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फिल्म धनक (एक समीक्षा )- सौम्या गुप्ता

हाल ही में मैंने एक मूवी देखी - "धनक"

पता नहीं क्यों पर उस मूवी की शुरुआत से ही जो दिख रहा था उसे मैंने अलग तरीके से लिया।

परी उसमें मुझे ईश्वर की तरह लगती है और हम जैसा होता है उसका भाई। परी के भाई की आंखें नहीं होती और वो आँखों को पाना चाहता है, उसका आंखों को पाने का जो रास्ता है वो जिंदगी में किसी बड़े लक्ष्य को पाने का रास्ता है। जब हम जिंदगी में कुछ बड़ा पाना चाहते है तो सफर में कुछ लोग अच्छे साथी की तरह मिलते है, कुछ आगे का रास्ता बताते है कुछ उसमें बाधा भी डालते है। कुछ लोग हमें उन बाधाओं से निकालते भी है। जिससे हमारी बड़ी इच्छा पूरी हो जाए उसे हम ईश्वर जैसा मानने लगते है, इस फिल्म में शाहरुख खान अभिनीत पात्र वो ईश्वर है।

लेकिन जिंदगी में कभी कभी ठहरने का मन करता है जैसे वो शादी वाला घर था उस फिल्म में और कभी-कभी पैरों के नीचे तपती रेत हमें तेज चलने को मजबूर करती है।

उस फिल्म का हर पात्र कुछ देर में चला जाता है, ये हमें सिखाता है कि लोग सिर्फ हमें आगे के रास्ते के बारे में बताने के लिए ही आते है, पूरी जिंदगी के लिए एक स्थाई सहारा ईश्वर ही होते है, जैसे उसमें परी होती है,लेकिन कभी-कभी ईश्वर भी हमारी परीक्षा लेने के लिए हमारा साथ छोड़ देते है, जैसे उसे आंखे मिलने से पहले परी बेहोश हो जाती है और उसका छोटा भाई उसे उठाते हुए बेहोश हो जाता है, ईश्वर भी यही चाहते है कि हम अपनी आखिरी साँस तक लड़े फिर वही होगा जो सही होगा उसमें उस बच्चे को आंखें मिल जाती है, हमें हमारी सही मंजिल मिल जाएगी।

उसमें कई बार वो लड़की ऐसी जगह पहुँचती है जहां पर वो उस मुकाम को मंजिल समझ सकती थी जैसे शादी वाले घर में जब उसको और उसके भाई को हमेशा के लिए रखने की और उसकी शादी की बात होती है पर वो विनम्रता से मना कर देती है क्योंकि उसके लिए उसके भाई की आंखे ही जरूरी और पहली प्राथमिकता थी।इसी तरह से हमें जीवन में किसी मंजिल को पाने के लिए छोटे छोटे स्वार्थों को त्यागना होता है तब हम वो बड़ी चीज पाते है जिसकी हमने ज्वलंत इच्छा की थी।

- सौम्या गुप्ता 

सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।


अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ  साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें  नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो  Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें

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कपूर ( लघुकथा ) - सविता मिश्रा 'अक्षजा'

"क्या हुआ बेटा! तेरी आवाज क्यों काँप-सी रही है? जल्दी से बता.. हुआ क्या...?"

"माँ वो गिर गया था सुबह-सुबह...।"

"कैसे, कहाँ गिरा, ज्यादा लगी तो नहीं? डॉक्टर को दिखाया! क्या बताया डॉक्टर ने?"

" माँ ज्यादा तो नहीं लगी, पर डॉक्टर कह रहे थे कि माइनर ऑपरेशन करना पड़ेगा। नाक में भीतरी चोट है।"

"ऑपरेशन…ऽ..ऽ...!"

"अरे मम्मा, परेशान होने वाली बात नहीं है।"

"सुन, अभी मत कराना ऑपरेशन। मैं तुरन्त चलती हूँ, शाम तक पहुँच जाऊँगी।"

प्रभु को याद करती हुई मानसी फोन रखते ही रो पड़ी। तुरन्त ही बेटे के पास जाने की तैयारी में जुट गयी हबड़-तबड़।

अभी दो साल पहले ही मिक्कू के पैरों का ऑपरेशन हुआ था| बस में बैठ वह सोचने लगी- फिर दो-तीन बार और दुर्घटना हुई और अब ये नाक पर चोट! भगवान, तू इस तरह क्यों बार-बार परीक्षा ले रहा है मुझ गरीब की! सोचते-सोचते साड़ी के पल्लू से रास्ते भर अपने आँसू पोंछती रही वह।

घर पहुँचते ही मिक्कू को साथ ले, अस्पताल पहुँची। बरामदों तक में पड़े कराहते हुए, रोते और दर्द से तड़पते हुए मरीजों और उनके तीमारदारों को देख वह भौंचक रह गयी। उसने हँसते हुए उसके साथ चल रहे मिक्कू की ओर देखा। सोचने लगी- मुझे तो काजल की लकीर-सा हल्का धब्बा ही दिया प्रभु ने। इन सब मरीजों के जीवन में तो काली रात का अँधेरा भर रखा है। तू बड़ा दयालु है भगवान, यूँ ही कृपा बनाए रखना मुझ पर।

अपने आँसू पोंछ वह मुस्कराती हुई डॉक्टर की केबिन में घुस गई।

© सविता मिश्रा 'अक्षजा'

जन्म: 1 / 6 / 73, प्रयागराज

प्रकाशित कृतियाँ: 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह।

अनुवाद : 'अदहने क आखर' अवधी अनुबाद [लघुकथा-संकलन]  

सम्पादन : 'खाकीधारी' 2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन} 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश}

पुरस्कार : लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता विधा में कई बार पुरस्कृत | 

आकाशवाणी आगरा से कहानी प्रसारित 

  आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|


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भाग्य का लिखा ( लघुकथा ) - सविता मिश्रा 'अक्षजा'

अपनी शादी तय होने की बात पर रश्मि का गुस्सा फूट पड़ा माँ पर... "क्या चाहती हैं आप? क्यों पर कुतरना चाह रही हैं मेरे|"

"उन्मुक्त हो उड़ रही हो| तुम्हारी उड़ान पर किसी ने पाबन्दी लगायी क्या कभी ?" माँ ने रोष में जवाब दिया|

"हाँ माँ लगाई! " खीझकर रश्मि बोली|

"तुम्हें पढ़ाया-लिखाया, तुमने जो चाहा, तुम्हें वो दिया| कौन-सी पाबन्दी लगाई तुम पर?" 

"तेईस की उम्र में ही पाँव में बेड़िया डाल दीं आपने और पूछ रही हैं कौन-सी पाबन्दी लगायीं? खुला आकाश बाहें फैलाये मेरे स्वागत के लिए बेताब था, पर आपने तो मेरे पर ही कतर दिए|"

"ऐसा क्यों बोल रही है? शादी तो करनी ही थी तेरी| अच्छा लड़का बड़े भाग्य से मिलता है| तेरे पापा के अंडर ट्रेनिंग किया है| तेरे पापा कह रहे थे एक दिन एक कामयाब आईपीएस बनेगा|"

"हाँ माँ, पापा की तरह कामयाब आइपीएस तो होगा, पर पापा की तरह पति भी बन गया तो?" उसके चेहरे पर कई भाव आये और चले गये|

बेटी के शब्द सुमन के दिल में 'जहर बुझे तीर' से चुभे| चेहरे पर उभर आए दर्द को छुपाते हुए बोली- "भाग्य का लिखा कोई मिटा सकता है क्या?"

"हाँ माँ, मिटा सकता है... जैसे पापा ने, आपका इस्तीफा दिलाकर मिटाया, आपका अपना भाग्य| नहीं तो आज आप पापा से भी बड़ी अफसर होतीं, पर... वे अपनी लकीर बड़ी तो खींच नहीं पाए, पर आपकी लकीर को छोटी... छोड़िए, उन्होंने तो उस लकीर का वजूद ही मिटा दिया |" 

© सविता मिश्रा 'अक्षजा'


ईमेल-2012.savita.mishra@gmail.com

अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों प्रकाश डालते हुए या कहें की ध्यान खींचते हुए एक शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपने लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि विधाओं में ढेरों रचनाएं साहित्य कोश को अर्पण की हैं, आपकी 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह के साथ अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हैं और 'खाकीधारी' 2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन} 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश} का सम्पादन भी किया, आप लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता विधा में कई बार पुरस्कृत हैं| आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|


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बदलते भाव ( लघुकथा ) - सविता मिश्रा 'अक्षजा'

"मर गया नालायक! देखो तो, कितना खून पीया था। उड़ भी नहीं पाया, जबकि सम्भव है इसने खतरा महसूस कर लिया होगा।"

"अरे मम्मी, आप दुखी नहीं है अपना ही खून देखकर?"

"नहीं, क्योंकि यह अब मेरा खून नहीं था, इसका हो गया था।"

"आप भी न, उस दिन उँगली कटने पर तो आपके आँसू नहीं रुक रहे थे। और आज अपना ही खून देखकर आप खुश हैं।"

''जो मेरा होता है, उसके नष्ट हो जाने पर कष्ट होता है। पर मेरा होकर भी जो मेरा न रहे, तब उसके नष्ट हो जाने पर मन को संतुष्टि होती है, समझा?''

"बस मम्मी, अब यह मत कहने लगिएगा कि यह खून पीने वाला मोटा मच्छर, कोई ठग व्यापारी या नेता है या फिर कोई भ्रष्ट अफसर! और उससे निकला खून, आपके खून पसीने की कमाई! जिसे पचा पाना सबके बस की बात नहीं!"

"मेरा पुत्तर, कितना समझने लगा है मुझे..! छीन-झपटकर कोई कब तक जिंदा रह सकता है भला। पाप का घड़ा एक न एक दिन तो फूटता ही है।"

© सविता मिश्रा 'अक्षजा'


ईमेल-2012.savita.mishra@gmail.com

अक्षजा जी को पढ़ना संवेदना जगाता है और स्पष्टता से भर देता है, आपने अपनी रचनाओं से मानवीय रिश्तों, संघर्षों, विरोधाभासों प्रकाश डालते हुए या कहें की ध्यान खींचते हुए एक शांतिमय और समृद्ध जीवन / दुनिया के लिए तरह तरह की विधाओं में साहित्य रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है, आपने लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि विधाओं में ढेरों रचनाएं साहित्य कोश को अर्पण की हैं, आपकी 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह के साथ अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हैं और 'खाकीधारी' 2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन} 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश} का सम्पादन भी किया, आप लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता विधा में कई बार पुरस्कृत हैं| आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|


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कोचिंग संस्थानों द्वारा भ्रामक प्रचार का समाज पर असर- सौम्या गुप्ता

 

भ्रामक प्रचार जिसका अर्थ है ऐसा प्रचार जो हमें भ्रम में डालता हो हमें सही चीजों से भटकाता हो, माने कि हमें सही चीजे न दिखा कर वो दिखाया जाए जिसके कारण हम उस संस्था की ओर आकर्षित हो सकें ।

विस्तार में समझते हैं:

जब हम कोचिंग संस्थानों में पढ़ने के लिए जाना चाहते हैं तो वहाँ पर हमको अध्यापको के पढ़ाने के तरीके जैसे- विश्लेषणात्मक व समीक्षात्मक व्याख्या करने का तरीका या उनकी अकादमिक योग्यता और अनुभव जैसे पहलुओं को देखना चाहिए। वहां पर अध्ययनरत छात्र छात्राएं विषय को कितना समझ पा रहे है यह जरूरी है। फिर यह भी आवश्यक है कि हमारे द्वारा यदि कोई प्रश्न पूछा जाता है तो क्या अध्यापक उसका सटीक उत्तर दे पा रहे हैं।

 

हम जब किसी संस्थान को चुने तो उसका कारण उपरोक्त होना चाहिए लेकिन भ्रामक प्रचार के चलते हम हाई रैंक और चकाचौंध देखने लगते है। इससे ज्यादातर संस्थानों में छात्रों की संख्या अमूमन बढ़ जाती है। जिसकी देखा देखी कभी-कभी समाज का दूसरा व्यवसायिक वर्ग भी भ्रम फैलाने की कोशिश करता है। वहीं दूसरी और छात्र वर्ग भी इस लालसा में कि कल प्रचार में इस फोटो की जगह मेरी फोटो होगी, वो भी इन संस्थानों का रूख करते हैं। और समय नष्ट करते हैं उचित मार्गदर्शन और पठन सामग्री के अभाव में।

 

इन सब का परिणाम ये होता है कि व्यवसायी वर्ग एक गलत चलन से अपना व्यवसाय आगे बढ़ाते हैं, वही छात्र वर्ग जब सालों मेहनत के बाद वो नहीं पाते, जो वो चाहते थे तो वो अवसाद और कभी-२ अति-अवसाद से घिर जाते है जो कभी-कभी आत्महात्या का

कारण भी बनता है। इसीलिए इन भ्रमों से बचना जरूरी है और कोचिंग चुनने का तरीका विश्लेषणात्मक और समीक्षात्मक हो।

 

एक और बात जो जुड़ी हुई है ऊपर के मुद्दे से वो है छात्रों की मानसिकता और कसौटी का जिसने कोचिंग संस्थानों को भ्रामक प्रचार का लालच दिया है वो है सूक्ष्म और विश्लेषणात्मक समझ की कमी और चकाचौंध के आधार पर आंकलन की ग़लत आदत, संस्थान का चुनाव उसकी पठन सामग्री और शिक्षण प्रक्रिया हो न कि उस संस्थान से कितने टापर निकले।

शुभकामनाएं

-सौम्या गुप्ता 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |

पिछले कुछ समय से आप एक स्वतंत्र लेखिका के रूप में वेबसाइट को सहयोग स्वरूप पाठकों के लिए ज्ञानवर्धक और विश्लेषणात्मक लेख उपलब्ध करा रही हैं जो आमजन के साथ सरकारी सेवाओं के अभ्यर्थियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी हैं।


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पहुंच (लघुकथा) - लवकुश कुमार

यथार्थ  सवाल करता है, यार प्रेम तुम अपनी वेबसाइट पर इतने आर्टिकल, लघुकथा व अन्य चीजें डालते रहते हो जबकि बहुत से लोग इन विषयों पर पहले ही लिख चुके है फिर तुम इन पर क्यों लिखते हो?

प्रेम गहरी साँस लेकर फिर मुस्कुराते हुए उत्तर देता है, तुम सही कर रहे हो यथार्थ कि इन विषयों पर पहले भी लिखा जा चुका है लेकिन उसकी पहुंच सीमित है क्योंकि एक वक्त जब मुझे ऐसी ही चीजों की जरूरत थी, एक स्पष्टता की जरूरत थी तब मुझे ये सब नहीं मिल पाया, कितना अच्छा होता अगर ये मुझे किसी स्थानीय स्तर पर मिल जाता और आसानी से मिल जाता, उसी कमी को भरने को मैं अपने तरीके से लोगों तक और उन छात्रों तक इसकी सरल पहुँच बनाना चाहता हूँ जिससे कि जिस स्पष्टता की कमी का सामना मैंने किया है उसे दूसरे न महसूस करे। अगर ये चीजें किसी एक के जीवन में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकी तो मैं इस काम को सार्थक समझूँगा।

यथार्थ गर्व की अनुभूति के साथ कहता है, वाह यार तुमने तो एक आदर्श प्रस्तुत कर दिया, शिकायत ही नहीं काम करके कमी को भरने का प्रयास! प्रेम के हाव भाव से विनम्रता और संतुष्टि का भाव झलक रहा था।

-लवकुश कुमार 


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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रुचि (लघुकथा) - लवकुश कुमार

सान्निध्य कौतूहलवश, यथार्थ तुम इतना टाइप कैसे कर लेते हो?

तुम्हारी उंगलियों में दर्द नहीं होता !

यथार्थ (अपनी टाइपिंग लाइन पूरा करते हुए)- सान्निध्य, पहली बात तो यह काम मेरी रुचि का है, मुझे आर्टिकल, लघुकथा लिखना बहुत पसंद है।

दूसरी बात, मैंने लोगों को अक्सर समाज और सरकार की बुराइयाँ करते हुए सुना है, मैं उन शिकायतों से आगे बढ़कर काम करना चाहता हूँ, इसीलिए मैं बिना खाए भी ये काम निरंतर कुछ समय तक कर सकता हूँ, क्योंकि ये काम मुझे बहुत जरूरी लगता है और इस तरह मैं लोगों में संवेदनशीलता बढ़ाने के निमित्त कुछ प्रयास कर पा रहा हू और उन जरूरी बातों की तरफ ध्यान खींच रहा हूं लोगों का जिधर ध्यान जाना चाहिए।और ये काम इतना जरूरी लगता है कि थकान भी मुझे रोक नहीं पाती।

अब सानिध्य समझ चुका था कि यथार्थ समाज और सरकार के बारे में लोगों की शिकायतों पर इसी तरह खूब काम करके प्रतिक्रिया करता है। 

-लवकुश कुमार 


लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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अपरिचित (लघुकथा) - लवकुश कुमार

अक्षिता विस्मित भाव से, चेतना मैं तुम्हारी एक बात से चौंक जाती हूँ कि तुम अपरिचित लोगों से भी इतने खुलेपन के साथ कैसे बात कर लेती हो, तुम्हें डर नहीं लगता कि इससे कोई हानि भी हो सकती है या लोग तुम्हें ग़लत समझ सकते हैं?

चेतना मुस्कुराते हुए देखो अक्षिता, अपना तो सिंपल फंडा है जो वास्तव में हो वही दिखो जब मैं नए लोगों से फ्रैंकनेस से पेश आती हूँ तो सामने से भी मैं ऐसी ही उम्मीद रखती हूँ। इससे हम दोनों मुखौटे के साथ नहीं मिलते, मैं इससे लोगों से सच्चाई से मिलती हूं और जो मुझसे इत्तेफाक रखेंगे वही मिलेंगे, जो मेरे काम के महत्व को समझेंगे, किसी खास मौके पर हम मिले तो हम वही रहेंगे जो पहली बार में थे। हमारी ईमानदारी ही हमारे एसोसिएशन की मजबूत नींव बनेगी। इसीलिए मैं अपरिचित लोगों से ऐसे ही सच्चाई से मिलती हूँ। अगर हम खुद ही मुखौटा लगा लेंगे तो सामने वाले से सच्चा होने की उम्मीद नहीं कर सकते।अगर  बाद में कलई खुलने पर कोई साथ छूटना है तो अभी वो जुड़े ही क्यों?

©लवकुश कुमार

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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सहयोग (लघु कथा) - सौम्या गुप्ता

रंजना - स्तुति तुम ये क्या लेखन के काम में लगी रहती हो, न जॉब है अभी, न जिंदगी में स्थायित्व (स्तुति की सहेली उलाहना देते हुए कहती है)!

स्तुति- (मुस्कुराते हुए) रंजना, मैं अपनी जॉब के लिए प्रयासरत हूँ, जिसके लिए मैं अपनी पढ़ाई भी करती हूँ। फिर इतना पढ़ने के बाद मूकदर्शक की भाँति सिर्फ शिकायतें करना नहीं पसंद करती। इससे इतर लोगों को स्पष्टता, सार्थकता व निडरता देने के लिए काम करना चाहती हूँ। मैं ऐसा करके ऐसे व्यक्तियों का सहयोग भी कर रही हूँ जो इसी काम में लगे हुए हैं, इस सहयोग के साथ मैं खुद के समय को नियमित सार्थक कार्य में लगा पाती हैं।

रंजना, जो अब तक स्तुति को एक एवरेज इंसान मानकर उलाहना दे रही थी, उसकी बातों सुनकर उस पर गर्व महसूस करके मुस्कुरा रही थी।

-सौम्या गुप्ता 

सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |


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दक्षता (लघु कथा) - लवकुश कुमार

यार उत्कर्ष, आजकल वेबसाइट पर बहुत आर्टिकल और लघुकथाएँ डाल रहे हो, दूसरे काम बंद कर दिए क्या? आखिर क्या राज है?

अभिनव - अरे उत्कर्ष, कोई है जो मुझे इस काम के लिए प्रोत्साहित करता है, इस काम की महत्ता को स्वीकार करता है और नियमित कुशल क्षेम पूछ इस काम के महत्व को दर्शाता है यहां तक कि ये काम नियमित चल सके उसके लिए सहयोग भी।

प्रोत्साहन से प्रसन्नता बढ़ती है और प्रसन्नता से दक्षता, परिणाम तुम्हारे सामने है और मुस्कुराने लगता है।

उत्कर्ष - अच्छा तो ये तारीफ का कमाल है। (वह आंखों में चमक के साथ बोलता है) सही भी है, हमें प्रोत्साहन मिलता है, तो हम खुश होते हैं और अधिक कुशलता से काम करते हैं।

©लवकुश कुमार

लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं, 

जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।


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