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आग (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

उसके शरीर में इतनी ताकत न थी कि वह मेहनत-मजदूरी कर सके।  भीख में रूखा-सूखा  जो मिल जाता उसी से पेट की आग को शान्त करने का प्रयास करती, या कभी केवल पानी पीकर ही गुजारा कर लेती। 

आज उसे भीख में थोड़ा-सा सूखा आटा मिल गया था।  आटे को बनिये को  बेच दूँ तो बदले में मिले पैसों से दो वक्त का गुजारा तो चल ही जाएगा, ये सोच कर दुकान पर पहुंच गयी, किन्तु बनिये ने आटा लेने से इन्कार कर दिया ।  

अगले ही पल उसे विचार आया, क्यूंँ ना इस आटे की रोटी ही बनाकर खा लूँ, पर ईंधन, बर्तन,  वो तो कुछ भी  थे नहीं उसके पास।  एक-दो टूटे-फूटेे बर्तन थे; उन्हें भी कुछ दिन पहले किसी ने चुरा लिया था।  निराश होकर लौट चली, कि   दू...s...र  श्मशान में उठती हुई आग की लपटें देख उसकी आँखों में चमक आ गयी। 

 शव लगभग जल चुका था। शव के साथ आए लोग उसके वहाँ पहुँचने से पहले ही जा चुके थे, उसने आव देखा न ताव, चिता के निकट फूटे हुए मटके के एक टुकडे़ में थोड़ा-सा पानी देखकर उसी में आटा गूंथ लिया और मोटी-मोटी  रोटियाँ थपक कर चिता के किनारे सुलगते अंगारों पर रख दी, ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा। 

अरसे बाद पेट की आग गर्म रोटियों से बुझ रही थी।

 

सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


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फल (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

सन्तान सुख से वंचित, निराश शर्मा जी ने अनाथालय से एक बच्चा गोद ले ले लिया।  बच्चे की खिलखिलाहट से उनके जीवन में मानो खुशियों की बहार ही आ गयी थी। शर्मा दम्पति दोनों मिल कर बडे़ लाड़प्यार से पालन करने लगे  उसका। बच्चे के कदम  घर में पड़ने से शर्मा जी का भाग्य ने साथ दिया और उनके अपने भी दो बच्चे पैदा हो गये,  परन्तु उन्होंने कभी तीनों बच्चों में भेदभाव नहीं किया। समान शिक्षा, समान लालन पालन। 

बडे़ पुत्र  शरद की किस्मत ने एक बार फिर करवट बदली और वो एक रोड़ ऐक्सीडैंट में बुरी तरह जख्मी हो गया तब शर्मा दम्पत्ति ने उसकी चिकित्सा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और वह ठीक भी हो गया,  फिर भी वह अपने दोंनों पैर गंवा बैठा।  इसी दौरान  सहानुभूति दर्शाने वाले "  अति शुभचिंतकों "के द्वारा वह जान चुका था कि उसे बाबा अनाथालय से ले कर आये थे । फिर तो जीवन से हताश  शरद मन ही मन कुंठित रहने लगा।  उसे लगने लगा किअब वह सबके ऊपर एक बोझ हो गया है।  और एक दिन हिम्मत बटोर कर उसने शर्माजी से  बोल ही दिया   " बाबा  मै जानता हूँ कि मैं आपकीऔलाद नहीं हूं आप मुझे अनाथालय से लाये थे 

।अब  मैं आपकी कभी सेवा नहीं कर सकूंगा,  उल्टा आप पर ही बोझ बन गया हूं।अच्छा हो यदि आप मुझे  वापस वहीं छोड़ आये "।  

पुत्र के मुंह से ऐसी बाते सुन कर शर्माजी आहत हो उठे।  आंखों की कोर  में आगये पानी को  धीरे से कमीज की बांह से पौंछ लिया  " बेटा ! कभी ऐसी बात जबान पर भी मत लाना। 

 तुम नहीं जानते, पकने के बाद फल भले ही वृक्ष का साथ छोड़ दें,पर वृक्ष को अपने फल कभी बोझ नहीं लगते। और तुम तो मेरा पहला फल हो।   मैं तुम्हें कैसे अपने से दूर कर सकता हूं।भावुक होकर शरद पिता के सीने से लिपटकर रोने लगा।

पिता का हाथ शरद के सिर पर था। 

 

सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


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ईदी (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

"अब्बू हमें इस बार ईदी में गिफ्ट और पैसे नहीं चाहियें"।  नौ वर्षीय सुहेल ने अपने अब्बा सेे कहा, तो रहमत खां हैरान रह गये। 
" मेरे बच्चे,तुझे ईदी नहीं चाहिये, तो और क्या चाहिए,तू बता मुझे! तू कहे तो मैं तेरे कदमों में जन्नत ला कर रख दूं "।

रहमत मियां  बेटे को गोद में उठा कर उसे प्यार से चूमने लगे।
सुहेल ठुनते हुए कहने लगा " नहीं अब्बू!!  जन्नत नहीं, एक वादा चाहिये आपसे। और सुहेल की हां में हां मिलाते हुए सारे बच्चों ने भी शोर मचा दिया " हांं हमें वादा चाहिये, वादा "।
" कैसा वादा मेरे बच्चों"!! बताओ तो सही?
"अब्बू हमने सुना है कि  खुदा पाक ने हजरत इब्राहिम से उनकी सबसे अज़ीज़ चीज़ कुर्बान करने के लिये कहा था  और उन्होंने अपने बेटे को कुर्बानी के लिए पेश किया था।"
" हांs.. मगर इससे तोहफे का क्या रिश्ता है बच्चों?"
"अब्बू तब खुदा पाक ने खुश होकर उनके बेटे की जगह बकरा रख दिया था।  क्या ये सच है अब्बू" ।
"हां ये सच है, तो तुम क्या चाहते हो"।
"अब्बू हम चाहते हैं कि आप भी अपने अज़ीज़ बच्चों को कुर्बानी पर रखें और खुदा पाक खुश होकरउसके बदले बकरा रख देंगे"।
बच्चों के मासूम सवाल से रहमत मियां कांप उठे।दोनों हाथ कानों पर रख लिये " ला-हौल-बिला-कुव्वत!! ये क्या बोल रहे हो!! कहीं ऐसा होता है भला! वो दौर और था बच्चो!यदि तुम्हें कुछ हो गया तो हम जीते जी मर जायेंगे।  नहीं नहीं..."।

अच्छा!!   बच्चों ने कुछ सोचते हुए कहा "तो फिर एक वादा करो कि इस बार आप मासूम जानवरों का खून नहीं बहाओगे, आप कुर्बानी के लिए आटे,गुड़, मिट्टी या कागज से बने  बकरे को ही हलाल करोगे"

"हाँ ये बात मानली तुम्हारी!"  कह कर रहमत खां ने राहत की सांस ली। 

 सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


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स्पर्श (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

छ:साल की तान्या खेलते -खेलते खलिहान में पहुंच गयी ,जहां खेत की रखवाली करने के लिए बिरजू काका बैठे थे ।
    "अरे ! गुड़िया आयी है!आ जा गुड़िया रानी....आ जा.. !का देख रही है!आ हमारी गोदी में आ जा !" "आ हम तुझे शहतूत देंगे मीठे मीठे"! मासूम तान्या लपक कर बिरजू काका की गोद में जा बैठी।
काका गुडिया को सहलाने लगे. ,. धीरे धीरे यहां वहां हाथ फिराने लगे । गुड़िया छोटी थी परन्तु उसके सर्प जैसे रेंगते हाथों के दूषित स्पर्श और विक्षिप्त मनो भावों को महसूस कर रही थी ।
"चाचा मुझे प्यास लगी है, " चाचा बहुत तेज से लगी है,"तान्या रुआंसी  हो गई ।
"अच्छा! हम अभी लाते हैं करवे से ठंडा ठंडा पानी" कह कर बिरजू काका पानी लाने के लिए खड़े हो गए ।
तान्या अन्दर ही अन्दर कांप रही थी और किसी तरह उनके बाहुपाश से छूटना चाहती थी।
"नहीं  चाचा  ...मुझे तो घर जा कर गिलास से ही  पानी पीना है"।
जब तक काका ने करवा उठाया, तान्या जान बचा कर वहां से घर की ओर दौड़  गयी।
स्पर्श के वो विषैले कांटे आज भी उसकी देह में चुभने लगते है।और उसकी पीड़ा को दिल में दबा लेती है 

सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


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मां की ममता और मामा का दुलार (एक लघुकथा) - सुनीता त्यागी

सविता अपने बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सजग रहती थी। इसलिए वह सदैव उन्हें पौष्टिक भोजन ही कराती थी। सर्दी के मौसम में हल्दी युक्त दूध और विटामिन्स  से भरपूर फल खाने के लिए देती और गर्मियों में आम का पन्ना और नींबू की शिकंजी देना न भूलती थी।
लेकिन उसका बेटा आयुष जब से टीनएजर हुआ है और नए स्कूल में जाने लगा है तभी से मित्रों के साथ पीजा - बर्गर, चाईनीज़, इटैलियन  जैसे जंक फूड खाने लगा। अब उसे माँ के हाथों का बना खाना बेस्वाद लगने लगा था।
  नतीजा यह हुआ कि आयुष की इम्युनिटी बहुत कमजोर हो गयी और आए दिन उसे नजला जुकाम रहने लगे। सुबह सोकर उठता तो उसे एक साथ बहुत सारी छींके आतीं और पूरे दिन नाक से पानी बहता रहता ।
अब यह उसकी रोज की बात हो गई थी।
कुछ महीने पहले आयुष गर्मियों की छुट्टियों में अपने मामा जी घर रहने गया। उसने देखा उसके मामाजी सुबह उठते ही गुनगुने पानी में सेंधा नमक डाल कर एक नली वाले लोटे की सहायता से नाक के एक छिद्र से पानी अन्दर पहुंचा कर दूसरे छिद्र से बाहर निकाल रहे थे।
उनके नजदीक खड़ा आयुष आश्चर्य से ये सब देख रहा था, और साथ ही छींकता भी  जा रहा था । 
" मामाजी आप ये क्या कर रहे हैं"। उसने मामा जी से पूछा।
" बेटा ये जल नेति की क्रिया है, वही कर रहा हूं "
" मामा जी इसको करने से क्या लाभ होता है "।
, " बेटा यह नाक की सफाई करती है और सांस नली सम्बन्धी परेशानी, पुरानी सर्दी, दमा, सांस लेने में होने वाली समस्या को दूर करती है।
इससेआंखों में पानी आना और आंख में जलन की समस्या कम होती है। और यह कान, और गले को बीमारियों से भी बचाती है। सिरदर्द, अनिद्रा, सुस्ती में जलनेति करना फायदेमंद है।तुम्हें भी यह नित्य ही करनी चाहिए। "मामा जी ने विस्तार से जानकारी दी।"
परन्तु मुझे तो यह करनी आती ही नहीं
मामा जी"
" कोई बात नहीं मैं सिखाउंगा तुम्हें। क्यों कि यदि जल नेति गलत तरीके से कर ली जाये तो उससे हानि भी हो सकती है"
" कैसी हानि मामाजी" आयुष ने हैरानी से पूछा।
देखो बेटा यदि हम पानी को अधिक गर्म कर लेंगे या नमक अधिक डाल देंगे तो उससे हमारी नाक में जलन हो सकती है, नाक से खून भी आ सकता है। और यदि हमने नासिका के अन्दर से पूरा पानी बाहर नहीं निकाला तो कान नाक में दर्द भी हो सकता है। और यदि लोटा गंदा है तो संक्रमण भी हो सकता है, इसलिए इसे किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए "।
ठीक है मामाजी आप मुझे भी सिखाइये ये जलनेति"
" ठीक है बेटा"
अगले दिन से मामाजी लम्बी नलकी वाले दो लोटों में चुटकी भर नमक और एक लीटर हल्का गर्म पानी डाल कर ले आये फिर उन्होंने धीरे-धीरे आयुष को नली से नाक में पानी डालने का और बाहर निकलने का अभ्यास कराया।  
आयुष जब तक उनके घर रहा तब तक उन्होंने आयुष को जलनेति की क्रिया कराई व उसको ठीक प्रकार से करने की सावधानियां भी समझायीं।
आयुष को अब इससे कुछ लाभ दिखाई देने लगा था तो वह स्वयं ही सुबह उठकर गुनगुने पानी में नमक डालकर जलनेति की क्रिया करने लगा तथा साथ में कपालभाति भी करने लगा।
देखते ही देखते कुछ महीनों में ही उसे छींकें आनी व नाक से पानी आना भी बंद हो गया, साथ ही जुकाम के कारण सिर में जो दर्द रहता था वह भी ठीक हो गया।
अब तो आयुष के घर में भी उसकी देखा देखी सभी लोग इस क्रिया को करने लगे। व मित्रों को भी जलनेति के फायदे समझाने लगे।

सुनीता त्यागी 
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


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उम्र ( लघुकथा ) - लवकुश कुमार

जीवन में बहुत से संयोग होते हैं, सुखद भी और दुखद भी, ऐसा ही एक संयोग मेरे साथ हुआ। सड़क दुर्घटना में मेरे बाएं हाथ की कालर बोन टूट गयी,हालत ये हुई कि, कुछ देर लेटना, कुछ देर बैठना। ऐसे ही एक दिन पत्नी मुझे बिस्तर पर लिटाकर गई और मेरा फोन चार्जिंग पर मुझसे कुछ दूरी पर लगा हुआ था, फोन की घण्टी बजती है। पत्नी मेरे बेटे को मुझे मोबाइल देने के लिए भेजती है पर जब तक बेटा आता है, फोन कट जाता है। इसीलिए बेटा मोबाइल मेरे पास रखकर चल देता है, मैं अपना मोबाइल उठाने की कोशिश में अपना हांथ बेड पर इधर उधर रख रहा था पर दोनों कंधों में क्लैविकल ब्रेस बंधा होने के चलते मेरे हाथ की गति ठीक से नहीं हो पा रही थी, मैं बस कोशिश कर रहा था, इतने में खेलने के लिए वापस जाते हुए मेरे बेटे ने अपने पिता को देख, दिक्कत को समझ लिया, वह आता है और मोबाइल को बेड से उठाकर मेरे हाथ में रखकर फिर खेलने चला जाता है। मैं अपने 6 साल के बेटे की संवेदनशीलता, तत्परता को देख मुग्ध हो जाता हूँ और सोचता हूँ कि क्या संवेदनएं हममें जन्म से होती हैं शायद जरूरत है तो सही माहौल और प्रोत्साहन देकर इन्हें बनाए रखने की, शायद बच्चों की संवेदनाओं को सामाजिक व्यवहार ही भ्रष्ट कर देता है। सच ही कहा जाता है कि अपने बच्चे को कुछ भी बड़ा बनाने से पहले उसे नेक इंसान बनाएं। वह समाज के साथ साथ आपके भी काम आएगा, हां अगर आपने उसे मतलबी बना दिया तो हो सकता है कि जरूरत निकल जाने पर वो आपसे भी परायों की तरह व्यवहार करें।

लवकुश कुमार 


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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आज्ञा की अवहेलना ( लघुकथा ) - मीरा जैन

जैसे ही जलज ने घर मे कदम रखा बुजुर्ग पिता ने बिना किसी लाग लपेट केअपने मन की बात कही या यूँ कहे आदेश दिया -
' बेटा !  मोहल्ले के कम्युनिटी हाल मे वास्तु के सामानों की शानदार प्रदर्शनी लगी है घर मे सुख- शांति, समृद्धि व खुशहाली आदि के लिए ढेर सारी वस्तुएं हैं आस पास के सभी महिला-पुरुष
आवश्यकतानुसार
 वस्तु ले लेकर आ रहे हैं बहू के साथ जाकर चार छ: वस्तुएं ले आ नहीं तो सारी अच्छी अच्छी वस्तुएं बिक जायेंगी '
जलज पिता की बातों से बेपरवाह सोफे पर पसर गया . अपने आदेश कीअवहेलना से खफा मोहन जी भी नाराज से अपने कमरे मे चले गई.
कुछ देर पश्चात जलज कमरे मे पहुँच पिता से मनुहार के अंदाज मे बोला -
' चलो पापा ! चाय बन गई है '
नाराजगी भरे स्वर मे मोहन जी ने जवाब दिया-
' अभी नहीं पीनी है मुझे चाय '
जलज ने पिता का हाथ अपने दोनों हाथों मे लेकर चूमते हुए कहा-
' जिसके पास पिता हो उसे किसी भी वास्तु की आवश्यकता नहीं होती
है  मेरे प्यारे पापा '
इतना सुन मोहन जी  भी भाव विभोर अपने बेटे को अपलक निहारने लगे बेटे द्वारा की गई आज्ञा की अवहेलना से मोहन जी की आँखें खुशी से नम हो गई थी।

- मीरा जैन

उज्जैन मध्य प्रदेश 


अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर  (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने  लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।          
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं  को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।

पता
516 साईं नाथ कॉलोनी,सेठीनगर
 उज्जैन ,मध्य प्रदेश 
पिन-456010
मो.9425918116
jainmeera02@gmail.com

अधिक जानने के लिए क्लिक करें।


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उपवास ( लघुकथा ) - मीरा जैन

समीर ने घर मे कदम रखते ही सामने अक्षय को देख प्रश्न किया-
' क्या बात है बेटा ! आज तुम खेलने नहीं गये तबियत तो ठीक है ?'
उत्साहित स्वर मे अक्षय ने जवाब दिया-
' पापा ! आज मम्मी  के साथ मैने भी निराहार उपवास किया है अब
उनके साथ पूजा भी करूंगा '
' क्या--- ' अवाक समीर का उत्तेजित स्वर उभरा-
' नीना ! ये क्या तमाशा है अक्षय से भी उपवास करवा लिया इस धर्म कर्म
को अपने तक ही सीमित रखो बच्चों के पीछे नहीं पड़ो समझी  '
नीना ने सफाई पेश की-
' समीर ! अब अक्षय कोई छोटा बच्चा नहीं पूरे चौदह वर्ष का हो चुका
 है और उसने स्वेच्छा से उपवास किया है और इसमे बुराई क्या है तन
 और मन के साथ
श्रेष्ठ समाज का निर्माण भी समाहित है '
समीर ने खीझते हुए पूछा-
' अब तक मैने सुना था उपवास से तन स्वस्थ व आत्मा पवित्र होती है ये
समाज बीच कहाँ से आ गया ?'
नीना ने गंभीरता पूर्वक धीमे से कहा-
' समीर ! बात दरअसल ये है मै चाहती हूँ अक्षय को ये भी ज्ञात हो कि
 भूख क्या होती है भूख का महत्व उसे मालूम होना ही चाहिये
 ताकि बड़ा होकर दीन- हीन , निर्धन व्यक्तियों के प्रति
इसके मन मे सहिष्णुता एवं उदारता के भाव हो भूखों को भोजन कराने
की लालसा इसके मन मे जागृत रहे कुछ नहीं तो किसी जरूरतमंद को हेय दृष्टि से तो नहीं देखेगा ये भी संस्कारों की अनमोल कड़ी है जो स्वस्थ समाज के लिये अति आवश्यक है '
उपवास के इस नये रूप ने समाज सेवी समीर को भाव विभोर कर दिया।

- मीरा जैन

उज्जैन मध्य प्रदेश 


अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर  (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने  लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।          
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं  को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।

पता
516 साईं नाथ कॉलोनी,सेठीनगर
 उज्जैन ,मध्य प्रदेश 
पिन-456010
मो.9425918116
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चाह ( लघुकथा ) - मीरा जैन

 स्वाति को देखते ही गोमती का पारा सातवें आसमान में पहुंच गया
' देखो-देखो , इस महारानी को  बड़ी शान से चली आ रही है आज साल भर का इतना बड़ा दिन है,  लक्ष्मी पूजन का महत्त्व ही नहीं है इसके लिये, अरे ! रीति-रिवाज , धर्म-संस्कृति भी कोई चीज होती है केवल पैसे के पीछे भागने से कुछ नहीं होगा समझी, एक दिन नहीं जाती तो कौन सा तूफान आ जाता----.'
मां का गुस्सा देख संदीप भी सहम  गया स्वाति भी चुपचाप अपने कमरे में चली गई.  मां के सामने संदीप की हिम्मत नहीं हो रही थी कि स्वाति को खाने की टेबल पर बुला ले, तभी दरवाजा खुला और स्वाति हाथ मुंह धो, कपड़े बदल कर खाने की टेबल पर आ खाना खाने लगी लेकिन उसकी आंखों में आंसू देख संदीप ने कहा-
' रो क्यों रही हो , मां का गुस्सा भी वाजिब है कम से कम आज के दिन तो तुम्हे घर पर ही रहना चाहिए था '
जवाब मे स्वाति बोली-
'  संदीप ! ये खुशी के आंसू है , मां ने क्या-क्या कहा मुझे कुछ ध्यान नहीं है , मैं तो उस क्षण से अब तक अभिभूत हूं जब गायत्री के परिजनों ने मेरे पैर पकड़ कहा-
' आप साक्षात देवी की अवतार हैं आपने जच्चा और बच्चा दोनों को बचा लिया हम लोगों ने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी दीपावली में हमारे घर भी लक्ष्मी आई है हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वह भी आपकी तरह नेक दिल और सेवाभावी बने '
 और मालूम संदीप ! आज मैने  उनसे  ऑपरेशन की फीस भी नहीं ली'
 स्वाति की बात सुन रही सासु मां का दिल भर आया सोचने लगी-
 ' मैं अपनी बहू सी कब बनूंगी '

- मीरा जैन

उज्जैन म०प्र०


अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर  (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने  लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।          
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं  को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।

पता
516 साईं नाथ कॉलोनी,सेठीनगर
 उज्जैन ,मध्य प्रदेश 
पिन-456010
मो.9425918116
jainmeera02@gmail.com

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प्रेम (लघुकथा)- सौम्या गुप्ता

मुझे तो यह जानकर आश्चर्य हो रहा है, प्रेम वो भी रचित से? तुम यह क्या कह रही हो संयोगिता?, साधना ने संयोगिता से पूछा, मुझे बड़ा अजीब लग रहा कि यह जानते हुए भी कि वो कैसा इंसान है, न तुम्हारा और न तुम्हारे खुले विचारों का वो सम्मान करता है, क्या तुमको वो स्वतंत्रता देगा? तुम स्वतंत्र नहीं रहोगी, जो तुम्हारा स्वभाव है, उसके प्रेम में पड़कर तुम, तुम नहीं रह जाओगी, तुम्हारी मुस्कुराहट भी खो जाएगी।

संयोगिता गहरी सांस लेकर, है कुछ बात, साधना, तुम मेरी दोस्त हो, मैं चाहे जिससे प्रेम करूँ, तुम अपनी सलाह मुझपर थोप नहीं सकती।

साधना निराश भाव से कहती है कि संयोगिता जिसे तुम बार बार प्रेम कर रही वह कुछ और है, आगे तुम्हारी मर्जी! पर याद रखना जो आकाश से प्रेम करते है, वो पंखों के बारे में सोचते है और जो कीचड़ से वे केंचुए बनकर ही रह जाते है, चुनाव तुम्हें करना है।

इफ यू लव द स्काई यू विल ग्रो विंग्स

- सौम्या गुप्ता 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


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