मैंने एक बार कहीं पढ़ा था, श्रंगार करती हुई स्त्रियों से ज्यादा सुंदर लगती है संघर्ष करती हुई स्त्रियाँ। ये लाइन मुझे इसलिए पसंद है क्योंकि मैं भी हार नहीं मानती, संघर्ष करती हूं और हर महिला करती है, किसी का संघर्ष जारी रहकर उसे ऊँचाइयों पर ले जाता है और कुछ का संघर्ष बस चार दीवारी में ही खत्म हो जाता है।
आज एक मूवी देखी Mission Over Mars, मुझे लगता है ये उन लोगों को जरूर देखनी चाहिए, जो हार नहीं मानना चाहते और लड़ना चाहते हैं अपनी आखिरी उम्मीद तक।
आप इसमें, कैसे हर मुश्किल का रास्ता निकाला जाता है देख सकते हैं। कैसे डर को भी हथियार बनाया जाता है। मंगल पर जाने वाले मिशन में एक टीम मेंबर को बुरे सपने आते है, और उनकी टीम लीडर उन सपनों को आधार पर जो गलत हो सकता था, उसका तोड़ निकाल लेती है।
जब वो महिलाएँ मिशन के सिवा कुछ नहीं सोचती हो तो किसी को कैसे कम बजट में काम कर सकते है, कैसे अपने पहले के रिसोर्स का उपयोग कर सकते हैं, कैसे मुश्किल में अनजाने ही भगवान हमारे मददगार बन जाते है या प्रकृति का संयोग हमारे पक्ष में होकर हितकारी हो जाता है? आखिरी क्षण जब हमें लगता है कि कुछ नहीं हो सकता तब कुछ ऐसा अचानक से दिख जाता है और लगता है कि ये किया जा सकता है। कैसे यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि कैसे एक मिशन फेल भी हो सकता है, जब आपको सटीक गणना से पता चलता है, तभी आप सब सही कर पाते हैं, माने हमारे पास जानकारी और आंकड़े होने चाहिए बेहतर निर्णय निर्माण के लिए, कैसे हम सीमित संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं, जब हमारे पास काम के लिए सही जुनूनी लोग हो। इससे सीखा जा सकता है, आशा कभी मत खोए, हमेशा नजर समाधान की ओर हो। आपकी काम के प्रति सच्ची भावना आपको सफल बनाती ही है।
देर किस बात की आप भी देख डालिए इस फिल्म को और दे दीजिए एक समावेशी विस्तार अपनी समझ और दृष्टिकोण को।
Happy Movie Watching!
- सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
अमूमन ऐसा देखा गया है कि जब भी हम किसी को अपने से आगे बढ़ते हुए देखते हैं, पढ़ाई में खुद से आगे देखते हैं, या अच्छी स्थिति पर देखते हैं तो हमारे अंदर एक ईर्ष्या की भावना पैदा होती है।
क्या हमने कभी सोचा है कि ईर्ष्या के कारण हमारा क्या नुकसान होता है? सबसे पहला नुकसान ये होता है कि हम उस व्यक्ति से जिससे हम ईर्ष्या कर रहे है उससे सीखना बंद कर देते हैं, अब आप सोचेंगे कि हम सीखना कैसे बंद कर सकते हैं? आप सोचिए अगर आप से कोई पढ़ाई में आगे निकल गया है और आप उसके प्रति जलन की भावना रख रहे हैं तो आप कभी भी उससे बराबरी नहीं कर पाएंगे, लेकिन अगर आप उनसे पूछे कि आपने इतने अच्छे से सारी चीजें कैसे मैनेज कीं, आपने किस तरह से पढ़ाई की तो अगली बार आप भी बेहतर प्रदर्शन कर सकते हो। इस तरह से बहुत सारी चीजें हैं जो हम अपने से आगे बढ़ते हुए लोगों से सीख सकते हैं। लेकिन जलन की भावना जो होती है वह हमें सीखने से कहीं ना कहीं बहुत पीछे ले जाती है और जो हम अपना भी थोड़ा बहुत कर सकते थे, वह भी अच्छे से नहीं कर पाते इस तरह जो हमें होना चाहिए था हम वह भी नहीं हो पाते हैं और दूसरे से बेहतर वह भी कहीं न कहीं असंभव हो जाता है इसलिए ऐसे लोगों को अपनी आदत पर एक बार विचार करने की जरूरत हैं।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
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शुभकामनाएं
अलग-अलग रंगरूप हमारे, दिल की धड़कन एक है।
जाति अलग है, धर्म अलग है, छत पर आकाश एक है।
अलग-अगल है धन की माया,
अलग-अगल है सबकी काया,
पर सबके पैरों के नीचे, देखो धरती एक है।
अलग-अलग है भाषा सबकी,
अलग-अलग हैं व्यंजन सबके,
'थोड़ा सा और लीजिए न' ये भाव तो एक है।
अलग-अलग है ईष्ट हमारे,
अलग-अलग है मंदिर - मस्जिद,
पर सभी ईष्टों का संदेश 'सेवा भाव' भी एक है।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी, उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |
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शुभकामनाएं
तुम स्वप्न से भरी उड़ान भरो, मैं उसका कारण बन जाऊँ,
नीले अम्बर में प्राण भरो, उसका संसाधन बन जाऊँ
नयनों में समेटे ये धरती, आकाश से भी रिश्ता जोड़ो.
निर्भीक सी सभी उड़ान भरो, भय का निष्कासन बन जाऊँ।
निष्पादित हो नियमों से कर्म, नियमों की मूरत बन जाऊँ,
हर सूरत कर्म का पालन हो, मैं ऐसी सूरत बन जाऊँ,
जो हो संरक्षा की बातें, तो नाम शीर्ष पर आ जाए,
पर्याय रहूं संरक्षण का, मैं वहीं ज़रुरत बन जाऊं।
तुम नभ से भी ऊंचा उड़ना, बेफिक्र बादलों से लड़ना,
हो तूफानों से मिलन कभी, तुम चीर उन्हें आगे बढ़ना,
ये हाथ, ये साथ, ये परवाज़े, सब जुड़े अटूट डोर से हैं,
इक छोर डोर की तुम बनना, दूजी वो छोर मैं बन जाऊं।
- संजय सिंह 'अवध'
ईमेल- green2main@yahoo.co.in
उक्त मन को छूने वाली कविता के रचयिता भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में ATC अधिकारी हैं और अपने कालेज के दिनों से ही, जैसा कि इनकी रचनाओं से घोतक है, जन जन में संवेदना, करूणा और साहस भरने के साथ अंतर्विषयक समझ द्वारा उत्कृष्टता के पथ पर युवाओं को अग्रसर करने को प्रयासरत हैं।
कवि के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।
उक्त कविता अपने पूरे अर्थ में सुधी पाठकों को स्पष्टता दे सके आइए इसके लिए एक छोटी सी प्रश्नोत्तरी से गुजर लिया जाए।
*कविता में 'उड़ान' का क्या अर्थ है?*
कविता में 'उड़ान' का अर्थ है सपने देखना, ऊंचाइयों को छूना, और जीवन में आगे बढ़ना। यह बाधाओं का सामना करने और निडर होकर आगे बढ़ने का प्रतीक है।
*कविता में कवि खुद को किस रूप में प्रस्तुत करता है?*
कविता में कवि खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है जो उड़ान भरने वाले का समर्थन करता है, उसके सपनों को साकार करने में मदद करता है, और हमेशा उसके साथ रहता है। वह प्रेरणा, सुरक्षा और मार्गदर्शन का प्रतीक है।
*कविता में 'भय का निष्कासन' का क्या मतलब है?*
कविता में 'भय का निष्कासन' का मतलब है डर को दूर करना, निडर बनना, और आत्मविश्वास के साथ जीवन जीना। यह उन बाधाओं और चुनौतियों का सामना करने का प्रतीक है जो हमें हमारे सपनों को पूरा करने से रोकती हैं।
*कविता में 'नियमों की मूरत बनना' का क्या तात्पर्य है?*
कविता में 'नियमों की मूरत बनना' का अर्थ है नैतिक मूल्यों और सिद्धांतों का पालन करना, सही राह पर चलना, और दूसरों के लिए प्रेरणा बनना।
*कविता का केंद्रीय संदेश क्या है?*
कविता का केंद्रीय संदेश है सपनों का पीछा करना, बाधाओं का सामना करना, और हमेशा समर्थन और सुरक्षा की भावना के साथ जीवन जीना। यह प्रेरणा, साहस और आशा का संदेश देती है।
इस कविता पर अपनी राय या प्रतिक्रिया आप संपर्क फॉर्म से भेज सकते हैं या lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।
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क्या ये कोई ट्रेंड चल रहा है ? कि हर प्रोफेशनल रिलेशन में कई लोग व्यक्तिगत संबंध पाने की कोशिश करते हैं शायद उन्हें भ्रम है कि जो व्यक्तिगत रूप से जुड़ेगा वही उनका हित कर पायेगा, लेकिन वास्तविकता ये है कि संवेदनशील लोग सबका भला करते हैं वह उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़े हो या फिर व्यावसायिक रूप से जड़े हों, इसलिए बेहतर यह है कि हम अपना कार्य अच्छे से करें और अपने व्यावसायिक संबंधों को अच्छा रखें उसके बाद ही हम अपने अधिकारों पर बात करें तो उनकी सुनवाई अच्छे से होगी।
ऐसा देखा गया है कि चापलूसी प्रिय व्यक्ति लोगों के कार्यों की बजाय उनके व्यवहार और उनकी हां मे हां मिलाने की आदत पर ज्यादा ध्यान देते हैं, लेकिन यह एक गलत प्रथा है इससे गुणवत्ता प्रभावित होती है।
अगर हम अपने कार्य की गुणवत्ता और कार्य में ईमानदारी पर ध्यान देने की बजाय व्यक्तिगत रूप से लोगों को खुश करने के चक्कर में पड़ेंगे तो झूठी और सतही औपचारिकताओं, दबाव, समय की बर्बादी और धोखे का सामना करने की परिस्थिति बनाएंगे।
काम में गुणवत्ता की भावना को अपना जीवन मूल्य बनाएं।
- शुभकामनाएं
- लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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अक्सर लोगों को बात करते सुना है कि " दान तो हम भी करते हैं लेकिन बताते नहीं फिरते या वाट्सऐप स्टेटस नही लगाते! "
आज के बदलते परिदृश्य में जब आम इंसान स्व केंद्रित होता जा रहा और उसकी व्यक्तिगत चाह और आवश्यकताएं इतनी बढ़ती जा रही हैं कि दूसरों की तकलीफ़ या सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए उसके लिए समय पैसा या अन्य संसाधन निकाल पाना मुश्किल होता जा रहा है, तब ऐसी हालत में किसी इंसान की व्यक्तिगत मदद में उसकी गोपनीयता का सम्मान करते हुए, अन्य संस्थागत मामलों में सामाजिक सरोकार के किए गए कार्यों का निस्वार्थ प्रचार एक निंदनीय नहीं सराहनीय कार्य है, इससे अन्य लोग प्रेरित होंगे और अपने व्यक्तिगत समस्याओं के साथ सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए भी प्रयत्न करेंगे, यथा: रक्तदान, श्रमदान, संस्था को वित्तीय मदद, वस्त्रदान इत्यादि।
- आरती
लेखिका संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी साथ ही सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रहित के मामलों पर चिंतन उनकी दिनचर्या की प्राथमिकताओं में शामिल है।
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हाल ही में मैंने एक मूवी देखी - "धनक"
पता नहीं क्यों पर उस मूवी की शुरुआत से ही जो दिख रहा था उसे मैंने अलग तरीके से लिया।
परी उसमें मुझे ईश्वर की तरह लगती है और हम जैसा होता है उसका भाई। परी के भाई की आंखें नहीं होती और वो आँखों को पाना चाहता है, उसका आंखों को पाने का जो रास्ता है वो जिंदगी में किसी बड़े लक्ष्य को पाने का रास्ता है। जब हम जिंदगी में कुछ बड़ा पाना चाहते है तो सफर में कुछ लोग अच्छे साथी की तरह मिलते है, कुछ आगे का रास्ता बताते है कुछ उसमें बाधा भी डालते है। कुछ लोग हमें उन बाधाओं से निकालते भी है। जिससे हमारी बड़ी इच्छा पूरी हो जाए उसे हम ईश्वर जैसा मानने लगते है, इस फिल्म में शाहरुख खान अभिनीत पात्र वो ईश्वर है।
लेकिन जिंदगी में कभी कभी ठहरने का मन करता है जैसे वो शादी वाला घर था उस फिल्म में और कभी-कभी पैरों के नीचे तपती रेत हमें तेज चलने को मजबूर करती है।
उस फिल्म का हर पात्र कुछ देर में चला जाता है, ये हमें सिखाता है कि लोग सिर्फ हमें आगे के रास्ते के बारे में बताने के लिए ही आते है, पूरी जिंदगी के लिए एक स्थाई सहारा ईश्वर ही होते है, जैसे उसमें परी होती है,लेकिन कभी-कभी ईश्वर भी हमारी परीक्षा लेने के लिए हमारा साथ छोड़ देते है, जैसे उसे आंखे मिलने से पहले परी बेहोश हो जाती है और उसका छोटा भाई उसे उठाते हुए बेहोश हो जाता है, ईश्वर भी यही चाहते है कि हम अपनी आखिरी साँस तक लड़े फिर वही होगा जो सही होगा उसमें उस बच्चे को आंखें मिल जाती है, हमें हमारी सही मंजिल मिल जाएगी।
उसमें कई बार वो लड़की ऐसी जगह पहुँचती है जहां पर वो उस मुकाम को मंजिल समझ सकती थी जैसे शादी वाले घर में जब उसको और उसके भाई को हमेशा के लिए रखने की और उसकी शादी की बात होती है पर वो विनम्रता से मना कर देती है क्योंकि उसके लिए उसके भाई की आंखे ही जरूरी और पहली प्राथमिकता थी।इसी तरह से हमें जीवन में किसी मंजिल को पाने के लिए छोटे छोटे स्वार्थों को त्यागना होता है तब हम वो बड़ी चीज पाते है जिसकी हमने ज्वलंत इच्छा की थी।
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
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"क्या हुआ बेटा! तेरी आवाज क्यों काँप-सी रही है? जल्दी से बता.. हुआ क्या...?"
"माँ वो गिर गया था सुबह-सुबह...।"
"कैसे, कहाँ गिरा, ज्यादा लगी तो नहीं? डॉक्टर को दिखाया! क्या बताया डॉक्टर ने?"
" माँ ज्यादा तो नहीं लगी, पर डॉक्टर कह रहे थे कि माइनर ऑपरेशन करना पड़ेगा। नाक में भीतरी चोट है।"
"ऑपरेशन…ऽ..ऽ...!"
"अरे मम्मा, परेशान होने वाली बात नहीं है।"
"सुन, अभी मत कराना ऑपरेशन। मैं तुरन्त चलती हूँ, शाम तक पहुँच जाऊँगी।"
प्रभु को याद करती हुई मानसी फोन रखते ही रो पड़ी। तुरन्त ही बेटे के पास जाने की तैयारी में जुट गयी हबड़-तबड़।
अभी दो साल पहले ही मिक्कू के पैरों का ऑपरेशन हुआ था| बस में बैठ वह सोचने लगी- फिर दो-तीन बार और दुर्घटना हुई और अब ये नाक पर चोट! भगवान, तू इस तरह क्यों बार-बार परीक्षा ले रहा है मुझ गरीब की! सोचते-सोचते साड़ी के पल्लू से रास्ते भर अपने आँसू पोंछती रही वह।
घर पहुँचते ही मिक्कू को साथ ले, अस्पताल पहुँची। बरामदों तक में पड़े कराहते हुए, रोते और दर्द से तड़पते हुए मरीजों और उनके तीमारदारों को देख वह भौंचक रह गयी। उसने हँसते हुए उसके साथ चल रहे मिक्कू की ओर देखा। सोचने लगी- मुझे तो काजल की लकीर-सा हल्का धब्बा ही दिया प्रभु ने। इन सब मरीजों के जीवन में तो काली रात का अँधेरा भर रखा है। तू बड़ा दयालु है भगवान, यूँ ही कृपा बनाए रखना मुझ पर।
अपने आँसू पोंछ वह मुस्कराती हुई डॉक्टर की केबिन में घुस गई।
© सविता मिश्रा 'अक्षजा'
जन्म: 1 / 6 / 73, प्रयागराज
प्रकाशित कृतियाँ: 'रोशनी के अंकुर' एवं 'टूटती मर्यादा' लघुकथा संग्रह तथा ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह।
अनुवाद : 'अदहने क आखर' अवधी अनुबाद [लघुकथा-संकलन]
सम्पादन : 'खाकीधारी' 2024{लघुकथा संकलन} 'अदृश्य आँसू' 2025 {कहानी संकलन} 'किस्से खाकी के' 2025 {कहानी संकलन} 'उत्तर प्रदेश के कहानीकार' 2025 {कथाकोश}
पुरस्कार : लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य / कविता विधा में कई बार पुरस्कृत |
आकाशवाणी आगरा से कहानी प्रसारित
आदरणीय लेखिका के बारे में और इनकी अन्य रचनाओं, योगदान, सम्प्रतियों के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें|
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सान्निध्य कौतूहलवश, यथार्थ तुम इतना टाइप कैसे कर लेते हो?
तुम्हारी उंगलियों में दर्द नहीं होता !
यथार्थ (अपनी टाइपिंग लाइन पूरा करते हुए)- सान्निध्य, पहली बात तो यह काम मेरी रुचि का है, मुझे आर्टिकल, लघुकथा लिखना बहुत पसंद है।
दूसरी बात, मैंने लोगों को अक्सर समाज और सरकार की बुराइयाँ करते हुए सुना है, मैं उन शिकायतों से आगे बढ़कर काम करना चाहता हूँ, इसीलिए मैं बिना खाए भी ये काम निरंतर कुछ समय तक कर सकता हूँ, क्योंकि ये काम मुझे बहुत जरूरी लगता है और इस तरह मैं लोगों में संवेदनशीलता बढ़ाने के निमित्त कुछ प्रयास कर पा रहा हू और उन जरूरी बातों की तरफ ध्यान खींच रहा हूं लोगों का जिधर ध्यान जाना चाहिए।और ये काम इतना जरूरी लगता है कि थकान भी मुझे रोक नहीं पाती।
अब सानिध्य समझ चुका था कि यथार्थ समाज और सरकार के बारे में लोगों की शिकायतों पर इसी तरह खूब काम करके प्रतिक्रिया करता है।
-लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
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आलोक और विवेक, शाम को टहलते हुए,
आलोक - यार, विवेक बहुत कहानियाँ लिखी जा रही हैं आजकल, सबको ज्ञान दे ही दोगे लग रहा, बाकी सारे काम बंद कर दिए क्या? और आलोक हंसने लगता है।
विवेक मुस्कुराते हुए- हाँ, आलोक प्रयास तो ऐसा ही है, तुम तो आलोक कहीं डाल नहीं रहे हो, इसीलिए मैं ही ऐसा करने का प्रयास कर रहा हूं। (दोनों हंसने लगते है)
आलोक - अच्छा एक बात बताओ एक दिन में कितनी कहानियाँ लिख सकते हो?
विवेक - (मुस्कुराते हुए) लिखने को तो बहुत सी लिख दूँ, जिन मुद्दों पर लिखना है उनके नाम जेहन में हैं फिर भी अन्य काम भी है और जीविका भी तो चलानी है।
बात को आगे बढ़ाते हुए संयत होकर विवेक कहता है कि लिखने को तो एक दिन में 15 कहानी लिख दूँ अगर इस काम की महत्ता को दर्शाना हो। लेकिन अच्छा प्रदर्शन भी जरूरी है। पर कुछ मोटी बुद्धि के लोग सिर्फ संख्या देखकर ही महत्व समझते है,
©लवकुश कुमार
लेखक भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं,
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