Recent Articles Related To लघु कहानियां

दिल को छू लेने वाली कुछ कहानियां (स्वर नम्रता सिंह)
परिंदा - सुनीता त्यागी  https://www.youtube.com/watch?v=BWUyL5xtPGU
तस्कीं को हम न रोयें - ममता कालिया https://www.youtube.com/watch?v=B_mpmpd5VeA
थोड़ा सा प्रगतिशील - ममता कालिया  https://www.youtube.com/watch?v=0tdKgYiLTqs
परली पार - ममता कालिया https://www.youtube.com/watch?v=MaXpAwVXnOc
पंडिताइन - ममता कालिया https://www.youtube.com/watch?v=JgJW0VmNNlU

आनंद लीजिये इन कहानियों का चेतना को छूने वाली कथावस्तु और मन को बाँधने वाली आवाज में |

धन्यवाद की पात्र हैं वह लेखिका जिन्होंने ये कहानियां लिखी और वह वक्ता यानी नम्रता जी जिन्होंने अपनी  आवाज में इन्हें  हमारे लिए और सुलभ तथा रोचक  बनाया |

बोलते तो सब हैं एक बोलना ये भी है कि आप किसी चेतना को छूने वाली कहानी को आवाज दें |


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दवा (लघुकथा) - सुषमा सिन्हा

अम्मा अपने लिए दवा ले रही थी, तभी दुकान पर एक व्यक्ति अपना पर्चा आगे कर दिया। दुकानदार ने दवा देते हुए कहा, यह बहुत बढ़िया टॉनिक है। इस से दिमाग तेज होता है, ब्रेन शार्प बनता है। याददाश्त ठीक रहती है...। बच्चों के लिए तो बहुत ही अच्छी दवा है। वह व्यक्ति दवा लेकर चला गया। अम्मा उत्सुकतावश दुकानदार से पूछी, बेटा इसके प्रयोग से याददाश्त कितनी अच्छी हो सकती है? क्या बहुत पीछे की बातें भी..., जैसे बचपन की बातें भी याद आ सकती है ?

दुकानदार मुस्कुराते हुए कहा-आप भी ना अम्मा! बच्चों की तरह बातें कर रही हैं। इस उम्र में आप बचपन के दिनों में लौटना चाहती हैं। नहीं बेटा! मैं अपने लिए नहीं, अपने बच्चों के लिए पूछ रही थी। क्या इस दवा से उन्हें अपने बचपन की याद आ सकती है? क्या इतनी कारगर दवा है? दुकानदार पुनः मुस्कुरा कर बोला, नहीं अम्मा! ऐसा तो नहीं हो सकता ! मगर आप ऐसा क्यों पूछ रही हैं? अम्मा बेचारी परेशान और बीमार थी। दुकानदार से जाते- जाते, धीरे-धीरे कहने लगी, क्या करें..! बच्चे सबूत मांगते हैं... कि, हमने उनके लिए किया ही क्या है ?

© सुषमा सिन्हा, वाराणसी 

ईमेल- ssinhavns@gmail.com


 आदरणीय सुषमा सिन्हा जी का जन्म वर्ष 1962 में गया (बिहार) में हुआ, इन्होने बीए ऑनर्स (हिंदी), डी. सी. एच., इग्नू (वाराणसी)  उर्दू डिप्लोमा में शिक्षा प्राप्त की|

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विगत 32 वर्षों से कविता, लघु कथा, कहानी आदि प्रकाशित । इनकी  प्रकाशित पुस्तकें निम्नलिखित हैं :-
चार लघुकथा संग्रह
1. औरत (2004)
2. राह चलते (2008)
3. बिखरती संवेदना (2014)
4. एहसास (2017)

अपने शिल्प में निपुण सुषमा जी में अथाह सृजनशीलता है। 

अपनी सिद्ध लेखनी से सुषमा जी जीवन के अनछुए पहलुओं पर लिखती रही हैं और लघु कथा विधा को और अधिक समृद्धशाली कर रही हैं    लेखिका और उनके लेखन, शिक्षा और सम्मान के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें |

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बहादुर - एक लघुकथा

अपने पराए के नाम पर मरने-मारने वाले.... बहादुर है और बिना अपना हित-अहित देखे सच का समर्थन करने वाले... बेवकूफ... फिर लोग कहते हैं कि दुनिया में इतनी तकलीफ क्यों है....गरीब और गरीब क्यों होता जा रहा और अमीर और अमीर क्यों होता जा रहा !

 

- लवकुश कुमार 


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समझदार - एक लघुकथा

ऊपर की कमाई से कोठियां खड़ी करने वाला रिश्तेदार समझदार और काबिल, एक नंबर की कमाई से जीवन जीने वाला भोला और कमज़ोर फिर लोग कहते हैं कि अंधे के हाथ बटेर कैसे लग गई !

- लवकुश कुमार 


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अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे - ( लघुकथा ) - सविता मिश्रा 'अक्षजा'

“नमस्ते अंकल जी, पापा की तबीयत ठीक नहीं है| आप भीतर चलकर उनके कमरे में ही उनसे मिल लीजिए|”

“क्या बात है भई, आपके साहबजादे बड़े बदले-बदले से जान पड़ रहे हैं!” बेटे की ओझल होती पीठ पर नजरें गड़ाये हुए श्याम ने व्यंग्यपूर्वक अपने जिगरी मित्र रामलाल से पूछा|

“आओ श्याम! आखिर आज रास्ता भूल ही गए |”

पोता पानी और बेटा चाय-नमकीन लेकर एक ही साथ कमरे में प्रविष्ट हुए। चाय रखकर बेटे ने विनम्रता से कहा, “कुछ और तो नहीं चाहिए पिता जी?” बाहर जाते हुए पलटकर पुनः बोला, “ज्यादा देर नहीं बैठिएगा, पीठ में फिर से दर्द होने लगेगा|” कहते हुए  पिता की कमर में बेल्ट बाँधकर चला गया|

श्याम ने अपनी छूट गयी बात को आगे बढ़ाया, “लगता है, दिवा- स्वप्न देख रहा हूँ मैं| पाँच-छह साल पहले तो यह साहब ऊँट-की-सी अकड़ी गर्दन लिए ...” श्याम के कुछ और अपशब्द कहने के पूर्व ही रामलाल ने ठहाका लगाया|

"आप हँस रहे हैं, किन्तु इस प्रकार से आपकी सेवा-शुश्रूषा होते देखकर, अभी-भी मैं बहुत अचंभित हूँ!”

“जड़ खोदकर ही मानोगे श्याम!”

“मैं भी तो जानूँ, आखिर बदल कैसे गए बरखुरदार?”

 “बढ़ते बच्चों का बाप जो हो रहा है|” गहरी मुस्कान के साथ दोनों मित्र चाय सुड़कने लगे।

© सविता मिश्रा 'अक्षजा' 

ईमेल-2012.savita.mishra@gmail.com


अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों प्रकाश डालते हुए या कहें की ध्यान खींचते हुए एक  शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपने  लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि विधाओं में ढेरों रचनाएं साहित्य कोश को अर्पण की हैं, आपकी 'रोशनी के अंकुर' एवं  'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा  ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह के साथ  अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हैं और 'खाकीधारी'  2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन}  'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश} का सम्पादन भी किया, आप लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता  विधा में कई बार पुरस्कृत हैं|  आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|


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अनकही (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

दीपक जी बाजार में मिले तो पीछे ही पड़ गए "आज तो चलना ही पड़ेगा, मेरा मकान देखने, बहुत इन्ट्रेस्ट से बनवाया है मैंने।" दीपक जी मेरे बॉस रह चुके हैं, अतः अनिच्छा से ही सही, जाना पड़ा।

मकान वाकई बहुत सुन्दर बनाया गया था। सुन्दर बगीचे वाला कम्पाउण्ड, अन्दर हर कमरे में चमचमाते मार्बल के फर्श, कीमती फर्नीचर, दीवारों पर महँगे वालपेपर्स, बेहद सुन्दर फॉल्स सीलिंग्स, एक्वेरियम, प्योर लेदर के सोफे, चमचमाते वॉशरूम देखकर मेरे मुख से अपने आप 'वाह' निकल गया और मन में ऐसा ही मकान बनाने की इच्छा बलवती होने लगी।

चाय पानी के बाद हम बाहर आए तो दीपक जी एकाएक बोले, "अरे तुमने बाईक उधर दाईं तरफ क्यों खड़ी की ? उधर वालों से हमारा झगड़ा है।" फिर घूमकर बाईं तरफ के मकान की ओर देखा तो पत्नी पर चिल्ला पड़े "नीमा, तुम्हारे सुखाए कपड़े उड़कर उस तरफ जा रहे हैं, संभालो उन्हें।" फिर कुछ संकोची स्वर से बोले "ये दाएं तरफ वाले भी ऐसे ही हैं, इनसे भी बोलचाल बन्द है हमारी। नब्बे लाख का मकान जो बना लिया है मैंने, नाते रिश्तेदार भी आज तक देखने नहीं आए, सब जलते हैं साले मुझसे। खैर, कैसा लगा मेरा बंगला ?" "बहुत खूबसूरत, बहुत शानदार" मैंने कहा। "तुमने एक बात नोट की, मैंने हर कमरे, यहाँ तक कि बरामदे में भी बिजली कनेक्शन के कई-कई प्वाइंट लगवाए हैं, ताकि किसी को किसी इन्स्ट्रुमेण्ट के चार्जिंग में कोई दिक्कत न हो, है न दूरदर्शी सोच मेरी।"

"बिल्कुल सही" मैंने कहा "काश बिजली के कनेक्शंस के साथ आपने सम्बन्धों के कनेक्शन भी जोड़े रखे होते तो डिस्चार्ज पड़े रिश्ते भी चार्ज हो जाते" कहना चाहता था मैं, पर कह न सका।

 

© संतोष सुपेकर ( सातवें पन्ने की खबर से साभार )

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


संतोष सुपेकर जी,  1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | (लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें )


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पछतावे भरा अतीत (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

"क्या पापा ?" विवेक अचकचा कर बोला, "आप, बस स्टैण्ड से बोल रहे हैं? मगर आप लोग तो ट्रेन से आ रहे थे न ?"

"ट्रेन लेट हो गई थी बेटा, पर बाकी बातें बाद में करेंगे।" परमानन्दजी का हकबकाया-सा स्वर था, "तू तो जल्दी से हमको लेने बस स्टैण्ड पर आ जा, हम यहाँ खड़े हैं एटीएम के पास।"

विवेक हड़बड़ाया-सा बस स्टैण्ड पहुँचा तो परमानन्दजी ने सारी बात बताई, "बेटा, हम सब तो ट्रेन में अपने कोच में सो रहे थे, तभी बीना स्टेशन पर जोरदार हंगामा होने लगा, ढेर सारे जवान लड़के, जो किसी नौकरी की परीक्षा के लिए आये थे, जबरदस्ती हमारे कोच में घुस आये, सोये हुए यात्रियों को उठाने लगे, उनसे मार-पीट, झगड़ा करने लगे। कोच में सवार महिलाओं, लड़कियों से छेड़छाड़ करने लगे। हम सभी बेहद घबरा गये थे, तेरी बहन उस समय बाथरूम गयी हुई थी। हमारा दिमाग चला, उसे फोन कर वहीं से बाहर निकलने को बोला, हम दोनों भी जैसे-तैसे बाहर निकले, बस स्टैण्ड पहुँचे और बस पकड़कर यहाँ तक आये, पर पता नहीं...", परमानन्दजी ने जोरदार झुरझुरी ली, "बेचारे बाकी पैसेंजर्स के साथ क्या घटी होगी ?"

"ओऽऽह" घटना सुनकर विवेक के मुँह से ऐसे निकला जैसे गुब्बारे से हवा और उस पर हावी होने लगा चार साल पहले का अतीत, जब उसने भी बेरोजगारों की फौज के साथ मिलकर ऐसी ही एक ट्रेन में जोरदार हंगामा कर यात्रियों को आतंकित और त्रस्त कर दिया था। तब तो वह बच गया था पर आज खुद को कठघरे में पा रहा था।

 

© संतोष सुपेकर ( मधुरिमा (दैनिक भास्कर)  से साभार )

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


संतोष सुपेकर जी,  1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | (लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें )


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मजबूत स्वर (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

कड़ाके की सर्दी की एक सुबह, रामकिशन जब घर लौटे तो देखा, बेटी अभी भी सो रही है, “अरे” उसे झिंझोड़ते हुए वे कुछ क्रुद्ध स्वर में बोले, “अनु, अभी तक सो रही है, साढ़े सात बज गये हैं, स्कूल नहीं जाना क्या?”

“क्या बाबा, आप भी ! सोने दो न, बोहोत ठण्ड है, आज से हमारे स्कूल का टाइम भी नौ बजे हो गया है।” रजाई में से अनु का उनींदा स्वर सुनाई दिया।

“और तू राजू” वे फिर छोटे भाई की ओर मुड़े, “तू भी अब तक पड़ा हुआ है, तेरा दफ्तर भी क्या…”

“हाँ भैया, कड़क ठण्ड के कारण आज से हमारा ऑफिस भी ग्यारह बजे खुलेगा।” राजकिशन का एक विजेता-सा स्वर रजाई में से उभरा।

“ओऽऽह” रामकिशन फीकी-सी मुस्कान से बड़बड़ाये, “तो इस जमा देने वाली सर्दी में सबके देर तक सोने का इन्तजाम हो गया है, सिवाय मेरे... खेत पर तो बिजली रात डेढ़ बजे ही आती है, चाहे कितनी भी कड़ी ठण्ड क्यों न पड़े, मुझे तो उठकर जाना ही है खेत पर, क्या करूँ किसान हूँ न…” उनींद और विजेता स्वर के बाद यह एक मजबूर नहीं, एक मजबूत स्वर था।

 

 

© संतोष सुपेकर (तरंग नई दुनिया, इंदौर  से साभार )

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


संतोष सुपेकर जी,  1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | (लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें )


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भयावह चिन्ता (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

कुछ दिन पहले टेलीविजन पर, अशान्त सरहदों पर मची मार-काट,

खून-खराबे के मध्य एक लोमहर्षक दृश्य देखा जो न सिर्फ याद रहा बल्कि एक

नयी चिन्तायुक्त सिहरन को भी जन्म दे गया...

 

इस दृश्य में युद्धग्रस्त, आतंकग्रस्त, शरणार्थी समस्याग्रस्त मुल्क का

एक विवश-अतिविवश पिता अपने छोटे बच्चे को सरहद की टूटी हुई बाड़ में

से पड़ोसी मुल्क की सरहद में छोड़ रहा था। ऐसा करते हुए उसकी आँखों में

प्रलय के आँसू थे। पिता से, मुल्क से बिछड़ते हुए नन्हे बालक का चेहरा ऐसा

हो रहा था कि क्रूरतम् व्यक्ति भी देखे तो फफककर रो पड़े...

 

ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई अपने जान से प्यारे बच्चे को किनारे से,

उफनते सागर में धकेल रहा हो, उम्मीद के खिलाफ इस उम्मीद में कि उफनते

सागर में तो कोई सम्भावना है बच्चे के बच जाने की, लेकिन किनारे पर मची

मार-काट, रक्तपात में तो उसका मारा जाना अवश्यम्भावी है।

 

हाहाकारी और अशान्त ऐसी कई सरहदें हैं दुनिया में ! मानवता की

कर्णबेधी और हृदयबेधी चीत्कार से उपजी मेरी इस चिन्तायुक्त सिहरन में शामिल

है, इन दृश्यों के आम होते जाने की चिन्ता...

 

© संतोष सुपेकर (नवनीत (मुम्बई) से साभार )

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


संतोष सुपेकर जी,  1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | (लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें )


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सपनों की कोपलें (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

लगभग रोज सुबह अपने शानदार बंगलो के शानदार बगीचे में घूमते हुए वे देखते थे सामने रोड पर खड़े, शायद पास की तंग बस्ती के रहने वाले बाप बेटे को। एक व्यक्ति अपने छोटे, सात-आठ वर्षीय बच्चे को लेकर उनके घर के सामने खड़ा रहता था, स्कूल बस के इंतज़ार में।

बच्चा उनके आलीशान मकान की ओर देखकर लगभग रोज एक जैसी बात करता जो उनकी श्रवण शक्ति की सीमा में रहती, "पापा हमारा भी ऐसा बंगला होगा एक दिन। होगा न पापा?"

"पापा हमारे पास भी ऐसी कार होगी। ये..." बच्चा हाथ चौड़े करता, "लम्बी, बड़ी सी, चमचमाती सी. होगी न पापा?"

"पापा हमारे घर के बाहर भी ऐसा बगीचा होगा जिसमें सुन्दर पौधे, ऊँचे-ऊँचे पेड़ होंगे, होंगे न पापा?"

"पापा... पापा... हमारा भी.." "पापा हमारा भी..."

और उसका गरीब पिता बुझे मन से भोले भाले बेटे की हर बात का "हाँ हूँ, होगा बेटा, जरूर होगा" कहकर जवाब देता रहता।

अपने शानदार बगीचे के पौधों में उगती कोपलें तो वे रोज देखते ही थे, बाहर सड़क पर भी रोज कुछ कोपलें देखते। कुछ भोले से सपनों की कोपलें, उगते हुए और मुरझाते हुए।

© संतोष सुपेकर (लघुकथा संग्रह - प्रस्वेद का स्वर से साभार )

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


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