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तुम पहले क्यों नहीं आये: पुस्तक समीक्षा सह परिचय - विशाल चंद

पुस्तक : तुम पहले क्यों नहीं आए? 

लेखक : कैलाश सत्यार्थी

 प्रकाशन : राजकमल पेपरबैक्स

        तुम पहले क्यों नहीं आए नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी द्वारा लिखी गई उन बच्चों की सच्ची कहानियों का संग्रह है, जिन्हें उन्होंने अपने संगठन बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से गुलामी और बाल श्रम से मुक्त कराया। यह किताब पढ़ते हुए बार-बार मन भारी हो जाता है और मन में क‌ई सवाल उठते हैं।

         इस पुस्तक में 12 बच्चों की जीवन कथाएँ हैं, जो पत्थर की खदानों, ईंट भट्ठों, घरेलू मजदूरी, कालीन कारखानों और तस्करी जैसे अमानवीय हालात से निकलकर आज़ादी की रोशनी तक पहुँच पाए। ये कहानियाँ किसी कल्पना की उपज नहीं, बल्कि हमारे समाज का कड़वा सच हैं और हर कहानी एक चुप चीख जैसी लगती है। शीर्षक कहानी देवली की है, जो तीसरी पीढ़ी से बंधुआ मजदूरी में जकड़ी हुई थी। जब उसे आज़ादी मिली तो उसके मुँह से निकला सवाल—

“तुम पहले क्यों नहीं आए?”

यह सवाल सिर्फ लेखक से नहीं, बल्कि हम सभी से किया गया सवाल बन जाता है। 

       किताब में प्रदीप, कालू, भावना और साहिबा जैसे बच्चों की कहानियाँ भी हैं, जिनके साथ अंधविश्वास, हिंसा, यौन शोषण और अमानवीय व्यवहार हुआ। इन किस्सों को पढ़ते हुए कई जगह शब्द साथ छोड़ देते हैं और सन्नाटा बोलने लगता है।इन्हें पढ़ते हुए कई बार मन करता है किताब बंद कर दूँ, लेकिन फिर लगता है—अगर हम पढ़ ही नहीं पाए, तो वे जिए कैसे होंगे? 

      हालाँकि यह किताब सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि उम्मीद भी देती है। बचाए गए कई बच्चे आगे चलकर पढ़े-लिखे, आत्मविश्वासी बने और आज दूसरों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। "यही इस किताब की सबसे बड़ी ताकत है।" कुल मिलाकर, तुम पहले क्यों नहीं आए एक झकझोर देने वाली, लेकिन ज़रूरी किताब है। यह हमें असहज करती है, सोचने पर मजबूर करती है और यह एहसास दिलाती है कि बच्चों की आज़ादी सिर्फ कानूनों से नहीं, हमारी संवेदना से संभव है।

" पढ़ें, समझें, बात करें और साझा भी "         

शुभकामनाएं 

विशाल चन्द  @reading_owl.3

https://www.facebook.com/vishal.chandji

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विशाल चन्द जी समाजशास्त्र के शोधार्थी, पाठक और संवेदनशील शिक्षार्थी हैं। नवीन ज्ञान अर्जन और सतत सीखना आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। पुस्तकों का पठन और संग्रहण आपको विशेष प्रिय है।

आपके भीतर एक घुमक्कड़ चेतना भी सक्रिय है, जो आपको नए लोगों, स्थानों और अनुभवों से जोड़ती रहती है। बागवानी आपके लिए प्रकृति से संवाद का माध्यम है।

आप समाज को अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखने और विभिन्न समूहों के साथ मिलकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को निरंतर प्रयासरत रहते हैं।


जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।

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गलत के साथ खड़े होकर सही की उम्मीद! (पुनर्विचार) - सोनम वर्मा

यह लेख पढ़ते समय यदि आपको असहजता महसूस हो, तो यह असहजता व्यर्थ नहीं है, यह वही बेचैनी है, जो तब होती है जब कोई हमें आईना दिखा देता है।

हम अक्सर समाज, व्यवस्था और लोगों को दोष देते हैं, पर यह देखने से बचते हैं कि कहीं हम स्वयं ही उस गलत का हिस्सा तो नहीं बन रहे, जिसका रोना रोज़ रोते हैं।दुनिया ऐसे लोगों से भरी पडी है जो वही पढ़ते हैं जो उन्हें सोचने से बचाए, वही सुनते हैं जो उन्हें हँसाकर टाल दे और वही देखते हैं जो उन्हें ज़िम्मेदारी से दूर रखे। फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि समाज बदल जाए, विचार ऊँचे हो जाएँ और लोग ईमानदार बन जाएँ। यह कैसी उम्मीद है, जो गलत को ताकत देकर सही से की जाती है?

जो लोग सच बोलते हैं, कठिन सवाल उठाते हैं और हमारी सुविधाजनक सोच को चुनौती देते हैं, उन्हें हम अनदेखा कर देते हैं। उन्हें उबाऊ, नकारात्मक या अव्यावहारिक कहकर किनारे कर दिया जाता है, पर जो लोग हमें बहलाते हैं, हमारी सोच को सुन्न करते हैं और भीड़ के स्वाद के अनुसार परोसते हैं, उन्हें हम सर आँखों पर बिठा लेते हैं। क्या यह चयन हमारी मानसिकता को उजागर नहीं करता?

हम शिकायत करते हैं कि आज कोई अच्छा नहीं लिखता, कोई ईमानदार नहीं रहा और कोई बदलाव नहीं चाहता। जबकी इसके ही समान्तर एक और सच्चाई यह है कि जब कोई सच में ईमानदारी से लिखता है या बदलाव की बात करता है, तो उसे पढने वालों कि संख्या कम ही मिलती है, क्योंकि ऐसा लेखन हमें कठघरे में खड़ा करता है, और खुद से सवाल करना हमें सबसे ज़्यादा असहज करता है।

हम गलत लोगों से सही काम की उम्मीद इसलिए करते हैं क्योंकि यह आसान है। खुद खड़े होना कठिन है, खुद बोलना जोखिम भरा है और खुद कुछ अलग करना असुविधाजनक है। इसलिए हम भीड़ में सुरक्षित रहना पसंद करते हैं।

वही भीड़ जो गलत को लोकप्रिय बना सकती है और फिर कहती है कि नेता खराब हैं, लेखक बिक गए हैं या व्यवस्था में खामियां आ गई हैं|

व्यवस्था की खामियों की तरफ इशारा करने वाले लोगों में अधिकतर, उसी व्यवस्था को रोज़ मज़बूत भी तो कर रहे हैं!

"हम जिन विचारों को समर्थन देते हैं, जिन लोगों को आगे बढ़ाते हैं और जिन बातों पर चुप रहते हैं, वही समाज की दिशा तय करती हैं।"

फिर भी हम अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से बचते हैं।

हम दोहरे मानक वाला इंसान नहीं कहलाना चाहते, पर सच यह है कि हम में से ज्यादातर सुविधावादी हो चुके हैं। और सुविधावाद धीरे-धीरे समाज की आत्मा को खोखला कर देता है। अमूमन लोग सही का साथ तभी देते हैं, जब उसमें हमें कोई असुविधा न हो।

यदि सच में बदलाव चाहिए, तो पहले यह देखना होगा कि हम किसके साथ खड़े हैं, किसे पढ़ रहे हैं और किस चुप्पी को हम समझदारी समझ रहे हैं।

क्योंकि गलत का साथ देकर सही की उम्मीद करना, समाज के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है।

यदि यह लेख आपको चुभा हो, तो इसे नज़र अंदाज़ मत कीजिए, संभव है, यही चुभन उस बदलाव की शुरुआत हो, जिसकी बात हम हमेशा दूसरों से करते आए हैं।

- सोनम वर्मा

सीतापुर, उत्तर प्रदेश


उदीयमान लेखिका एवं कवयित्री सोनम वर्मा जी, इतिहास, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक हैं और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर| शैक्षिक कार्यों के उद्देश्य हेतु बी.एड. किया  तथा वर्तमान में एम.एड. में अध्ययनरत हैं|

आपको सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन में विशेष रुचि है| सामाजिक सरोकारों के साथ ही शैक्षिक एवं मानवीय विषयों पर लेख एवं कविताएँ लिखना आप अपना शैक्षिक दायित्व समझती हैं|


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सोनम वर्मा - लेखिका परिचय

उदीयमान लेखिका एवं कवयित्री सोनम वर्मा जी, इतिहास, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक हैं और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर| शैक्षिक कार्यों के उद्देश्य हेतु बी.एड. किया  तथा वर्तमान में एम.एड. में अध्ययनरत हैं|

आपको सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन में विशेष रुचि है| सामाजिक सरोकारों के साथ ही शैक्षिक एवं मानवीय विषयों पर लेख एवं कविताएँ लिखना आप अपना शैक्षिक दायित्व समझती हैं|

आशा है की आपकी रचनाएँ पाठकों को स्पष्टता देंगी और उन्हें समाज में व्याप्त दिक्कतों के प्रति संवेदनशील बनायेंगी |  

शुभकामनाएं 

सम्पादक


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उद्देश्य - विद्यार्थियों को आने वाली दिक्कतों और उनसे होने वाली चूक के उपाय के तौर पर ताकि वह भौतिकी की बेहतर समझ के साथ अच्छा स्कोर करके अपने सपनों को पंख दे सकें |

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प्रस्तावित पुस्तक - भौतिकी 12वीं विशेष

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Proposed Book - Physics 11th Special

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- Lovekush Kumar

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प्रस्तावित पुस्तक - भौतिकी 11वीं विशेष

उद्देश्य - विद्यार्थियों को आने वाली दिक्कतों और उनसे होने वाली चूक के उपाय के तौर पर ताकि वह भौतिकी की बेहतर समझ के साथ अच्छा स्कोर करके अपने सपनों को पंख दे सकें |

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- लवकुश कुमार

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प्रस्तावित पुस्तक - भौतिकी CUET विशेष

उद्देश्य - विद्यार्थियों को आने वाली दिक्कतों और उनसे होने वाली चूक के उपाय के तौर पर ताकि वह भौतिकी की बेहतर समझ के साथ अच्छा स्कोर करके अपने सपनों को पंख दे सकें |

शुभकामनाएँ

- लवकुश कुमार

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