किसी के पास इतना काम है कि शुकून से खाना खाने तक का वक्त नहीं है
और किसी के पास इतना भी काम नहीं कि खाने भर का कमा सके
किसी से ओवरटाइम काम लिया जा रहा
और वो घर पर वक्त नहीं दे पा रहा
और किसी के पास काम ही नहीं
तो घर पर ही पड़ा हुआ है।
पेशे में पुराने लोगों के पास इतना काम है कि क्लाइंट वेटिंग में हैं
और नए लोगों के पास इतना भी काम नहीं कि
उस पेशे को जारी रख सकें
कुछ लालची चैन से खाने तक का वक्त भले न पाएं लेकिन मार्केट में मोनोपली चाहते हैं और किसी अन्य प्लेयर को टिकने ही नहीं देना चाहते।
इतनी असमानता क्या फ्रस्ट्रेशन, निराशा और ईर्ष्या को जन्म नहीं देती ?
क्या हम संतुलित दिनचर्या के महत्व को समझ रहे हैं?
कहीं हम अपना लाभ बढ़ाने के लिए अपने कर्मचारियों से संतुलित दिनचर्या की संभावनाएं तो नहीं छीन रहे उनसे नियमित ओवरटाइम कराकर ?