अखबार पढ़ते-पढ़ते सुधीर बाबू चहक उठे। पत्नी को आवाज देते हुए कहने लगे, सुनती हो मेरा एक जूनियर इसी शहर में अधिकारी बनकर आया है। खूब जल्दी तरक्की की है उसने। मैं जब बिजली आफिस से रिटायर किया था तो बहुत दिनों तक वह फोन करता था, मैं ही कभी अपनी तरफ से उसे
फोन नहीं किया। खैर, चलो अब हमारा बिजली वाला काम आसानी से हो जायगा। काफी समय से पेंडिंग पड़ा है। पत्नी भी खुश होकर कहने लगी, यह
तो बड़ी अच्छी बात है।
फिर देर किस बात की। फोन मिलाइये और बधाई देते हुए अपने काम
की बात करने पहुंच जाइये बिजली आफिस । हां-हां, ऐसा ही करता हूं। वह
बिना विलम्ब किये फोन लगाये। बधाई-आशीर्वाद देने के बाद थोड़ी देर तक
इधर-उधर की बातें करके फोन रख दिये। अब पत्नी को गुस्सा आ गया। वह
झुझलाहट में बोली आप भी हद करते हैं। आलतू-फालतू की बातें कर लिये,
मेन मुद्दे की बात भूल गये।
इसे ही कहते हैं, "आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास!" धत्त ।
सुधीर बाबू कुछ झेंपते हुए कहने लगे, मैं क्या कहता-कैसे कहता। फोन
करते ही उसने यही कहा-क्या सर, बहुत दिनों बाद याद किये, कोई काम है
क्या ?
ईमेल- ssinhavns@gmail.com
आदरणीय सुषमा सिन्हा जी का जन्म वर्ष 1962 में गया (बिहार) में हुआ, इन्होने बीए ऑनर्स (हिंदी), डी. सी. एच., इग्नू (वाराणसी) उर्दू डिप्लोमा में शिक्षा प्राप्त की|
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विगत 32 वर्षों से कविता, लघु कथा, कहानी आदि प्रकाशित । इनकी प्रकाशित पुस्तकें निम्नलिखित हैं :-
चार लघुकथा संग्रह
1. औरत (2004)
2. राह चलते (2008)
3. बिखरती संवेदना (2014)
4. एहसास (2017)
अपने शिल्प में निपुण सुषमा जी में अथाह सृजनशीलता है।
अपनी सिद्ध लेखनी से सुषमा जी जीवन के अनछुए पहलुओं पर लिखती रही हैं और लघु कथा विधा को और अधिक समृद्धशाली कर रही हैं लेखिका और उनके लेखन, शिक्षा और सम्मान के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें |
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