यार प्रत्यक्ष - तुम वाट्सऐप चैट में इतना इमोजी क्यों भेजते हो ?
प्रत्यक्ष- मैं तुम्हारे सामने बात करते समय मुस्कुराकर बात कर रहा हूँ, इससे तुमको भी अच्छा लग रहा होगा। क्योंकि मुस्कुराहट से जीवंतता प्रतीत होती है।
सार्थक - हाँ यार, ये तो है।
प्रत्यक्ष - इसी जीवंतता को मैं अपने संदेशों में लाना चाहता हूँ, इससे रिसीवर तक एक खुशी भी पहुँचती है जिससे उसके काम में भी दक्षता आती है।
क्योंकि इमोजी का उपयोग बातचीत में जीवंतता और भावनाएं जोड़ने के लिए किया जाता है। वे शब्दों के बिना विचारों को व्यक्त करने का एक तरीका हैं, और वे एक संदेश को अधिक मनोरंजक और आकर्षक बना सकते हैं। साथ ही वे बातचीत को अधिक व्यक्तिगत और संबंधित बना सकते हैं। वे टोन और भावना व्यक्त करने में मदद कर सकते हैं, जिससे संदेश को समझना आसान हो जाता है। अंत में, वे भावनाओं को व्यक्त करने में मदद कर सकते हैं जो शब्दों में व्यक्त करना में असमर्थ होते हैं।
और अगर तुम्हारे मुस्कुराने से अगर सामने वाले को अच्छा लगे या उसकी एफीसिएंसी बढ़े तो क्या तुम कंजूसी करोगे ?
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें|
मास्टर डिग्री पूरी होने के बाद दो रूममेट्स एक दूसरे से विदा लेते हुए - कॉलेज का एक नियम था कि एक जूनियर व एक सीनियर एक रूम में रह सकते हैं कोर्स भिन्न हो)
सीनियर मोहित - चलता हूँ प्रेम, तुम्हारा व्यवहार मुझे बहुत अच्छा लगा, टच में रहना।
प्रेम - हाँ, मोहित भैया, हम संपर्क में रहेंगे तभी तो याद रहेगा कि वित्तीय हितों से ऊपर भी कुछ सार्थकता व स्पष्टता देने वाले काम होते हैं। आपने मुझे जो लेखन की आदत डलवाई है, उससे मैं हमेशा लोगों के लिए लिखता रहूँगा, जरूरत पड़ने पर बोलूँगा भी और ये सब आपसे संपर्क के कारण निरंतर चलता रहेगा।
संपर्क जरूरी है इस भले काम के लिए और वे एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा लेते हैं और साथ ही विदाई के समय एक-दूसरे के प्रति सम्मान और प्यार को व्यक्त करते हैं और आगे बढ़ते हैं उत्कृष्टता और उससे मिलने वाले शुकून के लिए।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।
गरिमा - आभा एक बात तो बता जरा।
आभा - हाँ गरिमा, पूछो?
गरिमा - संपादक महोदय जब मुझे लेखिका महोदया बुलाते हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है जबकि नाम से जब वो बुलाते हैं तो इतना अच्छा नहीं लगता, ऐसा क्यों?
आभा - तू जवाब जानती है, फिर भी मुझसे पूछ रही है। लेखिका तो तू है, तुझे पता होना चाहिए और आभा हंसने लगती है।
गरिमा मुस्कुराते हुए- तू ऐसा ही समझ ले, अब बता।
आभा - इस संबोधन में तुम्हारे काम (लेखन) को महत्व दिया जा रहा है, जो तुम्हारा भी महत्व है, हर व्यक्ति खुद को महत्वपूर्ण समझना चाहता है और इसके संबोधन में तो तुम्हारे काम व तुम्हे दोनों को महत्व मिलता है, इसीलिए अच्छा लगता है दूसरे शब्दों में
'लेखिका' शब्द गरिमा तुम्हारे पेशे और पहचान का प्रतीक है। जब संपादक तुम्हे 'लेखिका' कहते हैं, तो वह तुम्हारे काम को मान्यता देते हैं और तुम्हे यह महसूस कराते हैं कि तुम एक पेशेवर हो और तुम सम्मानित महसूस कराती हो।
ठीक है न लेखिका महोदया ? और दोनों हंसने लगती हैं।
© सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।
आलोक और विवेक, शाम को टहलते हुए,
आलोक - यार, विवेक बहुत कहानियाँ लिखी जा रही हैं आजकल, सबको ज्ञान दे ही दोगे लग रहा, बाकी सारे काम बंद कर दिए क्या? और आलोक हंसने लगता है।
विवेक मुस्कुराते हुए- हाँ, आलोक प्रयास तो ऐसा ही है, तुम तो आलोक कहीं डाल नहीं रहे हो, इसीलिए मैं ही ऐसा करने का प्रयास कर रहा हूं। (दोनों हंसने लगते है)
आलोक - अच्छा एक बात बताओ एक दिन में कितनी कहानियाँ लिख सकते हो?
विवेक - (मुस्कुराते हुए) लिखने को तो बहुत सी लिख दूँ, जिन मुद्दों पर लिखना है उनके नाम जेहन में हैं फिर भी अन्य काम भी है और जीविका भी तो चलानी है।
बात को आगे बढ़ाते हुए संयत होकर विवेक कहता है कि लिखने को तो एक दिन में 15 कहानी लिख दूँ अगर इस काम की महत्ता को दर्शाना हो। लेकिन अच्छा प्रदर्शन भी जरूरी है। पर कुछ मोटी बुद्धि के लोग सिर्फ संख्या देखकर ही महत्व समझते है,
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।
"कब से लाईट गायब है? " पसीना पोंछते विनय ने चिढ़कर बन्द पड़े पंखे को देखते हुए कहा, 'चलो मोटरसाईकिल की सर्विसिंग ही करा लाता हूँ बीरबल चौक से। पर सर्विसिंग कराने जाओ तो तीन-चार घण्टे तो लग ही जाएँगे। दुकान से घर भी दूर है और मेरा मोबाइल भी खराब! कैसे होगा अब इतना टाईम पास? क्या गाड़ी छोड़कर वापस घर आऊँ और फिर जाऊँ?'
'उस दुकान के पास ही तो है न तेरे अश्विन चाचा का नया घर?' उसी समय, गई हुई बिजली वापस आ गई तो ट्यूबलाईट के साथ-साथ माँ की आँखें भी चमक उठीं, 'तेरे चचेरे भाई अनूप का! जिससे तेरी बोलचाल बन्द है। और वो भी तेरी गलतफहमी के कारण! बहुत हो गया वीनू बेटा! अब बस कर ये झगड़ा! जा, वहाँ दुकान से उन के घर हो आना।' रुका हुआ पंखा चला तो कमरे के वातावरण के साथ विनय के मन की उमस भी गायब हो गई। माँ अभी भी समझा रहीं थीं, 'अच्छा मौका है। तेरा टाईम पास हो जाएगा, गाड़ी की सर्विसिंग हो जाएगी और रिश्तों की भी!'
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
'और, कैसे हो भाई?' लेखक महोदय का जब फोन आया तो मैं बाज़ार में जलेबी की दुकान पर खड़ा था। जलेबियाँ तैयार हो रही थीं।
'ठीक हूँ सर। और बताइए सर आज कैसे याद किया?' एक नई आशंका मेरे अंदर सिर उठाने लगी थी।
जलेबी का कच्चा मैदा गर्म कढ़ाही में डाले जाते हुए मुझे सिहरता सा लगा।
'आजकल कहीं ज्यादा व्यस्त हो क्या? पर फिर भी फेसबुक तो देख ही रहे होंगे। मेरी नई कहानी को लेकर अब तक तुम्हारी कोई पोस्ट पढ़ने में नहीं आई? जबकि मैंने तुम्हें टैग भी किया था?' कड़ाही का तेल उबल रहा था '..... ग्रुप में मेरी उस नई कहानी का जो अपोज़ चल रहा है उस पर तुमने कुछ लिखा नहीं अब तक? मेरी रचना पर चल रहे इस विरोध से तुम क्या एग्री हो?'
कड़ाही में जलेबियाँ गोल-गोल हो रही थीं, कच्चा मैदा जमने लगा था।
'नहीं-नहीं सर। ऐसी कोई बात नहीं।'
'तो फिर अब तक उस पर कुछ लिखा क्यों नहीं? डरते हो क्या किसी से?'
'क्या हुआ? लकवा मार गया क्या जुबान को?'
'सर, वो क्या है?'
जलेबियों का मैदा, लाल गर्म होकर मजबूत होने लगा था, 'विथ ड्यू रिसेक्ट, दो महीने पहले आपने भी सर, मेरी एक रचना को लेकर बेवजह चले विरोध पर चुप्पी साध ली थी, ग्रुप में उस पर कुछ भी पोस्ट नहीं किया था जबकि व्यक्तिगत रूप से ... आपने उस रचना की तारीफ की थी....' उस दिन जाने कैसे मुझमें हिम्मत आ गई।
'तो?' जलेबियाँ गर्म, लाल सुर्ख होने लगीं थीं, 'उसका, उस बात का क्या बदला ले रहे हो?'
'नहीं सर, मैंने सोचा आपकी भी कुछ विवशताएँ रही होंगी जो आप मौन रहे। जब इतने बड़े लेखक होकर आप सच को सच नहीं कह सके, कोई टिप्पणी करने में असमर्थ रहे तो मैं तो बहुत छोटा लेखक हूँ। आपकी बड़ी असमर्थता के आगे मेरी छोटी असमर्थता क्या लगती है? नहीं सर?'
'अरे वा, होशियार हो गया यार तू तो। पत्थर रखने लगा पास में, ईंट का जवाब देने के लिए! हा हा हा। चलो, और सब ठीक ? ..'
फिर 'ठीक' का जवाब जाने बिना ही उधर से फोन कट गया।
जलेबियाँ गरमागरम कड़ाही से निकालकर सामान्य तापमान की चाशनी में डाली जा चुकी थीं।
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
अपकेन्द्रीय बल (लघुकथा संग्रह) से साभार
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
"बैठ जाओ थोड़ा... और ये... चाय पी लो।" बची सीमेंट वह बोरी में भर ही रहा था कि मैंने उससे कहा।
सीमेंट की धूल सने हाथ, पास रखे कपड़े से पोंछकर वह जमीन पर ही बैठ गया, चाय सुड़कते हुए उसने जेब में रखी अधजली बीड़ी सुलगा ली।
"ये... बीड़ी कब से पी रहे हो ?"
"हं हं हं" वह हँसा, खाँसा और ढेर सारा धुआँ उसके मुख से निकला,
"बीड़ी तो भोत पेले से पी रा हूँ। मेरे को तो लागे हे कि जनम से पेले से... बीड़ी पी रा हूँ।" कहते-कहते फिर लम्बा कश खींचा तो बीड़ी के साथ-साथ उसकी आँखें भी चमक उठीं।
"जन्म से पहले से पी रहे हो, मतलब ?"
"मतलब ये कि जब अम्मा के पेट में था तब से..." बची हुई चाय गटकता वह हँसकर बोला, "अम्मा भी तो बीड़ी पीती थी।"
"हें ? तुम्हारी माँ बीड़ी पीती थी ?" मैंने वितृष्णा से कहा, "औरत होकर भी ?"
सुनकर उसके चेहरे ने कई रंग बदले, चेहरे से हँसी गायब हो गई, हाथ में थमी बीड़ी उसने एकाएक फेंककर पाँवों तले कुचल डाली, "हाँ साबजी, अम्मा बीड़ी पीती थी, ओरत होके भी, पण मजूरी भी तो करती थी, ओरत हो के भी ?" माथे का पसीना पोंछते हुए वह सँभला और फिर हँसा, "ये. ये पसीना और बीड़ी तो खानदानी हे साबजी !"
© संतोष सुपेकर
ईमेल- santoshsupekar29@gmail.com
संतोष सुपेकर जी, 1986 से साहित्य जगत से जुड़े हैं, सैकड़ों लघुकथाएं. कविताएँ, समीक्षाएं और लेख लिखे हैं जो समाज में संवेदना और स्पष्टता पैदा करने में सक्षम हैं, आप नियमित अखबार-स्तम्भ और पत्र-पत्रिकाओं (लोकमत समाचार, नवनीत, जनसाहित्य, नायिका नई दुनिया, तरंग नई दुनिया इत्यादि) में लिखते रहे हैं और समाज की बेहतरी हेतु साहित्य कोश में अपना योगदान सुनिश्चित करते रहे हैं |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
सजग (चाय की चुस्कियाँ लेते हुए) - प्रतिभा, मुझे तुमसे कुछ पूछना है।
प्रतिभा - हाँ सजग, पूछिए आपको क्या पूछना है?
सजग - मुझे कभी-2 यह डर लगता है कि हमारी दोस्ती कब तक चलेगी या चलेगी भी या नहीं?
प्रतिभा - आप ऐसा क्यों सोचते हैं जब तक हम एक-दूसरे की प्रगति, स्वतंत्रता व स्पष्टता में सहायक रहेंगे, यह दोस्ती चलती रहेगी। किसी एक का साथ भी अगर दूसरे की प्रगति में सहायक होगा तो हमारी दोस्ती बनी रहेगी। एक मित्र की उन्नति होगी तो वो दूसरे मित्र को भी तो आगे बढ़ाएगा।
सजग - धन्यवाद प्रतिभा इस स्पष्टता के लिए।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।
क्या बात है समृद्ध? आजकल आधी रात के बाद भी काम करते रहते हो?
अरे कुछ नहीं प्रयास- मैं एक जुझारू और उत्साही साथी की तलाश में था और कुछ दिनों पहले ही मेरा एक ऐसे ही इंसान से परिचय हुआ, मैंने इसके लिए बहुत इंतजार किया है, इसीलिए मैं अपने सहयोगी के साथ काम करने को टालना नहीं चाहता, मैं चाहता हूँ कि वो मेरे काम को, मेरे काम के प्रति समर्पण व मेरी लगन को समझ सके। मैं अपने काम की महत्ता को अपने काम करने के तरीके से बताना चाहता हूँ। जिससे हमारे बीच इस लेखन के काम के लिए जुड़ाव की एक सही बुनियाद बन सके फिर आगे ये काम चलता रहेगा, मैं इतनी प्रेरणा उस साथी को देने की सोच रहा हूं।
प्रयास मुस्कुराते हुए- वाह, आप तो विचारों से भी समृद्ध हैं समृद्ध। आपके प्रयासों व विचारों की तो तारीफ करनी होगी, ये बात तो सही है कि किसी भी एसोसिएशन की नींव मजबूत और टिकाऊ होनी ही चाहिए तब ही उसे स्थायित्व मिलता है, फिर आपका इरादा तो जन कल्याण का है।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।
अद्वैत तुम अपने लिए काम करने वाले सहकर्मी के हर एक मैसेज पर जवाब या प्रतिक्रिया देते हो! सान्निध्य ने अद्वैत से पूछा।
अद्वैत - हाँ मैं ऐसा करता हूं क्योंकि मैं उसे बताना चाहता हूँ कि इवरी एफर्ट काउंट्स , हाँ उसकी सारी बातें ,अच्छी नहीं हो सकती, किसी की नहीं होती, पर मेरा उस साथी को प्रोत्साहन देने का तरीका है ये, मैं अपने कम्युनिकेशन में एक निरंतरता और सजीवता लाने को ऐसा करता हूं ताकि कम्युनिकेशन गैप की संभावना कम रहे।
वाह अद्वैत वाह, सानिध्य गर्व महसूस करता है अपने दोस्त पर।
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।