अवनीश भाई बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बी.एस.सी. के दौरान मेरे साथी रहे
और आजकल भारत सरकार के एक विभाग में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं |
अवनीश भाई की जिन बातों/ व्यवहार के लिए मै कृतज्ञ हूँ और जो बातें उन्हें मेरी नज़रों में
खास बनाती उन्हें इस उद्देश्य के साथ यहाँ साझा कर रहा हूँ ताकि उनके जैसे ही और लोग बने और तमाम लोगों को उनके जैसे मित्र मिल सकें;
जब कोई आपसे मुस्कुराकर मिलता है तो इससे सन्देश जाता है की उसे आपसे मिलकर ख़ुशी हुयी
नतीजतन आपकी सेल्फ एस्टीम बढ़ जाती है और आप खुद को महत्व का समझते हैं, अच्छा और बेहतर महसूस करते हैं और साथ ही ये भावना आपमें एक जिम्मेदारी का भाव लाती है जिससे आप अपने काम में और बेहतर करते हैं, अपने व्यवहार को और बेहतर बनाते ताकि आप ऐसे ही लोगों के लिए समाज के लिए महत्व के बने रहें |
इसीलिए अगर आपके आस-पास मुस्कुराकर मिलने वाले लोग हैं तो आपके लिए अपने काम में मन लगाना आसान हो जाता है |
2. किसी दिक्कत के वक़्त पूरी बात इत्मीनान से सुनना और बारीकी से विश्लेषण करके हल सुझाना -
अगर आप किसी दिक्कत में हैं और अवनीश भाई के पास पहुँच जाएँ और उन्हें अपनी दिक्कत बताएं तो पहले तो आपको पूरी बात सुनी जाएगी ताकि आप हल्का महसूस कर सकें और उसके बाद आपकी दिक्कत की जड़ का विश्लेषण होगा अपने अनुभव और समझ के आधार पर और जरुरी उपाय और मदद तुरंत या जल्द से जल्द की जाएगी |
3. सामजिक और पेशेगत मुद्दों पर बातचीत करने वाला साथी-
जहाँ अमूमन लोग अपनी यादों में खोये रहते हैं वहां कम हैं ऐसे लोग जो अपनी दिनचर्या, अपने काम, उसकी गुणवत्ता और उसमे इनोवेशन ( नवाचार ) पर तथा सामाजिक स्थितियों की बेहतरी के लिए बात करते हों, अवनीश भाई ने हमेशा इन मुद्दों पर बात करके और जरुरी कदम उठाकर समय को सही जगह लगाने की प्रेरणा दी |
4. मदद के लिए हमेशा हाज़िर -
अवनीश भाई के कितने ही खुद के काम पेंडिंग पड़े हों, कल किसी परीक्षा में बैठना हो लेकिन अगर आपने फ़ोन कर दिया या उनके पास पहुँच गये अपनी किसी दिक्कत या जरुरत के साथ तो फिर पहले आपकी बात सुनी जाएगी और अंतरिम हल देकर फिर बताया जायेगा की कल तो एक परीक्षा है उसके लिए पढ़ रहा हूँ, बाकि की कार्यवाही बाद के लिए .......
5. खुशमिजाज़ स्वभाव और मजाकिया लहजे में बड़ी बड़ी बात कह जाने की कला में माहिर -
नाराजगी तो अवनीश भाई के स्वभाव में कभी दिखी नहीं क्योंकि नाराज़गी भी वो ऐसे शब्दों में कहते हैं कि आपके पास मुस्कुराकर अपनी गलती मान लेने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता, उनकी बातों के सामने गुस्सा होने का सवाल ही नहीं उठता और हाँ आपने अगर टोंकने वाला काम किया है तो मीठी झिडकी देने में भी महारथ हांसिल है उन्हें , सब प्रैक्टिस और संगति की बात है , फणीश्वर नाथ रेनू की मैला आँचल पढने का विचार उन्होंने ही दिया |
6. मानव मन के पारखी-
मानव मन के पारखी ऐसे कि किस इन्सान को किस दिक्कत में क्या जरुरत होगी या उसे किस तरह की बातें हल्का महसूस कराएंगी और शांतचित्त होकर दिक्कत के मूल और तीव्रता पर सम्यक विचार करने लायक बना सकें |
अवनीश भाई ने लोगों से जुड़ते वक़्त ये कभी न सोंचा कि कौन उनके क्षेत्र, जाति, भाषा का है या अन्य का निष्पक्ष इंसान का उदाहरण, इसिलिए वो भारत के किसी भी हिस्से में रहे हों, उनके आस पास के लोग उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके, सीमित संसाधनों और व्यक्तिगत संघर्षों के बावजूद लोगों की मदद कैसे की जाती है, उनसे सीखा जा सकता है |
"एक अच्छा दोस्त आपके अन्दर की बेहतर करने की संभावनाओ को बाहर लाता है और आपमें सतही चिंताओं से हटाकर अपनी उर्जा ठोस काम और ठोस मुद्दों पर लगाने की हिम्मत भरता है स्पष्टता देकर"
-लवकुश कुमार
एक दृश्य में एक शायर, अपनी शायरी पाठ के बीच में बार-2 उस जलसे के आयोजक जोकि एक ज्ञानी इंसान थे उनका नाम ले रहा था और उनके जनहित के कार्यों को उद्धृत कर रहा था |
इसी घटना का सन्दर्भ लेते हुए क्या हम ये नहीं कर सकते कि जब किसी से बात करें तो उनका नाम लें बीच बीच में जरुरत के अनुसार, क्या होगा इससे ? इससे सामने वाले इंसान को अच्छा महसूस होगा और उसकी तरफ से बेहतर प्रतिक्रिया और बेहतर प्रदर्शन मिलेगा |
"वो फाइल उठा देना" से बेहतर है कि आप कहो कि " मोहन वो फाइल उठा देना"
"ठीक है" कहकर फ़ोन रखने से बेहतर है की आप कहो " ठीक है मोहन फ़ोन रखता हूँ " या "ठीक है मोहन फ़ोन रखता हूँ फिर बात होगी " या "ठीक है सोहन फ़ोन रखा जाये अब ? " या "ओके बाय मोहन रखता हूँ अब " |
नोट- हर किसी न किसी का कोई महत्व होता है, किसी को अपने व्यवहार से महत्वहीन न महसूस कराएँ
हर किसी से इंटरैक्ट करना जरुरी नहीं लेकिन जिससे इंटरेक्शन कर रहें हैं कम से कम उससे बात करते वक़्त उसकी गरिमा का ध्यान रखें और उसके कार्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें अगर कोई शब्द नहीं कह सकते तो एक प्यारी सी मुस्कान क्योंकि मुस्कान से हर्ष का पता चलता है और " हर्ष कृतज्ञता का सरलतम रूप है "
-लवकुश कुमार
भय सफलता का सबसे बड़ा बाधक है |
साहसी और हिम्मतवर व्यक्ति हज़ार कठिनाइयों मे भी विचलित नहीं होते |
जीवन के किसी भी क्षेत्र मे व्यवस्था एवं क्रम बनाए रखने के लिए सुदृढ़ मनोबल एवं साहसी होने की अत्यंत आवश्यकता है |
भय विमुख होना मनुष्य का सबसे बड़ा सौभाग्य है |
मानसिक कमजोरी, दुख या हानि की काल्पनिक आशंका से ही प्रायः लोग भयभीत रहते हैं |
परिस्थितियों या शंकाओं के विरुद्ध मोर्चा लेने की शक्ति हो तो भय मिट सकता है| इसके लिए हृदय मे दृढ़ता चाहिए |
परमात्मा को भूलकर अन्य वस्तुओं के साथ लगाव रखने से ही भय उत्पन्न होता है |
मनुष्य शरीर से अलग कोई अविनाशी तत्व है |
डर का सबसे प्रमुख कारण है अज्ञानता | जिसे हम ठीक तरह से नहीं जानते उससे प्रायः डरा करते हैं |
घने जंगलों मे सिंह, व्याघ्रों के बीच निवास करने वाले आदिवासी उनसे जरा भी नहीं डरते, बल्कि आँख-मिचौली खेलते रहते हैं, जबकि सामान्य लोगों को सिंह, व्याघ्र की बात सुनने से भी डर लगता है |
अजनबी आदमी को देखकर तरह – तरह की आशंकाएं मन मे उठती हैं, पर जब उसका पूरा परिचय होता है तो पूर्व आशंका मित्रता मे बादल जाती है |
इस संसार मे लगभग सारे डर अज्ञानमूलक हैं |
स्रोत- पुस्तिका – “ भय मारक है, साहस पराक्रम संजीवनी ” लेखक – श्रीराम शर्मा आचार्य