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खामोश ! (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

"बेटा, तुम वैज्ञानिक तो बनना चाहते हो।' पीटीएम (शिक्षक-पालक बैठक) में उस नए शिक्षक ने एक साधारण से लड़के से कुछ व्यंग्य से पूछा, "पर ये तो सोचा होगा कि बनाओगे क्या, अविष्कार किस चीज़ का करोगे?"

"मैं, मैं.. वह इंस्ट्रूमेंट बनाना चाहता हूँ" अपनी माता की ओर देखते, गोलीबारी में मारे गए व्यक्ति के दस वर्षीय पुत्र का जवाब था, "कि... कि "खामोश" कहते ही, बन्दूकें, तोपे, रिवॉल्वर सब, सहम कर हो जाएँ, खामोश!''

 

- संतोष सुपेकर (लघुकथा संग्रह - प्रस्वेद का स्वर से साभार )

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


संतोष सुपेकर जी,  1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | (लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें )


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शुभकामनाएं

 

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कटुता कैसे पैदा होती है और कैसे फैलती है ?

इस लेख में मै अपने अनुभव और अध्यात्मिक अध्ययन के आधार पर

कुछ कारणों पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रहा हूँ :

 

कटुता का उदय होता है परायेपन की भावना से 

इंसान एक बेचैन चेतना है, अहम् ( झूठा ज्ञान या खुद को लेकर वहम ) को पुष्ट करने के लिए 

वो उन लोगों को नीचा दिखाने का प्रयास करता है जिनको स्वयं से अलग मानता है,

कटुता में मुख्यता सामने वाले की गरिमा की परवाह

न करते हुए भाषा और व्यवहार में लापरवाही पायी जाती है,

ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है जिससे सामने वाले में हीन भावना और विरक्ति पैदा हो |

 

कटुता कैसे फैलती है ? इसके जवाब में हम देख सकते हैं

कि जब किसी इंसान को कटुता का सामना करना पड़ता है तो 

प्रतिक्रिया में वो सामने वाले के साथ भी कटुता का व्यवहार कर सकता है

या फिर ये सोंचकर अपने व्यवहार को संयत कर  सकता है की कल हमे

इनसे कोई काम (स्वार्थ) निकालना है; इस स्थिति में भी कटुता की भावना जो

उसके अन्दर जन्म ली थी वो ख़त्म नहीं होती केवल दब जाती है और जब सामने

कोई स्वयं से कमज़ोर और तथाकथित पराया इंसान आता है और कोई विशेष परिस्थिति बनती है 

तो वो दबी हुयी भावना क्रोध और कटुता  के रूप में सामने आती है |

 

क्रोध तुरंत पैदा नहीं होता, क्रोध तो अन्दर रहता है 

जो जितना ही दमित जीवन जीता है वो उतना क्रोधी होती है

बस ज्यादातर मामलों में क्रोध स्वयं से कमज़ोर इंसान पर ही बरसता है |

 

अतः अगर आप चाहते हैं की आपमें क्रोध और कटुता न आये तो दबावरहित जीवन जियें

जो लोग आपकी गरिमा का सम्मान न करें उनसे कोई भी काम हो दूरी बना लें अन्यथा कटुता बरदाश्त करते -करते 

आपके व्यवहार में भी कटुता आ जानी है की क्योंकि समय के साथ इंसान ऐसे व्यवहार को सामान्य मान लेता है | 

 

" बातों को तर्क  और अनुभव की कसौटी पर परखें  "

 

इससे इत्तर राय होने पर कांटेक्ट फॉर्म से अपना मत जरुर साझा करें |

शुभकामनायें

-लवकुश कुमार 

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ख़ास कौन ?

ख़ास वो जो अपनी असहमति को खुलकर व्यक्त करने की स्पष्टता और साहस रखे,

ख़ास वो जो अपनी सुविधा-असुविधा के साथ दूसरों की सुविधा का भी ध्यान रखे,

ख़ास वो जो मानवता को केंद्र में रखकर परम्पराओं से हटने से भी गुरेज न करे,

ख़ास वो जो इंसान की सूरत नहीं सीरत को तरजीह दे,

ख़ास वो जो सच को सुविधा से ऊपर रखे,

ख़ास वो जो  सही को अच्छे बुरे से ऊपर रखे,

ख़ास वो जो सुख दुख से ऊपर कर्तव्य को रखे और कर्त्तव्य निर्धारण में सत्य को केंद्र में रखे

ख़ास वो जो  मान्यताओं की अपेक्षा तथ्य को सम्मान देने की हिम्मत रखे

खास वो जो  स्वयं से आगे समष्टि को रखे

अकेलेपन से डरने वाले सामाजिक गुलाम बनते हैं, इस तरह ख़ास वो जो अकेलेपन से न डरे

ख़ास वो जो चालाकी का जवाब समझदारी से दे 

 

सांसारिक संपत्ति, संपत्ति अर्जन, संचयन और प्रबंधन की काबिलियत दिखाता है, ऐसा इंसान अध्यात्मिक रूप से भी संपन्न हो ऐसा जरुरी नहीं|

 

हाँ अध्यात्मिक रूप से संपन्न इंसान के लिए जरुरी है की वो इतनी संपत्ति जरुर

अर्जित करके की आत्मनिर्भर और निर्भीक होकर जी सके तथा सच के  समर्थन में मजबूती से खड़ा हो सके |

 

-लवकुश कुमार 

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अमूमन अध्यात्म में रूचि न होने के क्या कारण हो सकते हैं ?

अध्यात्म, स्वयं को जानने पर केन्द्रित है, यदि हम जान जाते हैं कि

हममे कुछ खामियां हैं या हमारे जीवन की प्राथमिकताओं में कुछ गड़बड़ है 

तब जो अगला चरण होता है वो है बदलाव के लिए कार्यवाही का,

जोकि बहुत कम लोग चाहते हैं,

दूसरों के व्यवहार को बदलने की इच्छा रखने वाले तो बहुत लोग मिल जायेंगे 

लेकिन स्वयं में बदलाव नहीं चाहते, स्वयं तो बस मनमानी करनी है, ऐसा सोंचने वालों की बहुतायत है |

दूसरा हमारे जीवंन के केंद्र में अहंकार ( झूठा ज्ञान ) होता है नतीजतन हम उसी केंद्र से निर्णय लेकर

वैसी ही प्राथमिकताएं निर्धारित करते हैं और उसी के अनुसार कर्म करते हैं,

अगर अध्यात्म की समझ पैदा हुयी तो प्राथमिकताओं में आमूल चूल परिवर्तन करने होंगे 

और इस तरह भीड़ से अलग हटना पड़ सकता है, जबकि लोग वह काम करके सुरक्षित महसूस करते हैं

जो ज्यादातर लोग कर रहे हों|

नतीजतन अमूमन लोग अध्यात्म से दूरी रखते हैं और इसे

अव्यवहारिक कहकर नकार देते क्योंकि उन्हें तो भीड़ का हिस्सा रहना है |

 

ये कुछ कारण हैं मेरी समझ में |

अगर आपके पास कोई और कारण हैं तो जरुर लिख भेजें फीडबैक फॉर्म से |

शुभकामनाएं

-लवकुश कुमार 

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