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तरकीब ( सूझ-बूझ पर जोर देनी वाली बालकथा) - मीरा जैन

जंगल के राजा मटकू शेर ने दिन-ब-दिन अपने जंगल की हालत को खस्ता होते देख सर्वे करवाया कि-

 'आखिर हमारे जंगल में ऐसी कौन सी गड़बड़ी हो रही है? जिसके कारण विकास आधा अधूरा ही हो रहा है।'

 सर्वे में पाया गया कि यहां बाहर से बहुत सी भेड़ें और बुजुर्ग जानवर आकर रहने लगे हैं भेड़ों से बात की तो ज्ञात हुआ कि उनके शरीर पर ऊन लदा हुआ है उन्हें काम करने से बहुत गर्मी का एहसास होता है इसीलिए वे काम नहीं कर पाती हैं, वहीं दूसरी और बुजुर्ग जानवरों ने कहा कि- 'हमे ठंड बहुत ज्यादा लगती है हम बीमार पड़ जाएंगे इसलिए खुले में काम नहीं कर सकते। '

इन लोगों के कारण जंगल पर खर्च का भार बढ़ रहा था और विकास कार्य में बाधा आ रही थी।

          इस समस्या के निदान हेतु मटकू शेर ने अपने सभी साथियों से विचार विमर्श किया और एक-एक कर सभी को इस समस्या को दूर करने हेतु अवसर भी दिया, किंतु असफलता ही हाथ लगी अंत में न चाहते हुए भी एक बहुत शरारती बंदर,चंकु को नियुक्त किया|

चंकु बंदर इस समस्या से निजात पाने हेतु जी जान से जुट गया उसने भेड़ो एंव बुजुर्ग जानवरों को सुना, समझाया, मान मन्नौवल की, फिर भी वे टस के मस नहीं हुए आखिर हार कर चंकु बंदर ने अंतिम उपाय का सहारा लिया जिससे भेड़े और बुजुर्ग जानवर अपनी शक्ति अनुसार कार्य करने लगे और देखते ही देखते कुछ ही दिनों में जंगल ने तरक्की की राह पकड़ ली यह देख मटकू शेर बहुत खुश हुआ और उसने पूछा-

" चंकु ! तुम एक बात तो बताओ जिस समस्या का समाधान हम मे से कोई नहीं कर पाया तुमने इतनी जल्दी कर दिखाया आखिर कैसे ?"

चंकु ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया-

" शेर राजा ! मैने ज्यादा कुछ नहीं किया भेड़ो के शरीर पर लदे ऊन को काटकर उनके स्वेटर बना बुजुर्ग जानवरों को पहना दिये ।"

जवाब सुन मटकू शेर बहुत खुश हुआ और चंकु को उसकी सूझ बूझ से समस्या की जड़ तक पहुँचने के लिए पुरष्कृत किया और उसे विकास मंत्री बना दिया |

 

- मीरा जैन 

उज्जैन, मध्य प्रदेश 

मो.9425918116
jainmeera02@gmail.com


अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर  (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने  लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।          
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं  को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं|

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 आज्ञापालन (परोपकार पर ज़ोर देती बालकथा)- मीरा जैन

खुशी से सराबोर सम्यक दौड़ता हुआ अर्पण से लिपट गया और अंकसूची बताते हुए कहने लगा- "अर्पण ! तुम्हारे कारण आज मै कक्षा में प्रथम आया हूं यदि उस दिन तुम मुझे अपनी साइकिल नही देते तो शायद मै परीक्षा देने स्कूल ही नही पहुंच पाता और फेल हो जाता । एक बात तो बताओ अर्पण ! खेलते खेलते हम दोनो में लगभग छ: माह पहले लड़ाई हो गई थी तब से हमारी बोलचाल बंद थी हम एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते थे, परीक्षा वाले दिन जब मैने स्कूल जाने के लिए साइकिल बाहर निकाली , उसका पहिया पंचर देख मेरे होश उड़ गए सोचने लगा-अब क्या होगा ? पापा भी बाहर गए हुए हैं , मै परीक्षा देने स्कूल कैसे पहुचुंगा, इसी घबराहट में मेरे आंसू छलक आए। कुछ समय पश्चात ही तुमने अपनी साइकिल मेरे हाथों में स्कूल जाने हेतु दे दी और ना चाहते हुए भी, मजबूरीवश तुम्हारी साइकिल लेकर चला गया पर एक बात तो बताओ तुम्हारे मन में मेरे प्रति अचानक प्रेम भाव कैसे उमड़ आया ?"

अर्पण ने सच बोलते हुए कहा- " "सम्यक ! सच तो यह है कि मै तुम्हारी साइकिल का पहिया पंचर देख बहुत खुश हुआ था कि तुम अब परीक्षा देने नहीं जा पाओगे लेकिन खिड़की से दादाजी ने साइकिल के कारण तुम्हें रोते हुए देख लिया उन्होंने तुरंत मुझे आदेश दिया- जाओ अपनी साइकिल सम्यक को देकर आओ पहले तो मैने ना नुकुर की किंतु बाद में मान गया जब दादाजी ने कहा-अर्पण बेटा मुसीबत में जो दूसरों के काम आए वही सच्चा इंसान होता है बाकी तो सब स्वार्थी , हो सकता है कभी तुम भी ऐसी स्थिति में फंस जाओ और तुम्हारी कोई मदद ना करे तो तुम पर क्या बीतेगी, साथ ही पड़ोसियों को तो हमेशा एक दूसरे से मिलकर ही रहना चाहिए, यूं भी परोपकारिता बहुत बड़ा धर्म है।"

 सम्यक ने भी हां में हां मिलाते हुए कहा-

" मां, कहती है घर में बड़े बुजुर्गों की बात हमेशा माननी चाहिए वह हमें अच्छा इंसान बनाने में मदद करते हैं।"

- मीरा जैन 

उज्जैन, मध्य प्रदेश 


अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर  (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने  लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।          
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