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५ वर्ष का यथार्थ अपनी दादी के साथ शाम को मोहल्ले की खाली रोड पर टहल रहा है|
स्वच्छ हवा और शांत माहौल में उसके मन में एक पुराना सवाल कौंध आता है और वह अपनी जिज्ञासा हेतु अपनी दादी से पूछता है कि दादी, पलक बुआ कि शादी में जब वो दुल्हन बनी होती हैं तो दूसरी बुआ लोग उनके आगे फूल क्यों डालती हैं ?
ताकि बुआ को ऐसा महसूस हो कि वो खास हैं, राजकुमारी हैं हालांकि वो न तो खास हैं और न ही राजकुमारी, दादी का जवाब आता है।
- लवकुश कुमार
एक दृश्य में एक शायर, अपनी शायरी पाठ के बीच में बार-2 उस जलसे के आयोजक जोकि एक ज्ञानी इंसान थे उनका नाम ले रहा था और उनके जनहित के कार्यों को उद्धृत कर रहा था |
इसी घटना का सन्दर्भ लेते हुए क्या हम ये नहीं कर सकते कि जब किसी से बात करें तो उनका नाम लें बीच बीच में जरुरत के अनुसार, क्या होगा इससे ? इससे सामने वाले इंसान को अच्छा महसूस होगा और उसकी तरफ से बेहतर प्रतिक्रिया और बेहतर प्रदर्शन मिलेगा |
"वो फाइल उठा देना" से बेहतर है कि आप कहो कि " मोहन वो फाइल उठा देना"
"ठीक है" कहकर फ़ोन रखने से बेहतर है की आप कहो " ठीक है मोहन फ़ोन रखता हूँ " या "ठीक है मोहन फ़ोन रखता हूँ फिर बात होगी " या "ठीक है सोहन फ़ोन रखा जाये अब ? " या "ओके बाय मोहन रखता हूँ अब " |
नोट- हर किसी न किसी का कोई महत्व होता है, किसी को अपने व्यवहार से महत्वहीन न महसूस कराएँ
हर किसी से इंटरैक्ट करना जरुरी नहीं लेकिन जिससे इंटरेक्शन कर रहें हैं कम से कम उससे बात करते वक़्त उसकी गरिमा का ध्यान रखें और उसके कार्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें अगर कोई शब्द नहीं कह सकते तो एक प्यारी सी मुस्कान क्योंकि मुस्कान से हर्ष का पता चलता है और " हर्ष कृतज्ञता का सरलतम रूप है "
-लवकुश कुमार
जिस दिन हम "तथाकथित" छोटे से छोटे पद वाले इंसान को भी इंसान समझकर उसकी गरिमा का सम्मान करते हुए मान देंगे उस दिन "तथाकथित" बड़े पद वाले लोगों के प्रति इनके मन से जलन कुछ कम हो जाएगी |
जैसे एक ड्राइवर भी चाहता है कि लोग उसे ड्राइवर नहीं उसके नाम से बुलाएँ जिसे उसके माता पिता ने बड़े प्यार से रखा होगा |
-लवकुश कुमार
सही काम में लगे रहो, बिना तारीफ की आकांक्षा के क्योंकि अमूमन लोग तारीफ और समर्थन आपकी नहीं अपनी जरूरत और सहूलियत के हिसाब से करते हैं, जिस दिन आपका काम जिस इंसान को महत्व का लग जायेगा फिर उसकी तरफ से तारीफ भी होगी और समर्थन की पेशकश भी।
-लवकुश कुमार
लोगों के मनमाने व्यवहार और असीमित उपभोग की आकांक्षाओं ने धरती और सभ्यता को संकट में डाल दिया है - ग्लोबल वार्मिंग, बिखरते रिश्ते, तनाव, बेरोजगारी और असुरक्षा की भावना, सामाजिक प्रतिष्ठा की चाह के चलते समाज से रिकग्निशन पाने की गैर जरूरी हद तक कामना इत्यादि।
जब अमूमन वाट्सैप स्टेटस पर पर्यटन के फोटोज या सतही ज्ञान के वीडियो/फोटो दिख रहे हों उस बीच " जीवन, मानव मन और दुनिया की बारिकियों या फिर इंसान की विरोधाभासों से भरी जिंदगी पर एक नजर डालने का इशारा है। "
हो सकता है कि २५० लोगों में ऐसे भी लोग हों जो स्टेटस में लेख या उक्ति देख बिना पढ़े आगे बढ़ा देते हों
कुछ ऐसे होंगे जो सहमत न होते होंगे और इन्हें किताबी बातें बोलकर चिढ़ जाते हों
कुछ ऐसे होंगे जो आंशिक रूप से सहमत होते होंगे
कुछ तो इन्हें जीवन में उतारते होंगे
कुछ के दिमाग के किसी कोने में पड़ जाते होंगे, ताकि वक्त जरूरत स्पष्टता में काम आयें
कुछ के जीवन में चल रहे झंझावातों और उलझनों का समाधान मिल जाता होगा
कुछ तो मेरे स्टेटस को रिपोस्ट करते हैं अपनी वाल पर
या वो खुद भी उक्तियों को स्टेटस में लगाना आदत में ले आते हैं।
मेरी कल्पना में है वो एक दिन जब आपकी कांटैक्ट लिस्ट के कई लोगों के वाट्सैप स्टेटस में होंगी ऐसी पंक्तियां जो हमारी समस्या का हल हो सकती हैं
या हमें हमारी मानसिक गुलामी का एहसास करा सकती हैं
या हमें हमारे जीवन के झूठ को आयने में दिखा सकने की क्षमता रखती होंगी
या फिर वो हमारे जीवन और समाज की असली और केंद्रीय समस्या की तरफ हमारा ध्यान खींच सकती हैं
या वो हमें ये अहसास दिला सकती हैं कि हमें कोई अधिकार नहीं अपनी आराम और विलासिता के लिए, समाज और वातावरण को खतरे में डालने का
या वो लोगों, स्वयं और दुनिया को लेकर हमारे भ्रम को तोड़ हमें तनाव और दबाव से मुक्त कर सकती हैं।
अगर आप भी किसी बिंदु से सहमत हैं तो उठाइए एक कदम खुद की और उस माहौल और उस हवा को बेहतर करने को जिसमें हम सांस लेते हैं।
जब हमारे कार्य के पीछे जनहित होता है फिर हमें ये न सोचना चाहिए कि लोग ( संकीर्ण समझ के लोग) हमारे बारे में क्या सोचते हैं।
शुभकामनाएं
- लवकुश कुमार
एक सरकारी कार्यालय का दृश्य, कर्मचारी अपने अपने काम में लगे हैं।
धीमी आवाज में, पदासीन अधिकारी हरीश जी के फोन पर रिंगटोन बजती है, " नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जाएगा "
हैलो, सामने से आवाज आती है
हैलो सचेत भाई कैसे हो, और कैसी चल रही है पहाड़ की यात्रा, हरीश जी पूछते हैं ।
बढ़िया चल रही है हरीश भाई, एक बात बताओ यार ये ड्राइवर को खाना खिलाने की बात हुई थी क्या, ये तो तीनों डाइट क्लेम कर रहा है जबकि मैंने तो ब्रेकफास्ट भी कराया और २०० रुपये भी दिए, सचेत निश्चिंत होना चाहते हैं, हरीश भाई, ऐसी कोई बात हुई थी क्या, अगर हुई है तो मैं दे देता हूं पैसे।
सचेत, हरीश के मित्र हैं और उत्तर भारत के पर्वतों की सैर के लिए ४ दिन के दौरे पर हैं, क्योंकि हरीश इसी पर्वतीय राज्य में केंद्रीय सेवा में हैं अतः दौरे की व्यवस्था इनके हांथ में और खर्चा दोस्त के हांथ में है ।
यथा नाम तथा गुण
सचेत, सचेत हैं कि जब बात नहीं हुई तो पैसे क्यों दें और हरीश, हरीश निकले कि जब बात केवल १००-२०० की हुई थी तो ज्यादा खर्चे के लिए अपने दोस्त को बोलें तो कैसे बोलें हालांकि वो चाहते थे कि ड्राइवर को खाने के लिए उचित भुगतान कर दिया जाए, क्योंकि कम दिहाड़ी में पहाड़ का अपेक्षाकृत महंगा खाना, ड्राइवर की जेब ही खाली कर सकता है।
क्योंकि बात १००-२०० की ही हुई थी इसीलिए हरीश ने सचेत से कह दिया कि वह सारी डाइट्स का भुगतान करने को बाध्य नहीं।
बात आई गई हो गयी हो गई लेकिन हरीश के संवेदनशील मन में विचार और सवाल आने लगे कि जब ड्राइवर को खाना, पार्टी ही खिलाती है तो उसने पहले क्यों नहीं कहा खुलकर, कहा भी तो गाड़ी मालिक ने १००-२०० की बात कही, और फिर झूठ क्यों बोला कि बात हुई है?
एक और बात कौंध गई कि ड्राइवर द्वारा खाने के लिए बोले गए झूठ को तो पकड़ लिया लेकिन उन आनलाइन शापिंग कंपनीज के झूठ का क्या जो १२०० की कीमत की चीज की कीमत को २५०० लिखकर उसे ४०% छूट के साथ १५०० का बेंच देती हैं?
क्या हम इस संगठित झूठ का विरोध कर पाते हैं?
- लवकुश कुमार
कल रात 10:30 के आस पास, 90's का एक गाना कई बार सुना (हैडफ़ोन लगाकर बिना किसी को डिस्टर्ब किये ), संगीत बड़ा अच्छा लगा, मनमोहक, किसी काम को जल्दी पूरा करने का दबाव न था, सुकून में था मन, और रचना हुयी एक लघुकथा (जो कुछ वक़्त समीक्षा में रहने के बाद वेबसाइट पर अपलोड कर दी जाएगी ) की और साथ ही कई पुरानी घटनाओं को शांत मन से याद कर पाया और उन पर लघुकथा की रचना के लिए शीर्षक लिखे (संख्या में 8), ये महत्ता होती है शांति की, सुकून की |
" दुनिया में सृजन और अन्वेषण के अनेक कार्य शून्य के क्षणों में ही हुए हैं | "

डॉ॰ प्रीति अग्रवाल द्वारा लिखित यह प्यारी सी पुस्तक, आदरणीय डॉ॰ विजय अग्रवाल सर के जीवन, संघर्ष, कार्यों और अनुभवों पर आधारित है, प्रकाशक बेनतेन बुक्स के शब्दों मे - " यह एक पिछड़े छोटे से गांव में निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे डॉ. विजय अग्रवाल के जीवन की सच्ची कहानी है। यह उस किसी भी ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो अपनी विपरीत परिस्थितियों से हार मानने से इंकार करके अपनी ज़िन्दगी में निरंतर अग्रसर होता जाता है। इसको पढ़ते समय इसमें आपको कई जगह अपनी झलक दिखाई दे सकती है। इस पुस्तक मे आपकी मुलाक़ात केवल घटनाओं से ही नहीं होगी बल्कि उन घटनाओं को जन्म एवं स्वरूप देने वाले जीवन के सूत्रों से भी होगी | 'तृषित' यानि प्यासा | यह आपके लिए ' जीवन के जलकुंड ' का भी काम कर सकती है, आपके जीवन से जुड़े कुछ प्रश्नो के उत्तर देकर "
मैंने क्या बेहतरी महसूस की इस पुस्तक को पढ़कर:
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय डॉ॰ प्रीति अग्रवाल को कि उन्होने इस पुस्तक को लिखकर हमारे जैसे युवाओं को अपने अजीज डॉ॰ विजय अग्रवाल सर को और बेहतर तरीके से जानने समझने का मौका दिया |
मुझे पूरा विश्वास है कि पाठक इस पुस्तक को पढ़कर बहुत कुछ बेहतरी की तरफ बढ़ सकते हैं फिर चाहे वो जीवन का मामला हो या प्रातियोगी परीक्षाओं की तैयारी का मामला हो |
शुभकामनायें