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पता (लघुकथा) - सुषमा सिन्हा

सुबह-सुबह बहू घर में हंगामा मचाई हुई थी। पता नहीं, अम्मा जी कहां चली गई हैं। घर में हर जगह देख लीं। वह आस-पड़ोस में भी पता करने चली गई। घर में पति और तीनों बच्चे भी घबरा गए। हे भगवान ! मां अस्सी साल की है। उनसे ठीक से चला भी नहीं जाता, आखिर कहां जा सकती हैं, अचानक उन्हें क्या हो गया, फोन पर भी जान-पहचान वालों से पूछताछ शुरू हो गई। पड़ोस के कुछ लोग घर पर आ गए और मां जी के बारे में बातें करने लगे। घर में शोरगुल होने लगा। तभी सबसे छोटा बेटा जो सात-आठ साल का था, सबके बीच में कहने लगा-आप लोग बेकार में परेशान हो रहे हैं, मम्मी को तो पता है दादी कहां जा सकती है, क्योंकि मम्मी ही तो उन्हें पता बताती रहती है। कभी आश्रम जाने को कहती है, कभी मंदिर, कभी तीरथ, कभी बुआ के घर। अचानक ही घर में ऐसी खामोशी छा गई, मानो घर नहीं कोई वीराना हो।

© सुषमा सिन्हा, वाराणसी 

ईमेल- ssinhavns@gmail.com


 आदरणीय सुषमा सिन्हा जी का जन्म वर्ष 1962 में गया (बिहार) में हुआ, इन्होने बीए ऑनर्स (हिंदी), डी. सी. एच., इग्नू (वाराणसी)  उर्दू डिप्लोमा में शिक्षा प्राप्त की|

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विगत 32 वर्षों से कविता, लघु कथा, कहानी आदि प्रकाशित । इनकी  प्रकाशित पुस्तकें निम्नलिखित हैं :-
चार लघुकथा संग्रह
1. औरत (2004)
2. राह चलते (2008)
3. बिखरती संवेदना (2014)
4. एहसास (2017)

अपने शिल्प में निपुण सुषमा जी में अथाह सृजनशीलता है। 

अपनी सिद्ध लेखनी से सुषमा जी जीवन के अनछुए पहलुओं पर लिखती रही हैं और लघु कथा विधा को और अधिक समृद्धशाली कर रही हैं    लेखिका और उनके लेखन, शिक्षा और सम्मान के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें |


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

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स्वार्थ (लघुकथा) - सुषमा सिन्हा

अखबार पढ़ते-पढ़ते सुधीर बाबू चहक उठे। पत्नी को आवाज देते हुए कहने लगे, सुनती हो मेरा एक जूनियर इसी शहर में अधिकारी बनकर आया है। खूब जल्दी तरक्की की है उसने। मैं जब बिजली आफिस से रिटायर किया था तो बहुत दिनों तक वह फोन करता था, मैं ही कभी अपनी तरफ से उसे

 फोन नहीं किया। खैर, चलो अब हमारा बिजली वाला काम आसानी से हो जायगा। काफी समय से पेंडिंग पड़ा है। पत्नी भी खुश होकर कहने लगी, यह

तो बड़ी अच्छी बात है।

फिर देर किस बात की। फोन मिलाइये और बधाई देते हुए अपने काम

की बात करने पहुंच जाइये बिजली आफिस । हां-हां, ऐसा ही करता हूं। वह

बिना विलम्ब किये फोन लगाये। बधाई-आशीर्वाद देने के बाद थोड़ी देर तक

इधर-उधर की बातें करके फोन रख दिये। अब पत्नी को गुस्सा आ गया। वह

झुझलाहट में बोली आप भी हद करते हैं। आलतू-फालतू की बातें कर लिये,

मेन मुद्दे की बात भूल गये।

इसे ही कहते हैं, "आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास!" धत्त ।

सुधीर बाबू कुछ झेंपते हुए कहने लगे, मैं क्या कहता-कैसे कहता। फोन

करते ही उसने यही कहा-क्या सर, बहुत दिनों बाद याद किये, कोई काम है

क्या ?

 

© सुषमा सिन्हा, वाराणसी 

ईमेल- ssinhavns@gmail.com


 आदरणीय सुषमा सिन्हा जी का जन्म वर्ष 1962 में गया (बिहार) में हुआ, इन्होने बीए ऑनर्स (हिंदी), डी. सी. एच., इग्नू (वाराणसी)  उर्दू डिप्लोमा में शिक्षा प्राप्त की|

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विगत 32 वर्षों से कविता, लघु कथा, कहानी आदि प्रकाशित । इनकी  प्रकाशित पुस्तकें निम्नलिखित हैं :-
चार लघुकथा संग्रह
1. औरत (2004)
2. राह चलते (2008)
3. बिखरती संवेदना (2014)
4. एहसास (2017)

अपने शिल्प में निपुण सुषमा जी में अथाह सृजनशीलता है। 

अपनी सिद्ध लेखनी से सुषमा जी जीवन के अनछुए पहलुओं पर लिखती रही हैं और लघु कथा विधा को और अधिक समृद्धशाली कर रही हैं    लेखिका और उनके लेखन, शिक्षा और सम्मान के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें |


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समीक्षा:  “रोशनी के डोंगे (लघुकथा- रजनी शर्मा बस्तरिया)- डॉ. रौशन शर्मा.

 

रजनी शर्मा बस्तरिया की कहानी “रोशनी के डोंगे” भारतीय लोकजीवन, विशेषतः छठ पर्व की आध्यात्मिक आभा और ग्रामीण संवेदना को अत्यंत काव्यात्मक भाषा में रूपायित करती है। यह कहानी मात्र एक पर्व का दृश्य नहीं रचती, बल्कि उसमें निहित नारी के तप, जिजीविषा, सौंदर्य और विश्वास की सांस्कृतिक गाथा प्रस्तुत करती है।

भावभूमि और संवेदना:

कहानी का आरंभ एक शहर की बालकनी से होता है — एक ऐसा स्थान जहाँ लेखक स्वयं को ‘देहाती अंदाज़’ में टिकाए हुए है। यही बालकनी ग्रामीण स्मृतियों और शहरी वास्तविकताओं के बीच संवेदनात्मक सेतु बन जाती है। कथा का परिवेश धीरे-धीरे छठ पर्व की प्रतीक्षा और उल्लास से भर उठता है — “कानों में छठ के गीत हक जमाती आ रही थी।” यह पंक्ति पूरे वातावरण में श्रद्धा और लोक-उत्सव की गंध बिखेर देती है।

 प्रतीकात्मकता और बिंब-योजना:

कहानी की भाषा चित्रमयी है। लेखक ने रोशनी, धूप, सूरज, घाट, टिकुली, दीपशिखा, अंजोर आदि प्रतीकों के माध्यम से जीवन, संघर्ष और आशा की सततता को दिखाया है।

“चँदा टिकुली का डूबते सूरज से भिड़ंत होना” — यह दृश्य नारी-सौंदर्य और प्रकृति के संगम का अद्भुत बिंब है। “घाट पर रोशनी के डोंगे, और उम्मीद की पतवार” — यहाँ दीप सिर्फ़ पूजा का साधन नहीं, बल्कि जीवन-संघर्ष में उम्मीद का रूपक बन जाता है।

कहानी का शीर्षक “रोशनी के डोंगे” भी इसी प्रतीकात्मक अर्थ का विस्तार है — जीवन रूपी अंधकारमय सागर में तैरती विश्वास की ज्योति।

नारी और लोकजीवन:

लेखिका ने छठ पर्व को ‘व्रती साम्राज्ञियों’ का साम्राज्य कहा है। यह दृष्टि विशेष रूप से स्त्री-केन्द्रित है।

वे स्त्रियाँ केवल सजने-सँवरने वाली नहीं, बल्कि त्याग, अनुशासन और श्रद्धा की प्रतीक हैं। लेखक की दृष्टि में वे इस लोकविश्वास की असली वाहक हैं, जो अंधकार में भी अंजोर जगाती हैं।

शैली और शिल्प:

कहानी का शिल्प काव्यात्मक गद्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। भाषा में लय, ध्वनि, और दृश्यात्मकता है। “बादलों का टुकड़ा आकर मेरे पास  लुढ़क जाता है”, “हवाएँ अखबार के बाल सँवारने की ज़िद करती हैं।”

ऐसे बिंब कहानी को संवेदना और सौंदर्य के सम्मिलन तक पहुँचा देते हैं।

विदुषी लेखिका रजनी जी ने ग्रामीण संस्कृति को आधुनिक नगर जीवन के संदर्भ में रखकर ‘सांस्कृतिक पुनर्स्मरण’ का प्रभाव उत्पन्न किया है।

अन्तर्निहित दर्शन:

कहानी अंततः उम्मीद, संघर्ष और जिजीविषा की कथा है।

छठ का पर्व यहाँ आस्था का सामाजिक रूपक है। ‘रोशनी के डोंगे’ — वे दीप हैं जो हर स्त्री अपने विश्वास से जलाती है, ताकि जीवन की अंधेरी लहरों में भी दिशा बनी रहे।

इसप्रकार, “रोशनी के डोंगे” एक संवेदना-संपन्न, सौंदर्यपूर्ण और प्रतीक-प्रधान कथा है, जिसमें लोक और शहरी जीवन के बीच आस्था की एक उजली लकीर खिंचती है।

रजनी शर्मा बस्तरिया ने इस कहानी में छठ पर्व की आत्मा, भारतीय नारी की सहनशीलता, और मनुष्य की जिजीविषा को बड़ी सहजता से शब्दों में बाँधा है। यह कहानी पाठक के भीतर भी एक दीप जलाती है —

“जुगजुगाता अंजोर…” —

यानी आशा की वह ज्योति, जो हर युग में, हर मन में, जलती रहनी चाहिए।

 

-डॉ. रौशन शर्मा.

दिल्ली विश्वविद्यालय


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जमीर (लघुकथा)- सौम्या गुप्ता

एक पिता अपनी बेटी से.....तुम बहुत दिनों से जॉब के लिए परेशान थी,  मैंने तुम्हारे लिए जॉब ढूंढ ली है।

बेटी खुशी से..... आप बताइए  पापा कौन सी जॉब है?

पिता ने कहा....अपने दस्तावेज़ निकाल के दे देना, दो लाख का इंतजाम करना होगा।

ये सुनते ही बेटी की खुशी उदासी में बदल गई, उसने कहा पापा ये जॉब तो मेरिट के आधार पर मिलती है,

पिता.. जहां तक मै जानता हूँ ..कोई सरकारी नौकरी बिना घूस के नहीं मिलती, ऐसे सिद्धांत पकड़ के रखेगी तो एक दिन बहुत बुरा हो सकता है,  खाने को भी न रह गया तो? 

बेटी ने कहा.....पापा खाने को कुछ न मिला तो शायद कुछ दिन जी जाऊँगी,  पर किसी दूसरे के हिस्से का खाकर तो जीते जी मर जाने के बराबर है,  मैंने अपनी सहेली को देखा है उसके पिता के बुरे कर्मों के कारण आज वो परेशान है, फिर आपने ही तो सिखाया है अपने सिद्धांतों के साथ खड़े रहना( बेटी ने पिता के मन को कूटनीतिक बुद्धि से जीता क्योंकि वो जानती थी कि उसके पिता कैसे मानेंगे)

इस बहस में बेटी जीत गई और पिता हारकर भी जीत गये ( बेटी ने मन ही मन अपने गुरु को याद किया और उन्हें धन्यवाद दिया जिनके जीवन से प्रेरणा पाकर उसने यह सत्याग्रह जीता था) लेकिन पिता अपनी बेटी की परीक्षा लेकर खुश थे |

- सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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हमारे जीवन का उद्देश्य क्या हो? - सौम्या गुप्ता

आज हमारे पास अपने जीवन के उद्देश्य के लिए बहुत से विकल्प उपलब्ध है। पर क्या आपने कभी सोचा है? क्या यही उद्देश्य सबकुछ है? 

हमारे पास दो तरह के जगत होते है- एक जिसमें हम खुद रहते है, एक जो हम अपने लोगों के साथ रहते है। मुझे ऐसा लगता है आप पहले खुद को एक मजबूत व्यक्तित्व बना लीजिए उसके बाद आप जो भी बनेंगे, शानदार बनेंगे। शानदार बनने के लिए जब आप खुद के साथ है उस वक्त खुद का ही परीक्षण कीजिए, आपने क्या किया है , क्या करना चाहते है, क्यों करना चाहते है? आपका करना सिर्फ आपके लिए है या दूसरों के लिए। 

जीवन का उद्देश्य, जीवन की सार्थकता में होना चाहिए और जीवन की सार्थकता आपके काम में, और काम से ज्यादा काम के तरीके से और उसके पीछे आपकी पवित्र भावना से तय होती है। आप जो कर रहे है अगर कुछ भी न मिलने पर भी आप वो काम कर सकते है तो आप सही काम कर रहे है, हां वो काम नैतिक और संवैधानिक भी होना चाहिए। 

काम से मिलने वाला आनंद ही काम से मिलने वाला सर्वोच्च पुरस्कार है।

-आइंस्टीन 

हमारा काम ज्ञान से उत्पन्न, ईश्वर को समर्पित और पूरे मन से होना चाहिए।

ऐसा पवित्र कर्म ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए, हम कुछ भी करे पूरे मन से करे और पवित्र भाव से करे। पवित्र भाव पवित्र कर्म के प्रति ही होगा

- सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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रोशनी के डोंगे (लघुकथा) - रजनी शर्मा बस्तरिया

अरसा हो गया था, नपी -तुली हवायें खिड़कियों के सात  पहरों से ही  कुंडियाँ खटखटाकर  आतीं थीं। अब धीरे से रजाई से झाँकता  सूरज!

 कानों में छठ के गीत हक जमाती आ रही थी। अब मैने भी गठियाये  गिरह खोल दिए ।

     ज्यादातर शहर की बालकनियाँ कतरे गये   पौधों की जमात भर रह गई है। जहाँ मंहगे गमले ,कालीन और न जाने क्या-क्या? पर मैंने बालकनी शहर में भी देहाती अंदाज में रखे हैं। इसमें ऐश्वर्य की चीज   बस एक बैठने का मोड़ा । जिस पर बैठकर या बालकनी में दुबककर दुनिया ज़हान को निहारना । यही मेरा गवैंया   शगल ......

     बादलों का टुकड़ा आकर मेरे पास लुढ़क जाता है और हवाएं  अखबार के बाल सँवारने की जिद करती हैं । चाय की ताप मेरे भीतर आ जाती है। 

  रात से  ही शीत से कहा- सुनी हो गई थी पर उम्मीद थी कि  सुबह कनखी कुतरती धूप सुलह करवा ही देगी! और हुआ भी यही‌।  शीत भी आँखें उघाड़ कर सूरज को देखना चाह रही थी , वह भी चोरी छुपे!

  पहले सड़क पर दूर से बजती बैंड बाजे की आवाज आई।  सड़क की अटारी पर पतुरिया, माई के आने की खबर ला रहीं थीं ।

     छठी पर्व के गीत हरक़ारा बन पाती बाँच रहे थे‌ मैं अपनी पारी की प्रतीक्षा में थी।

   अहा !  माहुर रचे  पाँव ,पायल बिछिया। सड़क भी बिल्कुल शांत थी! इतने माहुरिया गंध वाले पाँवों को हौले हौले वह भी सहेज रही थी।

अब अगर यह अवसर गंवा दिया तो फिर साल भर की प्रतीक्षा करनी होगी। सही तो है रोज-रोज वही कीमती पनही की लगातार झझरंग-झझरंग झांपे।

  पाँवों के साथ पाँवजोरी  करती आँचल के छोर  वह भी ललिया चुनर की घेराबंदी में!

  कलाइयों में सतरंगी चूड़ियाँ एक लय में जल तरंग सी बजती हुई। करधन के घुँघरू ,कान के झुमके इतना *शालीन सौंदर्य* आज घाट की ओर! एक लय में जा रहे थे। 

चँपई अंधेरा भी पलक झपकाना भूल गया था। माथे पर चँदा टिकली दपदप करती हुई । मानो ललाट पर ही सूरज उग आया हो और इस चँदा टिकली का डूबते सूरज फिर उगते सूरज से भिड़ंत होने वाली हो!

   गोद में शिशु ,सूपा, टोकनी ईख , कदली फल और न जाने क्या क्या? 

     मैं आज एक-एक दृश्य को भरपूर देखना चाह रही थी। लंबे केशों के स्वामिनियों  के पद चालन की गति चँवर डोला रही थी। हाँ यह कोई साधारण  नहीं बल्कि  व्रती साम्राज्ञियाँ  ही तो हैं।  इनके लिए , इनके संग  रोशनी का साम्राज्य ही तो पसरा है ।

    रेले को  जाते मैने देखा । मैं प्रतीक्षा में थी उनकी वापसी की ।

अहा!

   बंदन नाक से लेकर कपाल के अंतिम छोर तक.........! 

जैसे सूरज अंतिम छोर तक हो। 

माई को गाड़ी में बिठाते नवयुवक, युवतियों की ठिठोली , बहूओं का आँचल, बच्चों के हाथों में गुब्बारे।

   सूरज को लेकर लौटना। दोनो में अर्ध्य, नमन में पगा प्रणाम , बातियों की ऊबक -डुबक, घाट पर रोशनी के डोंगे, और उम्मीद की पतवार ।

संसार के सागर में पार उतरना  इतना आसान होता है क्या? यह चँदा टिकुली जो आकाश के माथे पर लकलका उठा है । इस छठ पर्व की छटा देहाती बालकनी से देखना।

 पर्व मेरे अंतस में उतर गया.....जंगली घास के रंगीन टोकनियाँ । जिजीविषा , संघर्ष, उम्मीद के रंगों से रंगे उनके लिए भी मन  ललच गया।

   मन तो सड़क का  भी ललचा  गया । सड़क आज घाट तक पहुँचने को बहुत आतुर, व्याकुल। घाट जो  जाती थी नदी तक.....  जिस पर उतरती थीं  व्रत धारिणियाँ। माहुर रचे पाँव उतरते थे घाट पर, लहरता पनीला आँचल झरते  फूल ,झलपता नेह ,दोनो में कंपित  दीपशिखा  की लौ ।

 

 जुगजुगाता अंजोर.......

  © श्रीमती रजनी शर्मा बस्तरिया

 रायपुर छत्तीसगढ़


आदरणीय श्रीमती रजनी शर्मा बस्तरिया जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना,  सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, वह एक शिक्षिका, लेखिका और साहित्यकार हैं, जिन्होंने बस्तर की संस्कृति और जीवन पर आधारित कई किताबें लिखी हैं। उन्होंने अपनी शिक्षा और बस्तर में तैनाती के दौरान आदिवासी संस्कृति, लोक नृत्य, बोलियों और त्योहारों के बारे में सीखा और इन विषयों पर 14 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ की सरकार और साहित्य के क्षेत्र में कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया है।

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ब्रह्मास्त्र (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

आज शाम की वॉक पर शर्मा जी बड़े अनमने से चुप-चाप चल रहे थे। संग चल रहे गुप्ता जी ने इसे भांप लिया था ।
" क्या बात है शर्मा जी ! आज आप कुछ परेशान से लग रहे हैं ? बताइए ना कुछ हमारे लायक हो तो ,हम मदद के लिए तैयार हैं "।
शर्मा जी पहले तो बात को टालते रहे ,लेकिन कई बार कुरेदने पर कहने लगे  " क्या बताऊं गुप्ता जी लगता है मैंने आपकी बात न मान कर बहुत बड़ी गलती की  है ।
रैन्ट पर घर देने से पहले आपने चेताया था ,लेकिन मुझे लगा था कि घर लेने वाला लड़का पढ़ा-लिखा है । पैथोलॉजी लैब है उसकी  ।अच्छी कमाई होती होगी । समय पर किराया मिलता रहेगा ,हमें और क्या चाहिए जात पात कोई मायने नहीं रखती मेरे लिए।"
"तो फिर कोई गड़बड़ कर दी क्या उसने" ।
" घर देने बाद हमें पता चला कि भ्रूण परीक्षण की आड़ में वह लिंग बताने का गैर कानूनी धंधा करता था जिसके चलते उसकी लैब पर 2 वर्ष से सरकार की सील लगी हुई है , और इस वजह से वह जेल भी जा चुका है "।

"अरे ..."

" जिन लोगों की उधारी है उसके सिर पर ,वो आए दिन आकर उससे गाली गलौज करते हैं ।बड़ी शर्म आती है हमें "।
शर्मा जी ने एक गहरी सांस ली, और मौन हो गये।
" आपके घर का रैंट तो समय पर देता है या वो भी ....." गुप्ता जी ने हैरानी से पूछा ।

" अजी कहां ! अभी तक तो किराया मांगने पर पति पत्नी कोई न कोई बहाना बना देते थे ।लेकिन कल जब मैं उनके घर तगादा करने गया , किरायेदार की पत्नी घर में अकेली थी।
मैंने पूछा बेटा पांच माह हो गये ,इस महिने भी किराया देना है या नहीं ।
तो उसने आंखें दिखाते हुए उल्टा मुझी पर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। ' अंकल जी जब पैसे होंगे दे देंगे हम , परेशान करोगे तो देख लेना.. "
" क्या देखना है बेटा मैं कोई नाजायज मांग तो कर नहीं रहा क्या करोगी बताओ "  मैंने कहा तो कहने लगी हम एससी हैं और सरकार ने हमारे लिये खास कानून बना रखा है उसी में आपके ऊपर छेड़छाड़ की रिपोर्ट दर्ज करा दूंगी '।

" मैं तुरंत उल्टे पैर हो लिया वहां से ।यार गुप्ता गर्म दूध मुंह में भर लिया है जो न उगलते बन रहा है ,न निगलते ही ।कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूं ।मैं इज्जतदार इन्सान हूं ।इस उम्र में
अगर उसने मुझे फंसा दिया तो मैं तो जीते जी मर जाऊंगा ।

 © सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


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महकता रिश्ता (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

नीलेश को सामने देख कर पायल को विश्वास नहीं हो रहा था कि ये वही लड़का  है जो स्कूल के दिनों में हमेशा उसे परेशान करता रहता था।नीलेश और वो दोनों जब एक ही कक्षा में पढ़ते थे,तब एक दिन वह उसके पीछे ही पड़ गया था। 
" पायल मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो "।
" अच्छा!! " पायल ने हंसते हुए जवाब दिया था। 
"सीमा बता रही थी,तुम ये शहर छोड़ कर जा रही हो,"

" हां!  वो ठीक कह रही थी "।
प्लीज़!. ऐसा मत करना पायल...,मै तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ, तुम्हारे बिना रह नहीं सकूंगा "।
" अरे कैसी पागलों वाली बातें कर रहा है तू, अभी तो हमने बारहवीं भी पास नहीं की है।  अभी बहुत कुछ करना है लाइफ में,  प्यार व्यार की बातें तो बाद में सोचेंगें, पहले पढ़ाई तो पूरी कर लें।समझा ?पायल ने चौंक कर हंसते हुए नीलेश की बात को टालना चाहा।
"लेकिन पायल तुम नहीं जानतीं,मैं तुम्हें दिलो-जान से  प्यार करता हूं, बस कभी कह नहीं पाया। यदि यकीन न हो तो चलो मेरे रूम पर" । 

कमरे का कोई कोना ऐसा न था,जहाँ पायल की तस्वीरें न चिपकी हों। हंसती, रोती, खिलखिलाती, उदास, दौड़ती, भागती,  हर पोजिशन के फोटो वहाँ लगे थे। कुछ छूटे हुए स्थानों पर पायल,पायल और सिर्फ पायल ही लिखा था ।  नीलेश की ऐसी दीवानगी देख कर पायल की आंखें विस्मय से फटी की फटी रह गयीं।

" ओ माइ गॉड! ये क्या पागलपन है नीलेश!!  पायल ने आश्चर्य से झिड़कते हुए कहा _ क्या सच में तुम मुझे इतना चहते हो!! "।
" आजमा कर देख लो!! तुम कहो तो मैं अपनी जान भी दे दूं ,  बस एक बार ये कह दो कि तुम भी मुझे.....  "।
" अरे अभी तुम्हारी औकात ही क्या है। फिर भी! मैं जो कहूँगी, क्या तुम वही करोगे " ?  पायल ने कटाक्ष करते हुए पूछा ।
" तुम कहो तो सही "।
" तो फिर मुझसे ये वादा करो, कि जब तक तुम पढ़ लिख कर मेरे योग्य नहीं बन जाओगे,  मुझसे कभी नहीं मिलोगे "।
पायल की बातों ने नीलेश के भीतर गहरे तक वार कर दिया था। फिर वह कुछ न बोल सका।
आज वही नीलेश लेफ्टिनेंट नीलेश के रूप में पायल केे सामने खड़ा था। 
" हैलो!  मैडम! कहां खो गयीं, अन्दर आने को नहीं कहोगी " ।
ओss  सौरी आइये!   मि. पागल ,।  पायल के मुंह से अनायास ही निकल गया। वर्षों से मुर्झाये रिश्ते की लता से आज प्यार के फूलों की भीनी महक फूट रही थी। 

© सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


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परिंदा (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

आँगन में  इधर-उधर फुदकती हुई गौरैया अपने बच्चे को उड़ना सिखा रही थी। बच्चा कभी फुदक कर खूंटी पर बैठ जाता तो कभी खड़ी हुई चारपायी पर, और कभी गिरकर किसी सामान के पीछे चला जाता। 

संगीता अपना घरेलू काम निपटाते हुई, ये सब देख कर  मन ही मन आनन्दित हो रही थी। उसे लग रहा था, मानो वह भी अपने बेटे रुद्रांश के साथ लुका-छिपी  खेल रही है।

आँखों से ओझल हो जाने पर जब गौरैया शोर करने लगती तब संगीता भी डर जाती कि जैसे रुद्रांश ही कहीं गुम हो गया है, और घबरा कर वह  गौरैया के बच्चे को श..श. करके आगे निकाल देती। 

बच्चा अब अच्छी तरह उड़ना सीख गया था।  इस बार वह घर की मुंडेर पर जाकर  बैठ गया और अगले ही पल उसने ऐसी उड़ान भरी कि वह दूर गगन में उड़ता चला गया। 

गौरैया उसे ढूंढ रही थी और चीं- चीं, चूं - चूं के शोर से उसने घर सिर पर उठा लिया। 

सन्तान के बिछोह में चिड़िया का करुण क्रन्दन देखकर  संगीता का दिल भी धक से बैठ गया। वो भी एक माँ जो ठहरी!  उसके बेटे रुद्र ने भी तो विदेश जाने के लिए पासपोर्ट बनवा लिया है औरअब कई दिनों से अमेरिका का वीजा पाने के प्रयास में लगा है।

© सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


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मान का पान (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

भैया का फोन सुनते ही बिना  समय गंवाये रिचा पति के संग मायके पहुंच गई। मम्मी की तो सबसे लाडली बेटी थी वो।
मां की गम्भीर हालत को देख कर  रिचा की आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गयी। मां का हाथ अपने हाथों में थाम कर " मम्मी sss " सुबकते हुए बस इतना ही कह पायी रिचा "। 

बेटी की आवाज कानों में पड़ते ही मां ने धीरे से आँखें खोल दीं । बेटी को सामने देकर उनके चेहरे पर खुशी के भाव साफ झलक रहे थे। "  तू.. आ.. गयी.. बिटिया!.. कैसी है तू!,  मेरा.. अब.. जाने का.. वक्त.. आ. गया.. है ,  बस तुझ से.. एक ही बात.. कहनी थी बेटा ! "

" पहले आप ठीक हो जाओ मम्मी!!  बात बाद में कह लेना " रिचा नेआँखों से हो रही बरसात पर काबू पाने की असफल कोशिश करते हुए कहा।

" नहीं बेटा!.. मेरे पास.. वक्त नहीं है,.. सुन!.. मां बाप किसी.. के हमेशा.. नहीं रहते,..  उनके बाद.. मायका. भैया भाभियों से बनता है.. "। मां की आवाज कांप रही थी।
रिचा मां की स्थिति को देख कर अपना धैर्य खो रही थी।  और बार बार एक ही बात कह रही थी ऐसा न कहो मम्मा!सब ठीक हो जायेगा "।

मां ने अपनी सारी सांसों को बटोर कर फिर बोलने की हिम्मत जुटाई " मैं तुझे एक ही... सीख देकर जा.. रही हूं बेटा!मेरे बाद भी रिश्तों की खुशबू यूं ही बनाये रखना,  भैया भाभियों के... प्यार.. को कभी लेने -देने की.. तराजू में मत तोलना..
बेटा!..  मान का.. तो पान ही.. बहुत.. होता है ",  मां ने जैसे तैसे मन की बात बेटी के सामने रख दी। शरीर में इतना बोलने की ताकत न थी, सो उनकी सांसें उखड़ने लगीं।

" हां मम्मा!आप निश्चिंत रहो, हमेशा ऐसा ही होगा, अब आप शान्त हो जाओ, देखो आप से बोला भी नहीं जा रहा है  ", रिचा ने मां को भरोसा दिलाया और टेबल पर रखे जग से पानी लेकर, मां को पिलाने के लिए जैसे ही पलटी, तब तक मां की आंखें बन्द हो चुकी थीं।
चेहरे पर असीम शान्ति थी, मानों उनके मन का बोझ हल्का हो गया था ।

© सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


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