छ:साल की तान्या खेलते -खेलते खलिहान में पहुंच गयी ,जहां खेत की रखवाली करने के लिए बिरजू काका बैठे थे ।
"अरे ! गुड़िया आयी है!आ जा गुड़िया रानी....आ जा.. !का देख रही है!आ हमारी गोदी में आ जा !" "आ हम तुझे शहतूत देंगे मीठे मीठे"! मासूम तान्या लपक कर बिरजू काका की गोद में जा बैठी।
काका गुडिया को सहलाने लगे. ,. धीरे धीरे यहां वहां हाथ फिराने लगे । गुड़िया छोटी थी परन्तु उसके सर्प जैसे रेंगते हाथों के दूषित स्पर्श और विक्षिप्त मनो भावों को महसूस कर रही थी ।
"चाचा मुझे प्यास लगी है, " चाचा बहुत तेज से लगी है,"तान्या रुआंसी हो गई ।
"अच्छा! हम अभी लाते हैं करवे से ठंडा ठंडा पानी" कह कर बिरजू काका पानी लाने के लिए खड़े हो गए ।
तान्या अन्दर ही अन्दर कांप रही थी और किसी तरह उनके बाहुपाश से छूटना चाहती थी।
"नहीं चाचा ...मुझे तो घर जा कर गिलास से ही पानी पीना है"।
जब तक काका ने करवा उठाया, तान्या जान बचा कर वहां से घर की ओर दौड़ गयी।
स्पर्श के वो विषैले कांटे आज भी उसकी देह में चुभने लगते है।और उसकी पीड़ा को दिल में दबा लेती है
- सुनीता त्यागी
राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद
ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com
आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |
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