यह लेख पढ़ते समय यदि आपको असहजता महसूस हो, तो यह असहजता व्यर्थ नहीं है, यह वही बेचैनी है, जो तब होती है जब कोई हमें आईना दिखा देता है।
हम अक्सर समाज, व्यवस्था और लोगों को दोष देते हैं, पर यह देखने से बचते हैं कि कहीं हम स्वयं ही उस गलत का हिस्सा तो नहीं बन रहे, जिसका रोना रोज़ रोते हैं।दुनिया ऐसे लोगों से भरी पडी है जो वही पढ़ते हैं जो उन्हें सोचने से बचाए, वही सुनते हैं जो उन्हें हँसाकर टाल दे और वही देखते हैं जो उन्हें ज़िम्मेदारी से दूर रखे। फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि समाज बदल जाए, विचार ऊँचे हो जाएँ और लोग ईमानदार बन जाएँ। यह कैसी उम्मीद है, जो गलत को ताकत देकर सही से की जाती है?
जो लोग सच बोलते हैं, कठिन सवाल उठाते हैं और हमारी सुविधाजनक सोच को चुनौती देते हैं, उन्हें हम अनदेखा कर देते हैं। उन्हें उबाऊ, नकारात्मक या अव्यावहारिक कहकर किनारे कर दिया जाता है, पर जो लोग हमें बहलाते हैं, हमारी सोच को सुन्न करते हैं और भीड़ के स्वाद के अनुसार परोसते हैं, उन्हें हम सर आँखों पर बिठा लेते हैं। क्या यह चयन हमारी मानसिकता को उजागर नहीं करता?
हम शिकायत करते हैं कि आज कोई अच्छा नहीं लिखता, कोई ईमानदार नहीं रहा और कोई बदलाव नहीं चाहता। जबकी इसके ही समान्तर एक और सच्चाई यह है कि जब कोई सच में ईमानदारी से लिखता है या बदलाव की बात करता है, तो उसे पढने वालों कि संख्या कम ही मिलती है, क्योंकि ऐसा लेखन हमें कठघरे में खड़ा करता है, और खुद से सवाल करना हमें सबसे ज़्यादा असहज करता है।
हम गलत लोगों से सही काम की उम्मीद इसलिए करते हैं क्योंकि यह आसान है। खुद खड़े होना कठिन है, खुद बोलना जोखिम भरा है और खुद कुछ अलग करना असुविधाजनक है। इसलिए हम भीड़ में सुरक्षित रहना पसंद करते हैं।
वही भीड़ जो गलत को लोकप्रिय बना सकती है और फिर कहती है कि नेता खराब हैं, लेखक बिक गए हैं या व्यवस्था में खामियां आ गई हैं|
व्यवस्था की खामियों की तरफ इशारा करने वाले लोगों में अधिकतर, उसी व्यवस्था को रोज़ मज़बूत भी तो कर रहे हैं!
"हम जिन विचारों को समर्थन देते हैं, जिन लोगों को आगे बढ़ाते हैं और जिन बातों पर चुप रहते हैं, वही समाज की दिशा तय करती हैं।"
फिर भी हम अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से बचते हैं।
हम दोहरे मानक वाला इंसान नहीं कहलाना चाहते, पर सच यह है कि हम में से ज्यादातर सुविधावादी हो चुके हैं। और सुविधावाद धीरे-धीरे समाज की आत्मा को खोखला कर देता है। अमूमन लोग सही का साथ तभी देते हैं, जब उसमें हमें कोई असुविधा न हो।
यदि सच में बदलाव चाहिए, तो पहले यह देखना होगा कि हम किसके साथ खड़े हैं, किसे पढ़ रहे हैं और किस चुप्पी को हम समझदारी समझ रहे हैं।
क्योंकि गलत का साथ देकर सही की उम्मीद करना, समाज के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है।
यदि यह लेख आपको चुभा हो, तो इसे नज़र अंदाज़ मत कीजिए, संभव है, यही चुभन उस बदलाव की शुरुआत हो, जिसकी बात हम हमेशा दूसरों से करते आए हैं।
- सोनम वर्मा
सीतापुर, उत्तर प्रदेश
उदीयमान लेखिका एवं कवयित्री सोनम वर्मा जी, इतिहास, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक हैं और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर| शैक्षिक कार्यों के उद्देश्य हेतु बी.एड. किया तथा वर्तमान में एम.एड. में अध्ययनरत हैं|
आपको सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन में विशेष रुचि है| सामाजिक सरोकारों के साथ ही शैक्षिक एवं मानवीय विषयों पर लेख एवं कविताएँ लिखना आप अपना शैक्षिक दायित्व समझती हैं|
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शुभकामनाएं
अक्सर लोगों को बात करते सुना है कि " दान तो हम भी करते हैं लेकिन बताते नहीं फिरते या वाट्सऐप स्टेटस नही लगाते! "
आज के बदलते परिदृश्य में जब आम इंसान स्व केंद्रित होता जा रहा और उसकी व्यक्तिगत चाह और आवश्यकताएं इतनी बढ़ती जा रही हैं कि दूसरों की तकलीफ़ या सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए उसके लिए समय, पैसा या अन्य संसाधन निकाल पाना मुश्किल होता जा रहा है, तब ऐसी हालत में किसी इंसान की व्यक्तिगत मदद में उसकी गोपनीयता का सम्मान करते हुए, अन्य संस्थागत मामलों में सामाजिक सरोकार के किए गए कार्यों का निस्वार्थ प्रचार एक निंदनीय नहीं सराहनीय कार्य है, इससे अन्य लोग प्रेरित होंगे और अपने व्यक्तिगत समस्याओं के निवारण के साथ सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए भी प्रयत्न करेंगे, यथा: रक्तदान, श्रमदान, संस्था को वित्तीय मदद, वस्त्रदान इत्यादि।
- आरती
लेखिका संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी साथ ही सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रहित के मामलों पर चिंतन उनकी दिनचर्या की प्राथमिकताओं में शामिल है।
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दिव्यांम के जन्मदिन पर गिफ्ट में आए ढेर से नई तकनीक के इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों में कुछ को दिव्यम चला नहीं पा रहा था घर के अन्य सदस्यों ने भी हाथ आजमाइश की लेकिन किसी को भी सफलता नहीं मिली तभी कामवाली बाई सन्नो का 11 वर्षीय लड़का किसी काम से घर आया सभी को खिलौनों में बेवजह मेहनत करता देख वह बड़े ही धीमे में व संकोची लहजे में बोला -
'आंटी जी ! आप कहें तो मैं इन खिलौनों को चला कर बता दूं' पहले तो मालती उसका चेहरा देखती रही फिर मन ही मन सोच रही थी कि इसे दिया तो निश्चित ही तोड़ देगा फिर भी सन्नो का लिहाज कर बेमन से हां कर दी और देखते ही देखते मुश्किल खिलौनों को उसने एक बार में ही स्टार्ट कर दिया सभी आश्चर्यचकित थे , मालती ने सन्नो को हंसते हुए ताना मारा -
' वाह री सन्नो ! तू तो हमेशा कहती है पगार कम पड़ती है और इतने महंगे खिलौने छोरे को दिलाती है जो मैंने आज तक नहीं खरीदे '
इतना ही सुनते ही सन्नों की आंखें नम हो गई उसने भरे गले से कहा- ' मैडम जी ! यह खिलौनों से खेलता नहीं बल्कि खिलौनों की दुकान पर काम करता है।'
- मीरा जैन
उज्जैन मध्य प्रदेश
अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।
पता
516 साईं नाथ कॉलोनी,सेठीनगर
उज्जैन ,मध्य प्रदेश
पिन-456010
मो.9425918116
jainmeera02@gmail.com
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आज से कुछ समय पहले पापा और उनके मित्र धर्म, राजनीति, समाज इन सब विषयों पर कुछ बातें कर रहे थे। उसी समय मैं वहां पहुंची और मैंने एक प्रश्न का उत्तर बहुत ही शानदार तरीके से दिया और कुछ देर तक मैं उन लोगों से बात भी करती रही जिन मुद्दों पर वे लोग बात कर रहे थे। पर मेरा तरीका थोड़ा सा तर्किक और अकादमिक स्तर का था। कुछ देर बाद ही पापा के मित्रों ने मुझे वहां से जाने के लिए कह दिया और कहा कि ये बाते बच्चों को नहीं करनी चाहिए। मुझे राजनीति, धर्म, समाज, दर्शनशास्त्र इन सभी विषयों पर बात करते हुए बहुत अच्छा लगता है और मुझमें इनकी एक स्तर की समझ भी है। मैंने उस समय सोचा कि क्यों मैं इन विषयों पर बात नहीं कर सकती?
शायद आज के समाज का एक हिस्सा लड़कियों को ऐसे मुद्दे जो पुरुषों के लिए ही समझे जाते थे उन पर लड़कियों को बात करने ही नहीं देना चाहता!
ऐसे लोगों को ये समझना चाहिए कि इस तरह वो दुनिया की आधी आबादी की विश्लेषण क्षमता और समझ का लाभ लेने से चूक रहे हैं, अगर न चूके तो दुनिया और बेहतर तथा संवेदनशील हो सकती है।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
मधुरिमा को खिलखिलाते हुए हंसते देखकर
चेष्टा ने चौंक कर पूछा, अरे मधुरिमा तुम तो कह रही थी कि हंसना भूल गई हो, केवल मुस्कुराती हो, यह अचानक बदलाव कहां से आ गया कि इतना खुलकर हंस रही हो ?
मधुरिमा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, हां चेष्टा पहले मैं मुस्कुराती ही थी बस क्योंकि कुछ उत्साह की कमी थी, कुछ निराशा के बादल थे, लेकिन अब कुछ लोगों से मिलकर, उनसे बात करके यह समझ आया है कि संघर्ष और दिक्कतें बहुत लोगों के जीवन में रहती हैं। हमें यह सोचकर निराश नहीं रहना चाहिए कि हमारे पास समय या संसाधन कम हैं, हमारा नजरिया यह होना चाहिए कि कुछ लोगों के पास इतने भी संसाधन नहीं है, तो क्यों ना इतने ही संसाधनों में जो बेहतर हो सके वह करें हम क्यों उस चीज के पीछे भागे जिसके लिए संसाधन नहीं है, फिलहाल जिन चीजों के लिए संसाधन है उनके लिए प्रयास करें, अपने पैरों पर खड़े हों और अपने इन्हीं कम संसाधनों में ही हम अपने से भी कम संसाधनों वाले लोगों की मदद कर सकते हैं और दूसरों के लिए की गई मदद से जो संतुष्टि की अनुभूति होती है वह लाजवाब है। उस अनुभूति ने ही मुझे ये हौसला दिया है कि मैं बहुत बड़ा भले कुछ ना कर पाऊं लेकिन अपने पैरों पर खड़े होकर कुछ लोगों के जीवन में मुस्कान ला सकती हूं और यह स्पष्टता और विश्वास मुझे इस योग्य बनाता है कि मैं अपनी परिस्थितियों पर ही हंस सकूं और यह परिस्थितियां मुझ पर नहीं, मैं इन परिस्थितियों पर हंस सकूं। ये मेरी खिलखिलाहट भरी हंसी इस विजय का प्रतीक है।
- लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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- आरती
लेखिका संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी साथ ही सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रहित के मामलों पर चिंतन उनकी दिनचर्या की प्राथमिकताओं में शामिल है।
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"मर गया नालायक! देखो तो, कितना खून पीया था। उड़ भी नहीं पाया, जबकि सम्भव है इसने खतरा महसूस कर लिया होगा।"
"अरे मम्मी, आप दुखी नहीं है अपना ही खून देखकर?"
"नहीं, क्योंकि यह अब मेरा खून नहीं था, इसका हो गया था।"
"आप भी न, उस दिन उँगली कटने पर तो आपके आँसू नहीं रुक रहे थे। और आज अपना ही खून देखकर आप खुश हैं।"
''जो मेरा होता है, उसके नष्ट हो जाने पर कष्ट होता है। पर मेरा होकर भी जो मेरा न रहे, तब उसके नष्ट हो जाने पर मन को संतुष्टि होती है, समझा?''
"बस मम्मी, अब यह मत कहने लगिएगा कि यह खून पीने वाला मोटा मच्छर, कोई ठग व्यापारी या नेता है या फिर कोई भ्रष्ट अफसर! और उससे निकला खून, आपके खून पसीने की कमाई! जिसे पचा पाना सबके बस की बात नहीं!"
"मेरा पुत्तर, कितना समझने लगा है मुझे..! छीन-झपटकर कोई कब तक जिंदा रह सकता है भला। पाप का घड़ा एक न एक दिन तो फूटता ही है।"
© सविता मिश्रा 'अक्षजा'
ईमेल-2012.savita.mishra@gmail.com
अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों प्रकाश डालते हुए या कहें की ध्यान खींचते हुए एक शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपने लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि विधाओं में ढेरों रचनाएं साहित्य कोश को अर्पण की हैं, आपकी 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह के साथ अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हैं और 'खाकीधारी' 2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन} 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश} का सम्पादन भी किया, आप लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता विधा में कई बार पुरस्कृत हैं| आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|
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भ्रामक प्रचार जिसका अर्थ है ऐसा प्रचार जो हमें भ्रम में डालता हो हमें सही चीजों से भटकाता हो, माने कि हमें सही चीजे न दिखा कर वो दिखाया जाए जिसके कारण हम उस संस्था की ओर आकर्षित हो सकें ।
विस्तार में समझते हैं:
जब हम कोचिंग संस्थानों में पढ़ने के लिए जाना चाहते हैं तो वहाँ पर हमको अध्यापको के पढ़ाने के तरीके जैसे- विश्लेषणात्मक व समीक्षात्मक व्याख्या करने का तरीका या उनकी अकादमिक योग्यता और अनुभव जैसे पहलुओं को देखना चाहिए। वहां पर अध्ययनरत छात्र छात्राएं विषय को कितना समझ पा रहे है यह जरूरी है। फिर यह भी आवश्यक है कि हमारे द्वारा यदि कोई प्रश्न पूछा जाता है तो क्या अध्यापक उसका सटीक उत्तर दे पा रहे हैं।
हम जब किसी संस्थान को चुने तो उसका कारण उपरोक्त होना चाहिए लेकिन भ्रामक प्रचार के चलते हम हाई रैंक और चकाचौंध देखने लगते है। इससे ज्यादातर संस्थानों में छात्रों की संख्या अमूमन बढ़ जाती है। जिसकी देखा देखी कभी-कभी समाज का दूसरा व्यवसायिक वर्ग भी भ्रम फैलाने की कोशिश करता है। वहीं दूसरी और छात्र वर्ग भी इस लालसा में कि कल प्रचार में इस फोटो की जगह मेरी फोटो होगी, वो भी इन संस्थानों का रूख करते हैं। और समय नष्ट करते हैं उचित मार्गदर्शन और पठन सामग्री के अभाव में।
इन सब का परिणाम ये होता है कि व्यवसायी वर्ग एक गलत चलन से अपना व्यवसाय आगे बढ़ाते हैं, वही छात्र वर्ग जब सालों मेहनत के बाद वो नहीं पाते, जो वो चाहते थे तो वो अवसाद और कभी-२ अति-अवसाद से घिर जाते है जो कभी-कभी आत्महात्या का
कारण भी बनता है। इसीलिए इन भ्रमों से बचना जरूरी है और कोचिंग चुनने का तरीका विश्लेषणात्मक और समीक्षात्मक हो।
एक और बात जो जुड़ी हुई है ऊपर के मुद्दे से वो है छात्रों की मानसिकता और कसौटी का जिसने कोचिंग संस्थानों को भ्रामक प्रचार का लालच दिया है वो है सूक्ष्म और विश्लेषणात्मक समझ की कमी और चकाचौंध के आधार पर आंकलन की ग़लत आदत, संस्थान का चुनाव उसकी पठन सामग्री और शिक्षण प्रक्रिया हो न कि उस संस्थान से कितने टापर निकले।
शुभकामनाएं
-सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
पिछले कुछ समय से आप एक स्वतंत्र लेखिका के रूप में वेबसाइट को सहयोग स्वरूप पाठकों के लिए ज्ञानवर्धक और विश्लेषणात्मक लेख उपलब्ध करा रही हैं जो आमजन के साथ सरकारी सेवाओं के अभ्यर्थियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी हैं।
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यार उत्कर्ष, आजकल वेबसाइट पर बहुत आर्टिकल और लघुकथाएँ डाल रहे हो, दूसरे काम बंद कर दिए क्या? आखिर क्या राज है?
अभिनव - अरे उत्कर्ष, कोई है जो मुझे इस काम के लिए प्रोत्साहित करता है, इस काम की महत्ता को स्वीकार करता है और नियमित कुशल क्षेम पूछ इस काम के महत्व को दर्शाता है यहां तक कि ये काम नियमित चल सके उसके लिए सहयोग भी।
प्रोत्साहन से प्रसन्नता बढ़ती है और प्रसन्नता से दक्षता, परिणाम तुम्हारे सामने है और मुस्कुराने लगता है।
उत्कर्ष - अच्छा तो ये तारीफ का कमाल है। (वह आंखों में चमक के साथ बोलता है) सही भी है, हमें प्रोत्साहन मिलता है, तो हम खुश होते हैं और अधिक कुशलता से काम करते हैं।
©लवकुश कुमार
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"कब से लाईट गायब है? " पसीना पोंछते विनय ने चिढ़कर बन्द पड़े पंखे को देखते हुए कहा, 'चलो मोटरसाईकिल की सर्विसिंग ही करा लाता हूँ बीरबल चौक से। पर सर्विसिंग कराने जाओ तो तीन-चार घण्टे तो लग ही जाएँगे। दुकान से घर भी दूर है और मेरा मोबाइल भी खराब! कैसे होगा अब इतना टाईम पास? क्या गाड़ी छोड़कर वापस घर आऊँ और फिर जाऊँ?'
'उस दुकान के पास ही तो है न तेरे अश्विन चाचा का नया घर?' उसी समय, गई हुई बिजली वापस आ गई तो ट्यूबलाईट के साथ-साथ माँ की आँखें भी चमक उठीं, 'तेरे चचेरे भाई अनूप का! जिससे तेरी बोलचाल बन्द है। और वो भी तेरी गलतफहमी के कारण! बहुत हो गया वीनू बेटा! अब बस कर ये झगड़ा! जा, वहाँ दुकान से उन के घर हो आना।' रुका हुआ पंखा चला तो कमरे के वातावरण के साथ विनय के मन की उमस भी गायब हो गई। माँ अभी भी समझा रहीं थीं, 'अच्छा मौका है। तेरा टाईम पास हो जाएगा, गाड़ी की सर्विसिंग हो जाएगी और रिश्तों की भी!'
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
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