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सेवा निर्यात की मौजूदा प्रगति देश में हो रहे संरचनात्मक सुधारों, तकनीकी विकास और नई पीढ़ी की उच्च कौशल युक्त क्षमताओं का परिणाम है। गौरतलब है कि सेवा निर्यात में सूचना प्रौद्योगिकी, वाणिज्य, बैंकिंग, वित्त, बीमा, पर्यटन, आतिथ्य, शिक्षा, चिकित्सा और कृत्रिम मेधा जैसी सेवाओं का निर्यात शामिल है
- भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) खोलने में आई तेजी से भी सेवा निर्यात बढ़ रहा है। नैसकाम और जिनोव की ओर से जारी इंडिया जीसीसी-लैडस्केप रपट के मुताबिक, जीसीसी के लिए भारत दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बन रहा है।
- फिलहाल देश में 1800 से अधिक जीसीसी हैं, जिनसे 21 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। दुनिया के करीब पचास फीसद जीसीसी सिर्फ भारत में हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जीसीसी का योगदान 1.5 फीसद से अधिक है, जो वर्ष 2030 तक 3.5 फीसद हो जाएगा। जीसीसी प्रमुख रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, उपभोक्ता सेवाएं, वित्त, मानव संसाधन और अनुसंधान एवं विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि भारत में कृत्रिम बुद्धिमता और डेटा विश्लेषण जैसे क्षेत्रों में शोध एवं विकास तथा नवउद्यम के अनुकूल माहौल से अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने केंद्र यहां खोलना चाहती हैं।
- इसमें दोराय नहीं कि सेवा निर्यात भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अहम पहलू बन गया है। इससे न केवल विदेशी व्यापार घाटे को थामे रखने में मदद मिल रही है, बल्कि देश में रोजगार निर्माण में भी इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। नीति आयोग की नई रपट में कहा गया है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान 55 फीसद से अधिक है और लगभग 18.8 करोड़ लोगों को यह रोजगार से जोड़ता है। सेवा क्षेत्र ने पिछले छह वर्षों में चार करोड़ अतिरिक्त रोजगार पैदा किए हैं। देश का सेवा निर्यात 14.8 फीसद की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ रहा है, जो वस्तु निर्यात के 9.8 फीसद से कहीं ज्यादा है।
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
पिछले कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन का भारत समेत पूरी दुनिया में प्रभाव साफ दिखने लगा है। ब्राजील के बेलेम में आयोजित काप 30 सम्मेलन में बुधवार को जारी 'जलवायु जोखिम सूचकांक-2026' की रपट में कहा गया है कि जलवायु आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित देशों में भारत नौवें स्थान पर है। पिछले तीन दशकों में देश में जलवायु आपदाओं के कारण करीब अस्सी हजार लोगों की जान जा चुकी है।
- अगर वैश्विक स्तर पर बात करें तो पिछले तीन दशकों में नौ हजार से अधिक मौसमी आपदाओं ने आठ लाख से ज्यादा लोगों की जिंदगी लील ली है। यह बात छिपी नहीं है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर उन्हीं विकासशील देशों को झेलना पड़ रहा है, जिनकी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भागीदारी सबसे कम है। विकासशील देश कमजोर सहन क्षमता और अनुकूलन के सीमित संसाधनों के कारण ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
- भारत सहित कई विकासशील देशों में जलवायु आपदाएं सामान्य स्थिति बनती जा रही हैं, जिसके लिए तत्काल और व्यापक वित्त पोषित अनुकूलन उपायों की जरूरत है। यह जगजाहिर है कि कार्बन उत्सर्जन के मामले में विकसित देशों का योगदान सबसे ज्यादा है, इसलिए अनुकूलन उपायों को लेकर उनकी जिम्मेदारी भी अधिक होनी चाहिए। उनकी भूमिका सिर्फ वित्तीय सहायता और तकनीकी सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कार्बन उत्सर्जन में कमी और कमजोर देशों के अनुकूलन प्रयासों का समर्थन करना भी शामिल है।
- भारत सेवा निर्यात में भले ही नई ऊंचाई हासिल करते हुए वैश्विक सेवा निर्यात का एक प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, मगर इस मामले में उसके सामने चुनौतियां भी कम नही हैं। इनमें सेवाओं की गुणवत्ता, दक्षता, सभी क्षेत्रों में कारोबार बढ़ाने, ग्रामीण और छोटे शहरों में शोध एवं नवाचार के साथ-साथ युवाओं में कृत्रिम मेधा (एआइ) जैसे कौशल विकसित करने की चुनौतियां प्रमुख हैं।
- सेवा निर्यात की मौजूदा प्रगति देश में हो रहे संरचनात्मक सुधारों, तकनीकी विकास और नई पीढ़ी की उच्च कौशल युक्त क्षमताओं का परिणाम है। गौरतलब है कि सेवा निर्यात में सूचना प्रौद्योगिकी, वाणिज्य, बैंकिंग, वित्त, बीमा, पर्यटन, आतिथ्य, शिक्षा, चिकित्सा और कृत्रिम मेधा जैसी सेवाओं का निर्यात शामिल है
- भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) खोलने में आई तेजी से भी सेवा निर्यात बढ़ रहा है। नैसकाम और जिनोव की ओर से जारी इंडिया जीसीसी-लैडस्केप रपट के मुताबिक, जीसीसी के लिए भारत दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बन रहा है।
- - फिलहाल देश में 1800 से अधिक जीसीसी हैं, जिनसे 21 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। दुनिया के करीब पचास फीसद जीसीसी सिर्फ भारत में हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जीसीसी का योगदान 1.5 फीसद से अधिक है, जो वर्ष 2030 तक 3.5 फीसद हो जाएगा। जीसीसी प्रमुख रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, उपभोक्ता सेवाएं, वित्त, मानव संसाधन और अनुसंधान एवं विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- ओपन एआइ के प्रमुख सैम आल्ट मैन के मुताबिक, कृत्रिम बुद्धिमता के लिए दुनिया में भारत दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। वहीं, गुगल के सीईओ सुंदर पिचाई का मानना है कि भारत इस क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व कर सकता है। इस समय भारत में कृत्रिम बुद्धिमता पारिस्थितिकी तंत्र का काफी तेजी से विस्तार हो रहा है। इस वर्ष भारत का कृत्रिम बुद्धिमता का बाजार 13.05 अरब डालर मूल्य की ऊंचाई पर है, जिसका आकार वर्ष 2032 में 130.63 अरब डालर तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। भारत में प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमता पारिस्थितिकी तंत्र में वर्तमान में साठ लाख से अधिक लोग कार्यरत हैं। देश में लगभग 1.8 लाख नवउद्यम हैं और पिछले वर्ष शुरू किए गए नवउद्यमों में से करीब 89 फीसद ने अपने उत्पादों या सेवाओं में कृत्रिम बुद्धिमता का उपयोग किया है।
-इसमें दोराय नहीं कि सेवा निर्यात भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अहम पहलू बन गया है। इससे न केवल विदेशी व्यापार घाटे को थामे रखने में मदद मिल रही है, बल्कि देश में रोजगार निर्माण में भी इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। नीति आयोग की नई रपट में कहा गया है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान 55 फीसद से अधिक है और लगभग 18.8 करोड़ लोगों को यह रोजगार से जोड़ता है। सेवा क्षेत्र ने पिछले छह वर्षों में चार करोड़ अतिरिक्त रोजगार पैदा किए हैं। देश का सेवा निर्यात 14.8 फीसद की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ रहा है, जो वस्तु निर्यात के 9.8 फीसद से कहीं ज्यादा है।
- ऐसे में भारत को सेवा क्षेत्र को और मजबूत करते हुए सेवा निर्यात में तेजी लाने की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। इस बात पर ध्यान देना होगा कि अभी भी भू-राजनीतिक रूप से भारत का सेवा क्षेत्र देश की व्यापक आर्थिक असमानता को दर्शाता है। देश में कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और तमिलनाडु उच्च मूल्य वाली सेवाओं मसलन- सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त और अचल संपत्ति में दबदबा रखते हैं
- इसमें कोई संदेह नहीं हैं कि देश अपने संरचनात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, और अर्थव्यवस्था के औपचारिक एवं शहरीकृत होने के साथ-साथ सेवा क्षेत्र में और भी ज्यादा कर्मचारियों को शामिल करने की क्षमता मौजूद है।
- सेवा क्षेत्र में लैंगिक समानता पर भी ध्यान देना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 10.5 फीसद महिलाएं सेवा क्षेत्र में कार्यरत हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 60 फीसद है।
- यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि अब सेवा निर्यात के क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में भारत के सेवा निर्यात में तेजी लाने के लिए सेवाओं की गुणवत्ता, दक्षता, उत्कृष्टता तथा सुरक्षा को लेकर और अधिक प्रयास करने होंगे
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
चलो जवानी की गलियों में,
बचपन की मुस्कानखोजने,
चालाकी से भरे स्वरों में,
वो मासूम ज़ुबान खोजने,
"आँखों में" खिलते सपनों से,
नींदें जो भी टूट गई थी,
चलो आज फिर उन
"नींदों में" फिर से
वही उड़ान खोजने।
- संजय सिंह 'अवध'
ईमेल- green2main@yahoo.co.in
उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।
कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।
कविता में 'ज़ुबान खोजने' का क्या अर्थ है?
'ज़ुबान खोजने' का अर्थ है, बचपन की भोली-भाली बातों और मासूमियत को वापस पाना। यह उन शब्दों और भावनाओं को खोजने की बात करता है जो हम बड़े होते हुए खो देते हैं।
इस कविता का केंद्रीय विचार क्या है?
इस कविता का केंद्रीय विचार जीवन के सफर में बचपन की यादों को संजोना, सपनों को पुनर्जीवित करना और फिर से उड़ान भरने की प्रेरणा लेना है।
इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।
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एक बचपन का जमाना था,
जिस में खुशियों का खजाना था..
चाहत चाँद को पाने की थी,
पर दिल तितली का दिवाना था..
खबर ना थी कुछ सुबहा की,
ना शाम का ठिकाना था..
थक कर आना स्कूल से,
पर खेलने भी जाना था..
माँ की कहानी थी,
परीयों का फसाना था..
बारीश में कागज की नाव थी,
हर मौसम सुहाना था..
हर खेल में साथी थे,
हर रिश्ता निभाना था..
गम की जुबान ना होती थी,
ना जख्मों का पैमाना था..
रोने की वजह ना थी,
ना हँसने का बहाना था..
क्युँ हो गऐे हम इतने बडे,
इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था।
इसलिए चाहे सिर पर न हो बाल
तब भी जीवन जियो बच्चों सा धमाल
यदि है जीवन में कुछ उमंग
कुछ शौक, कुछ तरंग
लगते हो तब ही जीवित से
वरना लगे जीवन में है बैरंग
बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
- डॉ अनिल वर्मा
डॉ अनिल वर्मा, कृषि रसायन में परास्नातक हैं और गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर उत्तराखंड में कृषि रसायन पर शोध कार्य कर चुके हैं।
इनके द्वारा शिक्षण और साहित्य के अध्ययन/अध्यापन का अनुभव एक बेहतर समाज के लिए उपयोगी है |
इस वेबसाइट पर लेखक द्वारा व्यक्त विचार लेखक/कवि के निजी विचार हैं और लेखों पर प्रतिक्रियाएं, फीडबैक फॉर्म के जरिये दी जा सकती हैं|
अलग-अलग रंगरूप हमारे, दिल की धड़कन एक है।
जाति अलग है, धर्म अलग है, छत पर आकाश एक है।
अलग-अगल है धन की माया,
अलग-अगल है सबकी काया,
पर सबके पैरों के नीचे, देखो धरती एक है।
अलग-अलग है भाषा सबकी,
अलग-अलग हैं व्यंजन सबके,
'थोड़ा सा और लीजिए न' ये भाव तो एक है।
अलग-अलग है ईष्ट हमारे,
अलग-अलग है मंदिर - मस्जिद,
पर सभी ईष्टों का संदेश 'सेवा भाव' भी एक है।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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शुभकामनाएं
तुम स्वप्न से भरी उड़ान भरो, मैं उसका कारण बन जाऊँ,
नीले अम्बर में प्राण भरो, उसका संसाधन बन जाऊँ
नयनों में समेटे ये धरती, आकाश से भी रिश्ता जोड़ो.
निर्भीक सी सभी उड़ान भरो, भय का निष्कासन बन जाऊँ।
निष्पादित हो नियमों से कर्म, नियमों की मूरत बन जाऊँ,
हर सूरत कर्म का पालन हो, मैं ऐसी सूरत बन जाऊँ,
जो हो संरक्षा की बातें, तो नाम शीर्ष पर आ जाए,
पर्याय रहूं संरक्षण का, मैं वहीं ज़रुरत बन जाऊं।
तुम नभ से भी ऊंचा उड़ना, बेफिक्र बादलों से लड़ना,
हो तूफानों से मिलन कभी, तुम चीर उन्हें आगे बढ़ना,
ये हाथ, ये साथ, ये परवाज़े, सब जुड़े अटूट डोर से हैं,
इक छोर डोर की तुम बनना, दूजी वो छोर मैं बन जाऊं।
- संजय सिंह 'अवध'
ईमेल- green2main@yahoo.co.in
उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।
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उक्त कविता अपने पूरे अर्थ में सुधी पाठकों को स्पष्टता दे सके आइए इसके लिए एक छोटी सी प्रश्नोत्तरी से गुजर लिया जाए।
*कविता में 'उड़ान' का क्या अर्थ है?*
कविता में 'उड़ान' का अर्थ है सपने देखना, ऊंचाइयों को छूना, और जीवन में आगे बढ़ना। यह बाधाओं का सामना करने और निडर होकर आगे बढ़ने का प्रतीक है।
*कविता में कवि खुद को किस रूप में प्रस्तुत करता है?*
कविता में कवि खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है जो उड़ान भरने वाले का समर्थन करता है, उसके सपनों को साकार करने में मदद करता है, और हमेशा उसके साथ रहता है। वह प्रेरणा, सुरक्षा और मार्गदर्शन का प्रतीक है।
*कविता में 'भय का निष्कासन' का क्या मतलब है?*
कविता में 'भय का निष्कासन' का मतलब है डर को दूर करना, निडर बनना, और आत्मविश्वास के साथ जीवन जीना। यह उन बाधाओं और चुनौतियों का सामना करने का प्रतीक है जो हमें हमारे सपनों को पूरा करने से रोकती हैं।
*कविता में 'नियमों की मूरत बनना' का क्या तात्पर्य है?*
कविता में 'नियमों की मूरत बनना' का अर्थ है नैतिक मूल्यों और सिद्धांतों का पालन करना, सही राह पर चलना, और दूसरों के लिए प्रेरणा बनना।
*कविता का केंद्रीय संदेश क्या है?*
कविता का केंद्रीय संदेश है सपनों का पीछा करना, बाधाओं का सामना करना, और हमेशा समर्थन और सुरक्षा की भावना के साथ जीवन जीना। यह प्रेरणा, साहस और आशा का संदेश देती है।
इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।
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श्री संजय सिंह, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में सन् २०१२ से वायु यातायात नियंत्रण अधिकारी (ATCO) के रूप में कार्यरत हैं।
“अवध” ये उपनाम इन्हें विद्यालय के दिनों में अपने भूगोल के अध्यापक से उपाधि के रूप में प्राप्त हुआ जिन्होंने इनको इस उपनाम से लिखने को प्रेरित किया।
केंद्रीय विद्यालय बैरागढ़ भोपाल से विद्यालयीन शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात, संजय सिंह “अवध” ने राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय भोपाल से इंजीनियरिंग में स्नातक प्राप्त किया।
बचपन से ही लेखन के शौकीन संजय सिंह “अवध” अभी तक कई सारे मंचों पर भी अपनी कविताओं की प्रस्तुति दे चुके हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।
आपने युवाओं से जुड़ने और उन्हें अनुनादित कर उनका श्रेष्ठ बाहर लाने के लिए अपना यूट्यूब चैनल ( यहां क्लिक करें ) भी बनाया है।
जैसा कि आपकी एक कविता उड़ान में उद्धृत है आप इस बात के हिमायती हैं कि व्यक्ति को खुलकर, अपने काम में उत्कृष्टता के दम पर ऊंची से ऊंची उड़ान को ध्येय बनाकर नैतिकता का साथ लिए हुए प्रयासरत रहना चाहिए।
क्योंकि आप शतरंज और बैडमिंटन भी खेलते हैं शौकिया तौर पर इस तरह खेल भावना भी झलकती है आपकी रचनाओं में, इसके साथ ही देश के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर अपनी सेवाएं देने का जो अवसर मिला और उससे प्राप्त अनुभव का पुट भी रहता है आपकी रचनाओं में और ये तत्व इन्हें एक अलग ही कलेवर देते हैं जो पाठकों में रुचि जगाने और स्पष्टता देने में सफल साबित होता है।
लेखक, कवि और चिंतक, श्री संजय सिंह 'अवध' की रचनाओं को उनके ब्लॉग ( यहां क्लिक करें ) से भी पढ़ा जा सकता है और उनकी ईमेल से उनसे संपर्क साधा जा सकता है - green2main@yahoo.co.in
युवाओं से संपर्क में नियमितता बनी रहे इसके लिए आपका वाट्सऐप चैनल ( यहां क्लिक करें ) भी है।
ज्यादा से ज्यादा लोग लाभान्वित हों आपकी रचनाओं से, इसी विश्वास के साथ।
- लवकुश कुमार
जलवायु परिवर्तन पर शुरू हुई 'संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन' की 30वीं वार्षिक बैठक में दोनों देशों, भारत और चीन की परिवर्तनकारी भूमिका की सराहना की गई।
- साथ ही कहा गया कि इन देशों ने जलवायु कार्रवाई को स्पष्ट तरीके से अपनाया है और वे दुनियाभर में स्वच्छ प्रौद्योगिकियों की लागत कम करने में मदद कर रहे हैं ।
- महाराष्ट्र के सांगली जनपद के मोहित्यांचे वडगांव (जिसे संक्षेप में वडगांव कहा जाता है) में हर शाम सात बजे भैरवनाथ मंदिर से 45 सेकंड के लिए एक सायरन ध्वनि गूंजती है, जो किसी चीनी मिल या अन्य औद्योगिक इकाई के कर्मचारियों के लिए बजने वाले सायरन से भिन्न है। यह ध्वनि दरअसल एक सूचना है कि अगले 90 मिनट (7 से 8:30 बजे तक) सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण- मोबाइल, टीवी इत्यादि बंद रहेंगे। दूसरा बजने वाला सायरन इस अवधि की समाप्ति की सूचना देता है।
- वर्तमान दौर में स्मार्टफोन और टीवी हमारे रोजमर्रा के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं, पर वडगांव ने इसको चुनौती दी है। इस गांव में लगभग 3,000 से 3,500 लोग रहते हैं। अधिकतर किसान या चीनी मिल श्रमिक हैं, जो प्रत्येक शाम डेढ़ घंटे के लिए 'डिजिटल डिटॉक्स' का पालन करते हैं । 15 अगस्त, 2022 को देश के स्वतंत्रता दिवस पर प्रारंभ हुई यह पहल अब न केवल ग्रामीण संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है, बल्कि आस-पास के गांवों के लिए भी प्रेरणास्त्रोत बन गई है।
- जब लक्ष्य सकारात्मक बदलाव का हो, तब समाज भी साथ आ खड़ा होता है। डिजिटल डिटॉक्स मुहिम का परिणाम यह हुआ कि एक माह में ही अंतर साफ दिखने लगा। छात्रों के अध्ययन में सुधार हुआ, रचनात्मकता में वृद्धि हुई और स्कूल में उनके व्यवहार में और स्पष्ट बदलाव नोटिस किया गया।
- जैसे-जैसे डिजिटल दुनिया विस्तृत हो रही है, वडगांव मॉडल जैसे प्रयोगों की अहमियत बढ़ती जा रही है। समाज को फिर से जोड़ने और संबंधों को पुनर्जीवित करने में ये रामबाण बन सकते हैं। इस पहल ने एक बार फिर हमें स्मरण कराया है कि तकनीक मनुष्य की सहजता के लिए है, न कि स्वामी बनने के लिए।
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
जलवायु परिवर्तन से उपजे संकट से निपटने के लिए वर्ष 2015 में वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ था। इसका मुख्य लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना था
- विकासशील देश इस दिशा में आगे बढ़ने का इरादा रखते हैं, लेकिन वित्तीय और तकनीकी चुनौतियां उनकी राह में रोड़े अटका रही हैं। इसके बावजूद भारत और चीन जैसे देश पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश कर रहे हैं।
- जलवायु परिवर्तन पर शुरू हुई 'संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन' की 30वीं वार्षिक बैठक में इन दोनों देशों की परिवर्तनकारी भूमिका की सराहना की गई।
- पेरिस समझौते में तय हुआ था कि विकसित देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकासशील देशों की वित्तीय और तकनीकी रूप से मदद करेंगे। मगर संयुक्त राष्ट्र की हाल की एक रपट बताती है कि यह वित्तीय मदद लगातार घट रही है । विकासशील देशों को वर्ष 2035 तक अपने लक्ष्यों को पाने के लिए हर साल 365 अरब डालर की जरूरत है, लेकिन वर्ष 2023 में इन देशों को केवल 26 अरब डालर की अंतरराष्ट्रीय सहायता मिल पाई, जो वर्ष 2022 के 28 अरब डालर से भी कम है।
- महाराष्ट्र के सांगली जनपद के मोहित्यांचे वडगांव (जिसे संक्षेप में वडगांव कहा जाता है) में हर शाम सात बजे भैरवनाथ मंदिर से 45 सेकंड के लिए एक सायरन ध्वनि गूंजती है, जो किसी चीनी मिल या अन्य औद्योगिक इकाई के कर्मचारियों के लिए बजने वाले सायरन से भिन्न है। यह ध्वनि दरअसल एक सूचना है कि अगले 90 मिनट (7 से 8:30 बजे तक) सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण- मोबाइल, टीवी इत्यादि बंद रहेंगे। दूसरा बजने वाला सायरन इस अवधि की समाप्ति की सूचना देता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए क्षेत्रवार समूहों का गठन किया गया है, जो हर घर जाकर इस पहल का महत्व समझाते हैं। इस 'डिजिटल कर्फ्यू' का उल्लंघन करने वालों को शुरू में चेतावनी दी जाती थी, लेकिन अब पूरा समाज इसका पालन करने का प्रयास करता है। माता-पिता भी नियम का अनुपालन करते हैं, ताकि बच्चे अकेला न अनुभव करें | इस 90 मिनट में बच्चे अध्ययन करते हैं, युवा पुस्तकें पढ़ते हैं या घर से बाहर निकलकर सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेते हैं।
- दरअसल, कोविड-19 के संक्रमण काल में मानव व्यवहार में अप्रत्याशित परिवर्तन देखा गया। इसने 2020 से 2022 तक शिक्षा के ऑनलाइन माध्यम को अनिवार्य बना दिया, जिससे कम आयु के बच्चों और युवाओं में मोबाइल फोन के प्रयोग को लेकर एक बुरे व्यवहार ने जन्म लिया। एक सर्वेक्षण के अनुसार, 18 वर्ष से कम के आयु के 65 प्रतिशत बच्चों में फोन चलाते रहने की मानो लत पड़ गई, जो 30 मिनट से अधिक समय तक फोन से दूर रहने में असमर्थ थे।
- हमारी राष्ट्रीय और आंतरिक सुरक्षा आतंकियों के रडार पर है। वैसे, यह खतरा तो हमेशा से रहा है। हां, उसकी निरंतरता व तीव्रता ऊपर-नीचे होती रही है। कभी खतरा बढ़ गया, तो कभी कम होता प्रतीत हुआ। पिछले एक-डेढ़ साल की तेजी से बदली भू- राजनीति भी हमारे सुरक्षा बलों की परीक्षा लेती रही है। बांग्लादेश के घरेलू हालात, नेपाल के उपद्रव और पाकिस्तान परस्त आतंकी संगठनों की नई रणनीति (विशेषकर सीमा रेखा के पास बड़े आतंकी शिविरों के बजाय सुदूर इलाकों में छोटे-छोटे ठिकाने बनाना, ताकि भारतीय एजेंसियों की निगरानी से बचा जा सके) ने क्षेत्र में ऐसी अस्थिरता को जन्म दिया है, जिसमें भारत के सामने चुनौतियां बढ़ गई हैं। नतीजतन, हमने अपनी सुरक्षात्मक रणनीति भी तेजी से बदली है।
विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स एवं दस्तावेजों पर आधारित तथा जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित, संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।
12 नवंबर - अंतरराष्ट्रीय एटीएसईपी दिवस
आपने एयरपोर्ट के नाम के साथ एटीसी का नाम सुना होगा, माने एयर ट्रैफिक कंट्रोलर, अमूमन लोग जानते हैं कि यह वो ऑफिसर होते हैं जो रेडियो तरंगों के द्वारा पायलट के टच में रहते हैं उन्हें नेविगेट करते हैं कि किस ऊंचाई पर उड़ना है कब लैंडिंग की परमिशन है, कब टेक ऑफ की परमिशन है, एयरपोर्ट पर मौसम कैसा है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिन इंस्ट्रूमेंट के थ्रू एटीसी पायलट से कनेक्ट करते हैं रेडियो फ्रीक्वेंसी पर, उन इंस्ट्रूमेंट को अप टू डेट और मेनटेन कौन करता है अगर उनमें से कोई इंस्ट्रूमेंट डाउन हो जाए तो उसे रिस्टोर कौन करेगा और इन सबके अलावा आपने एक शब्द सुना होगा रडार जिससे हम स्कैन करते हैं कि किसी एक पार्टिकुलर एरिया में कितने एयरक्राफ्ट फ्लाई कर रहे हैं, किधर को फ्लाई कर रहे वगैरह वगैरह, अपने सुना होगा कि कुछ एयरपोर्ट्स ऐसे हैं जहां पर कुहरे और बरसात की कंडीशन में भी लैंडिंग और टेक ऑफ होता है तो वह कौन से इंस्ट्रूमेंट होते हैं जो पायलट को हेल्प करते हैं इतनी लो विजिबिलिटी में भी लैंड करने में और कौन इन इंस्ट्रूमेंट को मेनटेन करता है, कौन इन्हें कैलीब्रेट करता है और चेक करता है कि इंस्ट्रूमेंट प्रॉपर कम कर रहे हैं, इन सबका जवाब है
" एयर ट्रैफिक सेफ्टी इलेक्ट्रॉनिक्स पर्सनल"
आइये विस्तार में समझते हैं इनकी जिम्मेदारियों, चुनौतियों और योगदान को, और शुरुआत करते हैं एक स्पष्टता देने वाली और मन को बांधने वाली कविता से जो लिखी है भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के ही एक अधिकारी श्री देवेश द्विवेदी, वरिष्ठ प्रबंधक एटीएसईपी ने :
ए ए आई का वादा , सुरक्षा सहित सेवा
हमनें बखूबी निभाकर, जीता है भरोसा
धरती हो या गगन हो , सब जद में है मेरे
वो आसमां के पंछी रखना तू भरोसा ।।
मेरी निगाहों से कोई ओझल न होगा (RADAR)
बात होती रहेगी, तू कितना भी दूर होगा. (HF/VHF)
अंगुली पकड़ के तेरी, तुझे राह हम दिखाते (NAVAID)
घने कुहरे में भी, तुझको हम रनवे दिखाते (ILS)
तेरे पहुँचने से पहले, पहुंचाएंगे तेरा संदेशा (AFTN)
वो आसमाँ के पंक्षी रखना तू भरोसा ।।
तकनीकियों की दुनियां में है अपना डेरा
हर उच्च मानक पर खरे उतरे हमेशा
ये हुनर है हमारा और हर atsep का वादा
वो आसमां के पंछी रखना तू भरोसा ।।
तू कहीं भी उड़े और उड़ता चले
हर कोने कोने तक मेरा सिग्नल मिले
ना डरना कभी ये सोचकर,
दुर्गम जगहों पर किसके भरोसे उड़े
ATSEP के सिपाही तुझे मिलेंगे सदा
वो आसमां के पंछी रखना तू भरोसा ।।
कभी मशीनों के साथ हम ठंडे हुए
कभी तेज धूप में जलते रहे
सब सहते पर न पीछे हटे
काम पूरे किए मुझे जो भी मिले
हर लक्ष्य को हमने समय से समेटा
वो आसमां के पंछी रखना तू भरोसा ।।
तू ऊंचा उड़े और उड़ता रहे
अपनी मंजिल पर सुरक्षित पहुँचता रहे
समय सबका बचे, कोई मुश्किल न पड़े
ATSEP की निगाह में तुम हो हमेशा
वो आसमां के पंछी रखना तू भरोसा ।।
- देवेश द्विवेदी, वरिष्ठ प्रबंधक एटीएसईपी
आइए और समझते हैं:
जहाँ पायलट और नियंत्रक विमानन सुरक्षा के प्रत्यक्ष चेहरे हैं, वहीं एटीएसईपी (एयर ट्रैफिक सेफ्टी इलेक्ट्रॉनिक्स पर्सनल) प आकाश के ये अदृश्य रक्षक ही यह सुनिश्चित करते हैं कि हर संचार सुविधा, नेविगेशन सहायता और निगरानी सुविधा चालू रहे, हर पैरामीटर इष्टतम सीमा के भीतर हो और जब भी कोई असामान्यता महसूस हो, तुरंत सामान्य स्थिति बहाल कर दें।
वे डीवीओआर, डीएमई, आईएलएस जैसे नेविगेशनल एड्स और रडार, एडीएस-बी जैसी निगरानी प्रणालियों की सटीकता बनाए रखने में मदद करते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि विमान सुरक्षित मार्गों और ग्लाइड पथों पर बने रहें। उनकी तकनीकी सटीकता सभी मौसमों में विमान की सटीक स्थिति और सुचारू लैंडिंग सुनिश्चित करती है। आधुनिक एटीसी उड़ान डेटा प्रोसेसिंग, समन्वय और सुरक्षा जाल के लिए सॉफ्टवेयर-संचालित प्रणालियों पर निर्भर करता है। इस संबंध में, एटीएसईपी स्वचालन और डेटाबेस सिस्टम के प्रबंधन में मदद करते हैं, सिस्टम एकीकरण, अपडेट, साइबर सुरक्षा और अतिरेक को संभालते हैं ताकि संचालन को लचीला और सुरक्षित रखा जा सके। एटीएसईपी त्वरित प्रतिक्रिया और त्वरित दोष सुधार द्वारा अधिकतम सिस्टम उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं। वे आईसीएओ मानकों और अनुशंसित प्रथाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करते हैं, जिससे वैश्विक विमानन सुरक्षा में योगदान मिलता है। अपनी अटूट प्रतिबद्धता, तकनीकी उत्कृष्टता और वैश्विक मानकों के पालन के माध्यम से, एटीएसईपी हमारे देश की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को बनाए रखते हैं और विमानन सुरक्षा में परिचालन विश्वसनीयता के उच्चतम स्तर को सुनिश्चित करते हैं।
------ तो क्या विचार हैं आपके बनना चाहेंगे, सीएनएस कार्मिक, यह भी एक तरीका है देश सेवा का।
स्रोत - समय समय पर CNS ( Communication Navigation & Surveillance ) कार्मिकों से बातचीत के अंश और कुछ तकनीकी लेख
साभार :
श्री देवेश द्विवेदी , वरिष्ठ प्रबंधक, एटीएसईपी
श्रीमती देबाश्री सरकर , प्रबंधक, एटीएसईपी
श्री राजेश भट्ट , प्रबंधक एटीएसईपी
संपादन - लवकुश कुमार
संपादक भौतिकी में परास्नातक हैं और पिछले 6 साल से इंडिया मेट डिपार्टमेंट में सेवाएं देते हुए एविएशन क्षेत्र से जुड़े हैं।
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