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अमूमन ऐसा देखा गया है कि जब भी हम किसी को अपने से आगे बढ़ते हुए देखते हैं, पढ़ाई में खुद से आगे देखते हैं, या अच्छी स्थिति पर देखते हैं तो हमारे अंदर एक ईर्ष्या की भावना पैदा होती है।
क्या हमने कभी सोचा है कि ईर्ष्या के कारण हमारा क्या नुकसान होता है? सबसे पहला नुकसान ये होता है कि हम उस व्यक्ति से जिससे हम ईर्ष्या कर रहे है उससे सीखना बंद कर देते हैं, अब आप सोचेंगे कि हम सीखना कैसे बंद कर सकते हैं? आप सोचिए अगर आप से कोई पढ़ाई में आगे निकल गया है और आप उसके प्रति जलन की भावना रख रहे हैं तो आप कभी भी उससे बराबरी नहीं कर पाएंगे, लेकिन अगर आप उनसे पूछे कि आपने इतने अच्छे से सारी चीजें कैसे मैनेज कीं, आपने किस तरह से पढ़ाई की तो अगली बार आप भी बेहतर प्रदर्शन कर सकते हो। इस तरह से बहुत सारी चीजें हैं जो हम अपने से आगे बढ़ते हुए लोगों से सीख सकते हैं। लेकिन जलन की भावना जो होती है वह हमें सीखने से कहीं ना कहीं बहुत पीछे ले जाती है और जो हम अपना भी थोड़ा बहुत कर सकते थे, वह भी अच्छे से नहीं कर पाते इस तरह जो हमें होना चाहिए था हम वह भी नहीं हो पाते हैं और दूसरे से बेहतर वह भी कहीं न कहीं असंभव हो जाता है इसलिए ऐसे लोगों को अपनी आदत पर एक बार विचार करने की जरूरत हैं।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूटान यात्रा ने दो असमान शक्तियों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों के एक मॉडल को प्रतिबिंबित किया
-- नेपाल के विपरीत, वर्ष 2008 में भूटान के चुनावी लोकतंत्र में परिवर्तन ने भारत के साथ संबंधों को अस्थिर नहीं किया है।
- वर्ष 2007 में भूटान में राष्ट्रीय परिषद के लिए पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव हुए थे। उस समय भारत- भूटान संधि में एक महत्त्वपूर्ण संशोधन किया गया और उस उपबंध को बदल दिया गया जिसमें कहा गया था कि भारत विदेशी मामलों में भूटान का 'मार्गदर्शन करेगा। उसकी जगह लिखा गया कि दोनों देश 'एक दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान' करेंगे। दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ अपने क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं करने देने पर भी सहमत हुए। इस उपबंध का परीक्षण साल 2017 में भूटान के डोकलाम क्षेत्र पर चीन के कब्जे के दौरान हुआ था।
- मोदी ने भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड द्वारा निर्मित और भारत की वित्तीय मदद से तैयार 1,020 मेगावॉट की पुनात्सांग - 2 जलविद्युत परियोजना का उद्घाटन किया और देश में नई ऊर्जा परियोजनाओं के लिए 4,000 करोड़ रुपये के ऋण देने की घोषणा की।
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
- भूटान ने वर्ष 2023 से सीमा यातां पर सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर कर, दलाई लामा से दूरी बनाए रखते हुए, तथा तिब्बत के संदर्भ में औपनिवेशिक अर्थ को बदलते हुए चीन की चिंताओं को दूर करने का प्रयास किया है। इस वर्ष, चीनी नववर्ष का जश्न भूटान की राजधानी थिम्पू में मनाया गया ये कदम भले ही भूटान की व्यवहारिकता से प्रेरित हों, लेकिन ये भारत के लिए सतर्कता बरतने का एक संकेत हैं। इस लिहाज से मोदी की यात्रा को एक आवश्यक उपाय के रूप में देखा जा सकता है।
-- न्याय और नीति यही कहती है कि आरक्षण की व्यवस्था को इस तरह लागू किया जाए कि पात्र लोगों को ही उसका लाभ मिलना सुनिश्चित हो सके।
- एससी -एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्यवस्था बनाए जाने के पक्ष में न्यायाधीश गवई ने यह बिल्कुल सही कहा कि आइएएस और गरीब मजदूर के बेटों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
- ध्यान रखा जाना चाहिए कि आरक्षण का उद्देश्य वंचित एवं पिछड़े तबकों के उन लोगों के उत्थान के विशेष प्रयत्न किए जाना है, जो वास्तव में सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं। आम तौर पर सामाजिक रूप से ऐसे पिछड़े लोग आर्थिक रूप से भी कमजोर होते हैं। आरक्षण में क्रीमी लेयर के सिद्धांत को लागू करने के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि आरक्षित वर्ग के किसी व्यक्ति के उच्च पद पर पहुंच जाने के बाद भी कई बार उसे उपेक्षा या भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
-- भारत में भ्रष्टाचार कोई नई घटना नहीं है और न ही यह केवल भारत तक सीमित है बल्कि वास्तव में, भ्रष्टाचार दुनिया भर में पाया जाता है। हालांकि, जैसे-जैसे देश विकास की सीढ़ी पर चढ़ते हैं, भ्रष्टाचार आमतौर पर कम होता जाता है। भारत आजादी की अपनी 100वीं वर्षगांठ मनाने के वक्त तक एक विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा भी रखता है इसलिए उसे इस स्थानिक समस्या से निपटना ही होगा। यह देश की विकास की आकांक्षाओं को जो नुकसान पहुंचा रहा है, उसे अनदेखा करना बहुत बड़ी भूल होगी।
- 1990 के दशक से, कई शोधकर्ताओं ने भ्रष्टाचार के देश की आर्थिक वृद्धि पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया है। अध्ययनों से यह बात साबित हुई है कि भ्रष्टाचार वास्तव में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने, निजी निवेश, रोजगार सृजन और आय समानता के लिए कितना हानिकारक है। कुछ शोधकर्ताओं ने दिखाया है कि कैसे भ्रष्टाचार खराब गुणवत्ता वाले उत्पादों और सेवाओं, नागरिकों के लिए जीवन की निम्न गुणवत्ता और कुछ कंपनियों के ताकतवर समूह के दबदबे को बढ़ावा देता है।
- यह सर्वविदित है कि अधिकांश विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बहुत कम भ्रष्टाचार है, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि क्या विकास स्वचालित रूप से कम भ्रष्टाचार की स्थिति पैदा करता है या कम भ्रष्टाचार किसी देश को विकास की सीढि़यों की ओर ले जाता है। सहज ज्ञान कहता है कि बाद वाला अधिक संभावित है
- भ्रष्टाचार को कैसे कम किया जाए? कुछ विद्वान और प्रभावशाली व्यक्ति कहते हैं कि शिक्षा में, खासकर प्राथमिक स्तर से ही नैतिकता और सदाचार की एक मजबूत नींव, इस दिशा में मददगार साबित हो सकती है। हालांकि यह भी एक परिकल्पना ही है।
- आपके इस स्तंभकार का मानना है कि तीन चीजें भ्रष्टाचार को कम करने में मदद कर सकती हैं। पहला, नियामकीय जटिलता को हर क्षेत्र में सरल बनाना, चाहे वह भूमि अधिग्रहण हो या सीमा शुल्क से जुड़ा वर्गीकरण हो। इससे अफसरशाही की मदद लेने के अवसर कम होंगे।
- मजबूत सुरक्षा कवच कम करना होगा जिसका लाभ अफसरशाह, खासकर वरिष्ठ अधिकारी, जांच और मुकदमे के खिलाफ उठाते हैं। आज, जब तक सरकार मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं देती है तब तक कोई भ्रष्ट अधिकारी भी काफी हद तक सुरक्षित रहता है और सतर्कता विभागों को अक्सर ऐसी मंजूरी हासिल करना बहुत कठिन लगता है।
- हालांकि ये सुरक्षा अच्छे इरादों से तय की गई थी ताकि अफसरशाहों को उनके पेशेवर कर्तव्यों के दौरान लिए गए निर्णयों के लिए गलत तरीके से दोषी ठहराए जाने से बचाया जा सके। लेकिन समय के साथ इनका विपरीत प्रभाव पड़ा है। शायद अब एक आय और संपत्ति ऑडिट की आवश्यकता है जो हर 10 साल में किया जाना चाहिए और यह उन अधिकारियों के खिलाफ स्वचालित जांच और मुकदमे को मंजूरी दे जिनकी संपत्ति का स्रोत आय, निवेश रिटर्न या विरासत के आधार पर साबित न किया जा सके
- अंत में में, कानूनी प्रणाली में बड़े बदलाव की आवश्यकता है ताकि भ्रष्टाचार के मामले तीन दशक या उससे अधिक समय तक न खिंचें। भारत यदि एक विकसित देश बनना चाहता है तो इसे भ्रष्टाचार से निपटना होगा, लेकिन इसके लिए केंद्र और राज्य स्तर पर सरकारों को कठिन फैसले लेने होंगे भले ही वे राजनीतिक रूप से जोखिम भरे हों
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
हमारी जिंदगी के बहुत से पल और कभी-कभी ज्ञान न होने पर पूरी जिंदगी ही चार लोगों को खुश करने में, चार लोगों की बातें मानने में ही निकल जाती हैं। हम अक्सर इन चार लोगों के करण पछताते भी रहते हैं। अगर लड़का हो तो रो मत अगर लड़की हो तो ऐसे मत करो, वैसे मत बैठो, ये मत करो, ऐसे हंसो, धीरे हंसो, बहुत सी बातें हम लोगों को समाज के नाम पर सिखाई जाती है। इन चार लोगों के कारण हम दौलत, shauhrat और पता नहीं क्या-क्या चाहते हैं? लोगों की सराहना पाने के लिए हम बहुत कुछ करने को तैयार रहते हैं। और फिर भी लोग जब हमसे खुश नहीं होते हैं तो हम सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे? और ऐसे ही हमारी जिंदगी निकलती जाती है। लेकिन ये सोचने की बात है क्या सच में हमारी जिंदगी सिर्फ इन्हीं चार लोगों के लिए है हम अपनी मर्जी से अपनी जिंदगी क्यों नहीं जीते हमेशा ये चार लोग ही क्यों?
हमारी वास्तविकता यही है कि हम कभी भी लोगों के हिसाब से खुद को या खुद के हिसाब से लोगों को नहीं बदल सकते। अगर हम खुश रहना चाहते हैं तो सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम इन चार लोगों के सर्टिफिकेट पाने की कोशिश ना करें। हम जो बहुत से अच्छे लोग जो बातें कह गए हैं उनके बारे में सोचे, उन्हें पढ़े, अच्छे लोगों का साथ करें या अच्छी किताबों का साथ करे। ये चार लोग कभी बदलने वाले नहीं हैं। जो निष्कर्ष अच्छी किताबों और अच्छे लोगों से निकले उसके आधार पर निर्णय ले।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
मौसम विज्ञान विभाग
वसुधा अपना विस्तार लिए, सारे मौसम श्रृंगार किए,
कुछ गूढ़ रहस्यों से गुज़री।
कभी नभ में दिखती काली घटा, नीले सागर की नभ में छटा, गर्जन करती सहसा बिजली नभ से क्यों धरती पर उतरी?
क्यों प्यास भी प्यास से तड़पी है? उच्छवास वहां क्यों मरती है ?
क्यों दूजी और हवा शीतल? खुशियां भी हिलोरे हैं भरती |
क्यों सूर्य प्रखर और तीक्ष्ण यहां ? क्यों चंदा सा शीतल है वहां?
यहां बादल खेल रहे होली, क्यों ढूंढ रहे हैं वहां चोली?
क्या गोल धरा है इसीलिए, या मायाजाल कोई रचती ?
हाय! विपदा है कैसी अब आई? कुछ तो ये चेताती हरजाई| जिनको था भान वो बच भी गए, बिन ज्ञान के जान कहां आई?
कहीं उठती खुशियों की तफ़री, कहीं विपदा से उठती अर्थी |
पर जीवन सारे मोल समान,
चलते पटरी , उड़े आसमान,
चेतन के ऐसे भाव लिए,
नवयुग का मन उद्धार लिए,
खुलते रहस्य की धार लिए,
मानवता के प्रति बस प्यार लिए,
विज्ञान की गंगा भगीरथ संग,
आकाश से पृथ्वी पर उतरी|
इस ज्ञान की गंगा साथ लिए ,
सारे रहस्य को साथ लिए,
तारण करने मानवता का,
बस ज्ञान की बरछी हाथ लिए,
हर खतरे का आभास लिए,
इक सेना कुरुक्षेत्र उतरी|
कुछ घाव मिले थे अभावों में,
रहते थे पांव भी छालों में
हर मौसम का मौसम समझें,
जिज्ञासा थी मतवालों में,
"आदित्यात् जायते वृष्टिः" के कौर लिए वो थालों में,
चलते रातों में उजालों में।
अठरह सौ पचहत्र कलकत्ता,शिमला फिर पुणे से आगे
"अन्वेषण" के संस्कार लिए, वो सेना दिल्ली में ठहरी|
आकाश से धरती के मौसम,
हर राज्य बराबर संप्रेषण, विपदा का पूर्व ही अनुमान,
यदि नहीं तो रक्षित हो जीवन,
बस ऐसा सेवा भाव लिए,
मौसम विभाग ने भारत में कर लिया जनम |
मां जैसी सबकी बलाएं लिए,
और बहन सा राखी कवच लिए,
हर विपदा से रक्षा करने,
मौसम विभाग ने शपथ धरी ।
- संजय सिंह 'अवध'
ईमेल- green2main@yahoo.co.in
उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।
कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।
कविता में 'ज़ुबान खोजने' का क्या अर्थ है?
'ज़ुबान खोजने' का अर्थ है, बचपन की भोली-भाली बातों और मासूमियत को वापस पाना। यह उन शब्दों और भावनाओं को खोजने की बात करता है जो हम बड़े होते हुए खो देते हैं।
इस कविता का केंद्रीय विचार क्या है?
इस कविता का केंद्रीय विचार जीवन के सफर में बचपन की यादों को संजोना, सपनों को पुनर्जीवित करना और फिर से उड़ान भरने की प्रेरणा लेना है।
इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।
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आज से कुछ समय पहले पापा और उनके मित्र धर्म, राजनीति, समाज इन सब विषयों पर कुछ बातें कर रहे थे। उसी समय मैं वहां पहुंची और मैंने एक प्रश्न का उत्तर बहुत ही शानदार तरीके से दिया और कुछ देर तक मैं उन लोगों से बात भी करती रही जिन मुद्दों पर वे लोग बात कर रहे थे। पर मेरा तरीका थोड़ा सा तर्किक और अकादमिक स्तर का था। कुछ देर बाद ही पापा के मित्रों ने मुझे वहां से जाने के लिए कह दिया और कहा कि ये बाते बच्चों को नहीं करनी चाहिए। मुझे राजनीति, धर्म, समाज, दर्शनशास्त्र इन सभी विषयों पर बात करते हुए बहुत अच्छा लगता है और मुझमें इनकी एक स्तर की समझ भी है। मैंने उस समय सोचा कि क्यों मैं इन विषयों पर बात नहीं कर सकती?
शायद आज के समाज का एक हिस्सा लड़कियों को ऐसे मुद्दे जो पुरुषों के लिए ही समझे जाते थे उन पर लड़कियों को बात करने ही नहीं देना चाहता!
ऐसे लोगों को ये समझना चाहिए कि इस तरह वो दुनिया की आधी आबादी की विश्लेषण क्षमता और समझ का लाभ लेने से चूक रहे हैं, अगर न चूके तो दुनिया और बेहतर तथा संवेदनशील हो सकती है।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि अब सेवा निर्यात के क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में भारत के सेवा निर्यात में तेजी लाने के लिए सेवाओं की गुणवत्ता, दक्षता, उत्कृष्टता तथा सुरक्षा को लेकर और अधिक प्रयास करने होंगे
- अब हमें साफ्टवेयर निर्यात के लिए अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करनी होगी और सेवा निर्यात की संभावनाओं वाले अन्य देशों में कदम बढ़ाने होंगे। हमें नए दौर की तकनीकी जरूरतों और उद्योग की अपेक्षाओं के अनुरूप कौशल प्रशिक्षण से नई पीढ़ी को सुसज्जित करना होगा। सेवा निर्यात बढ़ाने के लिए शोध, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के मापदंडों पर आगे बढ़ना होगा। देश के कोने-कोने खासकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों को भी सेवा क्षेत्र से जोड़ने के प्रयास करने होंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसे प्रयासों से देश का सेवा क्षेत्र और सेवा निर्यात रफ्तार पकड़ेगा तथा इससे भारत को वर्ष 2027 तक दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और वर्ष 2047 तक विकसित देश बनाने के बड़े लक्ष्य को हासिल करने में भी मदद मिलेगी।
- गतिशीलता में भी चीन आगे है। उसने इलेक्ट्रिक वाहनों पर वर्चस्व स्थापित कर लिया है। 2024 में चीन ने वैश्विक इलेक्ट्रिक कार बिक्री का लगभग दो-तिहाई हिस्सा अपने नाम किया। घरेलू बाजार में हर महीने बेची जाने वाली आधी कारें इलेक्ट्रिक हैं और दुनिया के शीर्ष 10 इलेक्ट्रिक वाहन के ब्रांडों में से छह अब चीनी हैं। चीन के वाहन अब उभरते बाजारों पर कब्जा कर रहे हैं। चीन में 100 से अधिक कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहन बनाती हैं। एआइ के नए माडल बनाने में अब भी अमेरिका आगे है, लेकिन जब एआइ का फोकस “नवाचार” से “विस्तार” पर शिफ्ट हो रहा है, तो असली जीत सिर्फ माडल की बेंचमार्क से नहीं, बल्कि कंप्यूटर के लिए ऊर्जा, डाटा की उपलब्धता, नियामक गति और एप्लीकेशन अपनाने की दर से तय होगी।
-- ड्रोन विशेषज्ञ बाबी सकाकी के अनुसार, “डीडेआइ हर साल लाखों ड्रोन बना सकता है, जो अमेरिका की तुलना में सौ गुना अधिक है।” अमेरिका सबसे उन्नत युद्ध ड्रोन बनाता है, लेकिन उनकी कीमत 6 से 13 मिलियन डालर तक होती है। युद्ध के सिद्धांत अब सस्ते ड्रोन, मानव रहित विमान की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें चीन उत्कृष्ट है। इसी बीच अमेरिका के एफ-35 कार्यक्रम की कुल लागत 1.58 ट्रिलियन डालर तक पहुंच गई है, जिससे भविष्य के रक्षा निवेशों के लिए जगह घट गई है।
- वैश्विक स्तर पर बन रही इस स्थिति में प्रासंगिक बने रहने के लिए भारत को अपनी विकास रणनीति को तीन बातों पर केंद्रित करना चाहिए- बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन, अपने घरेलू बाजार से परे निर्यात बाजार की खोज और अग्रणी तकनीक तक पहुंच। इन तीनों में चीन का वर्चस्व है। भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” रणनीति समझदारी भरी है, लेकिन अब गणित कहता है कि थोड़ा झुकाव जरूरी है। जहां चीन के साथ गठबंधन भारत के हित में हो, वहां वह साझेदारी करे और बाकी मुद्दों को अलग रखे। इसका अर्थ चीन के अधीन होना नहीं है, बल्कि उन विशिष्ट मुद्दों पर सहयोग है, जो भारत की राष्ट्रीय क्षमताओं को मजबूत करें।
- भारत के तटीय क्षेत्र, पारिस्थितिकी रूप से सबसे नाजुक क्षेत्रों में से हैं।
- एआई के लिए डेटा केंद्र
इन संयंत्रों की पानी की जरूरतें बहुत ज्यादा होती हैं क्योंकि इनके कूलिंग तंत्र हर साल लाखों लीटर पानी इस्तेमाल कर सकते हैं। ज्यादातर इनकी स्थापना उन क्षेत्रों में हो रही है जहां पानी की कमी है, जैसे मुंबई और चेन्नई । कुछ परिचालक अब हवा से ठंडी करने वाली या क्लोज्ड लूप सिस्टम अपना रहे हैं, लेकिन ये विकल्प अब भी सीमित हैं। कई केंद्र अब भी पानी की बहुत खपत करने वाले वाष्पीकरण कूलिंग पर निर्भर हैं। डेटा केंद्र बड़ी मात्रा में बिजली की भी खपत करते हैं। वैश्विक अनुमान बताते हैं कि वर्ष 2030 तक, वे दुनिया की 8 फीसदी तक बिजली उपयोग कर सकते हैं। भारत में, इस क्षेत्र की बढ़ती बिजली की मांग ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव डालती है। भारत का ग्रिड अब भी काफी हद तक जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है, जिससे कार्बन उत्सर्जन को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
- दुनिया भर की समाचार रिपोर्ट (ब्राजील, ब्रिटेन, चिली, आयरलैंड, मलेशिया, मेक्सिको, नीदरलैंड, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका और स्पेन से ) यह दर्शाती हैं कि जैसे-जैसे तकनीकी कंपनियां एआई को आगे बढ़ाने के लिए डेटा सेंटर बना रही हैं, वैसे ही कमजोर समुदायों को बिजली कटौती और पानी की कमी का सामना करना पड़ा है। इन गैर-टिकाऊ पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले तरीकों को लगातार जारी रखने से रोकने के लिए, भारत को डेटा केंद्र विस्तार के हर चरण में पर्यावरणीय स्थिरता को शामिल करना होगा। इसका मतलब है कि अक्षय बिजली स्रोतों का उपयोग करना, ऊर्जा कुशल बुनियादी ढांचा अपनाना और साथ ही, अत्याधुनिक कूलिंग तथा पानी को रिसाइक्लिंग करने वाली प्रणालियां लागू करना जरूरी है।
- डिजाइन और संचालन में टिकाऊपन को शामिल कर भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि डेटा संचालित उसकी यह वृद्धि आर्थिक और तकनीकी लक्ष्यों का समर्थन करे और साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी करे तथा कार्बन उत्सर्जन कम करे। हरित बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित कर, कुशल जल प्रबंधन और अक्षय ऊर्जा को अपनाकर, भारत खुद को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार डिजिटल विकास में एक वैश्विक अगुआ के रूप में स्थापित कर सकता है।
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
जानकारी 15.11.2025
- हाल में आए एक आंकड़े से पता चला कि चीन अमेरिका की तुलना में 2.5 गुना ज्यादा बिजली उत्पन्न करता है और उसका लक्ष्य हर साल “एक जर्मनी” के बराबर बिजली उत्पादन जोड़ने का है। एलन मस्क का भी कहना है कि अगले तीन-चार वर्षों में चीन में सौर ऊर्जा का उत्पादन अमेरिका के सभी स्रोतों से संयुक्त रूप से अधिक होगा। वास्तव में भविष्य को आकार देने वाली तकनीक के युग में चार तकनीकें तय करेंगी कि कौन आगे रहेगा- ऊर्जा, गतिशीलता (मोबिलिटी), एआइ और युद्ध की रणनीति (वारफेयर)।
- 2024 में चीन ने 14.4 गीगावाट हाइड्रोपावर जोड़ी, जो कई देशों के कुल उत्पादन से अधिक है और 58.7 गीगावाट पंप्ड-स्टोरेज हाइड्रो तक पहुंच गया है एवं 200 गीगावाट से अधिक निर्माणाधीन है। वह परमाणु ऊर्जा में भी सक्रिय है, जहां 30 रिएक्टर निर्माणाधीन हैं। कम वाणिज्यिक बिजली दरों और विशाल विनिर्माण की बदौलत बैटरी क्षेत्र में चीन ने फिर से ग्लोबल सप्लाई-चेन रैंकिंग में पहला स्थान हासिल किया है। सौर विनिर्माण की हर अवस्था में चीन की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक है। ऊर्जा वह कच्चा माल है, जो बाकी सभी मूलभूत तकनीक को चलाएगा। चीन इसमें में काफी आगे निकल चुका है और उन कीमतों पर, जिनसे कोई मुकाबला नहीं कर सकता।
-- सच्चाई यह है कि जहां अमेरिका बेहतर माडल बनाने का जश्न मना रहा है, वहीं चीन ने यह सुलझा लिया है कि उन्हें वास्तव में चलाएगा कौन। पिछले कुछ वर्षों में युद्ध का स्वरूप भी बदल गया है। अब युद्ध सस्ते ड्रोन और घूमने वाले गोला-बारूद से लड़े जा रहे हैं, न कि महंगे टैंकों और विमानों से। ड्रोन निर्माण में चीन का वर्चस्व है। उसकी कंपनी डीडेआइ के पास वैश्विक ड्रोन बाजार का 70 प्रतिशत हिस्सा है। इसके मैविक ड्रोन के माडल 300 से 5,000 डालर के बीच आते हैं।
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
अरे राजेश, ये किताब क्यों पैक कर रहे लिफाफे में?
मनीष भाई, गिफ्ट पैक हो रहा है गिफ्ट, अपने अतुल भाई की शादी के लिए।
अबे ! शादी में किताब कौन देता है?
क्यों? जरूरी है क्या जो परंपरा चल रही है उसी हिसाब से चले, कुछ नया नहीं कर सकते ?
भाई, मेरा मतलब है कि एंजॉयमेंट के दिन किताब !
अरे मनीष भाई उस दिन पढ़ने के लिए थोड़ी न है, यह तो एक पहल है कि जब दो लोग एक साथ मिल रहे हैं, एक दूसरे को उन्नति देने, एक दूसरे का साथ देने, एक दूसरे का ख्याल रखने को तो क्यों ना उस नेक काम की शुरुआत के आधार में एक अच्छी किताब हो, जिसकी कहानियां, नवयुगल में संवेदनशीलता लाएं, परस्पर सम्मान की भावना लाएं, एक दूसरे की गरिमा का सम्मान करने की इच्छा लाए, एक दूसरे की व्यक्तिगत चॉइस के साथ सामंजस्य बनाने की और समन्वय स्थापित करने की क्षमता निर्माण पर इशारा करें। इससे बढ़िया गिफ्ट और क्या हो सकता है जो उनकी शादी में प्रेम और आपसी सम्मान भरे और असहमति के बजाय सहमति के मुद्दों पर जोर देने को प्रेरित कर, हर निर्णय के केंद्र में जीवन की शांति को रखने को प्रेरित करें।
वह राजेश भाई बढ़िया लेक्चर देते हो, लेक्चर बाज आदमी हो एकदम, हाहाहा....
हां भाई क्यों नहीं, मेरे लेक्चर से अगर किसी के जीवन में शांति आ जाए तो मैं लेक्चर बाज ही सही।
दोनों हंसने लगते हैं..
एक नई पहल, एक बेहतरीन किताब, एक अमूल्य भेंट का रूप ले चुकी थी।
- लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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मधुरिमा को खिलखिलाते हुए हंसते देखकर
चेष्टा ने चौंक कर पूछा, अरे मधुरिमा तुम तो कह रही थी कि हंसना भूल गई हो, केवल मुस्कुराती हो, यह अचानक बदलाव कहां से आ गया कि इतना खुलकर हंस रही हो ?
मधुरिमा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, हां चेष्टा पहले मैं मुस्कुराती ही थी बस क्योंकि कुछ उत्साह की कमी थी, कुछ निराशा के बादल थे, लेकिन अब कुछ लोगों से मिलकर, उनसे बात करके यह समझ आया है कि संघर्ष और दिक्कतें बहुत लोगों के जीवन में रहती हैं। हमें यह सोचकर निराश नहीं रहना चाहिए कि हमारे पास समय या संसाधन कम हैं, हमारा नजरिया यह होना चाहिए कि कुछ लोगों के पास इतने भी संसाधन नहीं है, तो क्यों ना इतने ही संसाधनों में जो बेहतर हो सके वह करें हम क्यों उस चीज के पीछे भागे जिसके लिए संसाधन नहीं है, फिलहाल जिन चीजों के लिए संसाधन है उनके लिए प्रयास करें, अपने पैरों पर खड़े हों और अपने इन्हीं कम संसाधनों में ही हम अपने से भी कम संसाधनों वाले लोगों की मदद कर सकते हैं और दूसरों के लिए की गई मदद से जो संतुष्टि की अनुभूति होती है वह लाजवाब है। उस अनुभूति ने ही मुझे ये हौसला दिया है कि मैं बहुत बड़ा भले कुछ ना कर पाऊं लेकिन अपने पैरों पर खड़े होकर कुछ लोगों के जीवन में मुस्कान ला सकती हूं और यह स्पष्टता और विश्वास मुझे इस योग्य बनाता है कि मैं अपनी परिस्थितियों पर ही हंस सकूं और यह परिस्थितियां मुझ पर नहीं, मैं इन परिस्थितियों पर हंस सकूं। ये मेरी खिलखिलाहट भरी हंसी इस विजय का प्रतीक है।
- लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
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