अपनी तुम राह से भटके हुए,मंजिल भुला बैठे।
जो पाना चाहते थे तुम, खोकर सोंचते रोते।।
मुश्किलें राह में होंगी,अगर मुँह मोड़ लोगे तुम।
हँसेगे राह के पत्थर, और कायर बनोगे तुम।।
चाहे कितनी मुश्किलें हों,अपनी तुम राह मत छोड़ो।
न देखो राह के काँटे,हों चाहे आग के शोले।।
रहे बस याद यह तुमको, कोई गुमराह न कर दे।
खिले जो फूल गुलशन के,उन्हें झंखाड़ न कर दे।।
भला क्या बिन तपाये आग में,सोना निखरता है।
गुजर कर मुश्किलों से ही,कोई मंजिल पकड़ता है।।
अरे तुम हो नये राही,नजर इतिहास पर डालो।
परिश्रम में सफलता है,यही तुम तर्क अपनालो। ।
बढ़ो तुम वेग से आगे,मन में संकल्प तुम कर लो।
छोड़ दो जिन्दगी का सुख,लक्ष्य पाने का दम भर लो।।
एक कछुआ निरन्तर वेग से, निज लक्ष्य पा जाता।
मगर ठहरे हुए खरहे का,घमण्ड उसे चूर कर जाता।।
हुनर कोई अगर तुममे,जरा है कामयाबी की।
दिखा दो सुनहरी रंगत, अपने कारनामों की।।
कोशिशें लाख तुम कर लो,अपनी कमियाँ छिपाने की।
न बगुला हंस बन सकता, करे कोशिश बनाने की।।
अगर है अहमियत तुममें,खुद को बेहतर बनाने की।
करो तुम काम भी वैसा,कोशिशें आजमाने की।।
- ममता
लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश
ममता जी हिंदी में परास्नातक हैं और इसके साथ अपने स्नातक में इनके पास संस्कृत और दर्शनशास्त्र भी रहा है और आपने शिक्षा शास्त्र में भी स्नातक किया है, इस तरह लोगों को जीवन और स्वयं को लेकर स्पष्टता देने हेतु इनके पास प्रासंगिक सामग्री होने का बोध उनकी रचनाओं से झलकता है।
आप एक शिक्षिका भी है बाल मन की एक बेहतर समझ भी है आप में।
आपकी रचनाएं पाठकों में स्पष्टता, सही काम को लेकर निरंतरता का भाव जगाने में सक्षम हैं।
आपके द्वारा रचित साहित्य, पाठकों को हर संघर्ष के लिए तैयार कर उन्हें एक संवेदनशील, जागरूक और उत्कृष्ट बनाएगा, ऐसा विश्वास है।
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शुभकामनाएं
"अब्बू हमें इस बार ईदी में गिफ्ट और पैसे नहीं चाहियें"। नौ वर्षीय सुहेल ने अपने अब्बा सेे कहा, तो रहमत खां हैरान रह गये।
" मेरे बच्चे,तुझे ईदी नहीं चाहिये, तो और क्या चाहिए,तू बता मुझे! तू कहे तो मैं तेरे कदमों में जन्नत ला कर रख दूं "।
रहमत मियां बेटे को गोद में उठा कर उसे प्यार से चूमने लगे।
सुहेल ठुनते हुए कहने लगा " नहीं अब्बू!! जन्नत नहीं, एक वादा चाहिये आपसे। और सुहेल की हां में हां मिलाते हुए सारे बच्चों ने भी शोर मचा दिया " हांं हमें वादा चाहिये, वादा "।
" कैसा वादा मेरे बच्चों"!! बताओ तो सही?
"अब्बू हमने सुना है कि खुदा पाक ने हजरत इब्राहिम से उनकी सबसे अज़ीज़ चीज़ कुर्बान करने के लिये कहा था और उन्होंने अपने बेटे को कुर्बानी के लिए पेश किया था।"
" हांs.. मगर इससे तोहफे का क्या रिश्ता है बच्चों?"
"अब्बू तब खुदा पाक ने खुश होकर उनके बेटे की जगह बकरा रख दिया था। क्या ये सच है अब्बू" ।
"हां ये सच है, तो तुम क्या चाहते हो"।
"अब्बू हम चाहते हैं कि आप भी अपने अज़ीज़ बच्चों को कुर्बानी पर रखें और खुदा पाक खुश होकरउसके बदले बकरा रख देंगे"।
बच्चों के मासूम सवाल से रहमत मियां कांप उठे।दोनों हाथ कानों पर रख लिये " ला-हौल-बिला-कुव्वत!! ये क्या बोल रहे हो!! कहीं ऐसा होता है भला! वो दौर और था बच्चो!यदि तुम्हें कुछ हो गया तो हम जीते जी मर जायेंगे। नहीं नहीं..."।
अच्छा!! बच्चों ने कुछ सोचते हुए कहा "तो फिर एक वादा करो कि इस बार आप मासूम जानवरों का खून नहीं बहाओगे, आप कुर्बानी के लिए आटे,गुड़, मिट्टी या कागज से बने बकरे को ही हलाल करोगे"
"हाँ ये बात मानली तुम्हारी!" कह कर रहमत खां ने राहत की सांस ली।
सुनीता त्यागी
राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद
ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com
आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |
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शुभकामनाएं
छ:साल की तान्या खेलते -खेलते खलिहान में पहुंच गयी ,जहां खेत की रखवाली करने के लिए बिरजू काका बैठे थे ।
"अरे ! गुड़िया आयी है!आ जा गुड़िया रानी....आ जा.. !का देख रही है!आ हमारी गोदी में आ जा !" "आ हम तुझे शहतूत देंगे मीठे मीठे"! मासूम तान्या लपक कर बिरजू काका की गोद में जा बैठी।
काका गुडिया को सहलाने लगे. ,. धीरे धीरे यहां वहां हाथ फिराने लगे । गुड़िया छोटी थी परन्तु उसके सर्प जैसे रेंगते हाथों के दूषित स्पर्श और विक्षिप्त मनो भावों को महसूस कर रही थी ।
"चाचा मुझे प्यास लगी है, " चाचा बहुत तेज से लगी है,"तान्या रुआंसी हो गई ।
"अच्छा! हम अभी लाते हैं करवे से ठंडा ठंडा पानी" कह कर बिरजू काका पानी लाने के लिए खड़े हो गए ।
तान्या अन्दर ही अन्दर कांप रही थी और किसी तरह उनके बाहुपाश से छूटना चाहती थी।
"नहीं चाचा ...मुझे तो घर जा कर गिलास से ही पानी पीना है"।
जब तक काका ने करवा उठाया, तान्या जान बचा कर वहां से घर की ओर दौड़ गयी।
स्पर्श के वो विषैले कांटे आज भी उसकी देह में चुभने लगते है।और उसकी पीड़ा को दिल में दबा लेती है
- सुनीता त्यागी
राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद
ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com
आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |
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शुभकामनाएं
सविता अपने बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सजग रहती थी। इसलिए वह सदैव उन्हें पौष्टिक भोजन ही कराती थी। सर्दी के मौसम में हल्दी युक्त दूध और विटामिन्स से भरपूर फल खाने के लिए देती और गर्मियों में आम का पन्ना और नींबू की शिकंजी देना न भूलती थी।
लेकिन उसका बेटा आयुष जब से टीनएजर हुआ है और नए स्कूल में जाने लगा है तभी से मित्रों के साथ पीजा - बर्गर, चाईनीज़, इटैलियन जैसे जंक फूड खाने लगा। अब उसे माँ के हाथों का बना खाना बेस्वाद लगने लगा था।
नतीजा यह हुआ कि आयुष की इम्युनिटी बहुत कमजोर हो गयी और आए दिन उसे नजला जुकाम रहने लगे। सुबह सोकर उठता तो उसे एक साथ बहुत सारी छींके आतीं और पूरे दिन नाक से पानी बहता रहता ।
अब यह उसकी रोज की बात हो गई थी।
कुछ महीने पहले आयुष गर्मियों की छुट्टियों में अपने मामा जी घर रहने गया। उसने देखा उसके मामाजी सुबह उठते ही गुनगुने पानी में सेंधा नमक डाल कर एक नली वाले लोटे की सहायता से नाक के एक छिद्र से पानी अन्दर पहुंचा कर दूसरे छिद्र से बाहर निकाल रहे थे।
उनके नजदीक खड़ा आयुष आश्चर्य से ये सब देख रहा था, और साथ ही छींकता भी जा रहा था ।
" मामाजी आप ये क्या कर रहे हैं"। उसने मामा जी से पूछा।
" बेटा ये जल नेति की क्रिया है, वही कर रहा हूं "
" मामा जी इसको करने से क्या लाभ होता है "।
, " बेटा यह नाक की सफाई करती है और सांस नली सम्बन्धी परेशानी, पुरानी सर्दी, दमा, सांस लेने में होने वाली समस्या को दूर करती है।
इससेआंखों में पानी आना और आंख में जलन की समस्या कम होती है। और यह कान, और गले को बीमारियों से भी बचाती है। सिरदर्द, अनिद्रा, सुस्ती में जलनेति करना फायदेमंद है।तुम्हें भी यह नित्य ही करनी चाहिए। "मामा जी ने विस्तार से जानकारी दी।"
परन्तु मुझे तो यह करनी आती ही नहीं
मामा जी"
" कोई बात नहीं मैं सिखाउंगा तुम्हें। क्यों कि यदि जल नेति गलत तरीके से कर ली जाये तो उससे हानि भी हो सकती है"
" कैसी हानि मामाजी" आयुष ने हैरानी से पूछा।
देखो बेटा यदि हम पानी को अधिक गर्म कर लेंगे या नमक अधिक डाल देंगे तो उससे हमारी नाक में जलन हो सकती है, नाक से खून भी आ सकता है। और यदि हमने नासिका के अन्दर से पूरा पानी बाहर नहीं निकाला तो कान नाक में दर्द भी हो सकता है। और यदि लोटा गंदा है तो संक्रमण भी हो सकता है, इसलिए इसे किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए "।
ठीक है मामाजी आप मुझे भी सिखाइये ये जलनेति"
" ठीक है बेटा"
अगले दिन से मामाजी लम्बी नलकी वाले दो लोटों में चुटकी भर नमक और एक लीटर हल्का गर्म पानी डाल कर ले आये फिर उन्होंने धीरे-धीरे आयुष को नली से नाक में पानी डालने का और बाहर निकलने का अभ्यास कराया।
आयुष जब तक उनके घर रहा तब तक उन्होंने आयुष को जलनेति की क्रिया कराई व उसको ठीक प्रकार से करने की सावधानियां भी समझायीं।
आयुष को अब इससे कुछ लाभ दिखाई देने लगा था तो वह स्वयं ही सुबह उठकर गुनगुने पानी में नमक डालकर जलनेति की क्रिया करने लगा तथा साथ में कपालभाति भी करने लगा।
देखते ही देखते कुछ महीनों में ही उसे छींकें आनी व नाक से पानी आना भी बंद हो गया, साथ ही जुकाम के कारण सिर में जो दर्द रहता था वह भी ठीक हो गया।
अब तो आयुष के घर में भी उसकी देखा देखी सभी लोग इस क्रिया को करने लगे। व मित्रों को भी जलनेति के फायदे समझाने लगे।
- सुनीता त्यागी
राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद
ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com
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शुभकामनाएं
लगभग, सबकुछ योगेन्द्र यादव सर ने कहा दिया, वीडियो देख लीजिए:
https://youtu.be/C2T153GAmKo?si=0DtS5GjmHKmr6E0G
शुभकामनाएं
लवकुश कुमार


संपादक की कलम से माता पिता को संबोधित
“ हर फूल सुंदर होता है यदि उसे ध्यान से देखा जाए “
“हर बीज मे पौधा और फिर पेड़ बनने की संभावना होती
है जरूरत है तो उसे सही परवरिश और माहौल उपलब्ध कराने की ”
बच्चे देश का भविष्य है, यही आगे चलकर शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, व्यापारी, वकील,
साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार, नेता, अधिकारी, वैज्ञानिक इत्यादि बनेंगे।
ये बच्चे आगे चलकर एक संवेदनशील इंसान बन सकें ताकि ये दूसरों की दिक्कतों को समझ सकें, सच
का साथ दे लोगों के साथ न्याय कर सकें, उसके लिए जरूरी है कि वो पहले एक विस्तृत सोच का
इंसान बने जो काबिल हो, जीविका आर्जित कर सकें अपने क्षेत्र में तथा अन्य लोगों और पेशों को
समझ सकें, उनके महत्व को जान सकें, अपने लिए अलग-2 क्षेत्रों के विकल्प ढूँढ सकें।
इसी उद्देश्य से इस पुस्तिका में साहित्यिक लेखों के साथ विज्ञान के तथ्य है जो बच्चों की सोच को
विस्तार देंगे और उनकी जिज्ञासा को बढ़ाकर उन्हें कार्य-कारण सिद्धांत से वैज्ञानिक चेतना की
तरफ अग्रसर करेंगे।
ऐसी शख्शियतों के नाम भी दिये गए हैं जिन्होने अपने काम के बल पर नाम कमाया और अपना
जीवन सफल बनाया ताकि बच्चे अपने सीमित दायरे से बाहर निकल इन महान लोगों के बारे मे
जान सकें और जीवन मे एक्सीलेन्स हासिल करने के लिए प्रेरित हो सके, ये भी हो सकता है कि
फिर बच्चे अन्य ऐसे महान लोगों के बारे मे जानने की जिज्ञासा व्यक्त करें |
“किसी काम को करते वक़्त, मिलने वाला आनंद ही वास्तव मे उस काम को करने का पुरस्कार है|”
पुस्तक से कुछ अंश :


शुभकामनाएं
-लवकुश कुमार
लेखक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से भौतिकी मे स्नातक और आई आई टी दिल्ली से भौतिकी मे परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं।
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
लेखक के विजन के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।
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एक बचपन का जमाना था,
जिस में खुशियों का खजाना था..
चाहत चाँद को पाने की थी,
पर दिल तितली का दिवाना था..
खबर ना थी कुछ सुबहा की,
ना शाम का ठिकाना था..
थक कर आना स्कूल से,
पर खेलने भी जाना था..
माँ की कहानी थी,
परीयों का फसाना था..
बारीश में कागज की नाव थी,
हर मौसम सुहाना था..
हर खेल में साथी थे,
हर रिश्ता निभाना था..
गम की जुबान ना होती थी,
ना जख्मों का पैमाना था..
रोने की वजह ना थी,
ना हँसने का बहाना था..
क्युँ हो गऐे हम इतने बडे,
इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था।
इसलिए चाहे सिर पर न हो बाल
तब भी जीवन जियो बच्चों सा धमाल
यदि है जीवन में कुछ उमंग
कुछ शौक, कुछ तरंग
लगते हो तब ही जीवित से
वरना लगे जीवन में है बैरंग
बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
- डॉ अनिल वर्मा
डॉ अनिल वर्मा, कृषि रसायन में परास्नातक हैं और गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर उत्तराखंड में कृषि रसायन पर शोध कार्य कर चुके हैं।
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बच्चों को इन महान विभूतियों के बारें में पढ़ायें और उन्हें गुणवान तथा उच्च आदर्शों वाला इंसान बनाये, फिर वो ना छोटी बातों पर परेशान होंगे और ना ही छोटी बातों में फंसेंगे, फिर उनके उद्देश्य भी बड़े होएँगे और उनके काम में उत्कृष्टता दिखेगी और साथ ही वो दूसरों की दिक्कत के प्रति संवेदनशील भी होंगे और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाकर सही और त्वरित निर्णय ले पाएंगे |
अच्छा हो कि इनकी जीवनी पर आधारित पुस्तकें एक डिस्प्ले रैक में लगा दें बच्चों के अध्ययन कक्ष में |

स्वयं भी पढ़ें और बच्चों के साथ प्रेरणादायक प्रसंग साझा करें |
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वीर दुर्गा दास - दुर्गादास एक ऐसे नायक थे, जिनका सारा कर्तृत्व, कर्तव्य और संपूर्ण जीवन परस्वार्थ, परसेवा और परोपकार की पवित्र वेदी पर बलिदान होता रहा । वे न राजा थे और न राजकुमार । न उनका कोई पैतृक राज्य था और न बाद में ही उन्होंने कोई भू-खंड अपने अधिकार में करके उस पर अपना राजतिलक कराया । जबकि उन्होंने अपने बाहुबल और बुद्धिबल से मारवाड़ को स्वतंत्र कराया, मुगलों से तमाम जागीरें छीन ली, दिल्ली के बादशाह औरंगजेब को नीचा दिखाकर आर्य धर्म की पताका ऊँची कर दी । |
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सुभाष चंद्र बोस - स्वाधीनता के पुजारी |
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दादाभाई नौरोजी -स्वाधीनता के मंत्र- द्रष्टा |
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जानकी मैया- समाज - सुधार और जनसेवा मे संलग्न |
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जमशेद जी टाटा - आर्थिक पुनर्निर्माण के अग्रदूत |
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द्वारकानाथ घोष - धन, मन और चरित्र के धनी |
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पंजाब- केसरी लाला लाजपत राय - भारतीय स्वाधीनता को करने में जिन शिल्पियों का आदरणीय योगदान रहा है, पंजाब- केसरी लाला लाजपत राय का अन्यतम स्थान है |
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स्वामी विवेकानन्द - धर्म और संस्कृति के महान उन्नायक |
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स्वामी रामकृष्ण परमहंस- युग चेतना के सूत्रधार |
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कार्ल मार्क्स - समानता के पक्षकार |
इन जीवनियों को आप किफायती लागत में गायत्री परिवार की वेबसाइट से भी प्राप्त कर सकते हैं |
फोन के प्रति आकर्षण कम करना है तो उससे भी आकर्षक या कम से कम उसके टक्कर की किसी चीज़ की व्यवस्था करें
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टॉल्स्टॉय- मानव जीवन के भाष्यकार |
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रानी दुर्गावती - स्वतंत्रता के लिए प्राण अर्पण करने वाली, युद्ध लड़ने वाली विरंगना |
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पंडित-मदन-मोहन-मालवीय : बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक |
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श्रीमती सरोजिनी नायडू - मातृभूमि की सच्ची सेविका |
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महारानी अहिल्याबाई - उदारता और महानता की प्रतिमूर्ति |
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स्वामी श्रद्धानंद - भारतवर्ष के प्राचीन आदर्श, गुरुकुल |
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कर्मयोगी केशवानंद - साधु- संन्यासियों |
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समर्थ गुरु रामदास - भक्ति और शक्ति के समन्वयी |
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वीर शिवाजी - शौर्य और धर्मनिष्ठा के प्रतीक |
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रवीन्द्र नाथ टैगोर - साहित्यिक ऋषि, नोबल पुरस्कार |
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गुरु गोविंद सिंह- भक्ति और शौर्य के अमर साधक |
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गणेश शंकर विद्यार्थी- त्याग और बलिदान के आराधक |
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देशबंधु चितरंजनदास - वकालत का अपूर्व आदर्श |
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श्री विश्वेश्वरैया - स्वावलंबन द्वारा उच्च शिक्षा • सार्वजनिक लाभ के निर्माण कार्य जन जीवन में शिक्षा की महत्ता • राष्ट्रीय चरित्र का विकास, कैसा भी अवसर क्यों न हो, मनुष्य को अपना स्तर नहीं घटाना चाहिये ।। ऊँचा स्तर रखने से उसका प्रभाव अच्छा ही पड़ता है और आज नहीं तो कल लोग उसकी तरफ आकर्षित होते ही हैं |
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राजा राम मोहन राय - एक ब्रह्मोपासना का प्रचार उन्नीसवीं सदी का समय भारतवर्ष के इतिहास में महान् परिवर्तनों का था |
इन जीवनियों को आप किफायती लागत में गायत्री परिवार की वेबसाइट से भी प्राप्त कर सकते हैं |