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अनसोचा राउंड (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

"आपको इतने ढेर सारे पुरस्कार, मेडल मिले हैं इस खेल में। आप पर बायोपिक बन गई।"
मैंने उस खिलाड़ी से पूछा, "अब आगे आपके क्या सपने हैं?"

"सपने!" सोचते हुए उपेक्षित खेल की वह अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी, बोली, "सपना तो एक ही दिखता है अब। काश, मैं सुंदर होती और बजाय खिलाड़ी के फिल्म एक्ट्रेस होती" बोलते हुए उसने उत्तेजना से हवा में अपना मुका तो लहराया लेकिन उसके चेहरे की चमक फीकी पड़ गई और पीछे शेल्फ में रखे, उसे मिले ढेरों स्मृति चिन्ह भी द्युतिहीन लगने लगे, "क्योंकि मुझे तो इस खेल से कुछ विशेष नहीं मिला, आज भी मामूली नौकरी करती हूँ, लेकिन मेरे खेल जीवन पर जब फिल्म बनी तो उसमें मेरा किरदार निभाने वाली अभिनेत्री ने बहुत कमा लिया।"

© संतोष सुपेकर (लघुकथा संग्रह - प्रस्वेद का स्वर से साभार )

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


संतोष सुपेकर जी,  1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | (लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें )


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ताले, बिना चाभी वाले (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

"एँ! ये कैसा ताला?" सस्ता ताला खरीदने पटड़ी की एक दुकान पर गया और एक ताले को जब हाथ में लिया तो चौंक गया मैं, "दवाओ तो बन्द। और हाथ से खींचो तो खुल जाए? बिना चाभी के ही? ये कैसा ताला है भाई?"

"अरे वो आप छोड़ दो साब।" दुकानदार खिसियाता सा बोला, "वो ढेर मत देखो। वो माल भी आपके लिए नहीं है।" और उसने बाई तरफ इशारा किया, "आप इधर वाले ताले देखो। ये हैं आपके लिए।"

"पर ये खराब ताले..? यहाँ रखे ही क्यों हैं? ये भी बिकते हैं क्या?"

"हाँ बिल्कुल बिकते हैं साब। पीछे वाले रोड़ पर गाँव से आए हुए मजदूरों की कच्ची बस्ती बनी है। वो ही ले जाते हैं ये बिना चाभी के ताले! उनकी जिंदगी में गम के बड़े बड़े ताले तो हैं पर खुशियों की छोटी सी चाभी नहीं।"

"अरे वा! तुम तो फिलॉसॉफर हो।" मैं कुछ गम्भीर तो हुआ लेकिन फिर हँस पड़ा, "पर ये ताले तो खुल जाते हैं बिना चाभी के ही? फिर इनका मतलब ही क्या?"

"उनको मतलब है साब।" दुकानदार का स्वर जैसे किसी गहरे कुएँ से आता लगा तो अब मेरी हँसी भी कुएँ में गिरी किसी अंगूठी सी गायब हो गई, "बो गरीब काम पर जाते हैं तो ऐसे ही टूटे तालों को लगाकर। उनके पास ऐसा होता ही क्या है जो एक चोर के पास नहीं हो?"

- संतोष सुपेकर (लघुकथा संग्रह - प्रस्वेद का स्वर से साभार )

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


संतोष सुपेकर जी,  1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | (लेखक के बारे मे विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें )


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खामोश ! (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

"बेटा, तुम वैज्ञानिक तो बनना चाहते हो।' पीटीएम (शिक्षक-पालक बैठक) में उस नए शिक्षक ने एक साधारण से लड़के से कुछ व्यंग्य से पूछा, "पर ये तो सोचा होगा कि बनाओगे क्या, अविष्कार किस चीज़ का करोगे?"

"मैं, मैं.. वह इंस्ट्रूमेंट बनाना चाहता हूँ" अपनी माता की ओर देखते, गोलीबारी में मारे गए व्यक्ति के दस वर्षीय पुत्र का जवाब था, "कि... कि "खामोश" कहते ही, बन्दूकें, तोपे, रिवॉल्वर सब, सहम कर हो जाएँ, खामोश!''

 

- संतोष सुपेकर (लघुकथा संग्रह - प्रस्वेद का स्वर से साभार )

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


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स्पीड ब्रेकर (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

"अरे डॉक्टर साहब, आज कार कहां है?" परिचित डॉक्टर सुमित उसके ऑटोरिक्शा में बैठे तो पूछ लिया उसने.

"वो तो अभी रिपेयर में ही है. छोड़ो यार वो किस्सा.. वैसे नरेन, यह तुम अच्छा करते हो." विषय बदलते हुए डॉक्टर साहब ने कहा, "मैंने पढ़ा है अखबार में तुम्हारे बारे में."

"क्या सर?"

"अरे यही कि किसी बूढ़े, गरीब आदमी से रिक्शे का भाड़ा नहीं लेते."

"हऽऽम"

"क्या हुआ भाई, सीरियस क्यों हो गए?" डॉक्टर ने संभलकर पूछा.

"डॉक्टर साहब एक बात कहूं." उसमें न जाने कैसे हिम्मत आ गई, "आप भी कुछ अच्छा करिये ना"

"मतलब? व्हाट डू यू मीन?"

"सर, मैं भी आपका मरीज रहा हूं. आप हर मरीज से सात सौ रुपए फीस लेकर उसे सिर्फ दस मिनट देखते हैं. भगवान ने बहुत कुछ दिया है आपको."

चिकनी सड़क पर सरपट भागते ऑटोरिक्शा को अचानक स्पीड ब्रेकर का झटका लगा, "आप भी ऐसा करिये न, हर महीने में किसी एक दिन, सिर्फ एक दिन, मरीजों को फ्री देखिए न!"

- संतोष सुपेकर

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


सुपेकर जी, वर्षों से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं और आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमे कुछ हैं- सातवें पन्ने की खबर, प्रस्वेद का स्वर इत्यादि )


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जीवनसाथी - सौम्या गुप्ता

आज आपने फिर से चाय में चीनी ज्यादा कर दी, कितनी बार कहा है कि कम चीनी की चाय पिया करो.......मीनू ने गुस्से में फिक्र के कारण कहा।

लेकिन प्रेम ने पहले के अंदाज में मुस्कराते हुए उत्तर दिया....मुझे कुछ भी नहीं होगा तुम हो न मेरा ख्याल रखने के लिए, फिर मेरे लिए इतने व्रत भी तो करती हो।

मीनू का गुस्सा शांत हो जाता है और वो बोलती है शादी को 25 साल हो गये पर आपका उत्तर और अंदाज बिल्कुल भी नहीं बदला|

प्रेम ने मुस्कुराते हुए मीनू को एकटक निहारते हुए कहा.....मेरी रोज की आदत पर आज भी तुम मुझे पहले की तरह डांटती हो तुम भी कहाँ बदली हो मीनू?

दोनों ने चाय का कप हाथ में लिया और बालकनी की तरफ़ चल दिये, वहां पहुंचकर प्रेम ने मुस्कुराते हुए पूछा, मीनू हमारे साथ में या हमारे प्रेम में ऐसा क्या था कि हम आज भी पहले की तरह ही है, जैसे शादी के तुरंत बाद थे ?

मीनू ने कहा...आपने मुझे कभी बाँध के नहीं रखा,  मेरी स्वतंत्रता का सम्मान किया....मुझे और मेरे घर वालों को अपने ही परिवार की तरह समझा...इससे मेरी नजरों में आपका सम्मान बहुत बढ़ गया....आपने हमेशा मुझपर विश्वास किया....मेरी जॉब के लिए भी मुझे माहौल दिया.....रोज कुछ न कुछ वक्त हम साथ बिताते हैं |

प्रेम ने कहा हाँ जैसे अभी बिता रहे है....तुम मेरी सुख-दुख की सबसे ख़ास साथी हो...मैंने वहीं किया जो हर पति को करना ही चाहिए....विश्वास, प्रेम और सम्मान ही तो रिश्ते की नींव होते है 

मीनू कहती है, हाँ आप सही कह रहे है हम दोस्त बनकर ही ज्यादा रहे है और अपेक्षाओं का भारी पुलिंदा भी नहीं रखा इसीलिए आज भी हम बेस्ट फ्रेंड हैं, प्रेम में जरूरी है कि हम एक दूसरे को आत्म उन्नती की ओर भी ले जाए,  एक दूसरे के बिना भी हम खुश रह सके, हमारे रिश्ते में डर न हो,....आपने मुझे इस बात में भी सहायता की और स्वतंत्र चेतना समझा....लोगों के जैसी आपके मन मे स्त्री के प्रति पुरानी सामंतवादी सोच भी नहीं थी

प्रेम अपने अंदाज में फिर कहता है, मीनू तुम्हारा जैसा रुख था जीवन में गरिमा, आत्मनिर्भरता और उत्कृष्टता पाने का मैंने बस तुमको वैसा जीवन जीने दिया है, स्त्री और पुरुष दोनों स्वतंत्र चेतना ही है बस सृष्टि के संचालन के लिए  कुछ अन्तर है।

मजाक करते हुए प्रेम कहते हैं, वैसे एक बात और पूछनी है मेरी प्यारी मीनू से, बेस्ट फ्रेंड के बाद बॉय फ्रेंड बनने का भी चांस है क्या ? और हंसने लगते हैं 

मीनू, आप नहीं सुधरने वाले ! हाँ क्यों नहीं....रिश्ता लेकर घर कब आओगे?

फिर दोनों हँसते हुए अपनी चाय खत्म करते हैं |

मीनू और प्रेम साथ मिलकर अपना और बच्चों का लंच पैक करके निकल जाते है अपने-अपने काम पर। 

 

- सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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ख़ुशी - एक लघुकथा

कितनी सोंधी खुशबू आ रही है, लंबी सी सांस खींचकर, सोंधेपन को महसूस करते हुये साधना ने कहा,

हाँ सच्ची कुछ देर पहले ही बूंदा बांदी हुई है गर्म धरती की प्यास का इलाज, खिलखिलाते हुए अमृता ने जवाब दिया जो कि इसी गांव शांतिपुरी की रहने वाली है और अपनी कॉलेज फ्रेंड साधना को स्कूटी पर अपना गांव घुमा रही है|

लो आ गया हमारा शिव मंदिर और वो रही गौला नदी, अमृता ने मुस्कुराते हुए कहा, साधना की आंखों में भी चमक थी, मंद मंद ठंडी हवा, दूर तक दिखता क्षैतिज और फिर पेड़ों की कतार, जैसे कि सोच को विस्तार देने को कह रहे हों।

दोनों मंदिर के प्रांगण में बनी सीमेंट की बेंच पर बैठ जाती हैं। अमृता पहला सवाल दागती है: और साधना तुम फोन पर कुछ कह रही थी कि बहुत कुछ नया सीख रही हो, आओ अब आमने-सामने बात करते हैं, मुझे भी सिखाओ कुछ नया और इतना कहका अमृता अपनी अमर हंसी हंस देती है खिलखिलाकर, यूं की आस पास के मुरझाते फूल भी उसकी खिलखिलाहट से ऊर्जा समेट दुबारा खिल उठने को ललक उठें|

साधना भी अपने धीर और सौम्यता से भरे स्वभाव के अनुरूप मुस्कुराकर अपनी सहेली को उसके नाम से पुकारकार उसकी खिलखिलाहट की तारीफ करने से बिना चूके सधी हुयी आवाज मे कहती है कि देख अमृता मै तुझसे कुछ ऐसा साझा करना चाहती हूँ जो लोग कभी सालों-साल नहीं जान पाते,

अब ये तो संगति और पसंद की बात है कि मुझे सही समय पर ये बातें पता चल गईं|

अरे लेखिका महोदया क्या सीख लिया, अब बताओ भी, ज्यादा न तड़पाओ, अमृता ने बीच मे टोंकते हुये कहा और फिर वही खिलखिलाहट वाली हंसी|

अरे बताती हूँ मैडम, साधना ने मुस्कुराते हुये अपनी बात फिर शुरू की: मैंने पिछले कुछ महीनों से उपनिषद् गंगा सीरियल के कई एपिसोड देखे हैं,जो कुछ मिला वो अब कहे देती हूँ;

मैंने कई बार सुना है कि खुशी, आनंद ये सब अंदर से महसूस किया जा सकता है, और अब मुझे भी बहुत से बाहरी कारण नहीं ढूँढने पड़ते, बाहर बहुत सी गड़बड़ होने पर अंदर खुशी ही रहती है। एक अद्भुत चीज जो मैंने अनुभव की कि खुशियों की मांग जब हम बाहरी चीजों से करते हैं तो खुशियाँ नहीं मिलती लेकिन अंदर से आनंदित हो तो बाहर भी सबसे प्यार, स्नेह मिलता है।

उपनिषद् गंगा स्वयं को जानने का एक बहुत अच्छा साधन है। एक एपिसोड डेली, अंदर के इतने सारे प्रश्नों के उत्तर दे सकता है, ये अकथनीय अनुभव है। मेरे बचपन के जो प्रश्न थे, वो बहुत सारे सुलझ गए।

खिलखिलाने वाली अमृता अब शांत थी और पूछती है कि कुछ खुलकर बताओगी इंटेलिजेंट लेडी, मेरा मतलब है कि बाहरी चीजों से स्थायी ख़ुशी क्यों नहीं मिलती?

ओके बताती हूँ, साधना फिर अपनी बात शुरू करती है: बाहरी चीजों से स्थायी खुशी इसलिए नहीं मिलती क्योंकि यह सतही होती है और बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर करती है। जब हम अंदर से खुश होते हैं, तो हम अपने काम को अच्छे से अंजाम देते हैं और उत्कृष्टता पाते हैं जो अपने आप मे ही एक टिकाऊ आनंद देने वाली बात है और जब हम अंदर से आनंदित रहते हैं तो आस पास मुस्कुराकर अच्छे से पेश आते हैं नतीजा हमारे आस पास के लोगों के व्यवहार पर भी इसका प्रभाव पड़ता है और आस पास के लोगों का व्यवहार भी खुशनुमा हो जाए इसकी संभावना बढ़ जाती है और नतीजा हमें प्यार और स्नेह मिलता है।

आंतरिक खुशी आत्म-जागरूकता, संतोष और आत्म-प्रेम से आती है, जो बाहरी दुनिया से मिलने वाली क्षणिक खुशियों से कहीं अधिक स्थायी होती है।

वाह मोहतरमा वाह, क्या बात कही है तुम्हारी बात सुन बादल भी बरसकर तुम्हारा आलिंगन करना चाहते हैं, यह कहकर अमृता फिर खिलखिला उठती है|

अरे बादलों से तो मेरा वैसे ही नजदीकी रिश्ता है, मेरा एक दोस्त मौसम विज्ञान विभाग मे जो है, साधना भी अमृता की तरह ही खिलखिला रही थी बारिश की फुहार को अपने चेहरे पर महसूस करते हुये |

 

- लवकुश कुमार


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अभिव्यक्ति - एक लघुकथा

अरे रंगोली, कैसी हो?, प्रेम ने अचानक बस स्टॉप पर अपनी ग्रेजुएशन की बैचमेट को देखते हुये खुश होकर आवाज देते हुये कहा|

ओ हाय... प्रेम, मै बढ़िया तुम कैसे हो ? यहाँ कैसे ? अच्छा तुम तो केंद्र सरकार के किसी विभाग मे कार्यरत हो न ? रंगोली ने भी खुशी और आश्चर्य से भरे हुये चेहरे के साथ सवालों की झड़ी लगा दी|

मै भी एकदम अच्छा हूँ, रंगोली, महत्व दर्शाने के लिए नाम ओर ज़ोर देते हुये प्रेम ने जवाब दिया, हाँ यहीं पंतनगर मे पोस्टेड हूँ, तुम यहाँ कैसे? तुम भी तो किसी प्रशासनिक कार्यालय मे हो? इधर ? कहाँ जा रही हो ?

वाउ ग्रेट, सो क्लोज़ टू ब्यूटीफुल नैनीताल !, रंगोली मुस्कुराकर जवाब देते हुये, हाँ मै भी बरेली पोस्टेड हूँ नैनीताल जा रही हूँ घूमने और तुम कहाँ जा रहे हो ?

बहुत बढ़िया, मै हल्द्वानी आया था किसी काम से, काम तो हुआ नहीं वापस जा रहा हूँ, अच्छा हुआ तुम मिल गयी हल्द्वानी आना सफल हो गया, दोनों एक साथ हंसने लगते हैं | चाय पियोगी, नैनीताल की बस अभी रुकेगी कुछ देर, प्रेम आग्रह करता है |

क्यों नहीं ! ऐसे मौके कम ही आते हैं, रंगोली ने मुस्कुराते हुये जवाब दिया| दोनों पास की एक चाय की गुमटी से चाय लेते हैं |

हल्द्वानी की ठंड के बीच कडक चाय की चुस्की के साथ रंगोली पूछती है और सुनाओ प्रेम क्या चल रहा है आजकल ?

दो ही काम, नौकरी और लेखन, सामाजिक मुद्दों, शिक्षा और भ्रष्टाचार पर, रिएक्शन की अपेक्षा करते हुये प्रेम रंगोली को देख जवाब देता है|

बढ़िया, लेकिन सरकारी सेवा मे होकर भी भ्रष्टाचार पर लिखते हो ! डर नहीं लगता है ? रंगोली आश्चर्य के साथ पूछती है|

नहीं डर किस बात का, जैसे हम अपने आस पास की हवा/मिट्टी को शुद्ध करने के लिए लिखते बोलते हैं क्योंकि वो एक जरूरी काम है वैसे ही भ्रष्टाचार पर लिखना और बात करना भी जरूरी है क्योंकि हम सब उससे प्रभावित हैं, ये किसी एक सरकार या एक देश की समस्या नहीं, ये तो समाज की समस्या है, सरकार में लोग समाज से ही आते हैं, न तो हमारे बात न करने से भ्रष्टाचार खत्म होगा और न केवल कड़ी सजा से, इसके लिए लोगों की समझ पर काम करना होगा, जो लोग बीमार होकर मर जाने या अथाह पैसे के बिना सामाजिक प्रतिष्ठा ने मिलने के डर या दबाव मे रहते हैं या जो जीवन की अनिश्चितता के सत्य को स्वीकार नहीं करना चाहते वही डर और लालच मे भ्रष्ट आचरण करते हैं, मै फिर दोहराता हूँ ये केवल सरकार की नहीं समाज की और मानव मन की समस्या है |  जो इंसान मन से उत्पीड़क है, अज्ञानी है वो हिंसक भी होगा और भ्रष्टाचारी भी, फिर वो न धरती की परवाह करेगा न पानी, पेड़ और इंसान की |

रही बात सरकारी सेवा मे होने की तो इससे मेरी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं जाती, समाज के हित मे जरूरी मुद्दों पर विचार और राय व्यक्त करना हर जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है, बशर्ते इससे आपके कार्यालयी कार्य/दायित्व प्रभावित न हो, और फिर मेरी शिक्षा और चेतना मुझे इस बदलते हुये समाज के सामने मूक दर्शक बने रहने या लोगों की प्रतिक्रिया से डरकर अपनी बात न रखने की सीख नहीं देती |

प्रेम की गहरी बातें सुन, रंगोली अपनी समझ पर पुनर्विचार करने को विवश हो जाती है|

हॉर्न बजता है, बस चलने को तैयार हो चुकी थी, दोनों दोस्त बेहतर स्पष्टता की खातिर आगे की चर्चा और संपर्क के लिए अपने मोबाइल नंबर साझा करते हैं..............

 

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थ्रिल - एक लघुकथा

निसीथ, धीमे चला भाई सड़क पर और लोग भी हैं, और देख सामने मार्केट भी है, अनुभव ने डरते हुये निसीथ से बाइक की स्पीड कम करने को कहा |

देख भाई मुझे चाहिए थ्रिल लाइफ में और फिर ये तो हाइवे है मैं क्यों धीमी करूँ बाइक, निसीथ ने लापरवाही से जवाब दिया |

धड़ाम!!!  निसीथ ने इतने मे ही एक अधेड़ को टक्कर मार दी थी  जिसके हांथ से सीरप की शीशी गिरकर फूट गयी थी, अधेड़ के घुटनों से निकला खून और सीरप सड़क पर अपना रंग छोड़ चुके थे 

कुछ लोगों ने दोनों लड़कों को उठाया और कुछ ने उस अधेड़ आदमी को, चोट पीछे बैठे अनुभव को भी आई थी इसीलिए वो अपने साथी को गाली बकते हुये कह रहा था, "अबे गधे मना किया था न कि धीमे चल ये मार्केट एरिया है, तुझे थ्रिल ही महसूस करना है तो कोई बड़ी चुनौती वाला काम क्यों नहीं पकड़ता जीवन मे  ये बाइक को ओवरस्पीड चलाकर खुद की और दूसरों की जान क्यों लेने पर तुला है!, देख इस आदमी के हांथ मे दवाई थी, तेरे थ्रिल के चक्कर मे इसकी तो ......................."

-लवकुश कुमार



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मधुरिमा, चेतन और करप्सन - एक लघुकथा 

आओ इधर बैठते हैं, चेतन ने अपनी मंगेतर मधुरिमा को सिटी व्यू साइड की  टेबल की तरफ इशारा करते हुए कहा और दोनों बैठ गए अपनी-अपनी कुर्सी पर, यह रेस्तरां अपने विंडो साइड व्यू के लिए मशहूर था शहर में, खिड़की से बाहर नीचे हरे भरे पेड़ और सामने रेजिडेंशियल काम्प्लेक्स के ऊँचे ऊँचे टावर|

आये थे दोनों साथ में शुकून के पल बिताकर मेमोरी बनाने लेकिन इसी बीच चेतन जोकि एक सिविल इंजीनियर था राज्य सरकार में, चेतन बैठे ही थे कि उनके फोन में एक न्यूज़ पॉप होती है कि आसाम की एक महिला प्रशासनिक अधिकारी के घर से करोड़ों नकद कैश और करोड़ों की ज्वेलरी बरामद हुयी, वह महिला अधिकारी पिछले कुछ महीनो से विजिलेंस की निगरानी में थी |

चेतन ये खबर पढ़कर व्यथित सा हो गया , उसका उतरा सा चेहरा देखकर उसकी मंगेतर मधुरिमा जोकि पेशे से एक शिक्षिका है, सौम्यता से पूछती है, "क्या हुआ आपको, कोई दिक्कत ? ", "इज एवरीथिंग फाइन ?"

चेतन ने उसी व्यथित मन से कहा कुछ ख़ास नहीं, ये तो अक्सर का हो गया है, जब-तब खबर आ ही जाती है कि फलां अधिकारी के घर करोड़ों का कैश और ज्वेलरी बरामद हुयी!

ऐसी कौन सी मजबूरी, लालच या डर है कि लोग रिश्वत लेने से नहीं रोकते खुद को, मुझे तो कोई कारण नज़र नहीं आता, चेतन चिंता कि अवस्था मे बोला क्योंकि उसे ये बात पता थी कि रिश्वत के सिस्टम से लोगों को अवसर मिलने मे असमानता पैदा होती है और मेरिट किनारे हो जाती है साथ ही समाज मे ओवर-आल गुणवत्ता घटती है|
मधुरिमा मुस्कुराते हुये अपने दार्शनिक अंदाज में कहती है कि इनके अंदर का खालीपन इनसे भौतिक चीजों को इकट्ठा करके इन्हे भ्रम मे डलवाता है कि इससे इनके अंदर का खालीपन भर जाएगा या फिर उन्हे लगता है कि जल्दी और ज्यादा पैसे बनाकर वो समाज के लोगों से ज्यादा इज्ज़त पा लेंगे और अंदर कि बेचैनी मिट जाएगी हालांकि मिटती नहीं क्योंकि दुनिया के लोग भी तो चालाक है जब तक स्वार्थ रहता है तब ही तक मान देते हैं, किसी को लगता है कि कोई बड़ी बीमारी न हो जाए उसके लिए अनैतिक तरीके से पैसे इकट्ठे करते हैं, मौत और अकेलेपन से इतना डरते हैं एक से के घृणित कार्य करते हैं और जीना ही भूल जाते हैं, कोई वास्तविक रोमांच नहीं रह जाता, कोई पैसा इकट्ठा करने मे लगा है तो कोई प्रेस्टीज़, और तो और दबाव और डर मे जी रहे  दूसरों को भी तकलीफ देते हैं, गलत उदाहरण बनते हैं, ऐसे लोगों के लिए  तरस और घृणा की  भावना के साथ मधुरिमा  व्यंगात्मक मुस्कान देती है, चेतन कुछ रिलैक्स महसूस करता है जवाब पाकर, देर से ही सही बैरा आता और कहता है कि सर स्टार्टर मे क्या लेंगे ?

-लवकुश कुमार



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प्रतीक्षा - एक लघुकथा

और अनुपमा, कैसी हो ? साधना ने अपनी सहेली के हास्टल के कमरे में घुसते ही पूछा।

ठीक हूं यार, तू बता कैसी है और कैसे हैं मेरे होने वाले जीजा जी, साधना का हांथ पकड़ते हुए आंखों में एक चमक और चेहरे पर ठिठोली का भाव लाते हुए, अनुपमा ने भी सवाल दाग दिया।

वो भी ठीक हैं ( चेहरे पर लालिमा और मुस्कुराहट के साथ ), उनका तबादला बनारस हो गया है और आज ही वो बिजनौर के कार्यालय से रिलीव भी हो गए हैं, साधना ने जवाब दिया, पापा कह रहे थे कि मेरे फाइनल सेमेस्टर के एग्जाम के तुरंत बाद सगाई और नवंबर में शादी!

अब जल्द ही मेरा अकेलापन दूर हो जाएगा, साधना खिलखिलाते हुए बोली।

नहीं प्यारी, अकेलापन दूर नहीं होगा बस दब जायेगा, अनुपमा ने मुस्कुराते हुए आध्यात्मिक ज्ञान का साझा किया |

अकेलापन दूर होता है जब हम किसी बड़े काम में लगते हैं, ऐसा काम जो हमें हमारी उच्चतम संभावनाओं तक ले जाए, अनुपमा ने आगे समझाया |

तो तू कब ढूंढ रही है कोई जो तुझे तेरी उच्चतम संभावनाओं तक ले जाए, साधना ने कुछ खीझकर कहा।

प्रतीक्षा में हूं कि कब कोई मिलेगा ऐसा, जल्दबाजी में मैं किसी ऐसी गाड़ी में नहीं बैठना चाहती जिसमें मुझे खुद ही धक्का लगाना पड़े, इससे बेहतर है कि मैं पैदल ही चलती रहूं, अनुपमा ने गहरी सांस भरते हुए कहा।

- लवकुश कुमार

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