इंसानियत
गांव की कच्ची-पक्की सड़कें, ऊपर से बरसात का मौसम। जहां-तहां फिसलन और गड्ढे। वह ग्रामीण हाथ में छाता लिये जल्दी में कहीं जा रहा था।
अचानक से एक बाइक ठीक उसके बगले से गुजरी और देखते ही देखते पलट गयी। बाइक सवार लड़का हेलमेट में था, वरना बड़ी घटना घट सकती थी। बाइक के नीचे से वह खुद को निकालने का प्रयास करने लगा, किन्तु पैर में चोट आने की वजह से वह ऐसा नहीं कर पा रहा था। मदद के लिए आवाज देने लगा क्योंकि दो बाइक सवार एक साथ आते हुए दिखे, किन्तु वे दोनों बाइक सवार आगे जाकर रूके सो रुके ही रह गये।ग्रामीण से रहा नहीं गया। वह तेज चाल से चलते हुए घायल लड़के तक
पहुंचा और बड़ी मुश्किल से उसे बाहर निकालने में सफल हुआ। लड़का
जैसे-तैसे लड़खड़ाता हुआ खड़ा होकर उस ग्रामीण के प्रति कृतज्ञता प्रकट
करते हुए धन्यवाद बोला। फिर पलटकर सामने देखा। एक तरफ इंसानियत
जिन्दा थी तो दूसरी तरफ दम तोड़ रही थी। वे दोनों बाइक सवार अब तक
उसकी वीडियो बनाने में व्यस्त दिख रहे थे।
© सुषमा सिन्हा, वाराणसी
ईमेल- ssinhavns@gmail.com
आदरणीय सुषमा सिन्हा जी का जन्म वर्ष 1962 में गया (बिहार) में हुआ, इन्होने बीए ऑनर्स (हिंदी), डी. सी. एच., इग्नू (वाराणसी) उर्दू डिप्लोमा में शिक्षा प्राप्त की|
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विगत 32 वर्षों से कविता, लघु कथा, कहानी आदि प्रकाशित । इनकी प्रकाशित पुस्तकें निम्नलिखित हैं :-
पांच लघुकथा संग्रह
1. औरत (2004)
2. राह चलते (2008)
3. बिखरती संवेदना (2014)
4. एहसास (2017)
5. कथा कहानी (2023)
अपने शिल्प में निपुण सुषमा जी में अथाह सृजनशीलता है।
अपनी सिद्ध लेखनी से सुषमा जी जीवन के अनछुए पहलुओं पर लिखती रही हैं और लघु कथा विधा को और अधिक समृद्धशाली कर रही हैं लेखिका और उनके लेखन, शिक्षा और सम्मान के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें |
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शुभकामनाएं
सात वर्षीय सोनू पढ़ रहा था कि अचानक वह कहने लगा, पापा आप मम्मी के बारे में एक बात सुनेंगे तो आपको हंसी आ जायगी। पापा ने भी उसी भोलेपन से पूछा, बताओ, मम्मी ऐसा क्या करती है कि तुम्हें हंसी आती है और मुझे भी हंसी आ जायगी। अब वह पापा के. और करीब आकर कहने लगा, जानते हैं पापा, मैं जब भी मम्मी के साथ मन्दिर जाता हूं तो देखता हूं । मम्मी भगवान जी के सामने एक थाली में लड्डू-पेड़े, फल, सब रखकर थोड़ी देर आंखें बंद कर लेती है फिर उसे उठा लेती है और कहती है कि भगवान जी ने खा लिया। उसके बाद वही लड्डू-पेड़े मुझे देती है कि प्रसाद खा लो, लेकिन पापा मैं हमेशा काउण्ट करता हूं।
भगवान जी एक भी फल-मिठाई नहीं खाते हैं। भगवान जी बोलते नहीं हैं, लेकिन मम्मी पता नहीं कैसे सुन लेती है। मांगते भी नहीं, तो भी मम्मी उन्हें लड्डू-पेड़ा देती है। खाते भी नहीं, परन्तु कहती है खा लिये। दादी तो बोलती है, सुनती भी है, मांगती भी है, उन्हें भूख भी लगती है, लेकिन मम्मी को जल्दी सुनायी ही नहीं देता। अब बताइये पापा, मम्मी सबकुछ उल्टा-पुल्टा करती है कि नहीं। इतना कहने के बाद सोनू, पापा के मुख को गौर से देखने लगा। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि पापा को हंसी क्यों नहीं आ रही है।
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शुभकामनाएं
सहर्ष और प्रतीक्षा चाय के ढाबे पर बैठे हुए चाय की चुस्कियां ले रहे थे तभी सहर्ष ने कहा, पता है प्रतीक्षा आपसे पहले मैंने अपने कई मित्रों और परिचितों से मेरी पत्रिका के लिए लेख लिखने का अनुरोध किया, कुछ तो अच्छे पदों पर है और अच्छे संस्थानों से भी पढ़े हुए भी है पर किसी ने यह अनुरोध नहीं स्वीकार किया, किसी ने समय का बहाना बनाया किसी ने दूसरे बहाने बनाए और आपने मेरे एक बार कहने पर ही अपने लेखों को प्रकाशन हेतु देना शुरू कर दिया।
प्रतीक्षा ने कहा, सहर्ष दरअसल बात यह नहीं है कि आपने इतने लोगों से कहा, ये कुछ गलत दरवाजे पर दस्तक देने जैसा है, आपने सही दरवाज़े पर दस्तक दी इसीलिए आपको अपनी पत्रिका के लिए लेखिका भी मिल गई।
अब तो आपकी पत्रिका के लिए कितने ही लेखक और लेखिकाओं ने अपनी रचनाएं देनी शुरू कर दी है।
सहर्ष ने कहा, आप सही कह रही हो प्रतीक्षा, मैंने ही सही दरवाजे पर दस्तक नहीं दी, आज आप और दूसरे रचनाकार मेरी पत्रिका के लिए लिख रहे हो और इससे पहले भी जो लोग कर सकते थे, जिनको मैं खुद को अभिव्यक्त करने का मौका देना चाहता था, उन्होंने नहीं लिखा।
प्रतीक्षा ने कहा, आप सही कह रहे हैं, लेखन के लिए लेखकों से कहना ही बेहतर है, बजाय इसके कि हम नये लोगों को लेखक बनाने का प्रयास करे।
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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लड़का- मैं तुम्हें बेहद पसंद करता हूं। तुम जो चाहो ! जैसा चाहो ! मैं
करने को तैयार हूं, बस तुम शादी के लिए हां कर दो। लड़की- तुम्हें पता है न, मैं घर की अकेली लड़की हूं, दो भाई हैं बस कहने भर को। शायद ही हमारी खोज-खबर लेते हैं। मेरी नौकरी और पापा के पेंशन से घर चल रहा है। तुम्हारे घर वालों को हमारी शादी से कोई एतराज तो नहीं ? लड़का-अरे बिल्कुल नहीं।
मेरी मां तो कहती है, जो तेरी पसन्द वही मेरी पसन्द । अब बताओ कब
आऊं बारात लेकर। लड़की- एक खास बात और कहनी है, वह यह कि मेरी मां, मेरी जिम्मेदारी है। इसलिए मैं अपनी विधवा मां को नहीं छोड़ सकती। मैं उसे वचन दी हूं। इसके लिए तैयार हो ! तभी शादी सम्भव होगी। बोलो वचन
देते हो ? लड़का उलझन में पड़ गया। वह सोचने लगा जैसे एक म्यान में दो तलवारें, नहीं रह सकतीं, ठीक वैसे ही एक ही घर में लड़के की मां और लड़की की मां का साथ रहना मुश्किल है।
ऐसे भी मैंने अपनी मां को तो कुछ ऐसा-वैसा वचन दिया नहीं हूं।
उसने कहा ठीक है। मैं तुम्हारे वचन का मान रखूंगा। सचमुच शादी के बाद ऐसा ही हुआ। लड़की की मां घर में, लड़के की मां वृद्धाश्रम में।
© सुषमा सिन्हा, वाराणसी
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शुभकामनाएं
मां और शान्ति को लेकर आये दिन घर में कलह होता रहता। बहू किसी भी हाल में मां के साथ रहने को तैयार न थी। महेश अपनी तरफ से समझाने का पूरा प्रयास करता, परन्तु सब व्यर्थ । घर बड़ा था फिर भी मां के लिए जगह न थी। बेचारा बुझे मन से मां को वृद्धाश्रम भेजने को राजी हो गया। मां खुद को बिलकुल असहाय समझती। उसके पास जो कुछ भी था, सब बेटे को देकर पहले ही खाली हो चुकी थी। एक घर बचा था, उसमें भी उसके लिए एक कोना भी न था, जहां वह सुकून से रह सके। क्या करती, महेश इकलौटा बेटा था। काफी समय के बाद उसे अपनी एक पुरानी सहेली से मुलाकात हो गयी।
सहेली शान्ति को तंज कसने लगी-कालेज-स्कूल के दिनों में नारी सशक्तीकरण और महिला उद्धार जैसी बड़ी-बड़ी बातें करने वाली को क्या हो गया है ? नारी के हक में लड़ने वाली आज खुद इतनी कमजोर हो गयी ? सहेली, शान्ति का हाल समाचार जानने के बाद ऐसा बोल दी। परन्तु शान्तिअपने नामानुसार सब कुछ सुनकर भी शान्त रही। एक दिन बेटा, मां के पास आकर बिना नजरे मिलाये कहा-मां मैं कुछ दिनों से तुमसे कुछ कहना चाहता हूं। मां पूरे दृढ़ निश्चय के साथ सर उठाकर कहने लगी-बेटा पहले मेरी बात सुन लो। ऐसा है कि मैं तुमसे पहले यह बात परिवार और पड़ोस में बता चुकी हूं, आज, तुमसे कह रही हूं। परन्तु घबड़ाना मत, मैं कुछ मांग नहीं रही। बस इतना कहना चाहती हूं कि, मैं इस घर में किरायेदार लगाने वाली हूं। अगले महीने घर खाली कर दो ? महेश सन्न रह गया, जिस मां में वह सरस्वती-लक्ष्मी का रूप देखता आया था, आज साक्षात् काली को देख रहा था।
© सुषमा सिन्हा, वाराणसी
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शुभकामनाएं
अस्पताल के एक वार्ड में दो मरीज भर्ती थे। दोनों को एक ही बीमारी थी, दिल की। दोनों का छोटा-सा आपरेशन होने वाला था। एक जो जवान मरीज था, वह दर्द से कराह रहा था, छटपटा रहा था, बेचैनी महसूस कर रहा था। दूसरा मरीज जो अधेड़ उम्र का था वह एकदम शांत भाव से बिस्तर पर पड़ा था। जब दोनों का आपरेशन हो गया और एक नये वार्ड में लाया गया तो जवान मरीज ने पूछा-अंकल जी! क्या कल आपको दर्द नहीं हो रहा था?
आप बिल्कुल खामोश थे, जबकि मैं दर्द से तड़प रहा था।
अधेड़ शांत भाव से कहने लगा-दर्द तो मेरा भी असहाय था लेकिन तुम्हारे सामने तुम्हारे पिता जी थे, जो तुम्हें प्यार-दुलार के साथ बार-बार सांत्वना दे रहे थे। धैर्य बंधा रहे थे। वह काफी परेशान थे, तुम्हें बेचैन देखकर और तुम भी लाड़ लगा रहे थे। तुम्हारे विपरीत, मेरे बगल में बैठा मेरा बेटा झपकी ले रहा था। पिछली दो रातों से वह मेरी वजह से सोया नहीं था.मुझे अपने दिल से ज्यादा दिल के टुकड़े का ख्याल था तो मैं दर्द जाहिर कैसे
होने देता ? जवान का, एक पिता की महानता के आगे सिर झुक गया।
© सुषमा सिन्हा, वाराणसी
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आज अभय ने हमें लज्जित करने वाला काम किया है,अभय के दादा जी ने परिवार के सामने कहा।
दादी जी - अरे क्यों डांट रहे हो मेरे पोते को, आप बताइए तो कि इसने क्या किया है?
दादा जी - मैं इसे एक परिचित के घर ले गया था और मेजबान के पूछने पर कि खाने में क्या खाओगे? तो इसने कहा नमक- रोटी। वो क्या सोचेंगी कि इसको क्या यही खाना मिलता है घर में?
दादी जी - कोई बात नहीं, मेरा अभय आगे से ऐसा नहीं करेगा, अब मत डांटिये मेरे पोते को।
अभय ने विस्मित मन से सोचा कि माँ के व्यस्त होने पर घर में भी नमक रोटी खा लेता हूं, वहां अगर किसी की सहूलियत के लिए ये खाने को बोल दिया तो क्या गलत कह दिया? पर उत्तर न मिलने पर दादा जी की डांट से आहत हुआ अभय सुबकते हुए और यह सोचते हुए कि मैंने गलत क्या किया दूसरों की सहूलियत का ख्याल करके, वह सो गया।
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शुभकामनाएं
वह जगह शहर से थोड़ी हटकर थी, इसलिए कुछ सुनसान-सी थी। छिटपुट घर-मकान और गिनती की दुकान। बारिश तेज हो रही थी। एक लड़का पानी से बचने के लिए एक दुकान के छज्जे के नीचे जाकर खड़ा हो गया। कुछ देर बाद दुकानदार ने कहा, बेटा जरा एक बगल होकर खड़े रहो, ग्राहकों को आने में परेशानी न हो। लड़के ने हंसते हुए कहा, इस मौसम में कौन आएगा, आपकी दुकान पर। दुकानदार ने छूटते ही बोला, जैसे तुम आ गए हो। ऐसे ही समय में तो लोग आश्रय ढूंढते हैं। आते हैं पानी से बचने के लिए, परन्तु उनमे से कुछ को यूं ही खड़ा रहकर पानी रुकने का आसरा देखना अच्छा नहीं लगता, सो दुकान के अन्दर बैठकर चाय पीते हुए, पानी थमने का इंतजार करते हैं। सचमुच एक बारगी पानी का बौछार तेज हो गया तो चार-पांच लोग एक साथ दुकान में चले आएं। फिर कुछ पल में ही अन्दर बैठकर चाय पीने लगे। लड़का एक नजर उस अनुभवी और समझदार दुकानदार की ओर देखा, फिर थोड़ा शर्माते हुए, एक कप चाय का आर्डर देकर दुकान के अन्दर बैठ गया।
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अम्मा की खांसी बढ़ती जा रही थी। ऐसे में ठंड के समय दमा की बीमारी और भी परेशान करती ही है। दूसरी तरफ यह भी सच था कि अम्मा की ना तो सही से देखभाल हो रही थी न ठीक से दवा-दारूही हो रही था। बहू तो अम्मा की खांसी से इतनी ऊब चुकी थी कि उनके लिए सबसे पीछे वाले कमरे में व्यवस्था कर दी थी। पति के पूछने पर कारण बताती हुई कहने लगी-क्या करूं, घर में चार लोग आते-जाते रहते हैं। ऐसे में अम्मा के कारण बड़ी असुविधा और शर्म-सी महसूस होती है। फिर मुझे भी रात को सोने में दिक्कत होती है। घर भर को असुविधा ना हो, इसलिए ऐसा की। घर में बच्चे-बड़े, सब टीवी, मोबाइल पर व्यस्त रहते। ऊपर से पीछे का एकान्त कमरा ! अम्मा की खांसी की आवाज किसी को ठीक से सुनाई ही नहीं देती थी। वह खांसते-खांसते हलकान भी हो जाती तो भी किसी को पता नहीं चल पाता। कभी-कभी पोता बिट्ट जो आठ वर्ष का था, दादी के पास आकर बैठता और बातें भी करता। दादी से पूछता-दादी तुम्हारी खांसी कब ठीक होगी? दादी उसके सर पर हाथ फेरती हई उसे प्यार करती हई कहती-यह बुढापे की बीमारी है। मेरे दम के साथ ही जाएगी। वह ठीक से दादी की बात नहीं समझ पाता और बदले में दादी को भी प्यार-दुलार करता हुआ वहां से चला जाता। एक दिन सचमुच दादी खांसी के साथ ही इस दुनियां से विदा ले ली। अगले साल जाड़े के मौसम में बिट्टू की मां खांसी की चपेट में आ गई। एक रात बिट्टू, मां से कहने लगा-मम्मी तुम खांसी वाले कमरे में पीछे जाकर क्यों नहीं सोती हो, तुम्हारी वजह से मैं ठीक से सो नहीं पाता।
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सुबह-सुबह बहू घर में हंगामा मचाई हुई थी। पता नहीं, अम्मा जी कहां चली गई हैं। घर में हर जगह देख लीं। वह आस-पड़ोस में भी पता करने चली गई। घर में पति और तीनों बच्चे भी घबरा गए। हे भगवान ! मां अस्सी साल की है। उनसे ठीक से चला भी नहीं जाता, आखिर कहां जा सकती हैं, अचानक उन्हें क्या हो गया, फोन पर भी जान-पहचान वालों से पूछताछ शुरू हो गई। पड़ोस के कुछ लोग घर पर आ गए और मां जी के बारे में बातें करने लगे। घर में शोरगुल होने लगा। तभी सबसे छोटा बेटा जो सात-आठ साल का था, सबके बीच में कहने लगा-आप लोग बेकार में परेशान हो रहे हैं, मम्मी को तो पता है दादी कहां जा सकती है, क्योंकि मम्मी ही तो उन्हें पता बताती रहती है। कभी आश्रम जाने को कहती है, कभी मंदिर, कभी तीरथ, कभी बुआ के घर। अचानक ही घर में ऐसी खामोशी छा गई, मानो घर नहीं कोई वीराना हो।
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