लोग अंधविश्वास में क्यों फंसते हैं?
लोकल न्यूजपेपर में पढ़ते हुए कि एक पिता ने बेटे की चाह में बेटी की बलि दे दी, इसे पढ़ते हुए मन दुःख के साथ-साथ आश्चर्य से भी भर गया, ख्याल आया कि कैसे अशिक्षित और असंवेदनशील लोग है!
इस अंधविश्वास का कारण क्या हो सकता है?
एक कारण जो मैं समझ पा रही हूं, हो सकता है कि जब हम दुखी होते हैं, तब हमारा मन आशा की किरण ढूंढता हैं। उस समय किसी को वो एक किरण मिल जाती है या एक भ्रम कि उस समय कुछ लोगों को उम्मीद नहीं दिखती है तो वो बाबाओं के पास जाते हैं, दरअसल होता ये है, हम उस घोर दुःख की घड़ी में जो हमारे साथ खड़ा होता है उसे हम अपना भगवान समझ लेते हैं और ये वक्त की बात है कि उस समय हमें कैसा इंसान मिलता है, उसी इंसान का हम अनुसरण करते है। इस विश्वास के साथ की हमारी दिक्कतें दूर हो जायेंगी लेकिन अगर ये विश्वास तर्कहीन हो और हम संवेदना और करूणा भूलकर केवल स्वार्थ के वशीभूत हो जायें तो यही विश्वास अंधविश्वास में बदल जाता है, एक सात्विक इंसान का साथ हमें प्रेममयी बनाता है जबकि एक पाशविक प्रवृत्ति के स्वकेंद्रित इंसान का साथ हमें स्वार्थी और संवेदनाहीन बना देता है।
इसीलिए जरूरी है कि ये अज्ञान खत्म हो लेकिन उसमें समय लगेगा। लेकिन जब भी आप किसी संकट से गुजर रहे हों उस वक्त या तो आप खुद की अंतरात्मा पर यकीन करे या उस समय भी आप सही इंसान इस आधार पर चुने कि क्या वह अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरों का अहित करने की बात तो नहीं कर रहा, उसके जीवन में सच कितना है, इस तरह एक चुनाव आपकी जिंदगी बदल सकता है सकारात्मक या नकारात्मक आपके चुनाव पर निर्भर करता है।
दिक्कतें आती जाती रहती हैं, विकल्प मौजूद रहते हैं, दिक्कत के समय में सच्चे इंसान को ही चुनें और दिक्कतों के ऊपर इंसानियत को रखें, खुद से पहले समष्टि को रखें, अपने हित के लिए कोई ग़लत उदाहरण पेश न करें।
आपकी राय क्या है जरूर अवगत करायें।
शुभकामनाएं
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
अमूमन ऐसा देखा गया है कि जब भी हम किसी को अपने से आगे बढ़ते हुए देखते हैं, पढ़ाई में खुद से आगे देखते हैं, या अच्छी स्थिति पर देखते हैं तो हमारे अंदर एक ईर्ष्या की भावना पैदा होती है।
क्या हमने कभी सोचा है कि ईर्ष्या के कारण हमारा क्या नुकसान होता है? सबसे पहला नुकसान ये होता है कि हम उस व्यक्ति से जिससे हम ईर्ष्या कर रहे है उससे सीखना बंद कर देते हैं, अब आप सोचेंगे कि हम सीखना कैसे बंद कर सकते हैं? आप सोचिए अगर आप से कोई पढ़ाई में आगे निकल गया है और आप उसके प्रति जलन की भावना रख रहे हैं तो आप कभी भी उससे बराबरी नहीं कर पाएंगे, लेकिन अगर आप उनसे पूछे कि आपने इतने अच्छे से सारी चीजें कैसे मैनेज कीं, आपने किस तरह से पढ़ाई की तो अगली बार आप भी बेहतर प्रदर्शन कर सकते हो। इस तरह से बहुत सारी चीजें हैं जो हम अपने से आगे बढ़ते हुए लोगों से सीख सकते हैं। लेकिन जलन की भावना जो होती है वह हमें सीखने से कहीं ना कहीं बहुत पीछे ले जाती है और जो हम अपना भी थोड़ा बहुत कर सकते थे, वह भी अच्छे से नहीं कर पाते इस तरह जो हमें होना चाहिए था हम वह भी नहीं हो पाते हैं और दूसरे से बेहतर वह भी कहीं न कहीं असंभव हो जाता है इसलिए ऐसे लोगों को अपनी आदत पर एक बार विचार करने की जरूरत हैं।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
एक बचपन का जमाना था,
जिस में खुशियों का खजाना था..
चाहत चाँद को पाने की थी,
पर दिल तितली का दिवाना था..
खबर ना थी कुछ सुबहा की,
ना शाम का ठिकाना था..
थक कर आना स्कूल से,
पर खेलने भी जाना था..
माँ की कहानी थी,
परीयों का फसाना था..
बारीश में कागज की नाव थी,
हर मौसम सुहाना था..
हर खेल में साथी थे,
हर रिश्ता निभाना था..
गम की जुबान ना होती थी,
ना जख्मों का पैमाना था..
रोने की वजह ना थी,
ना हँसने का बहाना था..
क्युँ हो गऐे हम इतने बडे,
इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था।
इसलिए चाहे सिर पर न हो बाल
तब भी जीवन जियो बच्चों सा धमाल
यदि है जीवन में कुछ उमंग
कुछ शौक, कुछ तरंग
लगते हो तब ही जीवित से
वरना लगे जीवन में है बैरंग
बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
- डॉ अनिल वर्मा
डॉ अनिल वर्मा, कृषि रसायन में परास्नातक हैं और गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर उत्तराखंड में कृषि रसायन पर शोध कार्य कर चुके हैं।
इनके द्वारा शिक्षण और साहित्य के अध्ययन/अध्यापन का अनुभव एक बेहतर समाज के लिए उपयोगी है |
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क्रास्ना होरकाई → 2025 (साहित्य नोबेल पुरस्कार विजेता)
जब नोबेल कमेटी द्वारा इनसे पूछा गया कि आपके लेखन की प्रेरणा क्या है तो इनका उत्तर था *समाज की कड़वाहट*।
बड़ा ही अलग सा उत्तर था ये क्योंकि लोग प्रेम के कारण लिखते है, दर्द के कारण लिखते है पर कड़वाहट का प्रेरणा बनना विचारने योग्य बिंदु है। लेकिन यदि हम भारतीय दर्शन देखे तो महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वेदव्यास, तुलसीदास, सूरदास ने भी समाज के दिए गए जहर को पीकर अमृत देने का काम किया और ऐसा किया जा सकता है।
क्रास्ना होरकाई अपने कई -2 पन्नों तक चलने वाले वाक्यों का कारण बताते हुए कहते है कि
विचार अंतहीन होते है, जब हम पूर्ण विराम लगाते है तो हमारे विचारों का अबाध प्रवाह बाधित होता है, पूर्णविराम को इंसान तय नहीं करता है, ईश्वर तय करता है, मानवीय अनुभव कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते। इसे छोटे या टूटे हुए वाक्यों में कैद नहीं किया जा सकता, जीवन अखंड प्रवाह है, केवल ईश्वर जो संपूर्णता का प्रतीक हैं वही किसी चीज को पूर्ण रूप से खत्म करने का अधिकार रखता है, मनुष्य होने के नाते हम सिर्फ प्रवाह को ही अनुभव कर सकते है।
इसीलिए हम सबको जीवन में आने वाले वो पल जिनमें हम अवसाद से घिर जाते है, हमें किसी से कहना चाहिये और न कह सके तो लिखना चाहिए, खुद के अंदर की, समाज से मिली कड़वाहट को खत्म करने का ये बहुत अच्छा तरीका हो सकता है, जिन लोगों को नहीं सुना गया, उन्होंने लिखा है और ऐसा लिखा है कि हज़ारों साल पहले लिखा गया हम आज भी पढ़ते है, महाभारत के रचयिता व्यास जी भी सबको अपनी बात बताना चाहते थे पर किसी ने नही सुना और भारत को यह अमूल्य धरोहर मिली।
जब कभी जीवन को खत्म करने का विचार भी मन में आये तो एक बार जरूर सोचिये कि यह जिसे आप खत्म करने की बात कर रहे है क्या आपका है, मेरी मत सुनिए, इतने बड़े साहित्यकार की बात पर तो विचार कर लीजिए।
शुभकामनाएं।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
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हाल ही में मैंने एक मूवी देखी - "धनक"
पता नहीं क्यों पर उस मूवी की शुरुआत से ही जो दिख रहा था उसे मैंने अलग तरीके से लिया।
परी उसमें मुझे ईश्वर की तरह लगती है और हम जैसा होता है उसका भाई। परी के भाई की आंखें नहीं होती और वो आँखों को पाना चाहता है, उसका आंखों को पाने का जो रास्ता है वो जिंदगी में किसी बड़े लक्ष्य को पाने का रास्ता है। जब हम जिंदगी में कुछ बड़ा पाना चाहते है तो सफर में कुछ लोग अच्छे साथी की तरह मिलते है, कुछ आगे का रास्ता बताते है कुछ उसमें बाधा भी डालते है। कुछ लोग हमें उन बाधाओं से निकालते भी है। जिससे हमारी बड़ी इच्छा पूरी हो जाए उसे हम ईश्वर जैसा मानने लगते है, इस फिल्म में शाहरुख खान अभिनीत पात्र वो ईश्वर है।
लेकिन जिंदगी में कभी कभी ठहरने का मन करता है जैसे वो शादी वाला घर था उस फिल्म में और कभी-कभी पैरों के नीचे तपती रेत हमें तेज चलने को मजबूर करती है।
उस फिल्म का हर पात्र कुछ देर में चला जाता है, ये हमें सिखाता है कि लोग सिर्फ हमें आगे के रास्ते के बारे में बताने के लिए ही आते है, पूरी जिंदगी के लिए एक स्थाई सहारा ईश्वर ही होते है, जैसे उसमें परी होती है,लेकिन कभी-कभी ईश्वर भी हमारी परीक्षा लेने के लिए हमारा साथ छोड़ देते है, जैसे उसे आंखे मिलने से पहले परी बेहोश हो जाती है और उसका छोटा भाई उसे उठाते हुए बेहोश हो जाता है, ईश्वर भी यही चाहते है कि हम अपनी आखिरी साँस तक लड़े फिर वही होगा जो सही होगा उसमें उस बच्चे को आंखें मिल जाती है, हमें हमारी सही मंजिल मिल जाएगी।
उसमें कई बार वो लड़की ऐसी जगह पहुँचती है जहां पर वो उस मुकाम को मंजिल समझ सकती थी जैसे शादी वाले घर में जब उसको और उसके भाई को हमेशा के लिए रखने की और उसकी शादी की बात होती है पर वो विनम्रता से मना कर देती है क्योंकि उसके लिए उसके भाई की आंखे ही जरूरी और पहली प्राथमिकता थी।इसी तरह से हमें जीवन में किसी मंजिल को पाने के लिए छोटे छोटे स्वार्थों को त्यागना होता है तब हम वो बड़ी चीज पाते है जिसकी हमने ज्वलंत इच्छा की थी।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
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सहर्ष और प्रतीक्षा चाय के ढाबे पर बैठे हुए चाय की चुस्कियां ले रहे थे तभी सहर्ष ने कहा, पता है प्रतीक्षा आपसे पहले मैंने अपने कई मित्रों और परिचितों से मेरी पत्रिका के लिए लेख लिखने का अनुरोध किया, कुछ तो अच्छे पदों पर है और अच्छे संस्थानों से भी पढ़े हुए भी है पर किसी ने यह अनुरोध नहीं स्वीकार किया, किसी ने समय का बहाना बनाया किसी ने दूसरे बहाने बनाए और आपने मेरे एक बार कहने पर ही अपने लेखों को प्रकाशन हेतु देना शुरू कर दिया।
प्रतीक्षा ने कहा, सहर्ष दरअसल बात यह नहीं है कि आपने इतने लोगों से कहा, ये कुछ गलत दरवाजे पर दस्तक देने जैसा है, आपने सही दरवाज़े पर दस्तक दी इसीलिए आपको अपनी पत्रिका के लिए लेखिका भी मिल गई।
अब तो आपकी पत्रिका के लिए कितने ही लेखक और लेखिकाओं ने अपनी रचनाएं देनी शुरू कर दी है।
सहर्ष ने कहा, आप सही कह रही हो प्रतीक्षा, मैंने ही सही दरवाजे पर दस्तक नहीं दी, आज आप और दूसरे रचनाकार मेरी पत्रिका के लिए लिख रहे हो और इससे पहले भी जो लोग कर सकते थे, जिनको मैं खुद को अभिव्यक्त करने का मौका देना चाहता था, उन्होंने नहीं लिखा।
प्रतीक्षा ने कहा, आप सही कह रहे हैं, लेखन के लिए लेखकों से कहना ही बेहतर है, बजाय इसके कि हम नये लोगों को लेखक बनाने का प्रयास करे।
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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आज हमारे पास अपने जीवन के उद्देश्य के लिए बहुत से विकल्प उपलब्ध है। पर क्या आपने कभी सोचा है? क्या यही उद्देश्य सबकुछ है?
हमारे पास दो तरह के जगत होते है- एक जिसमें हम खुद रहते है, एक जो हम अपने लोगों के साथ रहते है। मुझे ऐसा लगता है आप पहले खुद को एक मजबूत व्यक्तित्व बना लीजिए उसके बाद आप जो भी बनेंगे, शानदार बनेंगे। शानदार बनने के लिए जब आप खुद के साथ है उस वक्त खुद का ही परीक्षण कीजिए, आपने क्या किया है , क्या करना चाहते है, क्यों करना चाहते है? आपका करना सिर्फ आपके लिए है या दूसरों के लिए।
जीवन का उद्देश्य, जीवन की सार्थकता में होना चाहिए और जीवन की सार्थकता आपके काम में, और काम से ज्यादा काम के तरीके से और उसके पीछे आपकी पवित्र भावना से तय होती है। आप जो कर रहे है अगर कुछ भी न मिलने पर भी आप वो काम कर सकते है तो आप सही काम कर रहे है, हां वो काम नैतिक और संवैधानिक भी होना चाहिए।
काम से मिलने वाला आनंद ही काम से मिलने वाला सर्वोच्च पुरस्कार है।
-आइंस्टीन
हमारा काम ज्ञान से उत्पन्न, ईश्वर को समर्पित और पूरे मन से होना चाहिए।
ऐसा पवित्र कर्म ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए, हम कुछ भी करे पूरे मन से करे और पवित्र भाव से करे। पवित्र भाव पवित्र कर्म के प्रति ही होगा
- सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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शुभकामनाएं
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"कहूँ कहानी"- रमेश बत्रा |
https://www.youtube.com/watch?v=cYWZsheaqkE | एक लाजा है वो बहोत गलीब है |
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"परिचित"- डॉ. रामनिवास मानव |
https://www.youtube.com/watch?v=96H4nrWtfXk | दस के नोट |
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"नन्दा"-कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर |
https://www.youtube.com/watch?v=ql3mQ9zapXA | नंदा उस नींद में सो रहा था जिससे कोई नहीं जागा |
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भोज, प्रतिभा राय |
https://www.youtube.com/watch?v=c4_P-QvrcTM&t=1s | एक दिन होने वाले भोज की तैयारी पिछले 10 दिनों से |
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गालियां- चंद्रधर शर्मा गुलेरी |
https://www.youtube.com/watch?v=jGDKC4Lez5g | क्योंकि अब गलियाँ चुभती हैं | |
आनंद लीजिये इन कहानियों का चेतना को छूने वाली कथावस्तु और मन को बाँधने वाली आवाज में |
धन्यवाद की पात्र हैं वह लेखिका/लेखिका जिन्होंने ये कहानियां लिखी और वह वक्ता यानी नम्रता जी जिन्होंने अपनी आवाज में इन्हें हमारे लिए और सुलभ तथा रोचक बनाया |
बोलते तो सब हैं एक बोलना ये भी है कि आप किसी चेतना को छूने वाली कहानी को आवाज दें |
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शुभकामनाएं
| जिनावर - चित्रा मुगदल | https://www.youtube.com/watch?v=2xj4XDVv6aE | सारांश 3 मिनट के बाद शुरू होता है | |
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दौड़ लघु उपन्यास- ममता कालिया |
https://www.youtube.com/watch?v=AKruXIgPdvA | एक लघु उपन्यास |
| कामायनी - जयशंकर प्रसाद | https://www.youtube.com/watch?v=9PFfsgicNw4 | स्वर कृतिम बुद्धिमत्ता |
| मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी - मंत्र | https://www.youtube.com/watch?v=9WmyGjf739w | पूरी कहानी |
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निर्मोही-ममता कालिया की कहानी |
https://www.youtube.com/watch?v=AypnekxuCaI | अपनी रचनाओं में ममता कालिया जी न केवल महिलाओं से जुड़े सवाल उठाती हैं, बल्कि उन्होंने उनके उत्तर देने की भी कोशिश की हैं। |
आनंद लीजिये इन रचनाओं का और अपनी सोच को विस्तार दीजिये |
धन्यवाद की पात्र हैं वह लेखिका/लेखक जिन्होंने ये कहानियां लिखी और वह वक्ता जिन्होंने अपनी आवाज में इनके सारांश को हमारे लिए और सुलभ तथा रोचक बनाया|
बोलते तो सब हैं एक बोलना ये भी है कि आप किसी चेतना को छूने वाली कहानी को आवाज दें |
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शुभकामनाएं
अपने मन में खुशियों के दीप जलाये रखिये,
आपकी मुस्कान है बहुत अनमोल इसे अपने होठों पर बनाए रखिए।
- सौम्या गुप्ता
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