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मंदाकिनी ने प्रिया के कांधे पर सिर टिका दिया और रोती हुई कहती रही “प्रिया आज वो मुझे हमेशा के लिए छोड़कर दूर चला गया"।
प्रिया ने मंदाकिनी का सिर सहलाते हुए कहा- “मंदाकिनी, समय ने तुम्हारे साथ क्रूर छल किया है, बचपन से आज तक हमेशा तुमको खुशियों की ठंडी छाँव ही मिली है, दुख तो डरता था जैसे तुम्हारे पास आने से।”
मंदाकिनी - फिर मेरे साथ ही ऐसा छल क्यों हुआ?
प्रिया - उसके हाथों को थाम के रखी हुई थी, समय के क्रूर छल का उसके पास कोई जवाब न था, बस वो भी अपनी सहेली संग कुछ आंसू ही बहा सकती थी।
लेकिन उसी समय प्रिया ने मन में सोचा, मैं आज तक एकतरफा प्रेम के चलते विकल रही हूँ व वात्सल्य का अभाव भी महसूस किया है, ईश्वर से शिकायतें करती रही, पर जिनको प्रेम और वात्सल्य का समुद्र मिला है वो मुझसे भी बहुत ज्यादा दुखी लग रहे हैं, फिर स्थाई सुख क्या है? जिसको खोने का डर न हो, सभी का प्यार मिल भी जाए तो क्या वो स्थाई रहेगा? नहीं रह सकता।
उस दिन से प्रिया सभी अस्थाई प्रेम के रूपों से अलग स्थाई प्रेम को खोज रही है, वह जानती है कि क्षणिक सुख और दुख जीवन का हिस्सा हैं। वह ऐसा प्रेम चाहती है जो हमेशा फिर उसको अपने अध्यात्मिक अध्ययन से उस परम आनंद के विषय में उस स्थाई प्रेम के विषय में पता चलता है कि भौतिक जगत में सभी में ईश्वर को देखना, जब सब में ईश्वर दिखेंगे तो कोई अपना पराया नहीं होगा, या कहें कि स्थायी प्रेम एक गहरी आध्यात्मिक स्थिति है जो स्वार्थ और भावनाओं से परे है। यह प्रेम मन की हीनता या निर्भरता से नहीं, बल्कि पूर्णता और आंतरिक शक्ति से उत्पन्न होता है। यह प्रेम अहंकार के विलय से पैदा होता है और इसका उद्देश्य व्यक्ति को मुक्ति, शांति और सच्चाई की ओर ले जाना है।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
: जैनेन्द्र कुमार की कहानी खेल पढ़ी जा सकती है बेहतर समझ के लिए।
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समर्थ तुम रेस्पेक्टेबल फ्लर्ट की बात कर रहे थे, मैंने महसूस किया है इससे मुझे भी अच्छा लगता है, ऐसा कैसे होता है? समझने में समर्थ करो मुझे भी, चेष्टा, समर्थ से जिज्ञासा करती है और हंसने लगती है।
समर्थ मुस्कुराते हुए, चेष्टा, जहां तक मैने समझा है, जब कोई हमारे अच्छे दिखने की या हमारी ड्रेस की या हमारे काम/उपलब्धि/व्यवहार की प्रशंसा इस तरह करता है कि उस बात के चलते एक जुड़ाव का प्रस्ताव या रुचि अभिव्यक्त हो तो हम खुश और बहुत अच्छा महसूस करते है, इसका कारण हमारे द्वारा खुद को महत्वपूर्ण महसूस करना होता है, खासकर जब ये प्रमाणीकरण या वैलीडेशन सामने से मिले, तुमने शायद महसूस किया हो कि जब हम सामने वाले इंसान की किसी बात के लिए तारीफ करते हैं और उधर से भी हमारे किसी काम की तारीफ मिल जाए तब एक अलग ही वैलीडेशन और इंपार्टेंस की फीलिंग आती है जो हममें उत्साह और आत्मविश्वास भर देती है इससे हमारी दक्षता बढ़ती है। जब कोई हमारी प्रशंसा करता है तो हमें अपनी काम की और खुद की सार्थकता का पता लगता है, काम के प्रति समर्पण भी बढ़ता है, बशर्ते तारीफ का विषय/तरीका ऐसा न हो कि सामने वाले को ये व्यक्तिगत सीमाओं के पार या निजता का हनन लगे।
चेष्टा - ओह, अब समझ आया कि दूसरों से प्रशंसा सुनना हमारे आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान को बढ़ा सकता है। जब हमें दूसरों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है, तो हम अपनी क्षमताओं पर अधिक विश्वास करते हैं और खुद को अधिक मूल्यवान महसूस करते हैं। यह हमें प्रेरित भी करता है और हमें बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
हां चेष्टा अब तुम समझने में समर्थ हो चुकी हो, तुम्हारी चेष्टा सफल रही, दोनों हंसने लगते हैं।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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डाक्टर विजय अग्रवाल - https://youtube.com/shorts/HEum_9kwLbE?si=hg34u0kU3R2kO43f
आचार्य प्रशांत - https://youtube.com/shorts/KQ19l1S-6j8?si=iyyGtMyzcn1ebPRu
https://youtube.com/shorts/QKGxcMuRPuc?si=Uu1fsAFbTYJDavf8
https://youtube.com/shorts/xM83JqsWeXo?si=Ff-PWBHnfW6ISl0m
https://youtube.com/shorts/_N4iLnZyb-0?si=dfhUg_AVplUZRM4B
https://youtube.com/shorts/paCaptm3uwo?si=CDVHmZ8tWfT1p3Qu
https://youtube.com/shorts/JPqEUvF2RFc?si=gNgdtOUKqXd7cLBb
https://youtube.com/shorts/9kyAXi4RUfc?si=jPwlv4eab3VEovzN
- आरती
संकलन कर्ता संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी।
"दुनिया, समाज सब बहुमत पर ही चलता है पापा, जिसकी ज्यादा सँख्या ज्यादा हो, उसी की तूती बोलती है' नमन पिता से कह रहा था, "अल्पमत को कोई नहीं पूछता।"
"नहीं बेटा" बाहर कम्पाउंड की ओर देखते प्रथमेशजी बोले, "हमेशा ऐसा नहीं होता, एक अकेला प्रखर बुद्धि, तेजस्वी इंसान भी अपने संकल्प को लेकर दृढ़ हो तो अन्याय की भीड़ को हरा सकता है। दीपक को देखा है न। दिये को। दीया, एक अकेला दीपक, जब प्रकाशित होता है कैसे घनघोर अंधेरे के बहुमत को हरा देता है? वो देखो, बाहर।"
उनकी बातें सुन मुस्कुराती, बाहर अंधेरे कम्पाउंड में खड़ीं मालिनी जी ने तभी दीपक जलाया तो उनके चेहरे के साथ ही *उजले वातावरण ने भी दमक कर* प्रथमेश जी की बात का समर्थन कया।
*और उस रात हार गया अंधेरे का बहुमत।*
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
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"छुट्टे नहीं है यार।" सर्दी की उस सुबह रामपाल अपने साथी रिक्शावाले से कह रहा था, "अभी दो घण्टे पहले एक अंकल स्टेशन से बैठे थे शास्त्री नगर के लिए लेकिन ऑटो में ही उनको हार्ट अटैक आ गया। मैं सीधे अस्पताल ले गया उनको और उनकी फेमेली बुलवा ली। जल्दबाजी में वो लोग मेरा किराया भी नहीं दे पाए।"
"अरे ! फिर तो आज तेरी बोहनी ही बेकार हो गई।" रियाज ने कहा, "तो अब रख दे आटो रिक्शा घर पे और आराम कर आज।"
"नहीं नहीं यार, उस अनजान आदमी की जान बच गई, यही आज की खुशी है और यही आज की बोहनी! मैं तो आज रिक्शा जरूर चलाऊँगा।" कहते हुए रामपाल ने ऑटो रिक्शा चालू किया तो *हैडलाईट की तेज रोशनी फैल गई।*
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
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"यार तुम कौनसी विचारधारा के हो?" सुबह तालाब किनारे टहलते हुए उसने पूछा मुझसे।
"क्यों? तुम्हें क्या लगा?" *सामने तालाब का पानी शान्त था लेकिन मेरी आँखों में शरारत हिलोरें लेने लगी थी।*
"मैंने देखा है जिस वाट्स एप ग्रुप में सरकार समर्थित लोग हैं, उसमें तुम सरकार के विरोध में टिप्पणी लिखते हो और जिस ग्रुप में सरकार विरोधी चर्चा होती है, वहाँ तुम सरकार के पक्ष में सारी पोस्ट डालते हो। ये क्या चकर है?"
" चक्कर? हा हा हा," *मैंने एक पत्थर उठाकर तालाब में फेंका तो पानी में तीव्र हलचल हुई और लहरें गोल-गोल चक्कर लगाने लगीं*," हम एक तीसरे ही ग्रुप के हैं, हम तो लोगों को उकसाते हैं और फिर उनकी उत्तेजना का आंनद लेते हैं बस !"
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
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आप इतना खुलकर कैसे बात कर लेते है, क्या आपको डर नहीं लगता? कि सामने वाला आपके बारे में गलत सोच सकता है?
नहीं मुझे लोगों का डर नहीं लगता क्योंकि मैंने शराफत का लबादा नहीं ओढ़ रखा है।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
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सुबह-2 गुलाबी ठंड को महसूस करती हुई स्तुति ने अपने मन में सोचा - अब तो और भी ज्यादा ठंड पड़ेगी, धूप नहीं निकलेगी, कपड़े नहीं सूखेंगे, दूसरी कितनी ही परेशानियां होंगी। हमेशा जब ज्यादा ठंडी होती है या ज्यादा गर्मी होती है तब हमें परेशानी होती है। हमें बसंत (मिलता-जुलता गर्मी-ठंडी का मौसम) बहुत पसंद आता है। अचानक एक बिजली सा विचार आया कि ये मिलता -जुलता मौसम हम अपनी जिंदगी में क्यों नहीं चाहते? सिर्फ सुख की कामना क्यों?
-सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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मीरा उस लड़के के पीछे दौड़ी जिसको उसने अपने सिर पर मोर पंख सजाये हुए देखा था, उसका हाथ पकड़ कर रोकते हुए मीरा ने कहा- तुम्हारा नाम क्या है?
उस लड़के ने कहा- कृष्णा
मीरा - माथे पर मोर पंख लगाने से और हाथों में बांसुरी पकड़ने से कोई कृष्ण नहीं बन जाता, कृष्ण बनने के लिए न जाने कितने राक्षसों का वध करना पड़ता है, सबकुछ जो प्रिय हो उसे छोड़ने का साहस होना चाहिए, धर्म की स्थापना करनी होती है। कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाली मीरा ने कहा।
कृष्णा( जो एक साधारण लड़का था) उसने कहा...पता है मुझे मैं कृष्ण नहीं हूं और इतना कृष्ण को तुम जानती हो तो ये भी जानती होगी कि कृष्ण को एक बहेलिये ने बाण मारा था जिससे उनकी मृत्यु हुई थी।
मीरा ने उदास और भरी हुई आँखों से हाँ में जवाब दिया।
उस साधारण लड़के ने कहा.....कृष्ण गए थे पर कृष्णत्व आज भी है।
मीरा ने प्रश्न भरी आँखों से कृष्णा की ओर देखा।
कृष्णा-आज अगर हम भगवद्गीता के अनुसार काम करे तो कृष्णत्व को ही जीवित रखने का काम कर रहे है और इससे कहीं न कहीं कृष्ण भी हमें हमारे बीच महसूस होंगे
मीरा ने कहा......हम कहाँ से कृष्ण की बातों को जी सकेंगे, उनके कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग को मान सकेंगे, वो तो भगवान थे।
कृष्णा- कृष्ण ने ये सब किया इसीलिए वो भगवान बने, लेकिन हम यही समझते है कि वो भगवान थे इसीलिए ये सब किया।
आज मीरा की आंखें खुल चुकी थी, वो साधारण कृष्णा उसके लिए कृष्ण बन चुका था। कृष्ण और कृष्णत्व को समझकर आज वो अपने आराध्य के प्रति पहले से ज्यादा श्रद्धा भाव से भर गयी थी, उसने अपना जीवन भी सच्चे अर्थों में कृष्ण भक्त के रूप में बिताया।
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सुबह-सुबह बहू घर में हंगामा मचाई हुई थी। पता नहीं, अम्मा जी कहां चली गई हैं। घर में हर जगह देख लीं। वह आस-पड़ोस में भी पता करने चली गई। घर में पति और तीनों बच्चे भी घबरा गए। हे भगवान ! मां अस्सी साल की है। उनसे ठीक से चला भी नहीं जाता, आखिर कहां जा सकती हैं, अचानक उन्हें क्या हो गया, फोन पर भी जान-पहचान वालों से पूछताछ शुरू हो गई।
पड़ोस के कुछ लोग घर पर आ गए और मां जी के बारे में बातें करने लगे। घर में शोरगुल होने लगा। तभी सबसे छोटा बेटा जो सात-आठ साल का था, सबके बीच में कहने लगा-आप लोग बेकार में परेशान हो रहे हैं, मम्मी को तो पता है दादी कहां जा सकती है, क्योंकि मम्मी ही तो उन्हें पता बताती रहती है। कभी आश्रम जाने को कहती है, कभी मंदिर, कभी तीरथ, कभी बुआ के घर। अचानक ही घर में ऐसी खामोशी छा गई, मानो घर नहीं कोई वीराना हो।
© सुषमा सिन्हा, वाराणसी
ईमेल- ssinhavns@gmail.com
आदरणीय सुषमा सिन्हा जी का जन्म वर्ष 1962 में गया (बिहार) में हुआ, इन्होने बीए ऑनर्स (हिंदी), डी. सी. एच., इग्नू (वाराणसी) उर्दू डिप्लोमा में शिक्षा प्राप्त की|
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विगत 32 वर्षों से कविता, लघु कथा, कहानी आदि प्रकाशित । इनकी प्रकाशित पुस्तकें निम्नलिखित हैं :-
पांच लघुकथा संग्रह
1. औरत (2004)
2. राह चलते (2008)
3. बिखरती संवेदना (2014)
4. एहसास (2017)
5. कथा कहानी (2023)
अपने शिल्प में निपुण सुषमा जी में अथाह सृजनशीलता है।
अपनी सिद्ध लेखनी से सुषमा जी जीवन के अनछुए पहलुओं पर लिखती रही हैं और लघु कथा विधा को और अधिक समृद्धशाली कर रही हैं लेखिका और उनके लेखन, शिक्षा और सम्मान के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें |
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