Recent Articles Related To Compassion

क्यों शामिल हों पुस्तक परिचर्चा मे ? कुछ जरूरी जो पाया जा सकता है, एक दृष्टि |

सबसे पहले बात कि कौन-कौन  शामिल होता है

"कुछ समन्वयक, सुधी पाठक, वरिष्ठ लेखक और समाज के अध्येता"

क्या होता है?

समन्वयक अपनी मन बांध लेने वाली भाषा शैली में सभी को संबोधित करते हैं फिर शामिल पाठक स्वयं द्वारा पढ़ी हुयी पुस्तक पर चर्चा करने की इच्छा व्यक्त करते हैं और समन्वयक उनसे बारी-बारी से आग्रह करते हैं अपनी पुस्तक पर अवलोकन, अनुभव और सीख साझा करने को |

क्या-क्या मिल सकता है जो आपके लिए उपयोगी हो

सबसे पहले उन्हे संबोधित करता हूँ जो किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, उन्हे लग सकता है कि प्रतियोगी परीक्षा मे इन साहित्यिक किताबों का क्या महत्व :महत्व है, खूब महत्व है

सोंच व्यापक होगी, एक से एक मेहनती और त्यागशील, न्यायशील और बहादुर लोगों के बारे मे पढ़कर और सुनकर जो स्पष्टता आएगी वो आपको बेहतर और नियमित तैयारी के लिए प्रेरित करेगी

अगर आपके जीवन मे संघर्ष हैं तो हो सकता है कि आप ऐसे इंसान के बारे मे पढ़ लें या सुन लें जिन्होने विकट परिस्थितियों मे भी हिम्मत बांधकर मेहनत की और अपने साथ दूसरों का भी भला कर सके, माने फिर आपको अपनी दिक्कतें छोटी लगने लगेंगी|

हो सकता है कि आपको जीवन उद्देश्यहीन लग रहा हो, सब कुछ खत्म सा दिख रहा हो, तब भी आपको अपने जीवन को अर्थ देने के कई तरीके मिल सकते हैं

हो सकता है कि पढ़ाई के दौरान भी जीवन या पढ़ाई से जुड़ी कोई बात आपके पढ़ाई के हिस्से का वक़्त जाया कर रही हो, उस अवस्था मे एक अच्छी किताब के साथ बिताए नियमित  कुछ मिनट्स आपके मन को शांति प्रदान कर आपकी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी को और बेहतर/दक्ष कर सकते हैं

हो सकता है कि किसी उधेड़बुन मे हों और आपको कोई रास्ता दिखाने वाली पुस्तक का नाम मिल जाए

हो सकता है कि आप कोई निर्णय न ले पा रही हों और कोई ऐसी पुस्तक के बारे मे चर्चा हो जाए जो आपको उस विषय पर स्पष्टता दे सके

हो सकता है कि आप कोई नया काम करना चाहते हों, तरीका न सूझ रहा हो और आपको किसी ऐसे इंसान कि पुस्तक के बारे मे पता चले जो उसी काम पर अपने अनुभव साझा किए हों |

एक जागरूक, जिम्मेदार और शिक्षित नागरिक के तौर पर आपका ध्यान जरूरी मुद्दों की तरफ जाएगा, जो हमारे परिवेश या हमारे लोगों को / उनके मन को प्रभावित करते हों 

विभिन्न परिप्रेक्ष्य मे चीजों को समझने के लिए अलग अलग किताबों के बारे मे जानने का मौका

उम्र भर के अनुभवों का निचोड़ होता है किताबों में, आप उस समझ को हासिल कर लोगों के साथ बेहतर ताल मेल बैठा कर कार्य कर सकते/सकती  हैं |

हम सबके जीवन मे कोई दोस्त होता है जिसका साथ अच्छा लगता है, क्योंकि उसकी बातें रुचिकर लगती हैं, कितना अच्छा हो कि इतिहास के किसी महान इंसान का आपको साथ मिल पाये, उनकी किताब पढ़कर |

एक समूह से परिचय होगा जो आपकी ही तरह साहित्य अध्ययन को अपनी दिनचर्या मे स्थान देकर, समाज की एक समवेशी छवि चाहता है अपने मन मे, लोगों को उनके संघर्षों और आकांक्षाओं के साथ स्वीकार करना चाहता है, कुछ बदलाव की बात और फिर अपने स्तर पर काम ताकि लोगों के जीवन मे गरिमा, स्वतन्त्रता, उत्कृष्टता और संपन्नता मिल पाये और ज्यादा से ज्यादा लोग देश के विकास और स्थायित्व मे अपने योगदान दे सकें |

और क्या सीख सकते हैं आपमें क्या बेहतरी हो सकती है पुस्तक परिचर्चा के बाद इसके लिए मेरा ये एक लेख पढ़ा जा सकता है, लिंक नीचे है :

किताबों से हम क्या पा सकते हैं : Book Meet ( पुस्तकों पर चर्चा ) एक सार्थक प्रयास और जरूरी भी

एक रोचक लेख विशाल चंद जी की तरफ से - आप जो ढूंढ रहे हैं वह मिलेगा लाइब्रेरी में (मिचिको आओयामा) - लघु समीक्षा सह परिचय - समीक्षक विशाल चंद

मिलते हैं परिचर्चा मे |

शुभकामनायें

-लवकुश कुमार


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

वेबसाइट के उद्देश्य के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।

Read More
 आज्ञापालन (परोपकार पर ज़ोर देती बालकथा)- मीरा जैन

खुशी से सराबोर सम्यक दौड़ता हुआ अर्पण से लिपट गया और अंकसूची बताते हुए कहने लगा- "अर्पण ! तुम्हारे कारण आज मै कक्षा में प्रथम आया हूं यदि उस दिन तुम मुझे अपनी साइकिल नही देते तो शायद मै परीक्षा देने स्कूल ही नही पहुंच पाता और फेल हो जाता । एक बात तो बताओ अर्पण ! खेलते खेलते हम दोनो में लगभग छ: माह पहले लड़ाई हो गई थी तब से हमारी बोलचाल बंद थी हम एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते थे, परीक्षा वाले दिन जब मैने स्कूल जाने के लिए साइकिल बाहर निकाली , उसका पहिया पंचर देख मेरे होश उड़ गए सोचने लगा-अब क्या होगा ? पापा भी बाहर गए हुए हैं , मै परीक्षा देने स्कूल कैसे पहुचुंगा, इसी घबराहट में मेरे आंसू छलक आए। कुछ समय पश्चात ही तुमने अपनी साइकिल मेरे हाथों में स्कूल जाने हेतु दे दी और ना चाहते हुए भी, मजबूरीवश तुम्हारी साइकिल लेकर चला गया पर एक बात तो बताओ तुम्हारे मन में मेरे प्रति अचानक प्रेम भाव कैसे उमड़ आया ?"

अर्पण ने सच बोलते हुए कहा- " "सम्यक ! सच तो यह है कि मै तुम्हारी साइकिल का पहिया पंचर देख बहुत खुश हुआ था कि तुम अब परीक्षा देने नहीं जा पाओगे लेकिन खिड़की से दादाजी ने साइकिल के कारण तुम्हें रोते हुए देख लिया उन्होंने तुरंत मुझे आदेश दिया- जाओ अपनी साइकिल सम्यक को देकर आओ पहले तो मैने ना नुकुर की किंतु बाद में मान गया जब दादाजी ने कहा-अर्पण बेटा मुसीबत में जो दूसरों के काम आए वही सच्चा इंसान होता है बाकी तो सब स्वार्थी , हो सकता है कभी तुम भी ऐसी स्थिति में फंस जाओ और तुम्हारी कोई मदद ना करे तो तुम पर क्या बीतेगी, साथ ही पड़ोसियों को तो हमेशा एक दूसरे से मिलकर ही रहना चाहिए, यूं भी परोपकारिता बहुत बड़ा धर्म है।"

 सम्यक ने भी हां में हां मिलाते हुए कहा-

" मां, कहती है घर में बड़े बुजुर्गों की बात हमेशा माननी चाहिए वह हमें अच्छा इंसान बनाने में मदद करते हैं।"

- मीरा जैन 

उज्जैन, मध्य प्रदेश 


अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर  (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने  लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।          
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं  को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।


मो.9425918116
jainmeera02@gmail.com

अधिक जानने के लिए क्लिक करें।


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

Read More
तुम पहले क्यों नहीं आये: पुस्तक समीक्षा सह परिचय - विशाल चंद

पुस्तक : तुम पहले क्यों नहीं आए? 

लेखक : कैलाश सत्यार्थी

 प्रकाशन : राजकमल पेपरबैक्स

        तुम पहले क्यों नहीं आए नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी द्वारा लिखी गई उन बच्चों की सच्ची कहानियों का संग्रह है, जिन्हें उन्होंने अपने संगठन बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से गुलामी और बाल श्रम से मुक्त कराया। यह किताब पढ़ते हुए बार-बार मन भारी हो जाता है और मन में क‌ई सवाल उठते हैं।

         इस पुस्तक में 12 बच्चों की जीवन कथाएँ हैं, जो पत्थर की खदानों, ईंट भट्ठों, घरेलू मजदूरी, कालीन कारखानों और तस्करी जैसे अमानवीय हालात से निकलकर आज़ादी की रोशनी तक पहुँच पाए। ये कहानियाँ किसी कल्पना की उपज नहीं, बल्कि हमारे समाज का कड़वा सच हैं और हर कहानी एक चुप चीख जैसी लगती है। शीर्षक कहानी देवली की है, जो तीसरी पीढ़ी से बंधुआ मजदूरी में जकड़ी हुई थी। जब उसे आज़ादी मिली तो उसके मुँह से निकला सवाल—

“तुम पहले क्यों नहीं आए?”

यह सवाल सिर्फ लेखक से नहीं, बल्कि हम सभी से किया गया सवाल बन जाता है। 

       किताब में प्रदीप, कालू, भावना और साहिबा जैसे बच्चों की कहानियाँ भी हैं, जिनके साथ अंधविश्वास, हिंसा, यौन शोषण और अमानवीय व्यवहार हुआ। इन किस्सों को पढ़ते हुए कई जगह शब्द साथ छोड़ देते हैं और सन्नाटा बोलने लगता है।इन्हें पढ़ते हुए कई बार मन करता है किताब बंद कर दूँ, लेकिन फिर लगता है—अगर हम पढ़ ही नहीं पाए, तो वे जिए कैसे होंगे? 

      हालाँकि यह किताब सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि उम्मीद भी देती है। बचाए गए कई बच्चे आगे चलकर पढ़े-लिखे, आत्मविश्वासी बने और आज दूसरों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। "यही इस किताब की सबसे बड़ी ताकत है।" कुल मिलाकर, तुम पहले क्यों नहीं आए एक झकझोर देने वाली, लेकिन ज़रूरी किताब है। यह हमें असहज करती है, सोचने पर मजबूर करती है और यह एहसास दिलाती है कि बच्चों की आज़ादी सिर्फ कानूनों से नहीं, हमारी संवेदना से संभव है।

" पढ़ें, समझें, बात करें और साझा भी "         

शुभकामनाएं 

विशाल चन्द  @reading_owl.3

https://www.facebook.com/vishal.chandji

Reading Owl Facebook page


विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

वेबसाइट के उद्देश्य के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।

Read More
आग (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

उसके शरीर में इतनी ताकत न थी कि वह मेहनत-मजदूरी कर सके।  भीख में रूखा-सूखा  जो मिल जाता उसी से पेट की आग को शान्त करने का प्रयास करती, या कभी केवल पानी पीकर ही गुजारा कर लेती। 

आज उसे भीख में थोड़ा-सा सूखा आटा मिल गया था।  आटे को बनिये को  बेच दूँ तो बदले में मिले पैसों से दो वक्त का गुजारा तो चल ही जाएगा, ये सोच कर दुकान पर पहुंच गयी, किन्तु बनिये ने आटा लेने से इन्कार कर दिया ।  

अगले ही पल उसे विचार आया, क्यूंँ ना इस आटे की रोटी ही बनाकर खा लूँ, पर ईंधन, बर्तन,  वो तो कुछ भी  थे नहीं उसके पास।  एक-दो टूटे-फूटेे बर्तन थे; उन्हें भी कुछ दिन पहले किसी ने चुरा लिया था।  निराश होकर लौट चली, कि   दू...s...र  श्मशान में उठती हुई आग की लपटें देख उसकी आँखों में चमक आ गयी। 

 शव लगभग जल चुका था। शव के साथ आए लोग उसके वहाँ पहुँचने से पहले ही जा चुके थे, उसने आव देखा न ताव, चिता के निकट फूटे हुए मटके के एक टुकडे़ में थोड़ा-सा पानी देखकर उसी में आटा गूंथ लिया और मोटी-मोटी  रोटियाँ थपक कर चिता के किनारे सुलगते अंगारों पर रख दी, ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा। 

अरसे बाद पेट की आग गर्म रोटियों से बुझ रही थी।

 

सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More
फल (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

सन्तान सुख से वंचित, निराश शर्मा जी ने अनाथालय से एक बच्चा गोद ले ले लिया।  बच्चे की खिलखिलाहट से उनके जीवन में मानो खुशियों की बहार ही आ गयी थी। शर्मा दम्पति दोनों मिल कर बडे़ लाड़प्यार से पालन करने लगे  उसका। बच्चे के कदम  घर में पड़ने से शर्मा जी का भाग्य ने साथ दिया और उनके अपने भी दो बच्चे पैदा हो गये,  परन्तु उन्होंने कभी तीनों बच्चों में भेदभाव नहीं किया। समान शिक्षा, समान लालन पालन। 

बडे़ पुत्र  शरद की किस्मत ने एक बार फिर करवट बदली और वो एक रोड़ ऐक्सीडैंट में बुरी तरह जख्मी हो गया तब शर्मा दम्पत्ति ने उसकी चिकित्सा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और वह ठीक भी हो गया,  फिर भी वह अपने दोंनों पैर गंवा बैठा।  इसी दौरान  सहानुभूति दर्शाने वाले "  अति शुभचिंतकों "के द्वारा वह जान चुका था कि उसे बाबा अनाथालय से ले कर आये थे । फिर तो जीवन से हताश  शरद मन ही मन कुंठित रहने लगा।  उसे लगने लगा किअब वह सबके ऊपर एक बोझ हो गया है।  और एक दिन हिम्मत बटोर कर उसने शर्माजी से  बोल ही दिया   " बाबा  मै जानता हूँ कि मैं आपकीऔलाद नहीं हूं आप मुझे अनाथालय से लाये थे 

।अब  मैं आपकी कभी सेवा नहीं कर सकूंगा,  उल्टा आप पर ही बोझ बन गया हूं।अच्छा हो यदि आप मुझे  वापस वहीं छोड़ आये "।  

पुत्र के मुंह से ऐसी बाते सुन कर शर्माजी आहत हो उठे।  आंखों की कोर  में आगये पानी को  धीरे से कमीज की बांह से पौंछ लिया  " बेटा ! कभी ऐसी बात जबान पर भी मत लाना। 

 तुम नहीं जानते, पकने के बाद फल भले ही वृक्ष का साथ छोड़ दें,पर वृक्ष को अपने फल कभी बोझ नहीं लगते। और तुम तो मेरा पहला फल हो।   मैं तुम्हें कैसे अपने से दूर कर सकता हूं।भावुक होकर शरद पिता के सीने से लिपटकर रोने लगा।

पिता का हाथ शरद के सिर पर था। 

 

सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More
पितृसत्तात्मक व्यवस्था और पुरूषों की समस्याएं- सौम्या गुप्ता

संपूर्ण पुरुष समाज को समर्पित:-

मैं बचपन से ही इस बात को लेकर बहुत चिढ़ती थी कि भगवान ने मुझे लड़की क्यों बनाया? इतनी पाबंदियाँ झेलनी पड़ती है। लेकिन जब थोड़ी समझदार हुई, तो समझ आया कि लड़का होना भी आसान नहीं है। घर में अगर एक बेटा हो या बड़ा बेटा हो तो पिता की तबियत बिगड़ते ही वह बड़ा बेटा, चाहे जितना ही छोटा क्यों न हो, घर की सारी जिम्मेदारी संभालने की कोशिश में लग जाता है। मैंने महिलाओं को अक्सर यह कहते सुना है कि हमें तो कभी छुट्टी नहीं मिलती, और एक सीमा तक यह सच भी है कि महिलाएँ पुरुषों से ज्यादा घंटे काम करती हैं।

पर एक पक्ष यह भी है कि महिलाएँ बीमार होने पर थोड़ा कम खाना बना सकती हैं, कुछ काम कम कर सकती हैं, अगर परिवार अच्छा है तो, पर पुरुषों के पास यह सुविधा नहीं होती। लगभग हर मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार का पुरुष न बीमार होने पर जल्दी डाॅक्टर के पास  जा पाता है, न कोई छुट्टी लेता है। जब तक वो ल़डका रहता है,घर की जिम्मेदारियों से तालमेल, फिर बहन की शादी, फिर अपनी शादी और घर में वो भी उलझा सा ही रह जाता है।

भावनात्मक रूप से अगर कोई पुरुष टूट भी जाए, तो वो किसी के सामने रो भी नहीं सकता क्योंकि हमारे समाज में ये भ्रम फैला हुआ है कि 'मर्द को दर्द नहीं होता'। लड़कियों और महिलाओं से ये अभिव्यक्ति तो नहीं छीनी जाती। मुझे लगता है कि ये धारणा टूटनी ही चाहिए और महिलाओं को ये मोर्चा उठाना चाहिए कि वो हर तरह के इमोशन को अभिव्यक्त कर सकें और साथ ही पुरूषों को भी अपनी हर तकलीफ़ साझा करने के लिए प्रोत्साहित कर सकें, ऐसा महिलाओं को ही इसलिए करना चाहिए कि वो ही माँ, बहन, पत्नी के रूप में पुरुष के जीवन में सिखाने में सबसे अहम् भूमिका निभाती है।

अमूमन पुरुषों में हार्ट अटैक तथा अन्य ऐसी ही तनाव से जुड़ी हुई बीमारियों ज्यादा होती है क्योंकि वो अपने इमोशन को दबाकर करते है। मैंने पढ़ा था कही 'बिन घरनी घर भूत का डेरा' पर इस समाज को और देश को जितनी महिलाओं की जरूरत है उतनी पुरुषों की भी।

आज झूठे महिला सशक्तिकरण की आड़ में पर जो महिलाएँ यह कहती है कि पुरुषों ने हमारा दमन किया है तो अब हम भी करेंगे, उनसे मेरा कहना है कि हमारी शक्ति सृजन की है, विनाश की नहीं। दुनिया को आधा पुरुषों ने नष्ट कर दिया तो दुनिया को आधा हम भी नष्ट करेंगे- ये नहीं करना।

साथ मिलना है महिला और पुरुष दोनों को, चेतना के स्तर पर दोनों एक हो और दोनों मिलकर इस समाज, देश और दुनिया को बचाएं।

"इस दुनिया को प्यार की जरूरत है, बदले की नहीं। "

जो हमारे जीवन में एक अहम भूमिका निभाते है, हम सबको जरूरत है कि हम उनके प्रति पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाए।

पुरुषों में भी संवेदना होती है, आप जयशंकर प्रसाद की रचना, नारी तुम केवल श्रद्धा हो, रचना पढ़ सकते है। कितने ही गाने ऐसे है जिनमें महिलाओं को पुरुष कितना अच्छे से समझ सकते है उनको आप समझ सकते हैं, एक गाने की लाइन है, मेरी छाया है जो, आपके घर चली, सपना बनके मेरी आँखों में है पली, मैंने जब ये देखा कि इसको लिखने वाला भी एक " पुरुष" है तो मेरे लिए ये चौकाने वाली बात थी, इसीलिए पुरुषों के प्रति अपनी अवधारणाओं को बदलने की जरूरत है।

शुभकामनाएं 

- सौम्या गुप्ता 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |

शुभकामनाएं

Read More
उत्साह और आत्मविश्वास (लघु कथा) - लवकुश कुमार )

समर्थ तुम रेस्पेक्टेबल फ्लर्ट की बात कर रहे थे, मैंने महसूस किया है इससे मुझे भी अच्छा लगता है, ऐसा कैसे होता है? समझने में समर्थ करो मुझे भी, चेष्टा, समर्थ से जिज्ञासा करती है और हंसने लगती है।

समर्थ मुस्कुराते हुए, चेष्टा, जहां तक मैने समझा है, जब कोई हमारे अच्छे दिखने की या हमारी ड्रेस की या हमारे काम/उपलब्धि/व्यवहार की प्रशंसा इस तरह करता है कि उस बात के चलते एक जुड़ाव का प्रस्ताव या रुचि अभिव्यक्त हो तो हम खुश और बहुत अच्छा महसूस करते है, इसका कारण हमारे द्वारा खुद को महत्वपूर्ण महसूस करना होता है, खासकर जब ये प्रमाणीकरण या वैलीडेशन सामने से मिले, तुमने शायद महसूस किया हो कि जब हम सामने वाले इंसान की किसी बात के लिए तारीफ करते हैं और उधर से भी हमारे किसी काम की तारीफ मिल जाए तब एक अलग ही वैलीडेशन और इंपार्टेंस की फीलिंग आती है जो हममें उत्साह और आत्मविश्वास भर देती है इससे हमारी दक्षता बढ़ती है। जब कोई हमारी प्रशंसा करता है तो हमें अपनी काम की और खुद की सार्थकता का पता लगता है, काम के प्रति समर्पण भी बढ़ता है, बशर्ते तारीफ का विषय/तरीका ऐसा न हो कि सामने वाले को ये व्यक्तिगत सीमाओं के पार या निजता का हनन लगे।

चेष्टा - ओह, अब समझ आया कि दूसरों से प्रशंसा सुनना हमारे आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान को बढ़ा सकता है। जब हमें दूसरों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है, तो हम अपनी क्षमताओं पर अधिक विश्वास करते हैं और खुद को अधिक मूल्यवान महसूस करते हैं। यह हमें प्रेरित भी करता है और हमें बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

हां चेष्टा अब तुम समझने में समर्थ हो चुकी हो, तुम्हारी चेष्टा सफल रही, दोनों हंसने लगते हैं।

©लवकुश कुमार


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।

Read More
आज की बोहनी (लघुकथा) - संतोष सुपेकर

"छुट्टे नहीं है यार।" सर्दी की उस सुबह रामपाल अपने साथी रिक्शावाले से कह रहा था, "अभी दो घण्टे पहले एक अंकल स्टेशन से बैठे थे शास्त्री नगर के लिए लेकिन ऑटो में ही उनको हार्ट अटैक आ गया। मैं सीधे अस्पताल ले गया उनको और उनकी फेमेली बुलवा ली। जल्दबाजी में वो लोग मेरा किराया भी नहीं दे पाए।"

"अरे ! फिर तो आज तेरी बोहनी ही बेकार हो गई।" रियाज ने कहा, "तो अब रख दे आटो रिक्शा घर पे और आराम कर आज।"

"नहीं नहीं यार, उस अनजान आदमी की जान बच गई, यही आज की खुशी है और यही आज की बोहनी! मैं तो आज रिक्शा जरूर चलाऊँगा।" कहते हुए रामपाल ने ऑटो रिक्शा चालू किया तो *हैडलाईट की तेज रोशनी फैल गई।*

© संतोष सुपेकर 

ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com


संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं | 


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

Read More
सभ्यताओं का अंत !

सभ्यताएँ तबाह हो जाती हैं क्योंकि वे अपने कवियों-साहित्यकारों की नहीं सुनती और उन्हें भ्रमित करने वालों के बताये रास्ते पर चलने लग जाती हैं |"

मिलकर रहने के बजाय लोग दस बहाने ढूंढ लेते हैं अलग अलग रहने के, एक दुसरे को नुकसान पहुंचाने के और इस तरह ले आते हैं अशांति माहौल में, लोगों के जीवन में और अपने जीवन में भी |

 

Read More
पारस्परिक सम्मान - बिना किसी शर्त के

अमूमन ऐसा देखा गया है कि किसी इंसान से कोई ग़लती या चूक हो गई या फिर कोई आंकड़ा बताने में कोई मानवीय गलती हो गई, इस पर ही कुछ लोग उस इंसान को नीचा दिखाने में लगे जाते हैं या अपमानजनक तरीके से बात करना शुरू कर देते हैं, जैसे कि बस इंतजार कर रहे हों कि अमुक इंसान से कोई ग़लती हो और इसे नीचा दिखाएं।

इससे कोई लाभ नहीं, न तो इस तरह कोई सामने वाले से कुछ अन्य चीजें जिसमें वो बेहतर है सीख सकता है और नहीं ऐसे इंसान से देशहित में या समाज हित में कोई कार्य ले सकता है।

पारस्परिक सम्मान बिना शर्त होना चाहिए, तब ही हम मिलकर कुछ बेहतर कर सकते हैं और एक दूसरे को निखारने में परस्पर सहयोग कर सकते हैं।

अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

 

फीडबैक या प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, इस फार्म को भर सकते हैं

 

शुभकामनाएं 

Read More