
आप सभी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की हार्दिक बधाई
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस हम सभी के लिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक विचार है—एक ऐसा विचार जो हमें जिज्ञासा, तर्क और सत्य की खोज की ओर प्रेरित करता है। 28 फ़रवरी का यह दिन डॉ. सी. वी. रमन की स्मृति में मनाया जाता है, जिन्होंने “रमन प्रभाव” की खोज कर भारत को विश्व वैज्ञानिक मानचित्र पर गौरवान्वित किया। यह दिन हमें याद दिलाता है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temperament) का विकास मानव जाति के समग्र विकास के लिए कितना आवश्यक है। जब समाज प्रश्न पूछता है, प्रमाण खोजता है और अंधविश्वास से ऊपर उठकर सोचता है, तभी वास्तविक प्रगति संभव होती है।
भारत की धरती सदैव महान वैज्ञानिकों की कर्मभूमि रही है। डॉ. सी. वी. रमन, जिनकी खोज ने प्रकाश के नए आयाम खोले, और डॉ. एस. चंद्रशेखर, जिन्होंने ब्रह्मांड की गहराइयों को समझने में अमूल्य योगदान दिया—ऐसे अनेक भारतीय वैज्ञानिक हमारे लिए गर्व का विषय हैं। इनके साथ-साथ होमी भाभा, विक्रम साराभाई, ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, मेघनाद साहा, एसएन बसु, जेसी बोस जैसे असंख्य वैज्ञानिकों ने भारत की वैज्ञानिक पहचान को वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
फिर भी, हमें आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। 140 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले देश के रूप में हमारे पास अपार प्रतिभा है, लेकिन नोबेल पुरस्कार जैसे वैश्विक सम्मान अब भी अपेक्षाकृत कम हैं। यह हमें संकेत देता है कि हमें अनुसंधान, नवाचार और वैज्ञानिक शिक्षा में और अधिक निवेश, सहयोग और अवसरों की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2026 का विषय “Women in Science: Catalyzing Viksit Bharat” हमें यह याद दिलाता है कि विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब विज्ञान में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को समान अवसर और सम्मान मिलेगा।
"विज्ञान तब ही पूर्ण होगा जब उसमें समाज के हर वर्ग की आवाज़ शामिल होगी।"
आइए, इस राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर हम संकल्प लें कि हम जिज्ञासु बनेंगे, प्रमाण आधारित सोच को अपनाएँगे और विज्ञान को केवल विषय नहीं, बल्कि जीवन शैली बनाएँगे।
"यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानवता को एक बेहतर, तार्किक और प्रगतिशील भविष्य की ओर ले जाएगा।"
जय विज्ञान!
- सुमित पाण्डेय
सुमित जी शिवालिक चिल्ड्रेन साइन्स फ़ाउंडेशन मे एक कुशल विज्ञान मित्र हैं जो अपनी टीम के साथ अपने वर्कशॉप्स, चर्चा और प्रयोगों द्वारा विद्यालयों के बच्चों मे वैज्ञानिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के सराहनीय प्रयास करते हैं |
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विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स और दस्तावेजों पर आधारित और जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं |
भ्रामक प्रचार जिसका अर्थ है ऐसा प्रचार जो हमें भ्रम में डालता हो हमें सही चीजों से भटकाता हो, माने कि हमें सही चीजे न दिखा कर वो दिखाया जाए जिसके कारण हम उस संस्था की ओर आकर्षित हो सकें ।
विस्तार में समझते हैं:
जब हम कोचिंग संस्थानों में पढ़ने के लिए जाना चाहते हैं तो वहाँ पर हमको अध्यापको के पढ़ाने के तरीके जैसे- विश्लेषणात्मक व समीक्षात्मक व्याख्या करने का तरीका या उनकी अकादमिक योग्यता और अनुभव जैसे पहलुओं को देखना चाहिए। वहां पर अध्ययनरत छात्र छात्राएं विषय को कितना समझ पा रहे है यह जरूरी है। फिर यह भी आवश्यक है कि हमारे द्वारा यदि कोई प्रश्न पूछा जाता है तो क्या अध्यापक उसका सटीक उत्तर दे पा रहे हैं।
हम जब किसी संस्थान को चुने तो उसका कारण उपरोक्त होना चाहिए लेकिन भ्रामक प्रचार के चलते हम हाई रैंक और चकाचौंध देखने लगते है। इससे ज्यादातर संस्थानों में छात्रों की संख्या अमूमन बढ़ जाती है। जिसकी देखा देखी कभी-कभी समाज का दूसरा व्यवसायिक वर्ग भी भ्रम फैलाने की कोशिश करता है। वहीं दूसरी और छात्र वर्ग भी इस लालसा में कि कल प्रचार में इस फोटो की जगह मेरी फोटो होगी, वो भी इन संस्थानों का रूख करते हैं। और समय नष्ट करते हैं उचित मार्गदर्शन और पठन सामग्री के अभाव में।
इन सब का परिणाम ये होता है कि व्यवसायी वर्ग एक गलत चलन से अपना व्यवसाय आगे बढ़ाते हैं, वही छात्र वर्ग जब सालों मेहनत के बाद वो नहीं पाते, जो वो चाहते थे तो वो अवसाद और कभी-२ अति-अवसाद से घिर जाते है जो कभी-कभी आत्महात्या का
कारण भी बनता है। इसीलिए इन भ्रमों से बचना जरूरी है और कोचिंग चुनने का तरीका विश्लेषणात्मक और समीक्षात्मक हो।
एक और बात जो जुड़ी हुई है ऊपर के मुद्दे से वो है छात्रों की मानसिकता और कसौटी का जिसने कोचिंग संस्थानों को भ्रामक प्रचार का लालच दिया है वो है सूक्ष्म और विश्लेषणात्मक समझ की कमी और चकाचौंध के आधार पर आंकलन की ग़लत आदत, संस्थान का चुनाव उसकी पठन सामग्री और शिक्षण प्रक्रिया हो न कि उस संस्थान से कितने टापर निकले।
शुभकामनाएं
-सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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एक कविता प्रशंसा को लेकर जिसके माध्यम से कवयित्री ने कई लोगों की आवाज को हम तक पहुंचाया है :
समाज के पैमाने पर
सुंदरता की प्रशंसा पाने के लिए
मैंने बहुत इच्छा की
पर समाज को चाहिए
गोरा रंग, आकर्षक काया
इसीलिए कभी वो प्रशंसा
मैं पा न सकीं
फिर खुद को देखा मैंने
खुद को संवारने की कोशिश छोड़कर
ज्ञान पाने के लिए प्रयास किए
छोड़ दी अपेक्षाएं उसकी प्रशंसा पाने की
जो समय के साथ चला जाना है
फिर पाया सच्चा ज्ञान और मिली सच्ची प्रशंसा
जो शरीर की नहीं, थी मन की, ज्ञान की,
समाज के द्वारा नहीं, कुछ सच्चे लोगों से,
जो समझते है भौतिकता से आगे की बातें।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |