क्या बात है समृद्ध? आजकल आधी रात के बाद भी काम करते रहते हो?
अरे कुछ नहीं प्रयास- मैं एक जुझारू और उत्साही साथी की तलाश में था और कुछ दिनों पहले ही मेरा एक ऐसे ही इंसान से परिचय हुआ, मैंने इसके लिए बहुत इंतजार किया है, इसीलिए मैं अपने सहयोगी के साथ काम करने को टालना नहीं चाहता, मैं चाहता हूँ कि वो मेरे काम को, मेरे काम के प्रति समर्पण व मेरी लगन को समझ सके। मैं अपने काम की महत्ता को अपने काम करने के तरीके से बताना चाहता हूँ। जिससे हमारे बीच इस लेखन के काम के लिए जुड़ाव की एक सही बुनियाद बन सके फिर आगे ये काम चलता रहेगा, मैं इतनी प्रेरणा उस साथी को देने की सोच रहा हूं।
प्रयास मुस्कुराते हुए- वाह, आप तो विचारों से भी समृद्ध हैं समृद्ध। आपके प्रयासों व विचारों की तो तारीफ करनी होगी, ये बात तो सही है कि किसी भी एसोसिएशन की नींव मजबूत और टिकाऊ होनी ही चाहिए तब ही उसे स्थायित्व मिलता है, फिर आपका इरादा तो जन कल्याण का है।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।
डाक्टर विजय अग्रवाल - https://youtube.com/shorts/HEum_9kwLbE?si=hg34u0kU3R2kO43f
आचार्य प्रशांत - https://youtube.com/shorts/KQ19l1S-6j8?si=iyyGtMyzcn1ebPRu
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- आरती
संकलन कर्ता संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी।
"यार तुम कौनसी विचारधारा के हो?" सुबह तालाब किनारे टहलते हुए उसने पूछा मुझसे।
"क्यों? तुम्हें क्या लगा?" *सामने तालाब का पानी शान्त था लेकिन मेरी आँखों में शरारत हिलोरें लेने लगी थी।*
"मैंने देखा है जिस वाट्स एप ग्रुप में सरकार समर्थित लोग हैं, उसमें तुम सरकार के विरोध में टिप्पणी लिखते हो और जिस ग्रुप में सरकार विरोधी चर्चा होती है, वहाँ तुम सरकार के पक्ष में सारी पोस्ट डालते हो। ये क्या चकर है?"
" चक्कर? हा हा हा," *मैंने एक पत्थर उठाकर तालाब में फेंका तो पानी में तीव्र हलचल हुई और लहरें गोल-गोल चक्कर लगाने लगीं*," हम एक तीसरे ही ग्रुप के हैं, हम तो लोगों को उकसाते हैं और फिर उनकी उत्तेजना का आंनद लेते हैं बस !"
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
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जब मैंने यह वैबसाइट शुरू की तो मेरे मन मे एक विचार आया कि क्यों ने अपने दोस्तों से ( जोकि अपनी मेहनत, मेधा और सुखद संयोग के दम पर अच्छी जगहों पर समाज की सेवा कर रहें हैं ) से कुछ लेख के माध्यम से योगदान देने के लिए कहूँ ताकि यह वैबसाइट सामाग्री के मामले मे समृद्ध हो सके और मैंने कहा भी लेकिन एक दो को छोडकर किसी ने ये कष्ट नहीं उठाया, हाँ तारीफ बहुत लोगों ने की जिससे उत्साह बढ़ा, कुछ सुधी मित्र और पाठकों ने बेहतरी के उद्देश्य से टिप्पड़ी की, जोकि अच्छा लगा, सबके अपने कारण थे किसीने कहा की दूसरे ज्यादा जरूरी काम हैं जिससे मै भी सहमत हुआ , किसी ने कहा की पब्लिक फॉरम पर लिखने का अभ्यास नहीं, फिर भी मैंने लेखन जारी रखा और अभी कुछ दिन पहले की ही बात है ऐसे साथियों से लेख के रूप मे सहयोग आया जिनसे केवल कुछ महिनो की पहचान है|
तीन बातों पर ज़ोर देना चाहता हूँ
1. दोस्ती के नाते कोई लिखने जैसे नए काम नहीं करने लग जाता, जब तक कि कोई परिस्थितगत बाध्यता या मजबूरी न आ जाए |
2. अनुकूल इंसान को अप्रोच करें जो वो काम करता हो जो आप करवाना चाहते हैं, फिर वो आपका दोस्त भले ही न हो, आपको सहयोग मिला जाएगा |
3. अपना नेक काम जारी रखिए उसे बड़े मंच पर ले जाइए ताकि ज्यादा लोग उसके बारे मे जान सकें, फिर उनमे से कोई अनुकूल इंसान या तो आपसे मिल जाएगा या खुद ही संपर्क करेगा |
ये बातें मामूली लग सकती हैं लेकिन जिन्हे समझ नहीं आती वो confectionary मे जाकर बुखार की दावा मांगते है, मेडिकल का रुख नहीं करते क्योंकि उनके घर के आस पास मेडिकल है नहीं तो सोंचते हैं की confectionary मे ही पता कर लें |
ये मेरे व्यक्तिगत अनुभव हैं |
शुभकामनाएं
जैसे कई कड़ियों वाली एक सीकड़ की मजबूती या कमजोरी का एहसास उस वक़्त होता है जब उससे एक वजनदार चीज़ लटकाई जाती है, यहाँ पर एक बात ध्यान देने वाली है कि कोई chain उतनी ही मजबूत मानी जाती है जितनी कि उसकी सबसे कमजोर कड़ी |
इस संसार और तंत्र की व्यवस्था मे जो खामियाँ हैं ये उन लोगों को पहले दिखती हैं जो इनसे दो चार होते होते हैं, या जिनका कठिन समय चल रहा होता है| वहीं जिनका समय सुखद चल रहा होता है उन्हे लगता है कि सब कुछ सही चल रहा है, सब चंगा सी |
उद्दहरण के लिए दहेज व्यवस्था से ऐसे लोगों को बिलकुल भी परहेज नही दिखता जिनके पास खूब पैसा है, इस प्रथा कि मार तो वो झेलता है जिसके पास रोटी कपड़े की ही कमाई बड़ी मुश्किल से हो पाती है, ऐसा इंसान एक तनाव मे रहता है और फिर हम शिकायत करते हैं कि लोग प्रेम से क्यों नहीं बात करते !
पहले तो इंसान ऊपरी मानक यथा, शक्ल, पहनावा और दिखावा देखकर रिश्ता बनाता है, दुख कि घड़ी मे जब साथ नहीं मिलता तो कहता कि लोग बड़े मतलबी हैं लेकिन कम ही हैं वो लोग जो अपनी पसंद के आधार को टटोलते हैं|
एक दूसरे को खुश रखने और रिश्ते को बनाए रखने के लिए लोग खूब एक दूसरे कि हाँ मे हाँ मे मिलाते हैं और गलत बातों का भी समर्थन कर देते हैं और इस आदत को वो समझदारी और आज के समय कि जरूरत बोलते हैं लेकिन जब उन्हे लंबे वक़्त तक कोई झूठ के अंधेरे मे रखे तब उन्हे इस सिस्टम की खामी नज़र आती है और वो कहते हैं की लोग बड़े झूठे हैं !
किसी भी समस्या कि सबसे बड़ी मार हमेशा कमजोर तबके के लोगों को ही पड़ती है, जलवायु परिवर्तन के चलते गर्मी का प्रकोप सबसे ज्यादा धूप मे काम करने वाले लोगों को पड़ता है न कि उन्हे जिनके घर भी वातानुकूलित हैं, घर के बाहर कार, कार्यालय और रेस्तरां भी |
उद्दहरण बहुत से हैं खुद का अवलोकन करने की जरूरत हैं, खुद पर नज़र रखने की जरूरत है कि हम कहाँ पर झूठ बोल रहे हैं ?
हर समय, हर काल में कोई न कोई दिक्कत या संघर्ष रहता है, लेकिन अगर वो कोई बहुत बड़ी दुर्घटना न हो तो समय का मलहम उसे भुला देता है और कालांतर मे रह जाती हैं केवल सुखद स्मृतियाँ |
गरिमा सुरक्षित रही तो भूतकाल परेशान नहीं करता, अंत भला तो सब भला |
A के मौखिक अनुरोध पर आप A के मार्फत (on behalf of A ) B से कोई वादा करते हैं तो कल को A के पीछे हट जाने पर आपकी बात खराब हो सकती है, आपकी छवि खराब हो सकती है B की नजरों में अतः इस जोखिम से बचने के लिए अगर संभव हो तो A और B की आपस में ही बात करा दो।