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वंदे मातरम् (हमारा राष्ट्रगीत- एक अनुस्मारक) - सौम्या गुप्ता

7 नवंबर 2025 को हमारे राष्ट्रगीत वंदे मातरम् ने 150 वर्ष पूरे किये। वंदे मातरम् अर्थात हम भारत माता की वंदना करते है। 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंद मठ में यह गीत लिखा जो उपन्यास के सन्यासियों द्वारा गया जाता था, फिर यह गीत भारतीय जन चेतना का गीत बन गया। इसे बच्चे से लेकर बूढ़े, यहां तक की इस गीत को गाते हुए कितने ही क्रांतिकारियों ने फांसी पर चढ़कर अपने प्राणों की आहुति दे दी। 

यह गीत स्वाधीनता संग्राम के लिए प्रेरणा था। हम अपने स्वधीनता के इतिहास को न बिसरा दे इसीलिए यह गीत 24 नवंबर 1950 को संविधान में जोड़ा गया। 

क्या हम सच में भारत मां की वंदना करते हैं? क्योंकि आज इस गीत को भी कुछ लोग सांप्रदायिकता (धार्मिकता का उन्मादी रूप) के नजरिये से विशेष वर्ग से जोड़कर देखते हैं। यह संकीर्ण नजरिया यह बताता है कि हम हमारी स्वाधीनता का सही सम्मान नहीं करते। हमें यह सोचने की जरूरत है कि क्या हम में सच में राष्ट्र प्रथम अर्थात स्वयं से भी पहले राष्ट्र का हित सोचने की भावना है?

आज इस गीत को हमें सच्चे अर्थों में समझने की जरूरत है और इसकी भावनाओं को जीने की भी जरूरत है।

सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम् की पंक्ति ने भारतीय मानस में चेतना का संचार किया। इस एक पंक्ति में भारत की समृद्धि, सौंदर्य और शक्ति एक साथ मूर्तिमान हो उठे।

 

थोड़ा लिखा ज्यादा समझना, हमें हमारे राष्ट्रगीत के एक-एक शब्द को समझकर उसे अपने व्यवहार, जीवन मूल्यों और दिनचर्या में शामिल करना है |

शुभकामनाएं 

 

-सौम्या गुप्ता 

बाराबंकी उत्तर प्रदेश 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |


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