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प्रोत्साहन का कमाल : उत्साह, आत्मविश्ववास और दक्षता बढ़ाने वाला

आज एक साथी से बात चल रही थी कि कैसे बड़ों द्वारा मिला प्रोत्साहन हमारी ऊर्जा बढ़ा देता है, आत्मविश्वास बढ़ा देता है इस तरह कि दिन बहुत बढ़िया जाता है |

अपने पुराने दिनो की बात याद करूँ तो एक दिन की बात है कि मेरे मामाजी जोकि वन विभाग मे अधिकारी थे उस समय, हमारे घर आए हुये थे अपने कुछ सहकर्मियों के साथ उस वक़्त मै ग्यारहवीं मे था, क्योंकि मेरे माता पिता सम्मान करते थे मामा जी का तो, उनकी बात का बड़ा महत्व था मेरे लिए या कह लीजिये कि मै अपने माता-पिता के चश्मे से से देखता था मै लोगों को, जैसा कि ज़्यादातर बच्चे करते हैं, मुद्दे कि बात पर आता हूँ, हुआ ये कि मैंने भौतिकी (वही विषय जिसमे मैंने बाद मे परास्नातक किया ) के ग्यारहवीं और बारहवीं दोनों (जी हाँ उस काल मे बोर्ड परीक्षा मे ग्यारहवीं और बारहवीं दोनों का पाठ्यक्रम आता था  ) के सूत्र को दो बड़े से चार्ट्स पर स्केच पेन से लिखकर बैठक कि दीवार पर लगा रखे थे, वही मेरे बैठने कि जगह थी,

जैसे ही मेरे मामा के सहकर्मी ने मेरे चार्ट्स पर कुछ टिप्पड़ी कि मेरे मामा ने तुरंत ये बात कही कि ये लड़का आगे चलकर आईएएस बनेगा, उस वक़्त मै आईएएस के बारे मे इतना जानता था कि ये उच्च स्तर कि प्रतियोगी परीक्षा से बनते हैं, वैसे मेरा उस वक़्त  आईएएस बनने के लिए पढ़ाई करने का कोई इरादा न था लेकिन क्योंकी बड़े मामा ने ये बात कही तो मै अपनी क्षमताओं को लेकर आश्वस्त हो गया कि मतलब दम और बुद्धि है मुझमे वैसी, हालांकि मै आईएएस तो नहीं बना लेकिन उस बढ़े हुये आत्मविश्वास के चलते अपना बेस्ट दे पाया हर उस काम मे जो मैंने अपने हांथ मे उठाया, बाकी चीज़ें तो समय और परिस्थिति पर निर्भर करती हैं लेकिन "अपनी क्षमताओं पर विश्वास हों बहुत जरूरी है अपना बेस्ट दे पाने और फोकस होकर काम कर पाने के लिए" |


ऐसे ही मेरे पापा के फुफेरे भाई जोकि एक बैंक मे प्रबन्धक थे मेरी नज़र मे सम्मानीय हैसियत रखते थे ने मेरे दसवीं के परीक्षा परिणाम को देखा और, मुझसे देश की आईआई टी पर बात कर रहे थे उस एक पल ने भी  मुझे अपनी क्षमताओं और योग्यताओं पर विश्वास दिलाया था हालांकि नीव बढ़िया न हो पाने और अन्य परिस्थितियाँ अनुकूल न होने के चलते मै ग्रेजुएशन के लिए आईआई टी मे प्रवेश न पा सका  और बाद मे पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए आईआई दिल्ली मे प्रवेश सुनिश्चित किया, ताऊ जी ने जो लायक होने का इशारा दिया उसने भरपूर रोल अदा किया 


ऐसे ही हमारे मुहल्ले के एक पत्रकार ताऊ जी ने मेरे दसवीं के रिज़ल्ट पर जो पूछताछ की थी मुझसे कि मै खुद को आम से खास मानने लगा था | 

बाल मन ठहरा, बचपन मे रिज़ल्ट के साथ मिली एक प्लेट भी बहुत माने रखती थी, पुरस्कार तो प्रतीक होते हैं उनका आकार और कीमत मायने नहीं रखती |


"यहाँ एक बात पाठकों के मन मे आ सकती है कि क्या सारा आत्मविश्वास दूसरों के बताने पर ही आया कि कुछ खुद का भी था, मै बताए देता हूँ कि खुद से भी विश्वास था कि जब मै पुस्तक के प्रश्न हल कर ले रहा हूँ या बीएचयू मे आए हुये पिछले साल के पेपर सॉल्व कर ले रहा हूँ  तो असल परीक्षा मे तो अच्छा करूंगा ही, और साथ मे मुझे अपने नियमित अभ्यास पर भी भरोसा था, लेकिन जब बड़े तारीफ करते हैं तो आश्वस्त हो जाते हैं आप क्योंकि आप कहीं भी रहो एक दो लोग ऐसे जरूर मिल जाते हैं जो छोटी छोटी सतही चीजों पर आपको नीचा महसूस कराते हैं और आत्मविश्वास को तोड़ने का प्रयास करते हैं, मेरे आस पास भी कुछ ऐसे लोग थे जो मुझे नीचा दिखाया करते थे केवल इस बात के लिए कि मै अपने पापा के काम मे हांथ बंटाने और स्कूल कोचिंग के अलावा दुनियादारी के बाकी पचड़ों मे इंटरेस्ट नहीं लेता था, भला ये भी कोई नीचा दिखाने की बात हुयी ! हाहाहाहा !


ऐसे ही एक बार अँग्रेजी के शिक्षक ने कहा था कि लवकुश तुम पत्रकार बन सकते हो छोटी सी बात को डीटेल मे लिख देते हो, back in the mind उनकी वो बात है कहीं |


मेरे एक करीबी दोस्त शुभांशु भाई के वहाँ जब भी जाना होता था तो उनके घर मे सब लोग बड़े आत्मीय तरीके से मिलते थे चाहे वो अंकल-आंटी लोग हों या दीदी लोग, अंकल पोस्ट ऑफिस मे अकाउंटेंट थे और मै अपने दोस्त और दीदी लोगों की समझ से हमेशा प्रभावित रहा, नतीजा उनका भी मुझे मान देना मेरी सेल्फ स्टीम को बढ़ाता रहा , इन मुलाकातों और रेकोग्निसन का अमूल्य योगदान होता  है मेरे जैसे किसी भी इंसान के जीवन मे |


सरकारी सेवा मे शामिल होने पर पहली तैनाती सिक्किम जैसे खूबसूरत प्रदेश मे हुयी वहाँ सर्विस के शुरुआती दिनो मे ही प्रभारी विज्ञानी द्वारा मेरे हर रिपोर्ट मे डिटेल्स को शामिल करने कि आदत को सराहा गया और मैंने और अधिक  मन ( माने ज्यादा समर्पण भाव से ) से अपना काम किया और प्रयास किया लोग मुझे मेरे व्यवहार से बाद मे मुझे मेरे काम से पहले याद रखें|


मेरे बाबा को भी मेरी पढ़ाई पर गर्व था और वो इसे व्यक्त भी करते थे नतीजा यही हुआ कि जो कुछ पाया और सीखा हूँ अपनी पढ़ाई के बल पर, ये आत्मनिर्भर जीवन भी, मेरी लाइफलाइन रहा है बड़ों से मिला प्रोत्साहन, सबको प्रणाम इस नेक कार्य के लिए जिसमे ज्यादा समय न लगा बस लगा तो दया के भाव से किसी के प्रयासों को देखना, आप जरूर प्रोत्साहित करें लोगों को उनके अच्छी नियत से किए गए कार्यों  के लिए | 


संस्कृत मे परास्नातक और शादी के बाद, हिन्दी मे परास्नातक कर रही आरती जी अपने बचपन को याद करती हुयी कहती हैं कि जब वो पढ़ने बैठती थीं तो उनकी लगन देखकर उनके पिता जी उन्हे शाबाशी देते और कहते कि तुम अच्छा करोगी और प्रोत्साहन के तौर पर क्लास से पहले ही काफी कुछ पढ़ा देते थे जिसने उन्हे और अधिक प्रोत्साहित किया पढ़ने को और हमेशा एक कदम आगे रहने के प्रयास को |


प्रशंसा के कमाल के संबंध मे इस वैबसाइट से जुड़ी हुयी कवयित्री, सौम्या गुप्ता जी अपने  अनुभव याद करते हुये कहती हैं कि

बचपन से ही मेरी पढाई को लेकर बहुत प्रशंसा हुई और मेरी मौसी, मेरे  मामा और  टीचर तक मेरी बहुत तारीफ करते थे क्योंकि टीचर्स के अथक प्रयास ( जिसमे मुझे मार भी खानी पड़ी हाहाहा !) मेरी Maths बहुत अच्छी हो गई थी।

मुझे भजन, सोहना देवीगीत, जिसे लोकगीत कहते है भी अच्छे से आते थे, मेरे भजन के कारण मेरी नानी और चाची, ताई ने भी बहुत तारीफ की।

एक तारीफ जिसका मेरे जीवन में बहुत ज्यादा महत्व है, मैं डा. विजय अग्रवाल सर के भेजे आर्टिकल को सारांश में बदलती हूँ, उन्होंने मुझे ये ये काम सौंपा उसके एक साल बाद तक मैं उनसे डांट सुनती रही क्योंकि मेरी हिंदी भाषा और आर्टिकल लिखने की शैली स्तरीय नहीं  थी। वो मेरे लिए Best teacher है उन्होंने भले डांटकर ही सही पर मुझे बहुत सिखाया, उन्होंने छोटी होली के दिन मेरे आर्टिकल पर “Excellent, इतना भेजा। Keep it up your hard work”  पूरे तीन दिन होली में मैं भले ही  दोस्तों से न मिल पायी, घर मे ही रही लेकिन सर की इतनी लाइन ही मेरी होली को खुशनुमा बनाने के लिए काफी थी क्योंकि आप जब खुश होते है तो खुश रहने के रास्ते बाहर नहीं खोजने पड़ते, बस अंदर ही आपके काम को लेकर खुशी आपको ऊर्जा देती रहती है 

मैंने अपनी लेखनी को विकसित करने के लिए डा. विजय अग्रवाल सर के भेजे गए लेखों को सारांशित किया, इसका फायदा मुझे आज तक मिल रहा है|


सौम्या जी आगे याद करती हुयी लिखती हैं कि एक प्रशंसा और आशीर्वाद जिसने उनके जीवन को बदल दिया, उनके शब्दों मे 

" एक बार मैंने प्रीति मैम को अपनी इच्छा को बताने के लिए एक कविता भेजी और उन्होने वो कविता अपने दोस्तों भी भेजी, जिसके लिए मुझे ma'am कि सर कि और उनके दोस्तों कि तरफ से खूब तारीफ मिली और मैंने उसके बाद अपने कविता लेखन को और बल दिया, 

ma'am मुझे पहले सिखाती है, न सीखने पर डांटती है, और फिर सीख लेने पर प्रशंसा  भी करती है, इस प्रशंसा को पाने के लिए मुझे हमेशा आत्मसुधार, आत्मचिंतन व मनन पर ध्यान देना होता है, जिससे बहुत सुधार हुआ है।

मेरी हिंदी व्याकरण की गलतियाँ, DP बनाते समय होने वाली गलतियाँ, यहाँ तक की मेरी सोच की सकारात्मकता के लिए सबसे ज्यादा योगदान उनका रहा है।


सौम्या जी इस बात पर ज़ोर देती हैं कि 

"प्रशंसा हमेशा सच्ची होनी चाहिए,सही काम के लिए होनी चाहिए। प्रशंसा से आत्म बल बढ़ना चाहिए पर प्रशंसा की चाह एक आदत नहीं होनी चाहिए। अगर आप कोई ऐसा काम कर रहे है जो बहुत जरूरी है और उसके लिए आपका अंतर्मन आपसे कह रहा हो तो उसे कोई भी प्रसंशा न मिलने पर भी करना चाहिए बस आपका काम समाज के हित में हो।"


इनकी एक कविता भी है प्रशंसा को लेकर जिसके माध्यम से इन्होने कई लोगों की आवाज को हम तक पहुंचाया है :

समाज के पैमाने पर 
सुंदरता की प्रशंसा पाने के लिए 
मैंने बहुत इच्छा की 
पर समाज को चाहिए 
गोरा रंग, आकर्षक काया 
इसीलिए कभी वो प्रशंसा 
मैं पा न सकीं 

फिर खुद को देखा मैंने 
खुद को संवारने की कोशिश छोड़कर 
ज्ञान पाने के लिए प्रयास किए 
छोड़ दी अपेक्षाएं उसकी प्रशंसा पाने की 
जो समय के साथ चला जाना है 
फिर पाया सच्चा ज्ञान और मिली सच्ची प्रशंसा 
जो शरीर की नहीं, थी मन की, ज्ञान की,
समाज के द्वारा नहीं, कुछ सच्चे लोगों से,
जो समझते है भौतिकता से आगे की बातें।


अगर आपके पास भी कोई कहानी है प्रोत्साहन से कमाल की तो लिख भेजिये हमे  नीचे दिए गए लिंक से क्या पता उसे पढ़कर कोई और भी प्रोत्साहित हो जाए और देश समाज या स्वयं के काम आ जाए | या फिर lovekush@lovekushchetna.in पर ईमेल कर दीजिये 

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लेख मे शामिल सभी लेखकों की तरफ से ढेरों शुभकामनायें

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भारत और विश्व के महान व्यक्तित्व -3

बच्चों को इन महान विभूतियों के बारें में पढ़ायें और उन्हें गुणवान तथा उच्च आदर्शों वाला इंसान बनाये, फिर वो ना छोटी बातों पर परेशान होंगे और ना ही छोटी बातों में फंसेंगे, फिर उनके उद्देश्य भी बड़े होएँगे और उनके काम में उत्कृष्टता दिखेगी और साथ ही वो दूसरों की दिक्कत के प्रति संवेदनशील भी होंगे और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाकर सही और त्वरित निर्णय ले पाएंगे |

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स्वयं भी पढ़ें और बच्चों के साथ प्रेरणादायक प्रसंग साझा करें |

1

टॉल्स्टॉय- मानव जीवन के भाष्यकार 

2

रानी दुर्गावती - स्वतंत्रता के लिए प्राण अर्पण करने वाली, युद्ध लड़ने वाली विरंगना

3

पंडित-मदन-मोहन-मालवीय : बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक

4

श्रीमती सरोजिनी नायडू - मातृभूमि की सच्ची सेविका

5

महारानी अहिल्याबाई - उदारता और महानता की प्रतिमूर्ति

6

स्वामी श्रद्धानंद  - भारतवर्ष के प्राचीन आदर्श,  गुरुकुल

7

कर्मयोगी केशवानंद - साधु- संन्यासियों

8

समर्थ गुरु रामदास - भक्ति और शक्ति के समन्वयी

9

वीर शिवाजी - शौर्य और धर्मनिष्ठा के प्रतीक

10

रवीन्द्र नाथ टैगोर - साहित्यिक ऋषि, नोबल पुरस्कार

11

  गुरु गोविंद सिंह- भक्ति और शौर्य के अमर साधक 

12

गणेश शंकर विद्यार्थी- त्याग और बलिदान के आराधक

13

देशबंधु चितरंजनदास - वकालत का अपूर्व आदर्श 

14

श्री विश्वेश्वरैया - स्वावलंबन द्वारा उच्च शिक्षा • सार्वजनिक लाभ के निर्माण कार्य जन जीवन में शिक्षा की महत्ता • राष्ट्रीय चरित्र का विकास, कैसा भी अवसर क्यों न हो, मनुष्य को अपना स्तर नहीं घटाना चाहिये ।। ऊँचा स्तर रखने से उसका प्रभाव अच्छा ही पड़ता है और आज नहीं तो कल लोग उसकी तरफ आकर्षित होते ही हैं

15

राजा राम मोहन राय - एक ब्रह्मोपासना का प्रचार

उन्नीसवीं सदी का समय भारतवर्ष के इतिहास में महान् परिवर्तनों का था 

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भारत और विश्व के महान व्यक्तित्व -2

बच्चों को इन महान विभूतियों के बारें में पढ़ायें और उन्हें गुणवान तथा उच्च आदर्शों वाला इंसान बनाये, फिर वो ना छोटी बातों पर परेशान होंगे और ना ही छोटी बातों में फंसेंगे, फिर उनके उद्देश्य भी बड़े होएँगे और उनके काम में उत्कृष्टता दिखेगी और साथ ही वो दूसरों की दिक्कत के प्रति संवेदनशील भी होंगे और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाकर सही और त्वरित निर्णय ले पाएंगे |

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स्वयं भी पढ़ें और बच्चों के साथ प्रेरणादायक प्रसंग साझा करें |

1

डॉ राजेंद्र प्रसाद - भारत के प्रथम राष्ट्रपति

2

गणेश शंकर विद्यार्थी - त्याग और बलिदान के आराधक

3

सेठ जमनलाल बजाज-एक और भामाशाह

4

कार्ल मार्क्स - दास कैपिटल के लेखक और प्रतिनिधित्व के हिमायती 

5

राष्ट्रमाता कस्तूरबा गांधी - भारतीय नारियों के लिए आदर्श 

6

महावीर स्वामी- अहिंसा और अपरिग्रह के प्रतीक (जैन सिद्धांत )

7

प्रफुल्ल चंद्र राय- विद्या और पदवी लोक कल्याण के उद्देश्य के लिए 

8

जगद्गुरु शंकराचार्य- अपनी माँ से कहते हैं सैकडो, लाखों माताओं की रक्षा, बालकों को अज्ञान और आडंबर के महापाप से बचाने के लिए यदि तुझे अपने बेटे का बलिदान करना पड़े, तो क्या तुझे प्रसन्नता नहीं होगी ?

9

स्वामी दयानंद सरस्वती - आर्य समाज की स्थापना 

10

महात्मा बुद्ध - बौद्ध धर्म की स्थापना - अप्पो दीपो भव

11

रानी लक्ष्मी बाई - आदर्श वीरांगना

12

बहन निवेदिता - भारतीय संस्कृति की अनन्य आराधिका

13

गुरुनानकदेव - व्यवहारिक अध्यात्मवाद, एक महान समाज सुधारक

14

स्वामी रामतीर्थ - व्यावहारिक वेदांत के प्रचारक, त्याग और तपस्या का विद्यार्थी जीवन, परोपकार की सक्रिय साधना

15

महायोगी अरविंद - नव जागरण के देवदूत

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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भारत और विश्व के महान व्यक्तित्व -1

बच्चों को इन महान विभूतियों के बारें में पढ़ायें और उन्हें गुणवान तथा उच्च आदर्शों वाला इंसान बनाये, फिर वो ना छोटी बातों पर परेशान होंगे और ना ही छोटी बातों में फंसेंगे, फिर उनके उद्देश्य भी बड़े होएँगे और उनके काम में उत्कृष्टता दिखेगी और साथ ही वो दूसरों की दिक्कत के प्रति संवेदनशील भी होंगे और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाकर सही और त्वरित निर्णय ले पाएंगे |

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1. होमी भाभा - नाभिकीय प्रोग्राम 
2. सी. वी. रमन ( रमन इ‌फेक्ट )- नोबेल पुरस्कार 
3. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम (मिसाइल मैन)
4. विक्रम साराभाई (अंतरिक्ष वैज्ञानिक)
5. Sardar V. Patel. (freedom fighter)
6. Subhas C. Bose (freedom fighter)
7. Jawahar lal Nehru (freedom fighter)
8. P.C. Ray 
9. श्री विश्वे श्वरैया बृहत भारत के विश्वकर्मा 
10. सेठ जमनालाल बजाज
11. महात्मा गाँधी  (वर्तमान जगत के युग पुरुष )
12.संत विनोबा भावे 
13. ईश्वर चन्द्र विद्यासागर सुधार तथा परोपकार के देवता
14. संत सुकरात (सेवा और सहिष्णुता के आदी) 

15. अब्राहम लिंकन - मानव समानाधिकार के सूत्रधार  

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अब्राहम लिंकन और अन्य के लिए लिंक

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मानव व्यवहार और समाज के सम्बन्ध में कुछ उक्तियां: भाग-3
  • जहाज अपने चारों तरफ के पानी के वजह से नहीं डूबा करते, जहाज पानी के अंदर समा जाने की वजह से डूबते हैं"
  • "मनुष्य होने और मनुष्य बनने के बीच का लंबा सफर ही जीवन है |"
  • "विचारपरक संकल्प स्वयं के शांतचित्त रहने का उत्प्रेरक है"
  •  "सरलता चरम परिष्करण है"
  • सामाजिक न्याय के बिना  आर्थिक समृद्धि निरर्थक है।
  • बिना आर्थिक समृद्धि के सामाजिक न्याय नहीं हो सकता किंतु बिना सामाजिक न्याय के आर्थिक समृद्धि हो सकती है |
  • सत् ही यथार्थ है और यथार्थ ही सत् है।"
  • "इच्छा रहित होने का दर्शन काल्पनिक आदर्श (यूटोपिया) है, जबकि भौतिकता माया है।"
  • "आपकी मेरे बारे में धारणा, आपकी सोच दर्शाती है; आपके प्रति मेरी प्रतिक्रिया, मेरा संस्कार है।"
  •  "शोध क्या है, ज्ञान के साथ एक अजनबी मुलाकात।" 
  • "पालना झूलाने वाले हाथों में ही संसार की बागडोर होती है।"
  •  "इतिहास स्वयं को दोहराता है, पहली बार एक त्रासदी के रूप में, दूसरी बार एक प्रहसन के रूप में।"
  • "सर्वोत्तम कार्यप्रणाली से बेहतर कार्यप्रणालियाँ भी होती हैं।"

स्रोत - यूपीएससी सिविल सेवा ( मुख्य परीक्षा निबंध के विषय  )

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मानव व्यवहार और समाज के सम्बन्ध में कुछ उक्तियां-भाग-२
  • अतीत' मानवीय चेतना तथा मूल्यों का स्थायी आयाम है 
  • एक अच्छा जीवन प्रेम से प्रेरित तथा ज्ञान से संचालित होता है
  • कहीं पर भी गरीबी हर जगह की समृद्धि के लिए खतरा है
  • जो समाज अपने सिद्धांतों के ऊपर अपने विशेषाधिकारों को महत्व देता है, वह दोनों से हाथ धो बैठता है
  • यथार्थ आदर्श के अनुरूप नहीं होता, बल्कि उसकी पुष्टि करता है
  • रूढ़िगत नैतिकता आधुनिक जीवन का मार्गदर्शक नहीं हो सकती
  • मूल्य वे नहीं जो मानवता है, बल्कि वे हैं जैसा मानवता को होना चाहिए
  • विवेक सत्य को खोज निकालता है
  • व्यक्ति के लिए जो सर्वश्रेष्ठ है, वह आवश्यक नहीं कि समाज के लिए भी हो
  • स्वीकारोक्ति का साहस और सुधार करने की निष्ठा सफलता के दो मंत्र

स्रोत - यूपीएससी  सिविल सेवा मुख्य परीक्षा- निबंध के विषय 

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मानव व्यवहार और समाज के सम्बन्ध में कुछ उक्तियां
  • किसी को अनुदान देने से, उसके काम मे हाथ बँटाना बेहतर है 
  • फुर्तीला किन्तु संतुलित व्यक्ति ही दौड़ मे विजयी होता है |
  • किसी संस्था का चरित्र चित्रण, उसके नेतृत्व मे प्रतिबिम्बित होता है |
  •   जो बदलाव आप दूसरों मे देखना चाहते हैं- पहले स्वयं मे लाइये – गांधी जी
  • अधिकार ( सत्ता ) बढने के साथ उत्तरदायित्व भी बढ़ जाता है |
  • शब्द दो-धारी तलवार से अधिक तीक्ष्ण होते हैं |
  • आवश्यकता लोभ की जननी है तथा लोभ का आधिक्य नस्लें बर्बाद करता है |
  • स्त्री पुरुषों के समान सरोकारों को शामिल किए बिना विकास संकटग्रस्त है |
  • राष्ट्र के भाग्य निर्माण का स्वरूप-निर्माण उसकी कक्षाओं मे होता है |
  • हम मानवीय नियमों का तो साहसपूर्वक सामना कर सकते हैं, परंतु प्रकृतिक नियमों का प्रतिरोध नहीं कर सकते |

 

 

स्रोत - यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा निबंध के विषय 

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पद बिना इज्ज़त - एक पहल

जिस दिन हम "तथाकथित" छोटे से छोटे पद वाले इंसान को भी इंसान समझकर उसकी गरिमा का सम्मान करते हुए मान देंगे उस दिन "तथाकथित" बड़े पद वाले लोगों के प्रति इनके मन से जलन कुछ कम हो जाएगी |

जैसे एक ड्राइवर भी चाहता है कि लोग उसे ड्राइवर नहीं उसके नाम से बुलाएँ जिसे उसके माता पिता ने बड़े प्यार से रखा होगा |

-लवकुश कुमार

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जो कुछ पापा सिखा गये |

आज 07/05/2025 को पापा की पुण्य तिथि है,

जो काम मै हर साल पापा की बरसी पर करता हूँ वो है उनकी उन बातों/सीख  को याद करना

जो या तो उन्होने कभी कहीं थी या ज़्यादातर अपने व्यवहार से परिलक्षित की थी

और मेरे खोजी मन ने उन्हे पकड़ लिया| 

आज सोंचा की क्यूँ न उन बातों को लिखकर एक लेख का रूप दे दूँ ताकि यदि मेरे जैसे ही किसी और

लवकुश को इन बातों और सीखों की जरूरत हो तो वो भी इन्हें अपने जीवन को दिशा देने के लिए अमल कर सके ,

अगर एक भी ऐसा इंसान जिसे ये बातें अपने जीवन को बेहतर और गरिमामय बनाने  मे मददगार साबित हो सकें

तो मै अपना लिखना सफल मानूँगा|

  1. जो सबसे पहली बात याद आती है वो उनकी ईमानदारी, जो कहते थे वही करते थे अपने व्यवहार और बातों मे अंतर न रखते थे, जो करना नहीं होता था उसका वादा नहीं करते थे |
  2. उनका मृदु व्यवहार, हर छोटे बड़े का हाल चाल लेना, उनके काम के बारे मे बात करना, कुशल-क्षेम पूछना, उनके इसी व्यवहार के चलते मुझे रिश्तों का ज्ञान हो गया था, जिनको वो चाचा कहते उनको मै बाबा कहता, जो उनको दादा कहे उन्हे मै चाचा/बुआ कहता|
  3. गलत का विरोध करना, उनके आस पास कुछ गलत हो रहा हो तो उसका विरोध करना |
  4. लोगों की दिक्कत पर उनके साथ खड़े रहना, पैसे/समय/साथ से उनकी हर संभव मदद करना |
  5. महत्वाकांक्षी थे लेकिन गलत रास्ता नहीं अपनाया |
  6. व्यापार के काम सिखाते थे लेकिन बीमारी के बावजूद भी मुझे मेरी इच्छा के विरुद्ध अपने काम मे न खींचा |
  7. पढे लिखें लोगों का उचित सम्मान करते थे, इसकी बदौलत पढे लिखे लोगों का मेरे घर आना जाना लगा रहा और मैं उनसे प्रभावित होकर, उनका सम्मान देख पढ़ाई मे अच्छा करने को लालयित रहा |
  8. पढ़ाईं मे मेरी लगन को देख उन्होने अपने व्यक्तिगत हित किनारे कर मुझे 12वीं के बाद पढ़ने महानगर भेजा|
  9. अपनी बीमारी को मेरी पढ़ाई मे बाधा न बनने दिया |
  10. गलती करके सीखने की गुंजाइश दी|
  11. संपत्ति को लेकर कभी भी स्वजनो से विवाद नहीं किया, शांति को उचित प्राथमिकता दी |
  12. अपने से बड़ों की सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया |
  13. बिना परिणाम की परवाह किए गलत के खिलाफ और कमजोर के समर्थन मे खड़े हुये |
  14. घर से बाहर निकल, नए लोगों को जानने और देश दुनिया को देखने समझने को प्रेरित किया |
  15. सबके साथ प्रेमवत रहने की प्रेरणा दी और कभी अपने पराए की भावना मन मे न आने दी |
  16. सस्ती होने पर भी गैर जरूरी चीजों को इकठ्ठा न करने की सलाह दी |
  17. कहने से ज्यादा सुनना और समझना सिखाया |
  18. हर काम को बेहतरीन तरीके से करने की प्रेरणा दी |
  19. आत्मनिर्भर होने की सीख दी |
  20. बिना लाग लपेट के सीधी और साफ बात रखने पर ज़ोर दिया |
  21. अपने से छोटों के प्रति संरक्षक का भाव रखने का उदाहरण बने |
  22. हमेशा प्रयास किया की उनके प्रयास से किसी का रुका हुआ काम बन सके |  

पापा एक व्यापारी थेबात के पक्के व्यापारीअसहायों के मददगार और रखवाले

मृत्यु शय्या पर लेटा व्यक्ति क्या इच्छा जाहिर कर सकता है ?

पापा ने ये इच्छाएँ जाहिर की:

  1. लवकुश को अधिकारी बना देना
  2. छोटी बहन की अच्छी जगह शादी कर देना
  3. अपनी माता और छोटे भाई का ख्याल रखना

इन इच्छाओं पर गौर करने वाला कौन था स्वयं मै (लवकुश कुमार), पापा ने जो समझ, ज़िम्मेदारी लेने की स्वीकार्यता और स्पष्टता दी उसकी बदौलत आज भारत सरकार मे समूह ख का अराजपत्रित अधिकारी हूँ, आगे की यात्रा जारी है,

बहन भी अपने दाम्पत्य जीवन मे खुश है, माता जी का आशीर्वाद बना है और अनुज भी अभियांत्रिकी मे स्नातक की उपाधि के बाद अपने कौशल और समझ के दम पर अपने लिए कर्मभूमि तैयार करने मे लगा है |

जब तक जीवित रहा और कुछ भी करूँगा, पापा द्वारा दी गयी  परवरिश याद रहेगी|

श्रद्धांजलि...

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सही काम, हर हालत में।

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