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फल (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

सन्तान सुख से वंचित, निराश शर्मा जी ने अनाथालय से एक बच्चा गोद ले ले लिया।  बच्चे की खिलखिलाहट से उनके जीवन में मानो खुशियों की बहार ही आ गयी थी। शर्मा दम्पति दोनों मिल कर बडे़ लाड़प्यार से पालन करने लगे  उसका। बच्चे के कदम  घर में पड़ने से शर्मा जी का भाग्य ने साथ दिया और उनके अपने भी दो बच्चे पैदा हो गये,  परन्तु उन्होंने कभी तीनों बच्चों में भेदभाव नहीं किया। समान शिक्षा, समान लालन पालन। 

बडे़ पुत्र  शरद की किस्मत ने एक बार फिर करवट बदली और वो एक रोड़ ऐक्सीडैंट में बुरी तरह जख्मी हो गया तब शर्मा दम्पत्ति ने उसकी चिकित्सा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और वह ठीक भी हो गया,  फिर भी वह अपने दोंनों पैर गंवा बैठा।  इसी दौरान  सहानुभूति दर्शाने वाले "  अति शुभचिंतकों "के द्वारा वह जान चुका था कि उसे बाबा अनाथालय से ले कर आये थे । फिर तो जीवन से हताश  शरद मन ही मन कुंठित रहने लगा।  उसे लगने लगा किअब वह सबके ऊपर एक बोझ हो गया है।  और एक दिन हिम्मत बटोर कर उसने शर्माजी से  बोल ही दिया   " बाबा  मै जानता हूँ कि मैं आपकीऔलाद नहीं हूं आप मुझे अनाथालय से लाये थे 

।अब  मैं आपकी कभी सेवा नहीं कर सकूंगा,  उल्टा आप पर ही बोझ बन गया हूं।अच्छा हो यदि आप मुझे  वापस वहीं छोड़ आये "।  

पुत्र के मुंह से ऐसी बाते सुन कर शर्माजी आहत हो उठे।  आंखों की कोर  में आगये पानी को  धीरे से कमीज की बांह से पौंछ लिया  " बेटा ! कभी ऐसी बात जबान पर भी मत लाना। 

 तुम नहीं जानते, पकने के बाद फल भले ही वृक्ष का साथ छोड़ दें,पर वृक्ष को अपने फल कभी बोझ नहीं लगते। और तुम तो मेरा पहला फल हो।   मैं तुम्हें कैसे अपने से दूर कर सकता हूं।भावुक होकर शरद पिता के सीने से लिपटकर रोने लगा।

पिता का हाथ शरद के सिर पर था। 

 

सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


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