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Awareness ( जागरूकता )

इस श्रेणी में आपको इस जीवन, दुनिया और स्वयं को लेकर समझ और जागरूकता के लिए कई लेख मिलेंगे और प्रसिद्ध दार्शनिक एवम् वेदांत शिक्षक आचार्य प्रशांत की कई उक्तियां भी इस कैटेगरी में संकलित की गई है जिनसे आपको मानव मन, जीवन और समाज को लेकर सयझ मिल सकती है साथ ही ऐसे मुद्दों पर भी लेख मिलेंगे जिनके बारे में जानना और संवेदनशील होना एक स्थाई समाज और स्थाई दुनिया के लिए बहुत जरूरी है।

शुभकामनाएं 

लवकुश कुमार 

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।

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समझ 10.11.2025

आवारा श्वान मामले को संवेदना और गंभीरता से देखने की जरूरत है। आवारा श्वान और मवेशियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है। हम अगर उन्हें सड़कों पर रहने की मंजूरी दें, तो वास्तव में उन्हें मौत की ओर ढकेलेंगे। अगर आवारा पशुओं से इंसानों को नुकसान होता है, तो खुद पशुओं की जिंदगी भी खतरे में पड़ती है। अत: बेहतर मानवीय बदलाव के लिए न्यायालय की सक्रियता जरूरी है, इसमें राज्यों को पूरा साथ देना चाहिए

- भारत का प्रजातंत्र एडवर्सेरियल डेमोक्रेसी (द्वंद्वात्मक या प्रतिस्पर्धी प्रजातंत्र ) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें लगातार जनमत तैयार कराने के लिए विचार सम्प्रेषण होता है।

- विज़न 2032 की सफलता का अर्थ केवल तकनीक का विस्तार नहीं, बल्कि सामाजिक नीतियों और संसाधनों के पुनर्गठन से नागरिकों तक लाभ पहुँचाने की सरकार की प्रतिबद्धता है। लोकतांत्रिक जवाबदेही और समावेशन के मानदंडों को अक्षुण्ण रखना सरकार की सर्वोपरि जिम्मेदारी होती है। यदि विजन 2032 के सिद्धांतों पर नीति- निर्माता, तकनीकी संस्थान और नागरिक समाज एकजुट होकर कार्य करें, तो भारत न केवल डिजिटल पहचान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर विश्वसनीयता, पारदर्शिता और नैतिक शासन का उदाहरण भी स्थापित करेगा। यदि सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना सफल होती है, तो भारत का डिजिटल भविष्य ही नहीं लोकतांत्रिक मूल्यों की भी रक्षा होगी।

- आज जब हम वंदे मातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने का पावन अवसर मना रहे हैं, यह केवल स्मरण का नहीं, बल्कि आत्मावलोकन का क्षण भी है। क्या हम उस भाव को जी पा रहे हैं, जिसके लिए असंख्य देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी ? क्या हम अपने जीवन में वही समर्पण, वही अनुशासन और वही मातृभूमि भक्ति स्थापित कर पाए हैं?

- प्रतिबद्ध व्यय का उच्च स्तर विकासात्मक कार्यों को करने की राज्य सरकारों की क्षमता को सीमित करता है।

 - एफआरबीएम समीक्षा समिति ने 2017 में अनुशंसा की थी कि राज्यों का कर्ज 20 फीसदी तक रहना चाहिए। इसके अलावा राज्य सरकारें सरकारी उपक्रमों द्वारा लिए गए ऋण की भी गारंटी देती हैं जो 2023-24 में जीएसडीपी का 4.2 फीसदी था। यह राज्यों की वित्तीय हालत के लिए एक जोखिम है। उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश और पंजाब जैसे कुछ राज्य कुल आंकड़ों से कहीं अधिक गंभीर वित्तीय संकट में हैं और इन्हें अलग नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता हो सकती है।


विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स और दस्तावेजों पर आधारित और जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित ,संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।

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उभरते सवाल 09.11.2025

 दुनिया भर में आर्थिक असमानता का लगातार बढ़ते जाना अब कई मायनों में चिंता का विषय बन गया है।

- आवारा श्वान समस्या का हल ?

- आज जब हम वंदे मातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण होने का पावन अवसर मना रहे हैं, यह केवल स्मरण का नहीं, बल्कि आत्मावलोकन का क्षण भी है। क्या हम उस भाव को जी पा रहे हैं, जिसके लिए असंख्य देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी ? क्या हम अपने जीवन में वही समर्पण, वही अनुशासन और वही मातृभूमि भक्ति स्थापित कर पाए हैं?


विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स और दस्तावेजों पर आधारित और जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित ,संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।

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जानकारी 09.11.2025

 इसरो ने अपने सबसे ताकतवर राकेट (एलवीएम3-एम5) से देश का अब तक का सबसे वजनी उपग्रह जीसैट-7आर प्रक्षेपित किया। सामरिक और भारतीय नौसेना की संचालन जरूरतों को साधने के लिए विकसित

- तथ्यों में देखें, तो अमेरिका में सरकारी एजंसी- नासा और निजी एजंसी- स्पेसएक्स, रूस की रासकासमास, चीन की सीएनएसए और यूरोप की ईएसए एजंसियों से भारत का इसरो प्रतिस्पर्धा में हैं।

- अमेरिका की स्पेसएक्स दुनिया का अब तक का सबसे ताकतवर राकेट फाल्कन हैवी और स्टारशिप विकसित कर रही है, जो सौ टन से ज्यादा पेलोड (वजन) ले जाने में सक्षम होगा। चीन भी अपने भारी राकेट लांग मार्च5बी और भविष्य के लिए लांग मार्च-9 जैसे सुपर-राकेटों का निर्माण कार्य जारी रखे हुए है। इस किस्म के ताकतवर राकेटों में रूस के प्रोटोन और विकसित किए जा रहे राकेट एंगारा का नाम भी शामिल है।

- साढ़े चार टन वजन वाले संचार उपग्रह जीसैट-7आर (सीएमएस-03) के सफल प्रक्षेपण ने भारत और इसरो को वह आत्मबल दिया है, जो देश को सामरिक, वैज्ञानिक और वाणिज्यिक मिशनों में अग्रणी पंक्ति में शामिल कराने के लिए जरूरी है। 

- यह उपग्रह विशेष रूप से भारतीय नौसेना की संचालन और सामरिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विकसित किया गया है। भारी उपग्रहों को प्रक्षेपित करने में सक्षम होना इस बात का संकेत है कि अंतरिक्ष शक्ति के मामले में भारत अब वह दक्षता हासिल कर चुका है, जिसके लिए कभी रूस या अमेरिका की अंतरिक्ष एजंसियों से बाहर कोई विकल्प मौजूद नहीं था।

- राज्यों के पूंजीगत व्यय को केंद्र सरकार की विशेष सहायता योजना से मदद मिल रही है। इस योजना के तहत राज्यों को 50 वर्ष का ब्याज रहित ऋण दिया जा रहा है। वर्ष 2020-21 से 2025-26 (11 अगस्त 2025 तक) तक राज्यों को इस योजना के तहत 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक का ऋण दिया गया। विश्लेषण बताता है कि अपने स्रोतों से राज्यों का पूंजीगत व्यय सपाट बना रहा और बढ़ोतरी को केंद्र सरकार से सहायता मिली।

- पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने राज्य सरकारों की वित्तीय हालत को लेकर एक व्यापक रिपोर्ट पेश की है। 

- इस प्रकार की रिपोर्ट राज्य सरकारों की वित्तीय हालत से संबंधित आम समझ को बेहतर बनाने में मदद करती हैं।

- वंदे मातरम्... यह केवल उच्चरित शब्द नहीं है, यह भारतीय आत्मा का वह शाश्वत निनाद है, जो डेढ़ शताब्दी से अनवरत गुंजित हो रहा है। यह मात्र गीत नहीं, राष्ट्र जागरण का वह दिव्य महामंत्र है, जिसने पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े भारत को आत्मबोध का प्रकाश दिया, निराशा के घोर तमस में अस्मिता की ज्योति प्रज्वलित की, संघर्ष को संबल और स्वाधीनता को स्वरूप प्रदान किया ।

- यह गीत भारतीय जीवन-दर्शन का प्रतीक है, जहां राष्ट्रभक्ति केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि भक्ति, साधना और सेवा का रूप ले लेती है।

- आनंद मठ के संन्यासी यह गीत गाते थे। यह 'संन्यासी विद्रोह' की प्रेरणा बना, जिसने ब्रिटिश सत्ता के सामने भारतीय आत्मबल का पहला प्रतिरोध खड़ा किया। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने सन् 1875 में जब इस गीत की रचना की, तब उन्होंने केवल काव्य नहीं लिखा, उन्होंने राष्ट्र की सोई हुई आत्मा को जगाने का संकल्प किया। सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम् की पंक्ति ने भारतीय मानस में चेतना का संचार किया। इस एक पंक्ति में भारत की समृद्धि, सौंदर्य और शक्ति एक साथ मूर्तिमान हो उठे।

- इसमें उस भारतमाता की दिव्यता झलकती है, जो केवल भूभाग नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति व सनातन चेतना का जीवंत रूप है।

- यू आईडीएआई द्वारा हाल ही में घोषित आधार विजन 2032 सरकार की एक अत्यंत महत्वाकांक्षी और दूरदर्शी पहल है। यह संकेत है कि भारत अब अपनी डिजिटल पहचान प्रणाली को आने वाले दशक के लिए अधिक मजबूत, सुरक्षित और समावेशी बनाने की दिशा में अग्रसर है। यह केवल तकनीकी उन्नयन का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक रणनीतिक दृष्टि-पत्र है, जो कृत्रिम बद्धिमत्ता, ब्लॉकचेन और क्वांटम एन्क्रिप्शन जैसी आधुनिक तकनीकों से आधार की संरचना को भावी चुनौतियों के अनुरूप ढालने की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। इसी उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित कर इस विज्ञान का प्रारूप तैयार करने का निर्णय लिया है

- विजन 2032 का उद्देश्य केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि डिजिटल सेवाओं को मानव सुविधाओं के केंद्रित बनाना भी है जहाँ सुरक्षा, सरलता और समावेशन तीनों को समान महत्व मिले और जन आकांक्षाएं आसानी से पूरी हो सके।


विभिन्न समाचार पत्रों और पब्लिक डोमेन में उपलब्ध रिपोर्ट्स और दस्तावेजों पर आधारित और जन जागरूकता के उद्देश्य से संकलित ,संकलन कर्ता भौतिकी में परास्नातक हैं ।

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प्रोफेशनल नकि व्यक्तिगत - लवकुश कुमार

क्या ये कोई ट्रेंड चल रहा है ? कि हर प्रोफेशनल रिलेशन में कई लोग व्यक्तिगत संबंध पाने की कोशिश करते हैं शायद उन्हें भ्रम है कि जो व्यक्तिगत रूप से जुड़ेगा वही उनका हित कर पायेगा, लेकिन वास्तविकता ये है कि संवेदनशील लोग सबका भला करते हैं वह उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़े हो या फिर व्यावसायिक रूप से जड़े हों, इसलिए बेहतर यह है कि हम अपना कार्य अच्छे से करें और अपने व्यावसायिक संबंधों को अच्छा रखें उसके बाद ही हम अपने अधिकारों पर बात करें तो उनकी सुनवाई अच्छे से होगी।

ऐसा देखा गया है कि चापलूसी प्रिय व्यक्ति लोगों के कार्यों की बजाय  उनके व्यवहार और उनकी हां मे हां मिलाने की आदत पर ज्यादा ध्यान देते हैं, लेकिन यह एक गलत प्रथा है इससे गुणवत्ता प्रभावित होती है।

अगर हम अपने कार्य की गुणवत्ता और कार्य में ईमानदारी पर ध्यान देने की बजाय व्यक्तिगत रूप से लोगों को खुश करने के चक्कर में पड़ेंगे तो झूठी और सतही औपचारिकताओं, दबाव, समय की बर्बादी और धोखे का सामना करने की परिस्थिति बनाएंगे।

काम में गुणवत्ता की भावना को अपना जीवन मूल्य बनाएं।

- शुभकामनाएं 

- लवकुश कुमार 


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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उभरते सवाल 08.11.2025

- शैक्षिक रैकिंग में हमारे शैक्षिक संस्थान क्यों पिछड़ रहे हैं?

- क्या मुनाफे और पर्यावरण को अलग करके देखना ठीक है?

- यह क्या बात हुई कि कोई कंपनी अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए पर्यावरण को प्रदूषित करना जारी रखे, ताकि बाद में उसके पर्यावरण के प्रति सजग शेयरधारक अपनी बढ़ी हुई संपत्ति का कुछ हिस्सा सफाई के लिए खर्च कर सकें? जबकि यह जाना-माना तथ्य है कि पर्यावरण में सुधार करना प्रदूषण को रोकने की तुलना में कहीं अधिक महंगा होता है।

- कैसे छुटकारा मिलेगा धनबल और बाहुबल की सियासत से?

लवकुश कुमार 


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लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं |

 

 

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समझ 08.11.2025

- समावेशी विकास और भरोसेमंद शासन ही धनबल और बाहुबल की सियासत को कमजोर कर सकता है।

- केंद्रीय और राज्यों के विश्वविद्यालयों को शिक्षण मानकों और संसाधनों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

- अनुसंधान के लिए एक तटस्थ लेकिन सक्षम वातावरण, चाहे वह कला का क्षेत्र हो या विज्ञान का, वह आदर्श है जिसकी ओर भारत को लक्ष्य बनाना चाहिए।

- देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने उचित ही यह बात रेखांकित की है कि बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में सरकारों के गिरने में शासन व्यवस्था एक प्रमुख कारण रही। जेन जी (सन 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी) के विद्रोहों ने भारत के पास-पड़ोस में मौजूद भ्रष्ट और गूंगी-बहरी सरकारों को गिरा दिया और यह सिलसिला आगे बढ़ता नजर आ रहा है।

- लवकुश कुमार 

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जानकारी 08.11.2025

संदर्भ- QS ranking

- शैक्षणिक संस्थाओं की रैंकिंग में गिरावट इस बात का संकेत है कि रिसर्च की गुणवत्ता, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेश के छात्रों को आकर्षित करने का माहौल और स्कॉलर टीचर अनुपात में हमारे टॉप इंस्टिट्यूट्स पिछड़े हैं। 

- हांगकांग यूनिवर्सिटी प्रथम आई, जबकि तीसरे स्थान पर सिंगापुर की दो यूनिवर्सिटीज रहीं। भारत का जीडीपी सिंगापुर और हांगकांग के मुकाबले क्रमशः नौ और दस गुना है।

- अमेरिकी सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी )

- पिछले महीने ही, पेरिस की एक अदालत ने पाया कि बहुराष्ट्रीय एकीकृत ऊर्जा और पेट्रोलियम कंपनी टोटलएनर्जीज़ ने यह दावा करके भ्रम पैदा किया था कि वह एनर्जी ट्रांजिशन में एक प्रमुख भूमिका निभा रही है। यूरोपीय संघ के उस कानून का हवाला देते हुए- जिसके अनुसार पर्यावरण संबंधी दावों के लिए उद्देश्यपूर्ण, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध और सत्यापन योग्य प्रतिबद्धताओं और लक्ष्यों का समर्थन आवश्यक है- अदालत ने पाया कि कंपनी की जलवायु संबंधी घोषणाएं हाइड्रोकार्बन में उसके विस्तारित निवेश के अनुरूप नहीं हैं। हालांकि कंपनी पर लगे जुर्माने अधिक नहीं हैं, लेकिन भविष्य में इनके बढ़ने की संभावना है- और इसीलिए यह निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

- एक निरंतर गर्म होती दुनिया में यह उम्मीद करना वाजिब है कि कुछ लोगों के खरीदारी के फैसले कंपनी की पर्यावरण संबंधी कार्रवाइयों से प्रभावित हो सकते हैं

- भारत दुनिया की अग्रणी कंपनियों के वैश्विक क्षमता केंद्रों के लिए एक पसंदीदा स्थान के रूप में अपनी स्थिति को अपनी बढ़ती घरेलू बौद्धिक पूंजी का एक संकेतक मानता

- जेन जी : सन 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी

- हिंद महासागर में मौजूद है मेडागास्कर 

- लवकुश कुमार 


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समाज की कड़वाहट, नोबेल पुरस्कार, लेखन, अवसाद और जीवन- सौम्या गुप्ता

क्रास्ना होरकाई → 2025 (साहित्य नोबेल पुरस्कार विजेता)

 जब नोबेल कमेटी द्वारा इनसे पूछा गया कि आपके लेखन की प्रेरणा क्या है तो इनका उत्तर था *समाज की कड़वाहट*। 

बड़ा ही अलग सा उत्तर था ये क्योंकि लोग प्रेम के कारण लिखते है, दर्द के कारण लिखते है पर कड़वाहट का प्रेरणा बनना विचारने योग्य बिंदु है। लेकिन यदि हम भारतीय दर्शन देखे तो महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वेदव्यास, तुलसीदास, सूरदास ने भी समाज के दिए गए जहर को पीकर अमृत देने का काम किया और ऐसा किया जा सकता है।

 क्रास्ना होरकाई अपने कई -2 पन्नों तक चलने वाले वाक्यों का कारण बताते हुए कहते है कि 

 विचार अंतहीन होते है, जब हम पूर्ण विराम लगाते है तो हमारे विचारों का अबाध प्रवाह बाधित होता है, पूर्णविराम को इंसान तय नहीं करता है, ईश्वर तय करता है, मानवीय अनुभव कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते। इसे छोटे या टूटे हुए वाक्यों में कैद नहीं किया जा सकता, जीवन अखंड प्रवाह है, केवल ईश्वर जो संपूर्णता का प्रतीक हैं वही किसी चीज को पूर्ण रूप से खत्म करने का अधिकार रखता है, मनुष्य होने के नाते हम सिर्फ प्रवाह को ही अनुभव कर सकते है।

इसीलिए हम सबको जीवन में आने वाले वो पल जिनमें हम अवसाद से घिर जाते है, हमें किसी से कहना चाहिये और न कह सके तो लिखना चाहिए, खुद के अंदर की, समाज से मिली कड़वाहट को खत्म करने का ये बहुत अच्छा तरीका हो सकता है, जिन लोगों को नहीं सुना गया, उन्होंने लिखा है और ऐसा लिखा है कि हज़ारों साल पहले लिखा गया हम आज भी पढ़ते है, महाभारत के रचयिता व्यास जी भी सबको अपनी बात बताना चाहते थे पर किसी ने नही सुना और भारत को यह अमूल्य धरोहर मिली।

जब कभी जीवन को खत्म करने का विचार भी मन में आये तो एक बार जरूर सोचिये कि यह जिसे आप खत्म करने की बात कर रहे है क्या आपका है, मेरी मत सुनिए, इतने बड़े साहित्यकार की बात पर तो विचार कर लीजिए।

शुभकामनाएं।

- सौम्या गुप्ता 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।


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क्या दान छिपाने की बात है ? एक समीक्षा - आरती

अक्सर लोगों को बात करते सुना है कि " दान तो हम भी करते हैं लेकिन बताते नहीं फिरते या वाट्सऐप स्टेटस नही लगाते! "

आज के बदलते परिदृश्य में जब आम इंसान स्व केंद्रित होता जा रहा और उसकी व्यक्तिगत चाह और आवश्यकताएं इतनी बढ़ती जा रही हैं कि दूसरों की तकलीफ़ या सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए उसके लिए समय पैसा या अन्य संसाधन निकाल पाना मुश्किल होता जा रहा है, तब ऐसी हालत में किसी इंसान की व्यक्तिगत मदद में उसकी गोपनीयता का सम्मान करते हुए, अन्य संस्थागत मामलों में सामाजिक सरोकार के किए गए कार्यों का निस्वार्थ प्रचार एक निंदनीय नहीं सराहनीय कार्य है, इससे अन्य लोग प्रेरित होंगे और अपने व्यक्तिगत समस्याओं के साथ सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए भी प्रयत्न करेंगे, यथा: रक्तदान, श्रमदान, संस्था को वित्तीय मदद, वस्त्रदान इत्यादि।

आरती 


लेखिका संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी साथ ही सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रहित के मामलों पर चिंतन उनकी दिनचर्या की प्राथमिकताओं में शामिल है।


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