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जानव, एक सरकारी कार्यालय में बैठा पिछले दिन से चले आ रहे
एक प्रपोजल के मसौदे को अंतिम रूप देने में लगा था कि
उसका फोन बजता है, भावना का फोन था, उसकी ग्रेजुएशन के वक्त से दोस्त।
कुछ दिनों पहले ही भावना अपनी माँ की ह्दयाघात से मृत्यु के सदमें से गुजरी थी,
इस बात को ध्यान में लेकर जानव ने तुरंत ही अपना काम रोककर भावना की काल अटेंड की।
जानव कल मैं राजधानी गई थी जीएम से मिलने, अपने गृहनगर में तबादले की अर्जी लेकर,
भावना ने चिंतित स्वर में कहा।
अच्छा किया जो व्यक्तिगत रूप से मिलकर अपनी परिस्थिति की जानकारी दी,
जानव ने जवाब दिया |
जानव मेरा तबादला हो जाएगा न, जी०एम० सर कह तो रहे थी कि
अगले रोस्टर में नाम डाल देंगे आपका, भावना ने कुछ आशा पाने की उम्मीद में कहा।
सरकारी विभाग में कई साल बिता चुके जानव ने सारी संभावनाओं
पर विचार करते हुए कहा कि, भावना तुम्हारा केस जेन्युइन है, इसलिए
तुम्हे तबादला मिलना चाहिए ताकि तुम अपने बीमार पिताजी का ख्याल रख सको,
लेकिन वादा करने और एक्जीक्यूशन में अंतर है, कई फैक्टर्स चेक करने होते हैं जैसे
कि तुम्हारा रिप्लेसमेंट तैयार करना होगा आदि आदि, इसीलिए वक्त भी लग सकता है।
ये सुनकर भावना दुखी हो गई क्योंकि वो अपना दिमाग उस तरफ लगाने की हालत में
खुद को नहीं पाती थी कि जब उसके तबादले में देरी के चलते उसके बीमार पिताजी कि
देखभाल की कुछ व्यवस्था करनी होगी, आखिर आफिस से छुट्टी भी तो एक लिमिट तक ही मिलेंगी।
-लवकुश कुमार
हैलो
नमस्ते दादा
नमस्ते भइया, कैसे हो ?
ठीक हूं दादा, आज जा रहा हूं रिपोर्ट लेनें, दिल्ली
पता नहीं क्या निकलेगा रिपोर्ट में, वैसे सब कुछ ठीक ही होना चाहिए, है न दादा
हां सब कुछ ठीक ही होना चाहिए, बाकी तुम परेशान न हों, कोई अगर थोड़ी बहुत दिक्कत होगी भी तो मेडिकल साइंस बहुत आगे है, डाक्टर ठीक कर देंगे, आनंद ने अपने छोटे भाई आशीष को हिम्मत देते हुए कहा।
ठीक है दादा नमस्ते, इतना कहकर आशीष ने फोन काट दिया।
आशीष को आनंद दादा कि ये बात बुरी लग गयी कि " थोड़ा बहुत कुछ दिक्कत होगी तो......."
क्योंकि उसने तो ये सुनने के लिए फोन किया था कि ," तुम परेशान न हों रिपोर्ट नार्मल आएगी "
इधर अचानक से फोनकाल पूरी होने से, आनंद दादा को भी शंका हुई कि उनका प्रयास, छोटे भाई को हर परिस्थिति के लिए तैयार करने का था, लेकिन असर तो कुछ और ही हो गया शायद!
-लवकुश कुमार
क्या बात है कनिष्क किन यादों में डूबे हो ?
निशीथ ने अपने रूममेट से पूंछा।
यही कि लोग कितने अजीब हैं, जो लोग उन्हें तरह तरह के झूठ बोलकर अंधेरे में रखते हैं,
असहमत होने पर भी अपनी असहमति व्यक्त नहीं करते और पीठ पीछे बुराई करते हैं
और तो और ऐसे लोग उनसे अपने मन मुताबिक काम भी करवा लेते हैं, ऐसों से तो वो
बहुत नज़दीक रहते हैं और मेरे जैसे लोग ( गहरी सांस लेते हुये )
जो उनका भला चाहते हैं, उनकी सुविधा असुविधा का ख्याल रखते हैं
उनसे वो दूरी बना लेते हैं क्या केवल इसलिए कि मैं उनकी बात से
सहमत न होने पर तुरंत अपना पक्ष रख देता हूं, कितना अजीब है न ?
हां अजीब तो है, निशीथ ने एक लंबी सांस लेते हुए कहा।
ये और भी अजीब होगा अगर तुम ऐसे " अंधेर-पसंद " इंसान से मेल जोल न बढ़ पाने पर
दुखी होते रहोगे जो सामने वाले से हर बात में केवल
" हां बिल्कुल सही " सुनना चाहते हैं और सामने वाले के "जीवन में सत्य के स्थान" के
बजाय अपने प्रति "तथाकथित समर्पण" को ही मानदंड मानते हैं।
यह सुन कनिष्क कमरे से बाहर निकल आया और हास्टल की बालकनी पर खड़ा हो
नीचे से गुलाब के फूलों की महक से सनी ठंडी हवा के झोंके को अपने गालों पर महसूस
करते हुए अपनी पसंद की समीक्षा करने लगा।
-लवकुश कुमार
आज 09 मई को स्व० रवि भाई की पुण्य तिथि है,
आज ही के दिन रवि भाई 2019 में अपनी यादें और काम पीछे छोड़ निकल गये अगले जन्म के लिए किन्ही और लोगों के हक़ की लड़ाई लड़ने, उन्हें हंसाने, हौंसला बढ़ाने और बेहतरी के लिए तैयार करने |
रवि भाई की याद आते ही उनका दिलदार स्वभाव और हर मौके पर साथ खड़े होने और दिक्कत में ढाल बनने के लिए तत्पर रहने की आदत याद आती है और याद आता है उनका मुस्कुराता हुआ चेहरा, ऐसा इंसान जो बीमारी की हालत में खुद से ज्यादा अपने भैया और परिवार की चिंता करता हो और खुद ही अपने इलाज़ के लिए मजबूती से आगे बढ़ रहा हो पूरी आशा के साथ |
ऐसे लोग कम ही होते हैं जो किसी की बेपटरी होती जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए हर संभव प्रयास करते हों, इस बात को वही लोग महसूस कर सकते हैं जो उनके साथ रहे हों |
उनके बड़े भाई अनिल भैया आज भी उन्हें याद करते हैं तो उनकी काबिलियत की तारीफ करते हुए और एक आह भरते हुए यही कहते हैं की आज वो होते तो दिन कुछ और ही होते और लोगों का रवैया कुछ और ही होता उनके परिवार की तरफ |
रवि भाई को उनके घर में प्यार से सब मुनीम कहते थे, उनके जितना पढ़ा लिखा और काबिल इंसान उनके गाँव में शायद ही कोई होता, एक और रिकॉर्ड था उनके नाम, 24 वर्ष की उम्र से पहले ही भारत सरकार के भारत मौसम विज्ञान विभाग में समूह ख के अराजपत्रित अधिकारी की सेवा (नौकरी) पाने का रिकॉर्ड, जिसके चलते वो स्थानीय लोगों और रिस्तेदारी में प्रेरणा का पात्र बन गये |
रवि भाई के रूममेट रहे राहुल भाई उन्हे याद करते हुये लिखते हैं –
“बात 2015 की है ,जब हम रूम पार्टनर थे. शाम का समय था। रवि कई दिनों बाद घर से थका हुआ आया (खेती किसानी के काम के बाद ) और तुरंत सो गया । जब जगा तो मुझे मेरे बैग में कुछ सामान रखते हुए देखा तो पूछा कि "राहुल कहाँ जा रहे हो? मैं उदास और मायूस चेहरे से बोला दिल्ली (इससे पहले मैं ट्रेन से कभी सफर नहीं किया था )", उसने बिना मेरे कुछ कहे कहा चलो चलता हूँ मैं भी क्योंकि तुम कभी अकेले नहीं गए हो। मैं कुछ नहीं बोल पाया क्योंकि मैं भी तो यही चाहता था कि वह मेरे साथ चले, लेकिन उसके चेहरे की थकान मुझे कुछ उससे कहने की इजाज़त नहीं दे रही थी …….हम दोनों साथ दिल्ली गए और अपना काम करके खुशी खुशी वापस भी आए ..आप यही सोच रहे हैं न कि मैं आपको यह सब क्यों बता रहा हूं ?..........बताता हूँ ... "मेरे पास में खाने तक का पैसा नहीं था, और मैं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति से बेहतर वाकिफ था। तो मैं अपने परिवार से भी नहीं कह पा रहा था कि मैं किन परिस्थितियों से गुजर रहा हूँ । हमारे हॉस्टल के मेस का 3 महीने के बकाया जो कि लोग एक महीने तक नहीं बकाया रखते, मेरे exam की fee और भी बहुत सी ऐसे क्रियाकलाप जो अब या तो पैसों से हो सकते थे या मुझे बी०एच०यू० छोड़कर वापस घर जाना पड़ता, क्योंकि मेरे परिवार के ऊपर 80 हजार का कर्ज हो चुका था शायद ही कोई हमारे संपर्क में रहा हो जिनसे मां ने पैसे न मांगा हो। ..हमारे पास पैसे के सारे रास्ते बंद हो गए थे। ..मैं शांत ,मायूस ,उदास और हताश होकर बैठता था। सब कुछ जैसे बिखर सा रहा था। मेरी मां का समर्पण,पिता जी का संघर्ष और मेरे ख्वाब ।. लेकिन कहते है न कि जब लगे कि सब कुछ खत्म हो रहा है तभी कुछ नया होता है । अगले ही दिन 7 अप्रैल 2015 को मेरे बैंक अकाउंट में एक मैसेज आता है कि "your account ……..is credited with 120000rs . "मुझे तो भरोसा ही नहीं हो रहा था ।एक पल में सब कुछ बदल गया। मां ने पिछले सभी वर्षों में जितना कर्जा मेरी शिक्षा के लिए लिया था और भी कर्जा सब खत्म ..जो सब कुछ बिखर सा गया था सब सवर सा गया ।" अब आप सोच रहे होंगे यह कहा से आ गया ?? बताता हूं .. मेरा चयन 2013 में डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी की INSPIRE स्कीम में हुआ था ।..जो हर साल चयनित छत्रों/छात्राओं को फेलोशिप देती है। मेरा चयन तो हुआ था लेकिन मेरा एक भी साल का पैसा नहीं आया था। मेरे साथ के सभी दोस्तों का पैसा आ गया था । इसका मुख्यालय दिल्ली में है और मैं इसी काम से दिल्ली गया था ।अगर रवि भाई उस दिन नहीं रहा होता तो मैं दिल्ली नहीं जा पाता और दिल्ली नहीं जा पाता तो मेरे पैसे नहीं मिलते ,और अगर उस दिन पैसे नहीं मिले होते तो शायद..... आज मैं यह लिख भी नहीं रहा होता ।।आप समझ गए होंगे मैं क्या कहना चाहता हु। मैं मानसिक रूप से यह कदम भी उठा सकता था जिसमें जीवन ..आप समझ गए होंगे ।..आज मै जो कुछ भी हूँ उसमें मेरे रवि भाई का बहुत योगदान है ।यह तो एक छोटा सा हिस्सा है ।.रवि भाई दुनिया से चला गया लेकिन जब तक मैं जिंदा हूं वह मेरी यादों में हमेशा जिन्दा रहेगा ।। लव यू पार्टनर(हम एक दूसरे को प्यार से यही बुलाते थे पार्टनर)”
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रवि भाई के गाँव से ही उनके भतीजे मिथिलेश उन्हे याद करते हुये क्या लिखते हैं, आपके सामने है :
“आदरणीय चाचा जी के बारे में लिखना मेरे लिए आसान नहीं है, क्योंकि उनके योगदान और स्नेह को शब्दों में बाँध पाना नामुमकिन-सा लगता है। कुछ लोग ज़िंदगी में ऐसी सीख और दिशा देते हैं, जो जीवन भर साथ रहती है। चाचा जी मेरे लिए ऐसे ही एक व्यक्ति रहे — और शायद हमेशा रहेंगे।
मुझे आज भी वो दिन याद है, जब वे मुझे मेरे घर से वाराणसी लेकर आए थे ताकि मैं आगे की पढ़ाई कर सकूं। उस समय मैं एक अपरिपक्व और दिशाहीन लड़का था। मुझे तो ये भी नहीं पता था कि जीवन में आगे क्या करना है। लेकिन चाचा जी ने न सिर्फ मेरे भविष्य की चिंता की, बल्कि मेरे घरवालों को भी इसके लिए तैयार किया।
उन दिनों में जब मुझे इंटरनेट, गूगल या सुंदर पिचाई के बारे में कुछ नहीं पता था, तब चाचा जी मुझसे इन विषयों पर बातें करते थे, मुझे दुनिया और अवसरों की झलक दिखाते थे। उन्होंने मुझे अलग-अलग क्षेत्रों के बारे में सोचने की प्रेरणा दी।
वे ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के सच्चे प्रतीक थे। मदद करना उनके स्वभाव में था। कोई भी उनसे सहायता माँगता, तो वे बिना संकोच उसे सहयोग देने को तैयार रहते। मुझे आज भी हैरानी होती है कि वे इतने सारे काम, ज़िम्मेदारियाँ और रिश्तों को इतने सहजता से कैसे निभा लेते थे।
जब मैं बी.एच.यू. वापस लौटा, तब मुझे समझ आया कि उनके जीवन में कितनी चुनौतियाँ थीं। लेकिन उन्होंने कभी किसी के सामने अपनी तकलीफ़ का ज़िक्र नहीं किया। जब भी मुझसे मिलते, चेहरे पर वही आत्मीय मुस्कान होती और ऐसा व्यवहार करते मानो सब कुछ ठीक है। अक्सर वे एक बात कहते थे —
"Life is full of sorrow, but you can change it." — और फिर मुस्कुरा देते थे।
उन्होंने अपने जीवन में कई जिम्मेदारियों को निभाया — चाहे वो परिवार के लिए हो या समाज के लिए।
चाचा जी न सिर्फ एक मार्गदर्शक थे, बल्कि मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत भी रहे। आज जब वो हमारे बीच नहीं हैं, तब भी उनकी बातें, उनके मूल्य और उनकी मुस्कान मेरे साथ हैं।”
मिथिलेश आज बी०एच०यू० से कम्प्यूटर साइन्स मे एमएससी कर रहे हैं |
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रवि भाई लोगों के चहेते थे, हों भी क्यूँ न, कई खूबियाँ थी रवि भाई में जो उन्हें लोगों का चहेता बनाती थीं और लोग उनसे दोस्ती करना चाहते थे, उनके साथ वक़्त बिताना चाहते थे, मसलन:
1. खिलंदड स्वभाव – हँसते खिलखिलाते अंदाज में बात कह देना, जवाब दे देना |
2. दोस्तों की जरुरत पर तैयार रहने वाला इंसान- काम अगर बूते का है तो बंदा भले ही रात देर से सोया हो, आपके साथ चल देगा |
3. मानव मन की सटीक समझ वाला इंसान – बचपन से ही तरह तरह के लोगों से संपर्क में रहने के चलते, मानव मन या मनो विज्ञान की बेहतर समझ थी, एक वाक्या याद आता है मै और रवि भाई एक दोपहर, सर सुन्दरलाल अस्पताल के पीछे अन्नपूर्णा कैंटीन में खाना खा रहे थे, उसी टेबल पर सामने की कुर्सी पर एक भैया जोकि किसी मरीज की तीमारदारी के लिए आये होंगे बैठे खाना खा रहे थे कि धोखे से उनके हाँथ से मेरी दाल का गिलास लुढ़क गया ( हाँ गिलास, वहां दाल गिलास में मिलती थी उसे प्लेट में उड़ेल कर खाना होता था ) दाल मेज पर फ़ैल गयी और मै खीज गया लेकिन कुछ कहा नहीं, बैरे को आवाज दी और खाना खाकर बाहर आ गये| बाहर आते है रवि भाई से कहा , “देखो यार उस आदमी से दाल गिर गयी और उसने सॉरी भी नहीं कहा ”, उस बात पर रवि भाई का जवाब था कि, “ हर कोई सॉरी नहीं कह पाता, क्या तुमने उसकी आँखें नहीं देखी, क्या उनमें छिपा खेद का भाव नहीं देखा ”, ऐसे थे रवि भाई |
4. किसी के साथ गलत हो रहा हो तो उसके साथ खड़े होने को तैयार – वर्ष 2014 की बात है मै बी.एस.सी सेकंड इयर में था और फर्स्ट इयर के PMK बैच वालों को फ्रेशर पार्टी देनी थी, मै पहली बार कोई स्पीच देना चाहता था,
उडती-2 खबर मिली कि लवकुश की स्पीच को प्रोग्राम में शामिल नहीं किया जा सकता, ये बात रवि भाई से कही गयी तो रवि भाई और सूर्यप्रकाश भाई ने एक साथ कहा कि फ्रेशर पार्टी के लिए वित्तीय अनुदान केवल लवकुश का ही नहीं हम तीनो का है इसीलिए देखते हैं की कैसे स्पीच नहीं देने देते हालाँकि बाद में ये कहने की जरुरत न पड़ी, पहले आयोजक मंडली के एक अग्रणी सदस्य ने स्पीच के बजाय, बैच की ही एक साथी मोहतरमा के साथ एंकरिंग करने को कहा तो मैंने सोंचा की ऐसे ही सही अपनी बात ही तो पहुंचानी है जूनियर्स के बीच लेकिन अज्ञात कारणों से अभ्यास के दौरान ही उन मोहतरमा ने मेरे साथ एंकरिंग करने से मना कर दिया, और मेरा स्पीच देना अबाध रूप से निर्धारित हो गया और मैंने जीवन की पहली स्पीच दी, स्टेज की स्पीच से पहले रवि भाई और अन्य दोस्तों के सामने कई बार अभ्यास किया ताकि आत्मविश्वास आ सके की स्टेज पर बोल सकूँ| हाँ वो मोहतरमा बाद में मेरी दोस्त बनीं लेकिन ये न बताया की उस दिन मेरे साथ एंकरिंग करने से मना क्यों किया और मैंने भी जोर देकर जवाब पाने के जरुरत न समझी |
5. मेरी शादी मेरे गाँव फत्तेपुर जिला लखीमपुर से होनी थी ये 2016 की बात है मै बीएससी फाइनल इयर में था, पापा की तबियत ठीक न थी इसिलए आयोजन मध्यम ही रखा गया, रवि भाई के साथ कुछ और दोस्तों को बरात में शामिल होने का न्योता दिया, 8-9 लोग आये बनारस से लखीमपुर, बाद में एक अन्य करीबी मित्र से पता चला कि रवि भाई ने सब दोस्तों को राजी करने के लिए कहा , “ क्योंकि लवकुश भाई के पापा की तबियत ख़राब है इसीलिए हम सबको चलना चाहिए लवकुश भाई का मनोबल बढ़ाने के लिए, जरुरत पड़ी तो काम में हाँथ भी बंटा लेंगे ”
ऐसे दिलदार और सूझ-बूझ वाले थे रवि भाई |
6. एक समझदार और धैर्यवान व्यक्ति – एक बार जब मै अपनी एम.एस.सी की पढ़ाई के लिए दिल्ली रहता था तब की बात है कि एक दोस्त की बहन की शादी थी मै उसके आयोजन में कुछ पैसे से मदद करना चाहता था लेकिन मेरी माली हालत ठीक न थी, ये विवशता मैंने रवि भाई को बताई और उधर से एक शांति प्रदान करने करने वाला जवाब आता है –“लवकुश भाई मदद करने के मौके फिर आयेंगे, दिल छोटा न करो, मन में इच्छा है तो एक दिन समर्थ भी हो जाओगे, और फिर मौके पड़े और मैंने मदद भी की, ऐसे ही चलती है दुनिया एक दूसरे से मिलकर और एक दूसरे की मदद से और इससे बढ़ता है अपनापन और व्यवहार में मिठास क्योकि अमूमन ऐसा देखा गया है कि जिन लोगों को लगता है की उन्हें किसी की मदद की जरुरत न होगी या वो अपने सारे काम बिना मदद के ही करेंगे उनके व्यबहार में एक रूखापन आने की संभावना बढ़ जाती है |”
रवि भाई के साथ जो सबसे बड़ी सुरक्षा महसूस होती थी वह यही थी मुझसे ज्यादा समझदार कोई है जो मुझे दुनियादारी के निर्णय लेने मे मदद कर सकता है, कालांतर मे मैंने डॉक्टर विजय अग्रवाल द्वारा लिखित पुस्तक – “ सही निर्णय कैसे लें” पढ़ी और वस्तुस्थिति का विश्लेषण करके तत्परता से निर्णय लेने की तरफ कदम बढ़ाया |
इंसान गुणों की खान हो सकता है अगर वो अपने पराये की भावना से ऊपर उठ जाए और दूसरों के बिगड़े काम बनाने के लिए प्रयासरत हो जाये |
रवि भाई के एक बात अक्सर याद रहेगी कि कितने भी बड़े बन जाना अपने गाँव मोहल्ले के उन लोगों का साथ न छोड़ना जिनके साथ बचपन बीता हो |
मेरा भी प्रयास है की क्या बचपन क्या जवानी अगर किसी के मौके पर खड़ा हो सकूँ उसके काम में मदद कर सकूँ, सही काम में उसका हौंसला बढ़ा सकूँ तो खुद को धन्य मानूंगा|
विनम्र श्रद्धांजलि |
आज 07/05/2025 को पापा की पुण्य तिथि है,
जो काम मै हर साल पापा की बरसी पर करता हूँ वो है उनकी उन बातों/सीख को याद करना
जो या तो उन्होने कभी कहीं थी या ज़्यादातर अपने व्यवहार से परिलक्षित की थी
और मेरे खोजी मन ने उन्हे पकड़ लिया|
आज सोंचा की क्यूँ न उन बातों को लिखकर एक लेख का रूप दे दूँ ताकि यदि मेरे जैसे ही किसी और
लवकुश को इन बातों और सीखों की जरूरत हो तो वो भी इन्हें अपने जीवन को दिशा देने के लिए अमल कर सके ,
अगर एक भी ऐसा इंसान जिसे ये बातें अपने जीवन को बेहतर और गरिमामय बनाने मे मददगार साबित हो सकें
तो मै अपना लिखना सफल मानूँगा|
“पापा एक व्यापारी थे, बात के पक्के व्यापारी, असहायों के मददगार और रखवाले”
मृत्यु शय्या पर लेटा व्यक्ति क्या इच्छा जाहिर कर सकता है ?
पापा ने ये इच्छाएँ जाहिर की:
इन इच्छाओं पर गौर करने वाला कौन था स्वयं मै (लवकुश कुमार), पापा ने जो समझ, ज़िम्मेदारी लेने की स्वीकार्यता और स्पष्टता दी उसकी बदौलत आज भारत सरकार मे समूह ख का अराजपत्रित अधिकारी हूँ, आगे की यात्रा जारी है,
बहन भी अपने दाम्पत्य जीवन मे खुश है, माता जी का आशीर्वाद बना है और अनुज भी अभियांत्रिकी मे स्नातक की उपाधि के बाद अपने कौशल और समझ के दम पर अपने लिए कर्मभूमि तैयार करने मे लगा है |
जब तक जीवित रहा और कुछ भी करूँगा, पापा द्वारा दी गयी परवरिश याद रहेगी|
श्रद्धांजलि...
बच्चे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं, ये अमूमन माहौल से निर्धारित होता है या दूसरा की उन्हे एक्सपोजर कैसा मिला
कुछ शब्द जो कैरियर बन सकते हैं, महत्व और योगदान दर्शाते हैं एक समाज के स्थायित्व के लिए
उनके बारे मे कुछ बातें यहाँ दी जा रही हैं :कुछ और पेशे आगे के लेख मे साझा किए जाएंगे |
| क्रम संख्या | पेशा | योगदान और महत्व | कुछ उदाहरण |
|---|---|---|---|
| 1 | साहित्यकार | लोगों को जीवन, दुनिया,चीजों, जगहों, समाज और खुद को लेकर समझ बेहतर हो इसके लिए किताबें, लेख, कवितायें, उपन्यास, निबंध, जीवनी, आत्मकथा रिपोर्ताज आदि लिखते हैं | | मुंशी प्रेमचंद, शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय, मनु भण्डारी, नागार्जुन, मुक्तिबोध आदि |
| 2 | शिक्षक | एक बेहतर, सजग, संवेदनशील, जागरूक, बहादुर, कौशलयुक्त और समझदार नागरिक बनाने के उद्देश्य से बच्चों को शिक्षित करते हैं | | आपके स्कूल के शिक्षक/शिक्षिकाएँ जिनसे पढ़कर आपको अच्छा लगता है | |
| 3 | डॉक्टर | लोग स्वस्थ रहकर अपना जीवन खुशी से जी सकें और खूब काम कर सकें, लोगों की मदद कर सकें इसके लिए बीमार पड़ने पर उनका इलाज़ करते हैं | | आपके शहर, आपके प्रदेश, देश के वो डॉक्टर जिन्होंने आपको स्वस्थ करने मे भूमिका निभाई | |
| 4 | इंजीनियर |
हमारे जीवन को आसान बनाने के लिए मशीन, सड़कों, रेल, पुलों, इमारतों, सॉफ्टवेअर,बिजली उपकरणो, कारखानो का निर्माण आदि |
एम॰ विश्वेसरैया, ई॰ श्रीधरन आदि |
कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जिनकी अनुचित मांगें आप ये सोचकर पूरी करते रहते हो कि इनसे बात बिगड़ न जाए, व्यवहार में जो मीठापन है वो चला न जाए और अक्सर ऐसा होता है कि ऐसा इंसान आपका दोहन करता रहता है।
तो आखिर क्या करें?
आपकी श्रद्धा सत्य के प्रति होनी चाहिए न कि किसी इंसान के प्रति, जब तक वो सत्य के साथ, आप साथ देते रहो।
जैसे ही कोई अनुचित मांग करें उससे तुरंत कहो कि उसकी मांग अनुचित है पूरी नहीं हो सकती।
फिर ऐसे इंसान से बिगड़नी हो तो बिगड़ जाए, जहां कल बिगड़नी हो आज बिगड़ जाए, कम से कम आपका नुकसान होने से बच जाएगा, ऐसे इंसान से बनाकर रखने से भी कोई लाभ न होगा।
जो जरूरी है आपके पास से जाएगा नहीं इसीलिए संभालने की जरूरत नहीं है और जो जरूरी नहीं है उसे संभालकर करोगे क्या!
किसी के पास इतना काम है कि शुकून से खाना खाने तक का वक्त नहीं है
और किसी के पास इतना भी काम नहीं कि खाने भर का कमा सके
किसी से ओवरटाइम काम लिया जा रहा
और वो घर पर वक्त नहीं दे पा रहा
और किसी के पास काम ही नहीं
तो घर पर ही पड़ा हुआ है।
पेशे में पुराने लोगों के पास इतना काम है कि क्लाइंट वेटिंग में हैं
और नए लोगों के पास इतना भी काम नहीं कि
उस पेशे को जारी रख सकें
कुछ लालची चैन से खाने तक का वक्त भले न पाएं लेकिन मार्केट में मोनोपली चाहते हैं और किसी अन्य प्लेयर को टिकने ही नहीं देना चाहते।
इतनी असमानता क्या फ्रस्ट्रेशन, निराशा और ईर्ष्या को जन्म नहीं देती ?
क्या हम संतुलित दिनचर्या के महत्व को समझ रहे हैं?
कहीं हम अपना लाभ बढ़ाने के लिए अपने कर्मचारियों से संतुलित दिनचर्या की संभावनाएं तो नहीं छीन रहे उनसे नियमित ओवरटाइम कराकर ?
Generally being practical means being adoptive to convinient ways rather choosing an ideal way of achieiving something without thinking the very impact it will leave on society and practices in long run while the actual meaning should be correcting your perspective such that you consider human psychology/mindset and preferences, precedences and situations while planning to achieve something involving human interventions.
This series of this website will have articles in line with the definitions above to bestow you with clarity on the terms and functioning of society.
लवकुश कुमार, भौतिकी में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली से परास्नातक हैं और वर्तमान में भारत मौसम विज्ञान विभाग में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।
इनका विश्वास है कि अच्छा साहित्य समाज में मानवता के घटक, संवेदनशीलता, विचारशीलता, बंधुत्व और चेतना के उन्नयन में योगदान करता है ; इसी बाबत साहित्यिक लेख, विचार और समीक्षाएं भी साझा की गयी हैं |
लेखक का विश्वास है की सूचना के इस युग में समावेशी प्रकृति के और समाज में मानवता, उत्कृष्टता और बंधुत्व को प्रोत्साहित करने वाले विचारों पर ज्यादा से ज्यादा जोर देना जरुरी है|
इनका रुझान बचपन से ही हिंदी साहित्य की तरफ रहा, विज्ञान की पढाई के साथ, कहानियां, उपन्यास, निबंध, जीवनी, यात्रा वृत्तान्त और लेख पढ़ते रहे, गायत्री परिवार के पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी की अध्यात्म पर पुस्तकें ग्यारहवीं में पढनी शुरू की, साथ ही बचपन से ही कक्षा में पढाए जाने वाले साहित्य ने इनका साहित्य को लेकर लगाव और जिज्ञासा बढाई परिणाम ये हुआ की बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय से भौतिकी में स्नातक करते वक़्त कक्षाओं के बाद का काफी समय साहित्य अध्ययन में दिया, वहां की साइबर लाइब्रेरी में ऑनलाइन ही प्रेमचंद्र द्वारा रचित बहुत सी कहानिया पढ़ी और सामाजिक ताने बाने को लेकर अपनी समझ पुष्ट की |
वहीं के केन्द्रीय पुस्तकालय से फणीश्वर नाथ रेनू और मनु भंडारी जी को पढ़ा, दुष्यंत कुमार जी को पढ़ा और साहित्य से ये लगाव आईआईटी दिल्ली से एम.एस.सी करने से लेकर भारत सरकार की सेवा में शामिल होने से लेकर आज तक जारी है |
जो कुछ सीखा, जिससे जीवन को बेहतर किया वही सब और लोगों के साथ साझा करने के प्रयोजन से इस वेबसाइट का निर्माण किया गया है |
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