अलग-अलग रंगरूप हमारे, दिल की धड़कन एक है।
जाति अलग है, धर्म अलग है, छत पर आकाश एक है।
अलग-अगल है धन की माया,
अलग-अगल है सबकी काया,
पर सबके पैरों के नीचे, देखो धरती एक है।
अलग-अलग है भाषा सबकी,
अलग-अलग हैं व्यंजन सबके,
'थोड़ा सा और लीजिए न' ये भाव तो एक है।
अलग-अलग है ईष्ट हमारे,
अलग-अलग है मंदिर - मस्जिद,
पर सभी ईष्टों का संदेश 'सेवा भाव' भी एक है।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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शुभकामनाएं
लोगों के मनमाने व्यवहार और असीमित उपभोग की आकांक्षाओं ने धरती और सभ्यता को संकट में डाल दिया है - ग्लोबल वार्मिंग, बिखरते रिश्ते, तनाव, बेरोजगारी और असुरक्षा की भावना, सामाजिक प्रतिष्ठा की चाह के चलते समाज से रिकग्निशन पाने की गैर जरूरी हद तक कामना इत्यादि।
जब अमूमन वाट्सैप स्टेटस पर पर्यटन के फोटोज या सतही ज्ञान के वीडियो/फोटो दिख रहे हों उस बीच " जीवन, मानव मन और दुनिया की बारिकियों या फिर इंसान की विरोधाभासों से भरी जिंदगी पर एक नजर डालने का इशारा है। "
हो सकता है कि २५० लोगों में ऐसे भी लोग हों जो स्टेटस में लेख या उक्ति देख बिना पढ़े आगे बढ़ा देते हों
कुछ ऐसे होंगे जो सहमत न होते होंगे और इन्हें किताबी बातें बोलकर चिढ़ जाते हों
कुछ ऐसे होंगे जो आंशिक रूप से सहमत होते होंगे
कुछ तो इन्हें जीवन में उतारते होंगे
कुछ के दिमाग के किसी कोने में पड़ जाते होंगे, ताकि वक्त जरूरत स्पष्टता में काम आयें
कुछ के जीवन में चल रहे झंझावातों और उलझनों का समाधान मिल जाता होगा
कुछ तो मेरे स्टेटस को रिपोस्ट करते हैं अपनी वाल पर
या वो खुद भी उक्तियों को स्टेटस में लगाना आदत में ले आते हैं।
मेरी कल्पना में है वो एक दिन जब आपकी कांटैक्ट लिस्ट के कई लोगों के वाट्सैप स्टेटस में होंगी ऐसी पंक्तियां जो हमारी समस्या का हल हो सकती हैं
या हमें हमारी मानसिक गुलामी का एहसास करा सकती हैं
या हमें हमारे जीवन के झूठ को आयने में दिखा सकने की क्षमता रखती होंगी
या फिर वो हमारे जीवन और समाज की असली और केंद्रीय समस्या की तरफ हमारा ध्यान खींच सकती हैं
या वो हमें ये अहसास दिला सकती हैं कि हमें कोई अधिकार नहीं अपनी आराम और विलासिता के लिए, समाज और वातावरण को खतरे में डालने का
या वो लोगों, स्वयं और दुनिया को लेकर हमारे भ्रम को तोड़ हमें तनाव और दबाव से मुक्त कर सकती हैं।
अगर आप भी किसी बिंदु से सहमत हैं तो उठाइए एक कदम खुद की और उस माहौल और उस हवा को बेहतर करने को जिसमें हम सांस लेते हैं।
जब हमारे कार्य के पीछे जनहित होता है फिर हमें ये न सोचना चाहिए कि लोग ( संकीर्ण समझ के लोग) हमारे बारे में क्या सोचते हैं।
शुभकामनाएं
- लवकुश कुमार