'और, कैसे हो भाई?' लेखक महोदय का जब फोन आया तो मैं बाज़ार में जलेबी की दुकान पर खड़ा था। जलेबियाँ तैयार हो रही थीं।
'ठीक हूँ सर। और बताइए सर आज कैसे याद किया?' एक नई आशंका मेरे अंदर सिर उठाने लगी थी।
जलेबी का कच्चा मैदा गर्म कढ़ाही में डाले जाते हुए मुझे सिहरता सा लगा।
'आजकल कहीं ज्यादा व्यस्त हो क्या? पर फिर भी फेसबुक तो देख ही रहे होंगे। मेरी नई कहानी को लेकर अब तक तुम्हारी कोई पोस्ट पढ़ने में नहीं आई? जबकि मैंने तुम्हें टैग भी किया था?' कड़ाही का तेल उबल रहा था '..... ग्रुप में मेरी उस नई कहानी का जो अपोज़ चल रहा है उस पर तुमने कुछ लिखा नहीं अब तक? मेरी रचना पर चल रहे इस विरोध से तुम क्या एग्री हो?'
कड़ाही में जलेबियाँ गोल-गोल हो रही थीं, कच्चा मैदा जमने लगा था।
'नहीं-नहीं सर। ऐसी कोई बात नहीं।'
'तो फिर अब तक उस पर कुछ लिखा क्यों नहीं? डरते हो क्या किसी से?'
'क्या हुआ? लकवा मार गया क्या जुबान को?'
'सर, वो क्या है?'
जलेबियों का मैदा, लाल गर्म होकर मजबूत होने लगा था, 'विथ ड्यू रिसेक्ट, दो महीने पहले आपने भी सर, मेरी एक रचना को लेकर बेवजह चले विरोध पर चुप्पी साध ली थी, ग्रुप में उस पर कुछ भी पोस्ट नहीं किया था जबकि व्यक्तिगत रूप से ... आपने उस रचना की तारीफ की थी....' उस दिन जाने कैसे मुझमें हिम्मत आ गई।
'तो?' जलेबियाँ गर्म, लाल सुर्ख होने लगीं थीं, 'उसका, उस बात का क्या बदला ले रहे हो?'
'नहीं सर, मैंने सोचा आपकी भी कुछ विवशताएँ रही होंगी जो आप मौन रहे। जब इतने बड़े लेखक होकर आप सच को सच नहीं कह सके, कोई टिप्पणी करने में असमर्थ रहे तो मैं तो बहुत छोटा लेखक हूँ। आपकी बड़ी असमर्थता के आगे मेरी छोटी असमर्थता क्या लगती है? नहीं सर?'
'अरे वा, होशियार हो गया यार तू तो। पत्थर रखने लगा पास में, ईंट का जवाब देने के लिए! हा हा हा। चलो, और सब ठीक ? ..'
फिर 'ठीक' का जवाब जाने बिना ही उधर से फोन कट गया।
जलेबियाँ गरमागरम कड़ाही से निकालकर सामान्य तापमान की चाशनी में डाली जा चुकी थीं।
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
अपकेन्द्रीय बल (लघुकथा संग्रह) से साभार
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
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अद्वैत तुम अपने लिए काम करने वाले सहकर्मी के हर एक मैसेज पर जवाब या प्रतिक्रिया देते हो! सान्निध्य ने अद्वैत से पूछा।
अद्वैत - हाँ मैं ऐसा करता हूं क्योंकि मैं उसे बताना चाहता हूँ कि इवरी एफर्ट काउंट्स , हाँ उसकी सारी बातें ,अच्छी नहीं हो सकती, किसी की नहीं होती, पर मेरा उस साथी को प्रोत्साहन देने का तरीका है ये, मैं अपने कम्युनिकेशन में एक निरंतरता और सजीवता लाने को ऐसा करता हूं ताकि कम्युनिकेशन गैप की संभावना कम रहे।
वाह अद्वैत वाह, सानिध्य गर्व महसूस करता है अपने दोस्त पर।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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आप इतना खुलकर कैसे बात कर लेते है, क्या आपको डर नहीं लगता? कि सामने वाला आपके बारे में गलत सोच सकता है?
नहीं मुझे लोगों का डर नहीं लगता क्योंकि मैंने शराफत का लबादा नहीं ओढ़ रखा है।
©लवकुश कुमार
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आपसे जुड़कर, आपके साथ काम करके मुझे सच में बहुत ही सुखद व गर्व का अनुभव होता है, दामिनी ने मुस्कुराते हुए सौम्यता के भाव के साथ कहा।
धन्यवाद, मुझे भी खुशी है एक मेहनती और नेकदिल दोस्त और उत्साही रचनाकर मिलने की, आपको क्या-२ बेहतरी महसूस हो रही है, दामिनी? उत्साह से भरे हुए प्रत्यक्ष ने उत्सुकता से पूछा।
दामिनी- मैं आपसे कितना कुछ सीखती हूं, चाहे वो लेखन के विषय में हो या गणित या जीवन का व्यावहारिक ज्ञान।
प्रत्यक्ष- दामिनी आप मुझसे सीख पायी, इसके लिए मुझे खुशी है, इसके लिए आपको खुद की संगति और पसंद पर गर्व करना चाहिए।
दामिनी- आप ऐसा क्यों कह रहे है?
प्रत्यक्ष- अगर आप डाक्टर साहब से न जुड़ी होती तो न हमें यह साझा मंच मिलता, न आप मुझसे मिल पाती, मेरी-आपकी साझा पसंद ने ही हमें मिलाया है और मेरी समझ और ज्ञान आपके काम आ रही हैं।
बिल्कुल सही, संयत आवाज और दामिनी की आंखों की चमक, उसके मन की स्पष्टता को दर्शा रहीं थीं।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
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पटकनी - ममता कालिया |
सह जीवन |
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भिखारिन - जयशंकर प्रसाद |
साहब, दो दिन में एक पैसा तो दिया नहीं, गाली क्यों देते हो ? |
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हींग वाला - सुभद्रा कुमारी चौहान |
बाहर माहौल खराब है अम्मा ........ |
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अंधे : खुदा के बन्दे - रमेश बत्रा |
जो आदमी होकर आदमी को नहीं पहचानते ......... अँधा हो चूका हूँ, मोहताज नहीं होना चाहता | |
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अनुभवी - रमेश बत्रा |
बाप मर गया है ....... |
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नदियाँ और समुद्र - रामधारी सिंह दिनकर |
गंभीर और मर्यादावान |
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चलोगे- रमेश बत्रा |
आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे कि मै कोई मुहर मांग लूँगा |
आनंद लीजिये इन कहानियों का चेतना को छूने वाली कथावस्तु और मन को बाँधने वाली आवाज में |
धन्यवाद की पात्र हैं वह लेखिका/लेखिका जिन्होंने ये कहानियां लिखी और वह वक्ता यानी नम्रता जी जिन्होंने अपनी आवाज में इन्हें हमारे लिए और सुलभ तथा रोचक बनाया |
बोलते तो सब हैं एक बोलना ये भी है कि आप किसी चेतना को छूने वाली कहानी को आवाज दें |
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शुभकामनाएं
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"कहूँ कहानी"- रमेश बत्रा |
https://www.youtube.com/watch?v=cYWZsheaqkE | एक लाजा है वो बहोत गलीब है |
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"परिचित"- डॉ. रामनिवास मानव |
https://www.youtube.com/watch?v=96H4nrWtfXk | दस के नोट |
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"नन्दा"-कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर |
https://www.youtube.com/watch?v=ql3mQ9zapXA | नंदा उस नींद में सो रहा था जिससे कोई नहीं जागा |
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भोज, प्रतिभा राय |
https://www.youtube.com/watch?v=c4_P-QvrcTM&t=1s | एक दिन होने वाले भोज की तैयारी पिछले 10 दिनों से |
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गालियां- चंद्रधर शर्मा गुलेरी |
https://www.youtube.com/watch?v=jGDKC4Lez5g | क्योंकि अब गलियाँ चुभती हैं | |
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