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जानकारी 08.11.2025

संदर्भ- QS ranking

- शैक्षणिक संस्थाओं की रैंकिंग में गिरावट इस बात का संकेत है कि रिसर्च की गुणवत्ता, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेश के छात्रों को आकर्षित करने का माहौल और स्कॉलर टीचर अनुपात में हमारे टॉप इंस्टिट्यूट्स पिछड़े हैं। 

- हांगकांग यूनिवर्सिटी प्रथम आई, जबकि तीसरे स्थान पर सिंगापुर की दो यूनिवर्सिटीज रहीं। भारत का जीडीपी सिंगापुर और हांगकांग के मुकाबले क्रमशः नौ और दस गुना है।

- अमेरिकी सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी )

- पिछले महीने ही, पेरिस की एक अदालत ने पाया कि बहुराष्ट्रीय एकीकृत ऊर्जा और पेट्रोलियम कंपनी टोटलएनर्जीज़ ने यह दावा करके भ्रम पैदा किया था कि वह एनर्जी ट्रांजिशन में एक प्रमुख भूमिका निभा रही है। यूरोपीय संघ के उस कानून का हवाला देते हुए- जिसके अनुसार पर्यावरण संबंधी दावों के लिए उद्देश्यपूर्ण, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध और सत्यापन योग्य प्रतिबद्धताओं और लक्ष्यों का समर्थन आवश्यक है- अदालत ने पाया कि कंपनी की जलवायु संबंधी घोषणाएं हाइड्रोकार्बन में उसके विस्तारित निवेश के अनुरूप नहीं हैं। हालांकि कंपनी पर लगे जुर्माने अधिक नहीं हैं, लेकिन भविष्य में इनके बढ़ने की संभावना है- और इसीलिए यह निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

- एक निरंतर गर्म होती दुनिया में यह उम्मीद करना वाजिब है कि कुछ लोगों के खरीदारी के फैसले कंपनी की पर्यावरण संबंधी कार्रवाइयों से प्रभावित हो सकते हैं

- भारत दुनिया की अग्रणी कंपनियों के वैश्विक क्षमता केंद्रों के लिए एक पसंदीदा स्थान के रूप में अपनी स्थिति को अपनी बढ़ती घरेलू बौद्धिक पूंजी का एक संकेतक मानता

- जेन जी : सन 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी

- हिंद महासागर में मौजूद है मेडागास्कर 

- लवकुश कुमार 


विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स और दस्तावेजों पर आधारित और जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित 


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं |

 

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पहुंच (लघुकथा) - लवकुश कुमार

यथार्थ  सवाल करता है, यार प्रेम तुम अपनी वेबसाइट पर इतने आर्टिकल, लघुकथा व अन्य चीजें डालते रहते हो जबकि बहुत से लोग इन विषयों पर पहले ही लिख चुके है फिर तुम इन पर क्यों लिखते हो?

प्रेम गहरी साँस लेकर फिर मुस्कुराते हुए उत्तर देता है, तुम सही कर रहे हो यथार्थ कि इन विषयों पर पहले भी लिखा जा चुका है लेकिन उसकी पहुंच सीमित है क्योंकि एक वक्त जब मुझे ऐसी ही चीजों की जरूरत थी, एक स्पष्टता की जरूरत थी तब मुझे ये सब नहीं मिल पाया, कितना अच्छा होता अगर ये मुझे किसी स्थानीय स्तर पर मिल जाता और आसानी से मिल जाता, उसी कमी को भरने को मैं अपने तरीके से लोगों तक और उन छात्रों तक इसकी सरल पहुँच बनाना चाहता हूँ जिससे कि जिस स्पष्टता की कमी का सामना मैंने किया है उसे दूसरे न महसूस करे। अगर ये चीजें किसी एक के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकी तो मैं इस काम को सार्थक समझूँगा।

यथार्थ गर्व की अनुभूति के साथ कहता है, वाह यार तुमने तो एक आदर्श प्रस्तुत कर दिया, शिकायत ही नहीं काम करके कमी को भरने का प्रयास! प्रेम के हाव भाव से विनम्रता और संतुष्टि का भाव झलक रहा था।

-लवकुश कुमार 


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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जीवन एक यात्रा - सौम्या गुप्ता

जिंद‌गी एक कारवाँ है,

इसमें लोग जुड़ते हैं,

इससे लोग कटते है।

 

माता-पिता, शिक्षक, दोस्त,

हमसफर इसका हिस्सा हैं 

पर वक्त का तकाजा

कभी इन्हें दूर

तो कभी पास लाता है।

 

पर हमें चलना होता है

और लोग जुड़ें  या ना जुड़ें 

हमें आगे बढ़ना होता है

 

कभी किसी साथी के संग

कभी अकेले खुद के हमराही बन

अपनी मंजिल तक पहुंचना होता है।

 

-सौम्या गुप्ता 

सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


इस कविता के माध्यम से कवयित्री क्या संदेश देना चाह रही है उसे कुछ प्रश्नों के माध्यम से आसानी से समझ सकते है :

इस कविता का मुख्य विषय क्या है?

इस कविता का मुख्य विषय जीवन है, जिसे एक कारवाँ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह जीवन के सफर में लोगों के साथ आने, बिछड़ने और आगे बढ़ने के बारे में है।

कविता में 'कारवाँ' शब्द का क्या अर्थ है?

यहाँ 'कारवाँ' शब्द जीवन के सफर का प्रतीक है, जिसमें लोग एक साथ चलते हैं, कुछ जुड़ते हैं और कुछ बिछड़ते हैं। यह जीवन की निरंतरता और परिवर्तनशीलता को दर्शाता है।

वक्त का तकाजा' से क्या तात्पर्य है?

वक्त का तकाजा' समय के प्रभाव और परिवर्तनों को दर्शाता है। यह दिखाता है कि कैसे समय के साथ लोग दूर हो जाते हैं या फिर से मिल जाते हैं, और जीवन में बदलाव आते रहते हैं।

हमें आगे क्यों निकलना होता है, चाहे कारवाँ चले या न चले?

हमें आगे निकलना होता है, क्योंकि जीवन एक निरंतर प्रक्रिया है। चाहे हमारे साथ कोई हो या न हो, हमें अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ते रहना चाहिए।

इस कविता का संदेश क्या है?

इस कविता का संदेश है कि जीवन एक सफर है, जिसमें हमें अकेले या दूसरों के साथ, आगे बढ़ते रहना चाहिए। हमें अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए हमेशा प्रयास करते रहना चाहिए, चाहे रास्ते में कितनी भी बाधाएं आएं।


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शुभकामनाएं

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प्रोत्साहन का कमाल : उत्साह, आत्मविश्ववास और दक्षता बढ़ाने वाला

आज एक साथी से बात चल रही थी कि कैसे बड़ों द्वारा मिला प्रोत्साहन हमारी ऊर्जा बढ़ा देता है, आत्मविश्वास बढ़ा देता है इस तरह कि दिन बहुत बढ़िया जाता है |

अपने पुराने दिनो की बात याद करूँ तो एक दिन की बात है कि मेरे मामाजी जोकि वन विभाग मे अधिकारी थे उस समय, हमारे घर आए हुये थे अपने कुछ सहकर्मियों के साथ उस वक़्त मै ग्यारहवीं मे था, क्योंकि मेरे माता पिता सम्मान करते थे मामा जी का तो, उनकी बात का बड़ा महत्व था मेरे लिए या कह लीजिये कि मै अपने माता-पिता के चश्मे से से देखता था मै लोगों को, जैसा कि ज़्यादातर बच्चे करते हैं, मुद्दे कि बात पर आता हूँ, हुआ ये कि मैंने भौतिकी (वही विषय जिसमे मैंने बाद मे परास्नातक किया ) के ग्यारहवीं और बारहवीं दोनों (जी हाँ उस काल मे बोर्ड परीक्षा मे ग्यारहवीं और बारहवीं दोनों का पाठ्यक्रम आता था  ) के सूत्र को दो बड़े से चार्ट्स पर स्केच पेन से लिखकर बैठक कि दीवार पर लगा रखे थे, वही मेरे बैठने कि जगह थी,

जैसे ही मेरे मामा के सहकर्मी ने मेरे चार्ट्स पर कुछ टिप्पड़ी कि मेरे मामा ने तुरंत ये बात कही कि ये लड़का आगे चलकर आईएएस बनेगा, उस वक़्त मै आईएएस के बारे मे इतना जानता था कि ये उच्च स्तर कि प्रतियोगी परीक्षा से बनते हैं, वैसे मेरा उस वक़्त  आईएएस बनने के लिए पढ़ाई करने का कोई इरादा न था लेकिन क्योंकी बड़े मामा ने ये बात कही तो मै अपनी क्षमताओं को लेकर आश्वस्त हो गया कि मतलब दम और बुद्धि है मुझमे वैसी, हालांकि मै आईएएस तो नहीं बना लेकिन उस बढ़े हुये आत्मविश्वास के चलते अपना बेस्ट दे पाया हर उस काम मे जो मैंने अपने हांथ मे उठाया, बाकी चीज़ें तो समय और परिस्थिति पर निर्भर करती हैं लेकिन "अपनी क्षमताओं पर विश्वास हों बहुत जरूरी है अपना बेस्ट दे पाने और फोकस होकर काम कर पाने के लिए" |


ऐसे ही मेरे पापा के फुफेरे भाई जोकि एक बैंक मे प्रबन्धक थे मेरी नज़र मे सम्मानीय हैसियत रखते थे ने मेरे दसवीं के परीक्षा परिणाम को देखा और, मुझसे देश की आईआई टी पर बात कर रहे थे उस एक पल ने भी  मुझे अपनी क्षमताओं और योग्यताओं पर विश्वास दिलाया था हालांकि नीव बढ़िया न हो पाने और अन्य परिस्थितियाँ अनुकूल न होने के चलते मै ग्रेजुएशन के लिए आईआई टी मे प्रवेश न पा सका  और बाद मे पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए आईआई दिल्ली मे प्रवेश सुनिश्चित किया, ताऊ जी ने जो लायक होने का इशारा दिया उसने भरपूर रोल अदा किया 


ऐसे ही हमारे मुहल्ले के एक पत्रकार ताऊ जी ने मेरे दसवीं के रिज़ल्ट पर जो पूछताछ की थी मुझसे कि मै खुद को आम से खास मानने लगा था | 

बाल मन ठहरा, बचपन मे रिज़ल्ट के साथ मिली एक प्लेट भी बहुत माने रखती थी, पुरस्कार तो प्रतीक होते हैं उनका आकार और कीमत मायने नहीं रखती |


"यहाँ एक बात पाठकों के मन मे आ सकती है कि क्या सारा आत्मविश्वास दूसरों के बताने पर ही आया कि कुछ खुद का भी था, मै बताए देता हूँ कि खुद से भी विश्वास था कि जब मै पुस्तक के प्रश्न हल कर ले रहा हूँ या बीएचयू मे आए हुये पिछले साल के पेपर सॉल्व कर ले रहा हूँ  तो असल परीक्षा मे तो अच्छा करूंगा ही, और साथ मे मुझे अपने नियमित अभ्यास पर भी भरोसा था, लेकिन जब बड़े तारीफ करते हैं तो आश्वस्त हो जाते हैं आप क्योंकि आप कहीं भी रहो एक दो लोग ऐसे जरूर मिल जाते हैं जो छोटी छोटी सतही चीजों पर आपको नीचा महसूस कराते हैं और आत्मविश्वास को तोड़ने का प्रयास करते हैं, मेरे आस पास भी कुछ ऐसे लोग थे जो मुझे नीचा दिखाया करते थे केवल इस बात के लिए कि मै अपने पापा के काम मे हांथ बंटाने और स्कूल कोचिंग के अलावा दुनियादारी के बाकी पचड़ों मे इंटरेस्ट नहीं लेता था, भला ये भी कोई नीचा दिखाने की बात हुयी ! हाहाहाहा !


ऐसे ही एक बार अँग्रेजी के शिक्षक ने कहा था कि लवकुश तुम पत्रकार बन सकते हो छोटी सी बात को डीटेल मे लिख देते हो, back in the mind उनकी वो बात है कहीं |


मेरे एक करीबी दोस्त शुभांशु भाई के वहाँ जब भी जाना होता था तो उनके घर मे सब लोग बड़े आत्मीय तरीके से मिलते थे चाहे वो अंकल-आंटी लोग हों या दीदी लोग, अंकल पोस्ट ऑफिस मे अकाउंटेंट थे और मै अपने दोस्त और दीदी लोगों की समझ से हमेशा प्रभावित रहा, नतीजा उनका भी मुझे मान देना मेरी सेल्फ स्टीम को बढ़ाता रहा , इन मुलाकातों और रेकोग्निसन का अमूल्य योगदान होता  है मेरे जैसे किसी भी इंसान के जीवन मे |


सरकारी सेवा मे शामिल होने पर पहली तैनाती सिक्किम जैसे खूबसूरत प्रदेश मे हुयी वहाँ सर्विस के शुरुआती दिनो मे ही प्रभारी विज्ञानी द्वारा मेरे हर रिपोर्ट मे डिटेल्स को शामिल करने कि आदत को सराहा गया और मैंने और अधिक  मन ( माने ज्यादा समर्पण भाव से ) से अपना काम किया और प्रयास किया लोग मुझे मेरे व्यवहार से बाद मे मुझे मेरे काम से पहले याद रखें|


मेरे बाबा को भी मेरी पढ़ाई पर गर्व था और वो इसे व्यक्त भी करते थे नतीजा यही हुआ कि जो कुछ पाया और सीखा हूँ अपनी पढ़ाई के बल पर, ये आत्मनिर्भर जीवन भी, मेरी लाइफलाइन रहा है बड़ों से मिला प्रोत्साहन, सबको प्रणाम इस नेक कार्य के लिए जिसमे ज्यादा समय न लगा बस लगा तो दया के भाव से किसी के प्रयासों को देखना, आप जरूर प्रोत्साहित करें लोगों को उनके अच्छी नियत से किए गए कार्यों  के लिए | 


संस्कृत मे परास्नातक और शादी के बाद, हिन्दी मे परास्नातक कर रही आरती जी अपने बचपन को याद करती हुयी कहती हैं कि जब वो पढ़ने बैठती थीं तो उनकी लगन देखकर उनके पिता जी उन्हे शाबाशी देते और कहते कि तुम अच्छा करोगी और प्रोत्साहन के तौर पर क्लास से पहले ही काफी कुछ पढ़ा देते थे जिसने उन्हे और अधिक प्रोत्साहित किया पढ़ने को और हमेशा एक कदम आगे रहने के प्रयास को |


प्रशंसा के कमाल के संबंध मे इस वैबसाइट से जुड़ी हुयी कवयित्री, सौम्या गुप्ता जी अपने  अनुभव याद करते हुये कहती हैं कि

बचपन से ही मेरी पढाई को लेकर बहुत प्रशंसा हुई और मेरी मौसी, मेरे  मामा और  टीचर तक मेरी बहुत तारीफ करते थे क्योंकि टीचर्स के अथक प्रयास ( जिसमे मुझे मार भी खानी पड़ी हाहाहा !) मेरी Maths बहुत अच्छी हो गई थी।

मुझे भजन, सोहना देवीगीत, जिसे लोकगीत कहते है भी अच्छे से आते थे, मेरे भजन के कारण मेरी नानी और चाची, ताई ने भी बहुत तारीफ की।

एक तारीफ जिसका मेरे जीवन में बहुत ज्यादा महत्व है, मैं डा. विजय अग्रवाल सर के भेजे आर्टिकल को सारांश में बदलती हूँ, उन्होंने मुझे ये ये काम सौंपा उसके एक साल बाद तक मैं उनसे डांट सुनती रही क्योंकि मेरी हिंदी भाषा और आर्टिकल लिखने की शैली स्तरीय नहीं  थी। वो मेरे लिए Best teacher है उन्होंने भले डांटकर ही सही पर मुझे बहुत सिखाया, उन्होंने छोटी होली के दिन मेरे आर्टिकल पर “Excellent, इतना भेजा। Keep it up your hard work”  पूरे तीन दिन होली में मैं भले ही  दोस्तों से न मिल पायी, घर मे ही रही लेकिन सर की इतनी लाइन ही मेरी होली को खुशनुमा बनाने के लिए काफी थी क्योंकि आप जब खुश होते है तो खुश रहने के रास्ते बाहर नहीं खोजने पड़ते, बस अंदर ही आपके काम को लेकर खुशी आपको ऊर्जा देती रहती है 

मैंने अपनी लेखनी को विकसित करने के लिए डा. विजय अग्रवाल सर के भेजे गए लेखों को सारांशित किया, इसका फायदा मुझे आज तक मिल रहा है|


सौम्या जी आगे याद करती हुयी लिखती हैं कि एक प्रशंसा और आशीर्वाद जिसने उनके जीवन को बदल दिया, उनके शब्दों मे 

" एक बार मैंने प्रीति मैम को अपनी इच्छा को बताने के लिए एक कविता भेजी और उन्होने वो कविता अपने दोस्तों भी भेजी, जिसके लिए मुझे ma'am कि सर कि और उनके दोस्तों कि तरफ से खूब तारीफ मिली और मैंने उसके बाद अपने कविता लेखन को और बल दिया, 

ma'am मुझे पहले सिखाती है, न सीखने पर डांटती है, और फिर सीख लेने पर प्रशंसा  भी करती है, इस प्रशंसा को पाने के लिए मुझे हमेशा आत्मसुधार, आत्मचिंतन व मनन पर ध्यान देना होता है, जिससे बहुत सुधार हुआ है।

मेरी हिंदी व्याकरण की गलतियाँ, DP बनाते समय होने वाली गलतियाँ, यहाँ तक की मेरी सोच की सकारात्मकता के लिए सबसे ज्यादा योगदान उनका रहा है।


सौम्या जी इस बात पर ज़ोर देती हैं कि 

"प्रशंसा हमेशा सच्ची होनी चाहिए,सही काम के लिए होनी चाहिए। प्रशंसा से आत्म बल बढ़ना चाहिए पर प्रशंसा की चाह एक आदत नहीं होनी चाहिए। अगर आप कोई ऐसा काम कर रहे है जो बहुत जरूरी है और उसके लिए आपका अंतर्मन आपसे कह रहा हो तो उसे कोई भी प्रसंशा न मिलने पर भी करना चाहिए बस आपका काम समाज के हित में हो।"


इनकी एक कविता भी है प्रशंसा को लेकर जिसके माध्यम से इन्होने कई लोगों की आवाज को हम तक पहुंचाया है :

समाज के पैमाने पर 
सुंदरता की प्रशंसा पाने के लिए 
मैंने बहुत इच्छा की 
पर समाज को चाहिए 
गोरा रंग, आकर्षक काया 
इसीलिए कभी वो प्रशंसा 
मैं पा न सकीं 

फिर खुद को देखा मैंने 
खुद को संवारने की कोशिश छोड़कर 
ज्ञान पाने के लिए प्रयास किए 
छोड़ दी अपेक्षाएं उसकी प्रशंसा पाने की 
जो समय के साथ चला जाना है 
फिर पाया सच्चा ज्ञान और मिली सच्ची प्रशंसा 
जो शरीर की नहीं, थी मन की, ज्ञान की,
समाज के द्वारा नहीं, कुछ सच्चे लोगों से,
जो समझते है भौतिकता से आगे की बातें।


अगर आपके पास भी कोई कहानी है प्रोत्साहन से कमाल की तो लिख भेजिये हमे  नीचे दिए गए लिंक से क्या पता उसे पढ़कर कोई और भी प्रोत्साहित हो जाए और देश समाज या स्वयं के काम आ जाए | या फिर lovekush@lovekushchetna.in पर ईमेल कर दीजिये 

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लेख मे शामिल सभी लेखकों की तरफ से ढेरों शुभकामनायें

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नन्ही चौपाल : एक प्रयास बाल निर्माण से राष्ट्र निर्माण का

अपने बेटे के एड्मिशन के लिए चुना पिथौरागढ़ की वादियों मे एक सुंदर स्कूल जी हाँ सुन्दर इसलिए ताकि स्कूल भेजने के लिए बच्चे को मनाना ना पड़े, अंदर प्रवेश करते ही सोने पर सुहागा वाली बात हो गयी, प्रधानाचार्य महोदया के कार्यालय के सामने ही बच्चों के लिए एक  आकर्षक और उपयोगी किताबों की सुंदर सी लाइब्रेरी देखी, और उसमे दिखी “नन्ही चौपाल” की एक पत्रिका, जी हाँ वही “नन्ही चौपाल” जिस पर ये लेख है |

फिर क्या था प्रवेश की औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद प्रिंसिपल मैम से “नन्ही चौपाल” पत्रिका की एक प्रति मांग ली घर पर पढने के लिए, मैम को पत्रिका में मेरी रूचि ने प्रभावित किया और उन्होंने साथ में एक और प्यारी और छोटी सी बुकलेट दे दी, नाम था जिसका “धूप का संदूक ” जिसके लेखक हैं बच्चों की आवाज को मंच देने वाले आदरणीय विप्लव भट्ट सर |

फिर क्या ! काम शुरू हुआ पत्रिकाओं को पढने और उनके विश्लेषण का और जो कुछ मिला उसका निचोड़ कह लीजिये या सार कह लीजिये आपके सामने है :

  • यह बाल पत्रिका इस मायने में बहुत खास निकली कि इसके संपादक आदरणीय विप्लव भट्ट सर स्वयं ही नन्ही चौपाल नामक संस्था के संचालक हैं और विभिन्न क्रियाकलापों के माध्यम से अपनी पत्रिका में वर्णित कई बातों का प्रत्यक्ष अनुभव करवाते हैं बच्चों को |

इसकी बानगी से पहले भट्ट सर का विज़न देख लें :

“बच्चो की कल्पनाओ, जिज्ञासाओं और
सीखने की ललक को एक नया आकाश
देने वाले विप्लव भट्ट  एक बहुआयामी
कलाकार, शिक्षक और बाल-संवेदना के
संवाहक है और कठपुतली, जादू और
रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से बच्चों
को विज्ञान, गणित व नैतिक शिक्षा से
जोड़ने का अद्भुत कार्य कर रहे है। ”


मेरा मानना है कि राष्ट्र की सेवा के कई तरीके हैं जिनमे

बच्चो की कल्पनाओ, जिज्ञासाओं और

सीखने की ललक को एक नया आकाश

देने के लिए प्रयत्न एक उच्च कोटि की राष्ट्र सेवा है।”


  • ये मेरी आदत रही है कहीं भी अगर कुछ ऐसा देखूं जो जनहित में है, जो जन कल्याण के लिए आगे बढाया जाना चाहिए तो उस कार्य को अपने सीमित शब्दों और सीमित समझ में प्रोत्साहित करने का प्रयास करना अपना धर्म समझता हूँ, इसी आदत के अनुरूप पत्रिका में दिए गए भट्ट सर के मोबाइल नंबर -9456762889 पर एक सन्देश लिख दिया:    
  • “नमस्कार सर, आशा करता हूँ कि आप सकुशल होंगे

आपकी लिखित कृतियों, धूप का संदूक और नन्ही चौपाल प्राप्त हुई।

बच्चों के विकास और भलाई के प्रति आपका समर्पण देख बहुत सुखद अहसास हुआ, आपके इन उन्मुखी और नवाचारी कार्यों के लिए साधुवाद 💐💐

आपके इन कार्यों में मैं अगर कोई सहयोग कर सकूं तो मुझे खुशी होगी।”  


क्या लगता है आपको क्या जवाब आया होगा उनकी तरफ से ?

जवाब नीचे है :

“ आपका हृदय से आभार बच्चों का बहुत ऋण है मेरे जीवन पर अतः बस उनसे ही सीखा हुआ प्रयास कर रहा हूँ

आपका प्रोत्साहन पूंजी है आशा करता हूँ जल्द ही आपसे मुलाक़ात होगी

हार्दिक आभार”

बच्चों के उत्साहवर्धन के लिए निमित्त कुछ दिनों बाद ही उनका सन्देश प्राप्त होता है कि

“हमारे कार्यक्रमों में शिरकत करें, बच्चों का उत्साहवर्धन करें और कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएँ।

हम मानते हैं कि आपके करकमलों से बच्चों का उत्साह और भी दोगुना होगा।”

ये महत्ता है बच्चों के उत्साहवर्धन की |


आईये कुछ प्रश्न और उत्तरों से समझते से “नन्ही चौपाल” के कार्यों और योगदान को, जिनको आगे बढाने और विस्तृत दायरे तक पहुंचाने और अन्य उत्साही लोगों को ऐसे ही नवाचारी प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करने को यह लेख लिखा जा रहा है :

लेखक का दृष्टिकोण:

विप्लव भट्ट जी 'नन्ही चौपाल' बाल संगठन के साथ ही बाल पत्रिका व चैनल
के माध्यम से बच्चों की आवाज़ को मंच देते है, वही स्व-निर्मित
शैक्षिक खिलौनों की प्रयोगशाला 
के जरिये बच्चों को किताबो से
परे 
सीखने का अवसर भी प्रदान करते हैं। आपका 'नन्ही चौपाल
'ऑन, व्हील्स' कार्यक्रम दूर-दराज़ के बच्चों तक रचनात्मक ज्ञान
पहुंचाने का, अभिनव प्रयास है।



"हर बच्चे के भीतर छिपा है एक वैज्ञानिक, एक कलाकार,
एक विचारक...। ज़रूरत है तो बस उसे एक चौपाल देने की,
जहां वह स्वयं को खुलकर अभिव्यक्त कर सके।"

- नन्हीं चौपाल


नन्ही चौपाल के मुख्य उद्देश्य क्या हैं?

नन्ही चौपाल का मुख्य उद्देश्य बच्चों को उनकी रचनात्मकता, जिज्ञासा और सीखने की ललक को बढ़ावा देना है। इसके लिए वे विभिन्न गतिविधियों, जैसे कठपुतलीजादू और रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को विज्ञानगणित और नैतिक शिक्षा से जोड़ते हैं। इसके अतिरिक्त, नन्ही चौपाल बच्चों को अपनी बात कहने और व्यक्त करने के लिए मंच भी प्रदान करता है।


विप्लव भट्ट बच्चों के लिए किस प्रकार के अभिनव प्रयास करते हैं?
विप्लव  भट्ट बच्चों के लिए कई अभिनव प्रयास करते हैं। वे बाल संगठन के साथ बाल पत्रिका और चैनल के माध्यम से बच्चों को अपनी आवाज देने का मंच प्रदान करते हैं। स्व-निर्मित शैक्षिक खिलौनों की प्रयोगशाला के माध्यम से बच्चों को किताबों से परे सीखने का अवसर प्रदान करते हैं। इसके अलावा, 'नन्ही चौपाल 'ऑन, व्हील्स' कार्यक्रम के माध्यम से दूर-दराज के बच्चों तक रचनात्मक ज्ञान पहुंचाने का प्रयास करते हैं।


विप्लव भट्ट बच्चों के जीवन में क्या महत्व रखते हैं?
विप्लव भट्ट बच्चों के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे बच्चों को उनकी रचनात्मकता को विकसित करनेसीखने के लिए प्रेरित करने और विज्ञानगणितऔर नैतिकता के मूल्यों को समझने में मदद करते हैं। वे बच्चों को अपनी बात रखने और खुद को व्यक्त करने के लिए एक मंच भी प्रदान करते हैं, जिससे बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है।


आप 'नन्ही चौपाल' के कार्यक्रमों के बारे मे जानने के लिए, सीखने के लिए और अन्य संबन्धित संपर्क के लिए उनकी पत्रिका मे दिये गए निम्नलिखित मोबाइल नंबर और ईमेल  आई डी से संपर्क साध सकते हैं – मो- 9456762889

nanhichaupal@gmail.com

अगर आप भी अपने क्षेत्र मे ऐसा ही कुछ करना चाहते हैं तो आप इनके यू-ट्यूब चैनल के साथ इनकी पत्रिकाओं से काफी कुछ सीख सकते हैं |

सन्दर्भ के लिए इनके यू-ट्यूब चैनल का लिंक यहाँ दिया जा रहा है और इनकी पत्रिका नन्ही चौपाल के एक अंक से कुछ छवियाँ संलग्न हैं ताकि इस नेक काम को और उसके लिए अपनाये गए अभिनव तरीके को बेहतर तरीके से समझा जा सके |

https://youtu.be/YTyv4fdfcmU?si=VJ6n1vfA0-KUAOph

आइये अब बात करते हैं विस्तृत तरीके से उनसे उन सूक्ष्म सकारात्मक परिवर्तनों पर पर जो नन्ही चौपाल के क्रियाकलापों से बच्चों मे लाये जा रहे हैं और योगदान सुनिश्चित कर रहे हैं राष्ट्र निर्माण मे |

जहाँ तक मैंने देखा, पढ़ा, समझा और महसूस किया है (अपने बचपन को याद करते हुए)

बच्चों के लिए शारीरिक विकास के लिए स्वास्थ्यवर्धक भोजन, खेल-कूद, व्यायाम और अच्छी नींद जरुरी होती है वहीँ उनके मानसिक विकास या जीवन/दुनिया/स्वयं को लेकर सही नजरिये का विकास हो या उनकी मानसिक, विश्लेषणात्मक, तार्किक क्षमताओं के विकास की बात हो या फिर उनके भावनात्मक विकास या फिर उन्हें एक बेहतर इंसान बनाने के लिए जरुरी मानवीय गुणों के लिए उनकी समझ पर काम करना हो तो हमें कई स्तर और कई परिप्रेक्ष्य में काम करना होता है, जिस पर हम आगे के लेख में बात करेंगे |

यहाँ पर ऐसे ही कुछ गुणों की सूची दी जा रही है जिन्हें विकसित करने के प्रयास के रूप मे विस्तृत प्रक्रिया अगले लेख में साझा करायी जाएगी, सन्दर्भ के लिए आप इनके यू-ट्यूब चैनल पर विजिट कर सकते हैं, उदाहरण के लिए खेल भावना (Sport’s Spirit) से बच्चे में हार जीत में एक सामान रहने और अगली बार बेहतर करने तक धैर्य आ जाता है इसके लिए हम बच्चों को खेलने के लिए पर्याप्त समय, स्थान और अन्य संसाधन की व्यवस्था करके ये सुनिश्चित कर सकते हैं, दूसरा गुण है वैज्ञानिक स्वाभाव (Scientific Temperament) जिससे तात्पर्य है कि बच्चे द्वारा चीज़ों के कार्य करने के पीछे वैज्ञानिक और तार्किक कारण ढूँढना, कार्य-कारण सिद्धांत जिसे हम वैज्ञानिक प्रयोग, विज्ञान प्रदर्शनी  या विज्ञान केंद्र के  भ्रमण से सुनिश्चित कर सकते हैं, अन्य के लिए जानकारी अगले लेख में |

सूची –

क्रम सं

गुण/उद्देश्य

1

खेल भावना

(Sport’sSpirit)

2

वैज्ञानिक स्वभाव (scientific temperament)

3

संवेदनशीलता

4

साक्षरता

5

विश्लेषण क्षमता

6

मदद की भावना

7

साझा करने की भावना

8

उत्कृष्टता की चाह

9

आत्मनिर्भर बन्ने की तमन्ना

10

खुद को व्यक्त करने की क्षमता और ललक

11

साहित्य में रुझान

12

जिज्ञासा

13

सीखते रहने की चाह

14

नवाचार

15

शिष्टाचार

16

अनुशासन

17

प्रबंधन और प्रशासन की क्षमता – मूलभूत

18

सामना करने का आत्मविश्वास और दृढ़ता

19

इमानदारी

20

सच्चाई

21

प्रतिबद्धता

22

पारस्परिक सम्मान

23

लोगों को अवसर देने और साथ लेकर चलने की भावना

24

लोगों का मनोबल बढ़ाने की चाह

25

वाक् कौशल

26

बहादुर, साहसी

27

प्रेमपूर्ण

28

वर्तमान का उपयोग

29

सतर्क रहना

30

अपने कर्तव्यों कि पहचान

31

व्यक्तिगत अधिकारों का सम्मान

32

गोपनीयता का सम्मान

33

विनम्रता

34

समय की मांग के अनुसार चीजों को छोड़ पाने की क्षमता

35

निष्पक्षता 

36

नए या कई काम देखकर घबराएँ न ऐसी कबिलियत

37

ज़िम्मेदारी उठाने की इच्छा

38

भीड़ से आगे खड़े होने का साहस

39

नए लोगों के सामने खुद को व्यक्त करने मे संकोच न करें ऐसा गुण

40

मजबूत शरीर कि चाह के लिए अनुशासन और व्यायाम

41

पर्यावरण को लेकर जागरूक

42

नेतृत्व क्षमता

43

समन्वय क्षमता

44

कला की समझ

45

रचनात्मकता

कई बातें होती हैं जिन्हे बच्चों मे विकसित करने के लिए अभ्यास और उचित माहौल देने की जरूरत होती है, जैसे MIHU (May I Help you) कार्मिक गगनदीप कौर जी इस बात पर ज़ोर देती हैं कि "अगर बच्चों को ज़िम्मेदार बनाना है -आपको बच्चे को शुरू से ही उसकी उम्र के हिसाब से छोटी-छोटी जिम्मेदारियां देना शुरू करना चाहिए। उदाहरण के लिए, उन्हें अपने खिलौने खुद समेटना सिखाएं- खेलने के बाद उन्हें उनकी जगह पर रखने के लिए प्रेरित करें,"

इसी तरह कार्यशाला मे बच्चों को छोटी छोटी ज़िम्मेदारी देकर, उनके पूरी होने पर उन्हे पुरस्कार देकर उनमे ज़िम्मेदारी उठाने कि इच्छा पैदा कि जा सकती है |


ऐसे ही इतिहास मे परास्नातक और उदीयमान कवयित्री सौम्या जी इस बात पर ज़ोर देती हैं कि

"बच्चों मे जो गुण विकसित करने हों माता पिता भी पहले वो गुण खुद मे लाएँ, माने अगर वो चाहते हैं कि बच्चे झूठ न बोलें और अपने वादे पूरे करें तो उन्हे भी यही बात आदत मे लानी होगी और अगर वो चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़ने मे मन लगाएँ तो उन्हे भी नियमित पढ़ना होगा बच्चों के सामने फिर चाहे उन्हे कोई परीक्षा देनी हो या न देनी हो"

 

माता-पिता बच्चों के साथ संवाद करने के लिए निम्नलिखित तरीकों का उपयोग कर सकते हैं:

ध्यान से सुनें: बच्चों को अपनी बातें कहने दें और उनकी बातों को ध्यान से सुनें। उनकी बातों को बीच में न काटें और उन्हें अपनी बात पूरी करने का मौका दें

खुले प्रश्न पूछें: ऐसे प्रश्न पूछें जो बच्चों को सोचने और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करें। उदाहरण के लिए, "आज स्कूल में आपका दिन कैसा रहा?" या "आपको सबसे ज़्यादा मज़ा किस चीज़ में आया?"

अपनी भावनाओं को व्यक्त करें: बच्चों को बताएं कि आप कैसा महसूस करते हैं। इससे वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए अधिक सहज महसूस करेंगे।

"इससे पहले कि बच्चों को महंगी चीजों मे खुशी ढूँढने कि आदत लगे उन्हे रचनात्मक कार्यों मे रुझान दिलवाकर आप उनके जीवन मे पैसे के अति महत्व को कम कर सकते हैं |"


इसी तर्ज पर स्कूल और कार्यशालाओं मे विभिन्न क्रियाकलापों से विभिन्न गुण बच्चों मे अभ्यास से विकसित किए जा सकते हैं और नन्ही चौपाल सरीखे मंच जहां बच्चे साप्ताहिक या किसी अन्य अंतराल पर इकट्ठे होकर सामूहिक रूप से एक दूसरे से प्रेरित होकर, एक दूसरे को देखते हुये अभ्यास से बहुत कुछ अच्छा सीख सकते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सहयोग कि भावना आदि गुण ल सकते हैं जो उनके जीवन को चेतना के उच्चतर स्तर पर ले जा सकते हैं |

 

इस सम्बन्ध में अगला लेख अन्य गुणो को विकसित करने के प्रयास के रूप मे क्रियाकलापों की विस्तृत परिचर्चा के साथ जल्द मिलेगा |

 

धन्यवाद और शुभकामनाएं

-लेखक

 

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श्री उदय सिंह - एक बेहतरीन शिक्षक और खुशमिज़ाज इंसान की मिशाल

वह ग्यारहवीं और बारहवीं मे मेरे भौतिकी ( फ़िज़िक्स ) और रसायन शास्त्र ( कैमिस्ट्रि ) के शिक्षक रहे |

स्वभाव मे खुशमिजाज़ और मज़ाकिया, फ़िज़िक्स और कैमिस्ट्रि दोनों मे गजब निपुणता, 

जी हाँ मैं उनसे कोचिंग लिया करता था स्कूल के बाद और स्कूल के पहले सुबह सवेरे |

“ कोई छात्र किस विषय को लेकर आगे बढ़ेगा ये बहुतायत मामलों मे इस बात पर

निर्भर करता है कि उस विषय से परिचय कराने वाला शिक्षक कैसा मिला ",

शिक्षक ने अगर रोचक ढंग से पढ़ा दिया तो मन लग जाता है उस विषय मे

और नतीजतन उस विषय मे बेहतर प्रदर्शन छात्र में उस विषय के साथ आगे

बढने  को लेकर एक आत्मविश्वास पैदा कर देता है |

मेरे साथ भी यही हुआ, पढ़ाते तो उदय सर दोनों ही विषय रोचक ढंग से थे लेकिन

कैमिस्ट्रि की क्लास अर्ली मॉर्निंग होने के चलते कैमिस्ट्रि नींद की भेट चढ़ गयी माने 

केमिस्ट्री की परफॉरमेंस फिजिक्स की तुलना में कमतर रही और रूचि भी उतनी न रही,

सौभाग्यवश फ़िज़िक्स के मामले मे संयोग अच्छा रहा, खूब न्यूमेरिकल प्रैक्टिस किए

और बनारस हिन्दू विश्वविद्यलय से भौतिकी मे बी०एस०सी ( आनर्स ) और

आई०आई ०टी० दिल्ली से भौतिकी मे ही परास्नातक भी किया |

आदरणीय उदय सर के जो गुण हमारे जैसे हजारों छात्रों के लिए

अमृतफल और प्रेरणा साबित हुये वो थे :

  • नियमित क्लास लेना
  • नियमित टेस्ट लेना
  • व्यंग कौशल के चलते माहौल मे जीवंतता बनाए रखने की खूबी
  • अध्यात्मिक प्रवृत्ति के चलते समय समय पर छात्रों/छात्राओं को  जीवन और दुनिया को लेकर स्पष्टता देना
  • गरीब और विपदा के सताये बच्चों की फीस माफ कर देना |
  • अध्यापन को लेकर समर्पण ऐसा कि घर पर ही भौतिकी की लैब स्थापित कर रखी थी |

एक बहुत खास घटना जिसने मेरे जीवन पर लॉन्ग लास्टिंंग इम्प्रैशन छोड़ दिया :

उदय सर, वेदमाता गायत्रीपीठ से जन-कार्यों हेतु जुड़े थे इसी बाबत एक बार

ग्यारहवीं के दौरान लखीमपुर के विलोबी हाल मे गायत्री परिवार के तरफ से

श्रद्धेय पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा लिखे युग साहित्य पर

आधारित एक पुस्तक मेला लगा जिसके बारे मे उदय सर ने

सब छात्रों को बताया, मैंने वहाँ से 56 रुपये मे 13 किताबें खरीदीं, 

किताबें मददगार और जीवन/ दुनिया को लेकर स्पष्टता देने वाली

लगीं और मेरे अध्यात्मिक अध्ययन का कारवां चल पड़ा जो आज

भी जारी है जिससे मुझमे बेहतर निर्णयन क्षमता के साथ-साथ

प्राथमिकताओं को लेकर स्पष्टता मिल रही है |

 

अगर उदय सर की संगति न मिली होती तो शायद मै आज वो

न बन पता जो बनकर आज मुझे खुशी और गर्व है |

हृदय से आभार आदरणीय उदय सर के लिए |  

-लवकुश कुमार

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बच्चों के लिए कैरियर से जुड़े कुछ शब्द, उनका मतलब और महत्व -1

बच्चे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं, ये अमूमन माहौल से निर्धारित होता है या दूसरा की उन्हे एक्सपोजर कैसा मिला 

कुछ शब्द जो कैरियर बन सकते हैं, महत्व और योगदान दर्शाते हैं एक समाज के स्थायित्व के लिए 

उनके बारे मे  कुछ बातें यहाँ दी जा रही हैं :कुछ और पेशे आगे के लेख मे साझा किए जाएंगे |

क्रम संख्या पेशा योगदान और महत्व  कुछ उदाहरण 
1 साहित्यकार  लोगों को जीवन, दुनिया,चीजों, जगहों, समाज और खुद को लेकर समझ बेहतर हो इसके लिए किताबें, लेख, कवितायें, उपन्यास, निबंध, जीवनी, आत्मकथा रिपोर्ताज आदि लिखते हैं | मुंशी प्रेमचंद, शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय, मनु भण्डारी, नागार्जुन, मुक्तिबोध आदि 
2 शिक्षक एक बेहतर, सजग, संवेदनशील, जागरूक, बहादुर, कौशलयुक्त और समझदार नागरिक बनाने के उद्देश्य से बच्चों को शिक्षित करते हैं | आपके स्कूल के शिक्षक/शिक्षिकाएँ जिनसे पढ़कर आपको अच्छा लगता है |
3 डॉक्टर लोग स्वस्थ रहकर अपना जीवन खुशी से जी सकें और खूब काम कर सकें, लोगों की मदद कर सकें इसके लिए बीमार पड़ने पर उनका इलाज़ करते हैं | आपके शहर, आपके प्रदेश, देश के वो डॉक्टर जिन्होंने आपको स्वस्थ करने मे भूमिका निभाई |
4 इंजीनियर 

हमारे जीवन को आसान बनाने के लिए मशीन, सड़कों, रेल, पुलों, इमारतों, सॉफ्टवेअर,बिजली उपकरणो, कारखानो का निर्माण आदि 

एम॰ विश्वेसरैया, ई॰ श्रीधरन आदि

 

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बच्चों के लिए साहित्य- उनके लिए सही आदर्श - श्रृंखला परिचय

आज आप बहुतायत संख्या में पाएंगे कि लोग कहते हैं कि आज की पीढ़ी ऐसी है, इनमें ये कमी है वो कमी है, जो भी कमियां या बुराइयां हैं तो उनका दोषी है कौन ?

 

बच्चों को जीवन मूल्य मिलते हैं उनके घर, स्कूल और मोहल्ले के माहौल से, साहित्य और सिनेमा से।

 

बच्चे आदर्श मानते हैं उन्हें जिनका सम्मान उनके बड़े करते हैं।

 

अगर आप आज अपने स्वार्थवश ग़लत इंसान का सम्मान करेंगे तो आपके बच्चे भी वैसे ही बनेंगे।

 

 

 

आने वाले समय में यही बच्चे अधिकारी, डाक्टर, इंजीनियर, वकील, कलाकार, न्यायधीश, शिक्षक, व्यापारी और नेता इत्यादि बनेंगे, उस वक्त हमारी इनसे क्या अपेक्षाएं होंगी, क्या वो इस पर खरे उतर पाएंगे?

 

इसके लिए हमें उन्हें अभी से तैयार करना होगा।

 

तकनीकी शिक्षा के साथ उन्हें जीवन और इस शरीर और मन की सही समझ देनी होगी।

 

उनमें संवेदनशीलता, समता, व्यक्ति की गरिमा, आज़ादी, सत्यनिष्ठा, परोपकार, त्याग, जिम्मेदारी और जवाबदेही जैसे मूल्यों के प्रति सम्मान अभी से विकसित करना होगा, नहीं तो कल हमारे पास भी अपनी उत्तरोत्तर पीढ़ी की आलोचना करने के सिवाय कोई और विकल्प न होगा।

 

बाहर के शासन और बाहर से लगाम से ज्यादा कारगर है इंसान का स्वयं में ये संकल्प कि वो विश्व व्यवस्था को बिगाड़ने या मनुष्यों के आपसी विश्वास को कम करने वाला कोई कार्य नहीं करेगा।

 

शुभकामनाएं 

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अंबेडकर जयंती और मानव जीवन की उच्चतम संभावना

कल १४ अप्रैल को देशभर में अंबेडकर जयंती को उनके मानने वाले, उनके शुक्र गुजार लोगों ने श्रद्धा पूर्वक मनाया, मैंने भी कल अपने साथ उठने बैठने वाले लोगों के साथ, बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर की शिक्षाओं, उनके संघर्षों और उनके कार्यों पर चर्चा की।

बात आरक्षण पर आयी, मैंने कहा

देश के समुचित विकास के लिए और देश के नागरिकों के बीच बंधुता के लिए ताकि आपसी सौहार्द बना रहे,  ््््््््््््््््््््््््््््

आरक्षण एक अफरमेटिव एक्शन है, जिसके द्वारा समाज के उस तबके को मौका दिया जा रहा है पढ़ाई और नौकरी का जो समाज की मुख्य धारा से पिछड़ चुके हैं ताकि वो भी अपनी प्रतिभा और कौशल से देश के विकास में योगदान दे सकें।

जितने ज्यादा लोग इस देश के विकास में बेहतर योगदान देंगे उतनी ही जल्दी हम महाशक्ति बनेंगे।

किसी तबके को ये न लगे कि उन्हें तो मौका ही नहीं मिला अच्छी शिक्षा पाकर देश के लिए कुछ बेहतर से बेहतर करने का, मानव जीवन की उच्चतम संभावना को पाने का, नहीं तो ये मलाल रह जाएगा मन में और समय दर समय प्रस्फुटित होता रहेगा।

फिर दोहराना चाहता हूं कि देश महान होता है देश के लोगों से, जब हर किसी को अवसर मिलेगा मानव जीवन की उच्चतम संभावना को पाने का तब ही देश महान होगा और नित विकास के नए कीर्तिमान स्थापित करेगा।

शुभकामनाएं 

 

 

 

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साहित्य जरूरी क्यों ? A must read.

ताकि हम अपने आस पास के लोगों के इतर खुद से दूर दराज के लोगों के जीवन, पहनावे और रहन सहन के बारे में जान सकें।

 

अच्छा जानना क्यों है दूर वालों के बारे में ?

 

ताकि

 

हम जान सकें कि अगर उनमें कुछ बेहतर है हमसे, जिसे अपनाया जा सके।

हम जान सकें उनके जीवन के संघर्षों के बारे में ताकि हमें अपनी दिक्कतें बड़ी न लगें।

हम जान सकें उनकी आकांक्षाओं के बारे ताकि जब कभी उनके साथ काम करना पड़े या उनके लिए नीतियां बनाना पड़े तो हम हम उनके व्यवहार और जरूरतों के पीछे का कारण जान सकें।

इस तरह नए लोगों के साथ काम करना आसान होगा।

 

समाज के एक तबके का इंसान दूसरे तबके के इंसान के बारे में जान ही तब पाता है जब या तो वो उनके बीच समय बिताए, या उनके बारे में फ़िल्म देखें या फिर साहित्य ( कहानी, कविता, उपन्यास, लेख, रिपोर्ताज, जीवनियां, आत्मकथा इत्यादि) पढ़ें।

 

फिर वही प्रश्न कि आखिर जानना क्यों है ?

 

ताकि समाज में आपसी संघर्ष कम हों और सब एक दूसरे को साथ लेकर चलें, एक दूसरे की तकलीफ़ों के प्रति संवेदनशील रहें ताकि स्थायित्व का मार्ग प्रशस्त हो और देश में शांति बनी रहे, जीवन में शांति बनी रहे।

 

उम्र के एक पड़ाव का इंसान उम्र के दूसरे पड़ाव के इंसान के विचारों और प्राथमिकताओं को जान पाता है, सुविधा असुविधा को जान पाता है साहित्य अध्ययन से नतीजतन तालमेल बिठाकर चलना आसान होता है, जीवन में शांति आती है और क्लेश कम से कम रहता है।

 

आज का इंसान, अपने पूर्वजों द्वारा अनुभव की गई जीवन और दुनिया की सच्चाई को पुस्तकों द्वारा पढ़कर अपने जीवन को सही दिशा दे सकता है, जिसमें अफसोस का कोई स्थान न हो, हो तो केवल उत्कृष्टता।

फिर क्या सोंच रहे हैं आप ? देंगे एक घंटा रोज का ? साहित्य अध्ययन को 

 

और बच्चों को भी मैथ्स साइंस के साथ-२ साहित्य पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करेंगे और देश को बेहतर और संवेदनशील ( जो दूसरों की तकलीफ़ को समझ सके ) नागरिक देने का प्रयास करेंगे ?

 

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