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आग (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

उसके शरीर में इतनी ताकत न थी कि वह मेहनत-मजदूरी कर सके।  भीख में रूखा-सूखा  जो मिल जाता उसी से पेट की आग को शान्त करने का प्रयास करती, या कभी केवल पानी पीकर ही गुजारा कर लेती। 

आज उसे भीख में थोड़ा-सा सूखा आटा मिल गया था।  आटे को बनिये को  बेच दूँ तो बदले में मिले पैसों से दो वक्त का गुजारा तो चल ही जाएगा, ये सोच कर दुकान पर पहुंच गयी, किन्तु बनिये ने आटा लेने से इन्कार कर दिया ।  

अगले ही पल उसे विचार आया, क्यूंँ ना इस आटे की रोटी ही बनाकर खा लूँ, पर ईंधन, बर्तन,  वो तो कुछ भी  थे नहीं उसके पास।  एक-दो टूटे-फूटेे बर्तन थे; उन्हें भी कुछ दिन पहले किसी ने चुरा लिया था।  निराश होकर लौट चली, कि   दू...s...र  श्मशान में उठती हुई आग की लपटें देख उसकी आँखों में चमक आ गयी। 

 शव लगभग जल चुका था। शव के साथ आए लोग उसके वहाँ पहुँचने से पहले ही जा चुके थे, उसने आव देखा न ताव, चिता के निकट फूटे हुए मटके के एक टुकडे़ में थोड़ा-सा पानी देखकर उसी में आटा गूंथ लिया और मोटी-मोटी  रोटियाँ थपक कर चिता के किनारे सुलगते अंगारों पर रख दी, ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा। 

अरसे बाद पेट की आग गर्म रोटियों से बुझ रही थी।

 

सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


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