अध्ययन से, जिसके महत्व को रेखांकित करके यहाँ अध्ययन के लिए लोगों को प्रेरित करने का प्रयास किया जा रहा है |
"हमारी समझ और स्पष्टता के साथ हमारे आदर्श, चुनाव और पसंद-नापसंद ही हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं |"
इन्हीं सब बातों के दृष्टिगत, मैंने यह वेबसाइट बनाई ताकि युवाओं से अपने अनुभव साझा कर सकूं जिससे ज्यादा से ज्यादा युवा, फिजूल कार्यों, दिखावों और सतही समस्याओं से उलझे बिना खुद की ऊर्जा और संसाधनों को स्वयं की और देश की समृद्धि में लगा सकें।