लगातार बारिश से हो रहे भूस्खलनों ने इंडोनेशिया और वियतनाम में दर्जनों लोगों की जान ले ली है। पुर्तगाल एक बवंडर की चपेट में आया और नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन से पता चलता है कि मुंबई में मॉनसून के दौरान होने वाली मौतों में से 8 फीसदी से अधिक बारिश की वजह से होती हैं। इनसे ज्यादातर कमजोर वर्ग के लोग प्रभावित होते हैं। इस वर्ष की पहली छमाही में ही मौसम संबंधी दिक्कतों के कारण 100 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ। यह भविष्य का जोखिम नहीं बल्कि यह बदलती जलवायु की कठोर हकीकत है।
- राज्यों में अधिक ऋण से सामान्य सरकारी ऋण और उधारी की जरूरतें बढ़ जाती हैं, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था के लिए धन की लागत प्रभावित होती है। राज्यों के बीच आय अंतर को कम करना और ऊंचे स्तर के ऋण मसले का समाधान करना प्रमुख नीतिगत चुनौतियां हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि वित्त आयोग इन मुद्दों से कैसे निपटता है।
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान जघन्य अपराधों में नाबालिगों की संलिप्तता बढ़ी है। दिल्ली के विजय विहार इलाके में लूटपाट का विरोध करने पर एक आटो चालक की हत्या के आरोप में पांच नाबालिगों की गिरफ्तारी से देश में पलती- बढ़ती एक चिंताजनक प्रवृत्ति और उसकी दिशा को समझा जा सकता है। अभी किसी भी स्तर पर इस बात की चिंता नहीं दिखती है कि बेरोजगार युवाओं या विद्यालय न जाने वाले किशोरों के भविष्य को संवारने लिए क्या किया जाए। उनके बीच से जो किशोर आपराधिक प्रवृत्ति की ओर कदम बढ़ा दे रहे हैं, उन्हें लेकर हमारी नीति क्या हो। यहां तक कि हम बच्चों को नैतिक और सामाजिक मूल्यों से लैस नहीं कर रहे। दूसरी ओर, समाज में अनेक तरह की बनती विपरीत स्थितियां किशोरों को अपराध के गर्त में धकेल रही हैं। राजधानी में वह आटो चालक महज अपनी रोजी-रोटी कमाने निकला था । मगर कुछ शातिर लड़के योजनाबद्ध तरीके से उसे सुनसान जगह ले गए और उससे लूटपाट की कोशिश करने लगे । जब आटो चालक ने इसका विरोध किया, तो आरोपियों ने उस पर चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर दिया। पकड़े जाने पर इन आरोपियों ने यह बात कबूली है कि वे नशे के आदी हैं और इसके लिए पैसे जुटाने के इरादे से उन्होंने वारदात को अंजाम दिया।
समझा जा सकता है कि अपराध के दलदल में धंसते कुछ किशोर किस तरह खतरनाक हो रहे हैं। दिल्ली में हुई यह ताजा घटना एक उदाहरण भर है। यह दुखद ही है कि पढ़ने-लिखने की उम्र में कई किशोर हथियार लेकर सड़कों पर चल रहे हैं और आए दिन लूटपाट से लेकर हत्या तक के जघन्य अपराध में लिप्त पाए जा रहे हैं। गंभीर अपराधों में संलिप्त नाबालिगों को लेकर कानून अस्पष्ट और लचर होने का ही परिणाम है कि उनका दुस्साहस लगातार बढ़ता चला गया है। यह देखा गया है कि जघन्य अपराधों को अंजाम देने वाले कई नाबालिगों पर बाल सुधार गृह में भेजने का भी कोई असर नहीं होता। खासतौर पर सुनियोजित तरीके से हत्या और बलात्कार जैसे अपराधों के नाबालिग आरोपियों के प्रति क्या नीति अपनाई जानी चाहिए, अब इस मसले पर सरकार और समाज को एक बार विचार करना होगा ।
- अपराध के पांव - संपादकीय जनसत्ता १७.११.२०२५
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
विकास की विपन्नता और समृद्धि के संकट क्या हैं ?
- पिछले कुछ दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों से आतंकियों के कई गुटों का जो भंडाफोड़ हुआ, वह चिंतित करने वाला ही है। यह गंभीर चिंता की बात है कि पढ़े-लिखे और यहां तक कि डाक्टर डिग्री धारक भी आतंक के रास्ते पर चल रहे हैं।
- एक के बाद एक कई आतंकी गुटों के भंडाफोड़ के बीच दिल्ली की घटना केवल यही नहीं बताती कि सुरक्षा एजेंसियों को और अधिक सतर्क रहना होगा, बल्कि इसकी भी मांग करती है कि मुस्लिम समाज का राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक स्तर पर नेतृत्व करने वाले यह देखें कि किन कारणों से उनके युवा आतंक की राह पर चल रहे हैं?
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
दुनिया भर में आर्थिक असमानता का लगातार बढ़ते जाना अब कई मायनों में चिंता का विषय बन गया है।
- आवारा श्वान समस्या का हल ?
- आज जब हम वंदे मातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने का पावन अवसर मना रहे हैं, यह केवल स्मरण का नहीं, बल्कि आत्मावलोकन का क्षण भी है। क्या हम उस भाव को जी पा रहे हैं, जिसके लिए असंख्य देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी ? क्या हम अपने जीवन में वही समर्पण, वही अनुशासन और वही मातृभूमि भक्ति स्थापित कर पाए हैं?
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स और दस्तावेजों पर आधारित और जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित ,संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
- शैक्षिक रैकिंग में हमारे शैक्षिक संस्थान क्यों पिछड़ रहे हैं?
- क्या मुनाफे और पर्यावरण को अलग करके देखना ठीक है?
- यह क्या बात हुई कि कोई कंपनी अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए पर्यावरण को प्रदूषित करना जारी रखे, ताकि बाद में उसके पर्यावरण के प्रति सजग शेयरधारक अपनी बढ़ी हुई संपत्ति का कुछ हिस्सा सफाई के लिए खर्च कर सकें? जबकि यह जाना-माना तथ्य है कि पर्यावरण में सुधार करना प्रदूषण को रोकने की तुलना में कहीं अधिक महंगा होता है।
- कैसे छुटकारा मिलेगा धनबल और बाहुबल की सियासत से?
- लवकुश कुमार
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स और दस्तावेजों पर आधारित और जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं |
भ्रामक प्रचार जिसका अर्थ है ऐसा प्रचार जो हमें भ्रम में डालता हो हमें सही चीजों से भटकाता हो, माने कि हमें सही चीजे न दिखा कर वो दिखाया जाए जिसके कारण हम उस संस्था की ओर आकर्षित हो सकें ।
विस्तार में समझते हैं:
जब हम कोचिंग संस्थानों में पढ़ने के लिए जाना चाहते हैं तो वहाँ पर हमको अध्यापको के पढ़ाने के तरीके जैसे- विश्लेषणात्मक व समीक्षात्मक व्याख्या करने का तरीका या उनकी अकादमिक योग्यता और अनुभव जैसे पहलुओं को देखना चाहिए। वहां पर अध्ययनरत छात्र छात्राएं विषय को कितना समझ पा रहे है यह जरूरी है। फिर यह भी आवश्यक है कि हमारे द्वारा यदि कोई प्रश्न पूछा जाता है तो क्या अध्यापक उसका सटीक उत्तर दे पा रहे हैं।
हम जब किसी संस्थान को चुने तो उसका कारण उपरोक्त होना चाहिए लेकिन भ्रामक प्रचार के चलते हम हाई रैंक और चकाचौंध देखने लगते है। इससे ज्यादातर संस्थानों में छात्रों की संख्या अमूमन बढ़ जाती है। जिसकी देखा देखी कभी-कभी समाज का दूसरा व्यवसायिक वर्ग भी भ्रम फैलाने की कोशिश करता है। वहीं दूसरी और छात्र वर्ग भी इस लालसा में कि कल प्रचार में इस फोटो की जगह मेरी फोटो होगी, वो भी इन संस्थानों का रूख करते हैं। और समय नष्ट करते हैं उचित मार्गदर्शन और पठन सामग्री के अभाव में।
इन सब का परिणाम ये होता है कि व्यवसायी वर्ग एक गलत चलन से अपना व्यवसाय आगे बढ़ाते हैं, वही छात्र वर्ग जब सालों मेहनत के बाद वो नहीं पाते, जो वो चाहते थे तो वो अवसाद और कभी-२ अति-अवसाद से घिर जाते है जो कभी-कभी आत्महात्या का
कारण भी बनता है। इसीलिए इन भ्रमों से बचना जरूरी है और कोचिंग चुनने का तरीका विश्लेषणात्मक और समीक्षात्मक हो।
एक और बात जो जुड़ी हुई है ऊपर के मुद्दे से वो है छात्रों की मानसिकता और कसौटी का जिसने कोचिंग संस्थानों को भ्रामक प्रचार का लालच दिया है वो है सूक्ष्म और विश्लेषणात्मक समझ की कमी और चकाचौंध के आधार पर आंकलन की ग़लत आदत, संस्थान का चुनाव उसकी पठन सामग्री और शिक्षण प्रक्रिया हो न कि उस संस्थान से कितने टापर निकले।
शुभकामनाएं
-सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
पिछले कुछ समय से आप एक स्वतंत्र लेखिका के रूप में वेबसाइट को सहयोग स्वरूप पाठकों के लिए ज्ञानवर्धक और विश्लेषणात्मक लेख उपलब्ध करा रही हैं जो आमजन के साथ सरकारी सेवाओं के अभ्यर्थियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी हैं।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें