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Proposed Book - Physics CUET Special

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- Lovekush Kumar

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प्रस्तावित पुस्तक - भौतिकी पंतनगर, रानीचौरी एवं भरसार प्रवेश परीक्षा विशेष

उद्देश्य - विद्यार्थियों को आने वाली दिक्कतों और उनसे होने वाली चूक के उपाय के तौर पर ताकि वह भौतिकी की बेहतर समझ के साथ अच्छा स्कोर करके अपने सपनों को पंख दे सकें |

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- लवकुश कुमार

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Proposed Book - Physics : Pantnagar, Ranichauri & Bharsar Special

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प्रस्तावित पुस्तक - भौतिकी NEET विशेष

उद्देश्य - विद्यार्थियों को आने वाली दिक्कतों और उनसे होने वाली चूक के उपाय के तौर पर ताकि वह भौतिकी की बेहतर समझ के साथ अच्छा स्कोर करके अपने सपनों को पंख दे सकें |

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- लवकुश कुमार

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Proposed Book - Physics NEET Special

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- Lovekush Kumar

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आग (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

उसके शरीर में इतनी ताकत न थी कि वह मेहनत-मजदूरी कर सके।  भीख में रूखा-सूखा  जो मिल जाता उसी से पेट की आग को शान्त करने का प्रयास करती, या कभी केवल पानी पीकर ही गुजारा कर लेती। 

आज उसे भीख में थोड़ा-सा सूखा आटा मिल गया था।  आटे को बनिये को  बेच दूँ तो बदले में मिले पैसों से दो वक्त का गुजारा तो चल ही जाएगा, ये सोच कर दुकान पर पहुंच गयी, किन्तु बनिये ने आटा लेने से इन्कार कर दिया ।  

अगले ही पल उसे विचार आया, क्यूंँ ना इस आटे की रोटी ही बनाकर खा लूँ, पर ईंधन, बर्तन,  वो तो कुछ भी  थे नहीं उसके पास।  एक-दो टूटे-फूटेे बर्तन थे; उन्हें भी कुछ दिन पहले किसी ने चुरा लिया था।  निराश होकर लौट चली, कि   दू...s...र  श्मशान में उठती हुई आग की लपटें देख उसकी आँखों में चमक आ गयी। 

 शव लगभग जल चुका था। शव के साथ आए लोग उसके वहाँ पहुँचने से पहले ही जा चुके थे, उसने आव देखा न ताव, चिता के निकट फूटे हुए मटके के एक टुकडे़ में थोड़ा-सा पानी देखकर उसी में आटा गूंथ लिया और मोटी-मोटी  रोटियाँ थपक कर चिता के किनारे सुलगते अंगारों पर रख दी, ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा। 

अरसे बाद पेट की आग गर्म रोटियों से बुझ रही थी।

 

सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


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फल (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

सन्तान सुख से वंचित, निराश शर्मा जी ने अनाथालय से एक बच्चा गोद ले ले लिया।  बच्चे की खिलखिलाहट से उनके जीवन में मानो खुशियों की बहार ही आ गयी थी। शर्मा दम्पति दोनों मिल कर बडे़ लाड़प्यार से पालन करने लगे  उसका। बच्चे के कदम  घर में पड़ने से शर्मा जी का भाग्य ने साथ दिया और उनके अपने भी दो बच्चे पैदा हो गये,  परन्तु उन्होंने कभी तीनों बच्चों में भेदभाव नहीं किया। समान शिक्षा, समान लालन पालन। 

बडे़ पुत्र  शरद की किस्मत ने एक बार फिर करवट बदली और वो एक रोड़ ऐक्सीडैंट में बुरी तरह जख्मी हो गया तब शर्मा दम्पत्ति ने उसकी चिकित्सा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और वह ठीक भी हो गया,  फिर भी वह अपने दोंनों पैर गंवा बैठा।  इसी दौरान  सहानुभूति दर्शाने वाले "  अति शुभचिंतकों "के द्वारा वह जान चुका था कि उसे बाबा अनाथालय से ले कर आये थे । फिर तो जीवन से हताश  शरद मन ही मन कुंठित रहने लगा।  उसे लगने लगा किअब वह सबके ऊपर एक बोझ हो गया है।  और एक दिन हिम्मत बटोर कर उसने शर्माजी से  बोल ही दिया   " बाबा  मै जानता हूँ कि मैं आपकीऔलाद नहीं हूं आप मुझे अनाथालय से लाये थे 

।अब  मैं आपकी कभी सेवा नहीं कर सकूंगा,  उल्टा आप पर ही बोझ बन गया हूं।अच्छा हो यदि आप मुझे  वापस वहीं छोड़ आये "।  

पुत्र के मुंह से ऐसी बाते सुन कर शर्माजी आहत हो उठे।  आंखों की कोर  में आगये पानी को  धीरे से कमीज की बांह से पौंछ लिया  " बेटा ! कभी ऐसी बात जबान पर भी मत लाना। 

 तुम नहीं जानते, पकने के बाद फल भले ही वृक्ष का साथ छोड़ दें,पर वृक्ष को अपने फल कभी बोझ नहीं लगते। और तुम तो मेरा पहला फल हो।   मैं तुम्हें कैसे अपने से दूर कर सकता हूं।भावुक होकर शरद पिता के सीने से लिपटकर रोने लगा।

पिता का हाथ शरद के सिर पर था। 

 

सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


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ईदी (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

"अब्बू हमें इस बार ईदी में गिफ्ट और पैसे नहीं चाहियें"।  नौ वर्षीय सुहेल ने अपने अब्बा सेे कहा, तो रहमत खां हैरान रह गये। 
" मेरे बच्चे,तुझे ईदी नहीं चाहिये, तो और क्या चाहिए,तू बता मुझे! तू कहे तो मैं तेरे कदमों में जन्नत ला कर रख दूं "।

रहमत मियां  बेटे को गोद में उठा कर उसे प्यार से चूमने लगे।
सुहेल ठुनते हुए कहने लगा " नहीं अब्बू!!  जन्नत नहीं, एक वादा चाहिये आपसे। और सुहेल की हां में हां मिलाते हुए सारे बच्चों ने भी शोर मचा दिया " हांं हमें वादा चाहिये, वादा "।
" कैसा वादा मेरे बच्चों"!! बताओ तो सही?
"अब्बू हमने सुना है कि  खुदा पाक ने हजरत इब्राहिम से उनकी सबसे अज़ीज़ चीज़ कुर्बान करने के लिये कहा था  और उन्होंने अपने बेटे को कुर्बानी के लिए पेश किया था।"
" हांs.. मगर इससे तोहफे का क्या रिश्ता है बच्चों?"
"अब्बू तब खुदा पाक ने खुश होकर उनके बेटे की जगह बकरा रख दिया था।  क्या ये सच है अब्बू" ।
"हां ये सच है, तो तुम क्या चाहते हो"।
"अब्बू हम चाहते हैं कि आप भी अपने अज़ीज़ बच्चों को कुर्बानी पर रखें और खुदा पाक खुश होकरउसके बदले बकरा रख देंगे"।
बच्चों के मासूम सवाल से रहमत मियां कांप उठे।दोनों हाथ कानों पर रख लिये " ला-हौल-बिला-कुव्वत!! ये क्या बोल रहे हो!! कहीं ऐसा होता है भला! वो दौर और था बच्चो!यदि तुम्हें कुछ हो गया तो हम जीते जी मर जायेंगे।  नहीं नहीं..."।

अच्छा!!   बच्चों ने कुछ सोचते हुए कहा "तो फिर एक वादा करो कि इस बार आप मासूम जानवरों का खून नहीं बहाओगे, आप कुर्बानी के लिए आटे,गुड़, मिट्टी या कागज से बने  बकरे को ही हलाल करोगे"

"हाँ ये बात मानली तुम्हारी!"  कह कर रहमत खां ने राहत की सांस ली। 

 सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


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स्पर्श (लघुकथा) - सुनीता त्यागी

छ:साल की तान्या खेलते -खेलते खलिहान में पहुंच गयी ,जहां खेत की रखवाली करने के लिए बिरजू काका बैठे थे ।
    "अरे ! गुड़िया आयी है!आ जा गुड़िया रानी....आ जा.. !का देख रही है!आ हमारी गोदी में आ जा !" "आ हम तुझे शहतूत देंगे मीठे मीठे"! मासूम तान्या लपक कर बिरजू काका की गोद में जा बैठी।
काका गुडिया को सहलाने लगे. ,. धीरे धीरे यहां वहां हाथ फिराने लगे । गुड़िया छोटी थी परन्तु उसके सर्प जैसे रेंगते हाथों के दूषित स्पर्श और विक्षिप्त मनो भावों को महसूस कर रही थी ।
"चाचा मुझे प्यास लगी है, " चाचा बहुत तेज से लगी है,"तान्या रुआंसी  हो गई ।
"अच्छा! हम अभी लाते हैं करवे से ठंडा ठंडा पानी" कह कर बिरजू काका पानी लाने के लिए खड़े हो गए ।
तान्या अन्दर ही अन्दर कांप रही थी और किसी तरह उनके बाहुपाश से छूटना चाहती थी।
"नहीं  चाचा  ...मुझे तो घर जा कर गिलास से ही  पानी पीना है"।
जब तक काका ने करवा उठाया, तान्या जान बचा कर वहां से घर की ओर दौड़  गयी।
स्पर्श के वो विषैले कांटे आज भी उसकी देह में चुभने लगते है।और उसकी पीड़ा को दिल में दबा लेती है 

सुनीता त्यागी
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |


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मां की ममता और मामा का दुलार (एक लघुकथा) - सुनीता त्यागी

सविता अपने बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सजग रहती थी। इसलिए वह सदैव उन्हें पौष्टिक भोजन ही कराती थी। सर्दी के मौसम में हल्दी युक्त दूध और विटामिन्स  से भरपूर फल खाने के लिए देती और गर्मियों में आम का पन्ना और नींबू की शिकंजी देना न भूलती थी।
लेकिन उसका बेटा आयुष जब से टीनएजर हुआ है और नए स्कूल में जाने लगा है तभी से मित्रों के साथ पीजा - बर्गर, चाईनीज़, इटैलियन  जैसे जंक फूड खाने लगा। अब उसे माँ के हाथों का बना खाना बेस्वाद लगने लगा था।
  नतीजा यह हुआ कि आयुष की इम्युनिटी बहुत कमजोर हो गयी और आए दिन उसे नजला जुकाम रहने लगे। सुबह सोकर उठता तो उसे एक साथ बहुत सारी छींके आतीं और पूरे दिन नाक से पानी बहता रहता ।
अब यह उसकी रोज की बात हो गई थी।
कुछ महीने पहले आयुष गर्मियों की छुट्टियों में अपने मामा जी घर रहने गया। उसने देखा उसके मामाजी सुबह उठते ही गुनगुने पानी में सेंधा नमक डाल कर एक नली वाले लोटे की सहायता से नाक के एक छिद्र से पानी अन्दर पहुंचा कर दूसरे छिद्र से बाहर निकाल रहे थे।
उनके नजदीक खड़ा आयुष आश्चर्य से ये सब देख रहा था, और साथ ही छींकता भी  जा रहा था । 
" मामाजी आप ये क्या कर रहे हैं"। उसने मामा जी से पूछा।
" बेटा ये जल नेति की क्रिया है, वही कर रहा हूं "
" मामा जी इसको करने से क्या लाभ होता है "।
, " बेटा यह नाक की सफाई करती है और सांस नली सम्बन्धी परेशानी, पुरानी सर्दी, दमा, सांस लेने में होने वाली समस्या को दूर करती है।
इससेआंखों में पानी आना और आंख में जलन की समस्या कम होती है। और यह कान, और गले को बीमारियों से भी बचाती है। सिरदर्द, अनिद्रा, सुस्ती में जलनेति करना फायदेमंद है।तुम्हें भी यह नित्य ही करनी चाहिए। "मामा जी ने विस्तार से जानकारी दी।"
परन्तु मुझे तो यह करनी आती ही नहीं
मामा जी"
" कोई बात नहीं मैं सिखाउंगा तुम्हें। क्यों कि यदि जल नेति गलत तरीके से कर ली जाये तो उससे हानि भी हो सकती है"
" कैसी हानि मामाजी" आयुष ने हैरानी से पूछा।
देखो बेटा यदि हम पानी को अधिक गर्म कर लेंगे या नमक अधिक डाल देंगे तो उससे हमारी नाक में जलन हो सकती है, नाक से खून भी आ सकता है। और यदि हमने नासिका के अन्दर से पूरा पानी बाहर नहीं निकाला तो कान नाक में दर्द भी हो सकता है। और यदि लोटा गंदा है तो संक्रमण भी हो सकता है, इसलिए इसे किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए "।
ठीक है मामाजी आप मुझे भी सिखाइये ये जलनेति"
" ठीक है बेटा"
अगले दिन से मामाजी लम्बी नलकी वाले दो लोटों में चुटकी भर नमक और एक लीटर हल्का गर्म पानी डाल कर ले आये फिर उन्होंने धीरे-धीरे आयुष को नली से नाक में पानी डालने का और बाहर निकलने का अभ्यास कराया।  
आयुष जब तक उनके घर रहा तब तक उन्होंने आयुष को जलनेति की क्रिया कराई व उसको ठीक प्रकार से करने की सावधानियां भी समझायीं।
आयुष को अब इससे कुछ लाभ दिखाई देने लगा था तो वह स्वयं ही सुबह उठकर गुनगुने पानी में नमक डालकर जलनेति की क्रिया करने लगा तथा साथ में कपालभाति भी करने लगा।
देखते ही देखते कुछ महीनों में ही उसे छींकें आनी व नाक से पानी आना भी बंद हो गया, साथ ही जुकाम के कारण सिर में जो दर्द रहता था वह भी ठीक हो गया।
अब तो आयुष के घर में भी उसकी देखा देखी सभी लोग इस क्रिया को करने लगे। व मित्रों को भी जलनेति के फायदे समझाने लगे।

सुनीता त्यागी 
 राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद 
 ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com


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