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अभी हाल ही में अपने देश के एक विश्वविद्यालय से दुखी करने वाली खबर आई कि इंजीनियरिंग के पहले वर्ष के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली और तथाकथित रूप से उसने अपने स्यूसाइड नोट में इसका कारण अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई के चलते आने वाली दिक्कतों को बताया!
युवा और पढ़ाई, ऐसी ही कुछ खबरें राजस्थान के कोटा से भी आयीं थी कुछ वक़्त पहले कि वहाँ अध्ययनरत कुछ बच्चे पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव और सामाजिक दबाव के चलते अवसाद का शिकार हुये और उनमे से कुछ ने आत्महत्या जैसे दुखद कदम उठा लिए |
इन दुखद खबरों के बीच कुछ सवाल हैं, जिन पर मेरी नजर में विचार करना जरूरी हो जाता है हर उस जिम्मेदार इंसान के लिए जो या तो अभिभावक है, या इस देश के भविष्य की चिंता करने वाला नागरिक या खुद कोई युवा, कोई विद्यार्थी |
उन्हे अपने माता पिता और प्रियजनों की इतनी चिंता तो होती है कि स्यूसाइड नोट छोड़ जाते हैं लेकिन खुद के जीवन से इतना निराश क्यों हो जाते हैं ?
कहीं ऐसा तो नहीं कि दुनिया को इतनी ज्यादा अहमियत दे देते हैं कि उसका सामना नहीं कर पाते ! और स्वयं कि असीम संभावना को भूल जीवन को खत्म कर लेते हैं |
कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने अपनी आज़ादी को चाहने वाली चेतना के बजाय लोगों द्वारा हमे दिये गए सर्टिफिकेट को ज्यादा मान दे दिया है ! हमारे उपनिषद और आध्यात्मिक साहित्य हमसे कहते हैं कि जीवन का मुख्य उद्देश्य है डर, लालच और मोह से मुक्ति है लेकिन ये क्या हमने मुक्ति कि तरफ बढ्ने के बजाय खुद को और ज्यादा बांध लिया लोगों कि हमसे अपेक्षाओं से और लोगों को अधिकार दे दिया कि वो हमारा आंकलन करें सतही चीजों पर !
किसी भी इंसान का आंकलन केवल एक बात पर हो कि उसके जीवन मे सच्चाई का क्या स्थान है, रही बात परीक्षा मे परिणाम कि तो उसमे ये हमारा व्यक्तिगत निर्णय होना चाहिए कि हम अपनी जीविका ( जो आत्मनिर्भरता और उत्कृष्टता का साधन है ) के लिए कौन सा काम चुनना चाहते हैं, इसमे ये नहीं होना चाहिए कि दुनिया वाले ज्यादा मान किस काम को देते हैं, दुनिया को ज्यादा मान देने से बचो,
इस बड़ी सी दुनिया मे हर तरह के लोग हैं, बाहरी दिखावा देख प्रभावित होने वाले (मोटी बुद्धि के लोग) और आपके काम की उत्कृष्टता और आपके जीवन मे सच्चाई की स्थान देखने वाले गहरी दृष्टि के लोग भी, इसीलिए काम ऐसा चुनिये जिसमे डूबने का दिल करे, जिसे आप कम पैसे या बिना पैसे मिले भी कर सको फिर फर्क ही नहीं पड़ता कि दुनिया वाले तारीफ कर रहे या नहीं, अगर आपका काम वाकई दुनिया के कुछ लोगों के भी काम का है तो आप न भूखे रहोगे और नहीं गुमनाम, काम मे मज़ा आपको आ ही रही, बाकी रही बात अन्य जरूरतों कि तो वो भी पूरी ही जानी है, पहली जरूरत तो उत्कृष्टता और आज़ादी ही है, रोटी कि व्यवस्था हो जाती है अगर आप वो काम कर रहे जो दुनिया के मतलब का है, बाकी उस काम को आप कितना महत्व दिलवा पाते हो ये भी आपकी काबिलियत है |
"पेशे से बैंककर्मी अंशिङ्का शर्मा जी कहती हैं कि जीवन आपका है इसके इन-चार्ज आप खुद हो, इसे एक उपयोगी काम मे लगाकर खुद को उत्कृष्टता और आत्मनिर्भरता की मंजिल तक ले जाने का जिम्मा आपका है, लोगों के अनावश्यक सवालों के जवाब देने कि जरूरत नहीं, जरूरत है होश मे काम चुनकर उसमे सही मेहनत करने की |"
-----------------अंशिङ्का शर्मा जी की शैक्षिक पृष्ठभूमि इंजीनियरिंग की है और वह पेशे से बैंककर्मी हैं |
नहीं, बस जरूरत है इसे समय देकर सीखने की, मेहनत करने की |
अमूमन ऐसा देखा गया है कि बारहवीं तक हिन्दी या अन्य माध्यम के जो बच्चे बारहवीं के बाद अँग्रेजी माध्यम वाले कोर्स मे दाखिला लेते ही अँग्रेजी से आतंकित हो जाते हैं उनकी अँग्रेजी और उस विषय दोनों की समझ उस स्तर कि नहीं होती कि वह विषय वो अँग्रेजी मे समझ सकें इसका एक उपाय ये हो सकता है कि अगर ऐसे बच्चे बारहवीं के बाद अँग्रेजी माध्यम मे पढ़ाई को इच्छुक हैं तो पहले ही अपनी अँग्रेजी पर पकड़ को शॉर्ट स्टोरीज की किताब से और उस विषय की महत्वपूर्ण परिभाषाओं और शब्दों का अँग्रेजी रूपान्तरण साथ मे ही मजबूत करें ताकि बारहवीं के बाद अचानक बोझ न बने और इसके बाद भी अगर कक्षा मे दिक्कत आए तो अपने शिक्षक को अपनी दिक्कत से अवगत कराएं और उनसे मदद मांगे और शिक्षक भी संवेदनशीलता के साथ इस देश के कर्णधार हमारे युवाओं की दिक्कत को समझते हुये उचित व्यवस्था और उपाय करें, लेकिन किसी भी हालत अँग्रेजी या कोई भी विषय न आने पर खुद को हीन न माने, मै फिर इस बात को दोहराता हूँ कि आपकी महत्ता आपकी विषय विशेषज्ञता से नहीं आपके जीवन मे सच्चाई और आपकी आत्मनिर्भरता से होनी है इसीलिए किसी को अधिकार न दें आपको नीचा या इंफीरियर महसूस करने का जब तक आपके जीवन मे सच्चाई और आत्मनिर्भरता है आप ठसक से सीना तानकर चलिये, अपने पैरों पर खड़े हो सकें इसके लिए कोई काम सीखें, कोई ज्ञान हंसिल करें, परंपरागत या गैर परंपरागत इस नेक काम के लिए किसी कि मदद लेनी पड़े तो संकोच न करें, माता-पिता भी बच्चों को ज्ञानवान और काबिल बनाने के लिए पूरे प्रयत्न करें लेकिन दबाव न बनाए बच्चे पर कोई ऐसा कोर्स करने पर जिसमे उसे रुचि न हो, जो कुछ अभिभावक जानते हैं वो बच्चे को जरूर बताएं, फायदे नुकसान, तथ्यों के साथ और इस तरह मदद करें उसकी सही डिसीजन लेने मे और रखेँ गुंजाइश इस बात की कि उनका बच्चा अपनी असहजता पर खुलकर बोल सके,
“हमें लोगों की नजर में नहीं स्वयं कि नज़र मे ऊंचा उठने की जरूरत है सच्चाई और एक सीमा के बाद के आत्मनिर्भरता लाकर “
“लोग तो अपनी जरूरत और मूड के हिसाब से मान देते हैं ऐसे मान को मान नहीं भी दोगे तो चलेगा लेकिन जीवन मे ईमानदारी रखना, न स्वयं से और न ही दूसरों से कोई झूठ, सच बोलिए चीजों को बेहतर व्यक्त करना सीखिये अभ्यास और विश्लेषण से |”
हम सबके भीतर दिव्यता है अपने काम मे उत्कृष्टता लाकर उसे मैनीफेस्ट कीजिये, “जो आनंद काम को बेहतर तरीके से करने, और तकलीफ मे या वाकई के जरूरतमंद जीव की मदद मे है वो बड़े बड़े मनोरंजन मे नहीं |”
जीवन मे अफसोस कि सिचुएशन से बचा जा सकता है पहला तो चीजों को गहराई मे समझ कर और खुद के लिए कुछ भी चुनने से पहले दूसरों की नकल करने के बजाय पहले खुद को फिर खुद कि असली जरूरतों को जानकार और निर्णय के आधार मे सच्चाई को रखकर नकि कोई डर या लालच को रखकर |
जब जरूरत हो कोई इंसान चुनने कि तब उस इंसान से जीवन कि गहराई पर बात कर लें, अगर उस इंसान मे जीवन को गहराई से समझने का रुझान होगा तो वो आपके साथ रिश्ते मे भी गहराई ल पाएगा/पाएगी |
- लवकुश कुमार, भौतिकी मे परास्नातक हैं और सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन अपना दायित्व समझते हैं और दृढ़ विश्वास रखते हैं कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं :-
उनके शब्दों मे :
तीसरा प्रमुख कारण है बढ़ता भौतिकवाद -> ऐसा देखने को मिला है कि कुछ लोगों द्वारा आज संतोष और शांति जैसे मूल्यों को बहुत नकारात्मकता के साथ लिया जाता है, और ऐसे लोगों को संख्या संक्रामक रोग की तरह तेजी से बढ़ रही है। अगर हम अपनी सच्ची जरूरतों की बात करे तो वो है रोटी, कपड़ा, मकान, ज्ञान ( इंटरनेट/ किताबें )। इन जरूरतों के लिए हमें करोड़ो - लाखों के पैकेज की जरूरत नहीं होती। हाँ लेकिन अगर आप इतने महत्वाकांक्षी हैं कि स्वयं की आज़ादी और जीवन मे सच्चाई से ज्यादा बाहरी सम्मान को ही सब कुछ समझते हैं तो ये अवसाद का एक कारण बन जाता है। अन्यथा भारतीय चेतना हमेशा से ही इतना चाहती है कि आत्मनिर्भता, सचाई और ईमानदारी बनी रहे जीवन मे और हम अच्छे से जीवन यापन कर सके।
आज के संदर्भ में कहीं इसका सबसे बड़ा कारण हमारे हाथ में छोटी सी device मोबाइल का होना और फिर इस पर अत्यधिक निर्भरता तो नहीं ? इसी मोबाइल की वजह से आज न हमारे पास अपने साथ के लोगों के साथ बैठ चर्चा का समय है और न ही चीजों को सूक्ष्मता मे देख पाने का धैर्य, बस लगें हैं सतही मनोरंजन मे और उस ज्ञान को पाने मे जो चार लोगों के बीच शेखी बघारने मे तो काम आ सकता है लेकिन असल जीवन और कार्यक्षेत्र मे किसी काम का नहीं | नतीजा ये कि जब उच्च साहित्य से संपर्क नहीं रहा तो हमारी संवेदनशीलता भी कम हो गयी और हम दूसरों की तकलीफ के प्रति कम संवेदनशील हो गए इसीलिए उन्हे हल करने के प्रयास भी कम हो गए और दूसरों कि तकलीफ कम करके जो आनंद मिलता है उससे भी हम अछूते रह गए, पास क्या रह गया उथला मनोरंजन !
दूसरा ये कि वो ये जान पाएंगे कि जीवन का असली और टिकाऊ आनंद है अपने काम की उत्कृष्टता और जरूरतमंद लोगों के लिए काम करना है, लोगों का जीवन आसान और सुविधाजनक हो सके इसके लिए काम करने मे, लोगों के जीवन मे गरिमा, बंधुता और आत्मनिर्भरता के लिए काम करने मे है |
बाजारवाद और वाणिज्यवाद आजकल के जीवन में कई तरह के नुकसान लाते हैं। ये हमें भौतिक सुखों के पीछे भागने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे हम अपनी असली ज़रूरतों और मूल्यों से दूर हो जाते हैं। अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा और असमानता बढ़ती है, जिससे सामाजिक तनाव और असंतोष पैदा होता है। इसके अलावा, ये हमारी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालते हैं, क्योंकि हम लगातार दूसरों से तुलना करते रहते हैं और तनाव में जीते हैं।
मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग कई नकारात्मक प्रभाव डालता है। यह हमारी नींद को बाधित करता है, जिससे थकान और एकाग्रता की कमी होती है। सोशल मीडिया और अन्य ऐप्स पर लगातार लगे रहने से हमारा ध्यान भटकता है और हम वास्तविक दुनिया से कट जाते हैं। शारीरिक निष्क्रियता और आंखों की समस्याएँ भी बढ़ती हैं। इसके अलावा, मोबाइल फोन की लत हमें सामाजिक रूप से अलग कर सकती है और हमारी अन्य लोगों के साथ तालमेल बैठा पाने कि क्षमता को प्रभावित कर सकती है जिससे तनाव आ सकता है जो हमारे सोंचने समझने की क्षमता ओर नकारात्मक प्रभाव डालता है और हम घातक कदम उठाने कि तरफ बढ़ सकते हैं |
आध्यात्मिकता हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह हमें आंतरिक शांति, संतोष और उद्देश्य की भावना प्रदान करती है। यह हमें तनाव और चिंता से दूर रहने में मदद करता है, जिससे हमारी मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है। आध्यात्मिकता हमें नैतिक मूल्यों और सही-गलत की समझ देती है, जिससे हम बेहतर इंसान बनते हैं। यह हमें दूसरों के प्रति सहानुभूति और दयालुता विकसित करने में भी मदद करता है, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं।
आप एक बार अपना सच्चा विश्लेषण कीजिए कि आपके हाथों में मोबाइल है ? या आप मोबाइल के हाथों में है ?आप 24 घंटे के लिए अपना मोवाइल Switch off करके रख दीजिए और उस समय अपने मस्तिष्क पर प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
दयानंद सरस्वती ने कहा था 'वेदों की और लौटो', आप सीधे वेद नहीं पढ़ पा रहे तो कम से कम अन्य सरलीकृत आध्यात्मिक साहित्य से (गायत्री परिवार वैबसाइट लिंक) अध्यात्म को जान लीजिए। इंटरनेट पर ब्रम्हाकुमारी, गायत्री परिवार जैसे बहुत से संस्थानों के प्रोग्राम आते है, आप उनसे सीख सकते है।
आप महात्वाकांक्षी बनिए। लेकिन टार्गेट मे इस दुनिया की किसी चीज के बजाय सबसे पहले उत्कृष्टता, ईमानदारी और आत्मनिर्भरता को रखिए, इतना कर लेने के बाद आपको एहसास हो जाएगा कि दुनिया मे ऐसा बहुत कुछ या कहिए ज़्यादातर चीज़ें ऐसी हैं जिनको टैस्ट करने या हांसिल करने की बिलकुल भी जरूरत नहीं हैं |
न ही जरूरत से ज्यादा पाने की आशा रखिए। महत्व देना है तो चेतना को दीजिए, शरीर को नहीं। जरूरी नहीं है कि बाजारवाद के नाम पर आपको जो परोसा जाए वो सब आप कंज्यूम ही कर लें |
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ सामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन की आदत भी रखती हैं |
इस आशा के साथ कि यह लेख पाठकों को स्पष्टता देगा|
बातों को तर्क और व्यावहारिकता की कसौटी पर परखें और संतुष्ट होने पर ही लागू करें |
शुभकामनाओं के साथ |
जैसे कई कड़ियों वाली एक सीकड़ की मजबूती या कमजोरी का एहसास उस वक़्त होता है जब उससे एक वजनदार चीज़ लटकाई जाती है, यहाँ पर एक बात ध्यान देने वाली है कि कोई chain उतनी ही मजबूत मानी जाती है जितनी कि उसकी सबसे कमजोर कड़ी |
इस संसार और तंत्र की व्यवस्था मे जो खामियाँ हैं ये उन लोगों को पहले दिखती हैं जो इनसे दो चार होते होते हैं, या जिनका कठिन समय चल रहा होता है| वहीं जिनका समय सुखद चल रहा होता है उन्हे लगता है कि सब कुछ सही चल रहा है, सब चंगा सी |
उद्दहरण के लिए दहेज व्यवस्था से ऐसे लोगों को बिलकुल भी परहेज नही दिखता जिनके पास खूब पैसा है, इस प्रथा कि मार तो वो झेलता है जिसके पास रोटी कपड़े की ही कमाई बड़ी मुश्किल से हो पाती है, ऐसा इंसान एक तनाव मे रहता है और फिर हम शिकायत करते हैं कि लोग प्रेम से क्यों नहीं बात करते !
पहले तो इंसान ऊपरी मानक यथा, शक्ल, पहनावा और दिखावा देखकर रिश्ता बनाता है, दुख कि घड़ी मे जब साथ नहीं मिलता तो कहता कि लोग बड़े मतलबी हैं लेकिन कम ही हैं वो लोग जो अपनी पसंद के आधार को टटोलते हैं|
एक दूसरे को खुश रखने और रिश्ते को बनाए रखने के लिए लोग खूब एक दूसरे कि हाँ मे हाँ मे मिलाते हैं और गलत बातों का भी समर्थन कर देते हैं और इस आदत को वो समझदारी और आज के समय कि जरूरत बोलते हैं लेकिन जब उन्हे लंबे वक़्त तक कोई झूठ के अंधेरे मे रखे तब उन्हे इस सिस्टम की खामी नज़र आती है और वो कहते हैं की लोग बड़े झूठे हैं !
किसी भी समस्या कि सबसे बड़ी मार हमेशा कमजोर तबके के लोगों को ही पड़ती है, जलवायु परिवर्तन के चलते गर्मी का प्रकोप सबसे ज्यादा धूप मे काम करने वाले लोगों को पड़ता है न कि उन्हे जिनके घर भी वातानुकूलित हैं, घर के बाहर कार, कार्यालय और रेस्तरां भी |
उद्दहरण बहुत से हैं खुद का अवलोकन करने की जरूरत हैं, खुद पर नज़र रखने की जरूरत है कि हम कहाँ पर झूठ बोल रहे हैं ?
बच्चों को इन महान विभूतियों के बारें में पढ़ायें और उन्हें गुणवान तथा उच्च आदर्शों वाला इंसान बनाये, फिर वो ना छोटी बातों पर परेशान होंगे और ना ही छोटी बातों में फंसेंगे, फिर उनके उद्देश्य भी बड़े होएँगे और उनके काम में उत्कृष्टता दिखेगी और साथ ही वो दूसरों की दिक्कत के प्रति संवेदनशील भी होंगे और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाकर सही और त्वरित निर्णय ले पाएंगे |
अच्छा हो कि इनकी जीवनी पर आधारित पुस्तकें एक डिस्प्ले रैक में लगा दें बच्चों के अध्ययन कक्ष में |

1. होमी भाभा - नाभिकीय प्रोग्राम
2. सी. वी. रमन ( रमन इफेक्ट )- नोबेल पुरस्कार
3. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम (मिसाइल मैन)
4. विक्रम साराभाई (अंतरिक्ष वैज्ञानिक)
5. Sardar V. Patel. (freedom fighter)
6. Subhas C. Bose (freedom fighter)
7. Jawahar lal Nehru (freedom fighter)
8. P.C. Ray
9. श्री विश्वे श्वरैया बृहत भारत के विश्वकर्मा
10. सेठ जमनालाल बजाज
11. महात्मा गाँधी (वर्तमान जगत के युग पुरुष )
12.संत विनोबा भावे
13. ईश्वर चन्द्र विद्यासागर सुधार तथा परोपकार के देवता
14. संत सुकरात (सेवा और सहिष्णुता के आदी)
15. अब्राहम लिंकन - मानव समानाधिकार के सूत्रधार
इन जीवनियों को आप किफायती लागत में गायत्री परिवार की वेबसाइट से भी प्राप्त कर सकते हैं |
1. विद्युत क्षेत्र में किसी भी बिंदु पर विद्युत विभव, प्रति इकाई धनात्मक परीक्षण आवेश को ...................................... से उस बिंदु तक बिना
त्वरण के विद्युत बल के विरुद्ध लाने में किए गए कार्य के बराबर होता है।
2. विद्युत विभव एक अवस्था-निर्भर फलन है अर्थात इसका मान इस बात पर निर्भर करता है कि उस बिन्दु कि ..............क्या है जिस पर हमे विद्युत विभव ज्ञात करना है |
3. विद्युत बल ...............................बल होते हैं। (संरक्षी/असंरक्षी)
4. विद्युत क्षेत्र में दो बिंदुओं के बीच विद्युत विभवांतर (अर्थात विद्युत क्षेत्र में दो बिंदुओं के विद्युत विभवों का अंतर)को एक ...........................धनात्मक परीक्षण आवेश को बिना किसी त्वरण के विद्युत बल के विरुद्ध एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में किए गए कार्य के रूप में परिभाषित किया जाता है|
5. चूँकि किसी दिए गए आवेश विन्यास के कारण विद्युत क्षेत्र द्वारा परीक्षण आवेश पर किया गया कार्य पथ से स्वतंत्र
होता है, इसलिए विभवांतर भी किसी भी पथ के लिए ...........................होता है।
6. किसी बिंदु पर धनात्मक आवेश के कारण विभव धनात्मक होता है जबकि ऋणात्मक आवेश के कारण यह....................... होता है।
7. जब किसी धनात्मक आवेश को विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है, तो यह एक बल का अनुभव करता है जो इसे उच्च विभव
वाले बिंदुओं से निम्न विभव वाले बिंदुओं की ओर ले जाता है। दूसरी ओर, एक ऋणात्मक आवेश एक बल का अनुभव
करता है जो इसे ...............विभव से .....................विभव की ओर ले जाता है।
8. विद्युत द्विध्रुव के कारण लंबवत द्विभाजक पर वैद्युत विभव ............................होता है।
9. वह पृष्ठ जिसके प्रत्येक बिंदु पर ..........................वैद्युत विभव होता है, समविभव पृष्ठ कहलाता है।
10. (i) रेखीय आवेश के कारण समविभव पृष्ठ का आकार ............... होता है। (ii) जबकि बिंदु आवेश के कारण यह ....................होता है।
समविभव पृष्ठ के गुण
11. (a) समविभव पृष्ठ एक दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करते क्योंकि यह प्रतिच्छेद बिंदु पर विद्युत क्षेत्र E की दो दिशाएँ देता
है जो ............................नहीं है।
(b) समविभव पृष्ठ प्रबल विद्युत क्षेत्र के क्षेत्र में ...............................दूरी पर होते हैं
(c) विद्युत क्षेत्र सदैव समविभव पृष्ठ के प्रत्येक बिंदु पर ................................होता है तथा उच्च विभव वाले एक समविभव पृष्ठ से निम्न विभव
वाले समविभव पृष्ठ की ओर निर्देशित होता है।
(d) परीक्षण आवेश को समविभव पृष्ठ के एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में किया गया कार्य ......................होता है।
(e) विद्युत क्षेत्र की दिशा ................विभव से ...................विभव की ओर होती है, अर्थात विभव घटने की दिशा में।
12. विद्युत क्षेत्र उस दिशा में होता है जिस दिशा में विभव सबसे अधिक तेजी से ...................है।
14. स्थिरवैद्युत स्थितिज ऊर्जा स्थिरवैद्युत बल के विरुद्ध किया गया कार्य, स्थितिज ऊर्जा के रूप में संग्रहित हो जाता है। इसे स्थिरवैद्युत स्थितिज ऊर्जा कहते हैं।
15. विद्युत क्षेत्र में एक इकाई धनात्मक परीक्षण आवेश को एक बंद पथ (closed लूप) पर गति कराने में किया गया कार्य शून्य होता है।
इस प्रकार, स्थिरवैद्युत बल संरक्षी प्रकृति के होते हैं।
16.एकसमान विद्युत क्षेत्र E में एक द्विध्रुव की स्थितिज ऊर्जा निम्न प्रकार से दी जाती है: स्थितिज ऊर्जा = -p ECosØ
17. वह प्रक्रिया जिसमें किसी क्षेत्र को किसी विद्युत क्षेत्र से मुक्त (E= 0) बनाना शामिल होता है, इलेक्ट्रोस्टैटिक परिरक्षण (electrostatic shielding)के रूप में जानी जाती है।
उत्तर :
1.अनंत 2. स्थिति 3. संरक्षी 4. इकाई 5. समान 6. ऋणात्मक 7. निम्न, उच्च 8. शून्य 9. समान 10.बेलनाकार, गोलाकार 11a.संभव 11b निकट 11c अभिलंबवत 11d शून्य 11e उच्च, निम्न 12. घटता
ऐसा नहीं है, अध्यात्म न तो पैसा कमाने से रोकता है और न ही एक समृद्ध जीवन जीने से।
बल्कि अध्यात्म में तो इंसान एक समृद्ध और संतुलित जीवन के लिए पूरे प्रयत्न करता है।
अध्यात्म तो बस खुद पर नजर रखने को कहता है, होश में आने को कहता है।
अध्यात्म कहता है कि जितना जरूरी पैसा कमाना है उतना ही कमाएं और पैसे कमाने के लिए ऐसे रास्ते अपनाएं जिनसे विश्व व्यवस्था मे लोगों की आज़ादी बनी रहे, किसी का शोषण न हो और किसी के साथ छल न हो, लोग सच्चाई के प्रकाश मे रहें और उन्हे झूठ के अंधेरे मे न रखा जाए उन्हे उथली खुशी न बेंची जाए |
व्यक्ति की गरिमा और बंधुत्व बना रहे और साथ देश और व्यक्ति की स्वतन्त्रता भी |
हर समय, हर काल में कोई न कोई दिक्कत या संघर्ष रहता है, लेकिन अगर वो कोई बहुत बड़ी दुर्घटना न हो तो समय का मलहम उसे भुला देता है और कालांतर मे रह जाती हैं केवल सुखद स्मृतियाँ |
गरिमा सुरक्षित रही तो भूतकाल परेशान नहीं करता, अंत भला तो सब भला |
1.विस्थापन धारा वह धारा है जो उस क्षेत्र में कार्य करती है जिसमें ........................... क्षेत्र समय के साथ बदल
रहे हैं।
2. परिवर्तनशील विद्युत क्षेत्र ............................................... क्षेत्र का स्रोत है।
3. एक विद्युत चुम्बकीय तरंग एक त्वरित या दोलनशील आवेश द्वारा विकीर्ण की गई तरंग होती है
जिसमें परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र विद्युत क्षेत्र का स्रोत होता है और परिवर्तनशील विद्युत क्षेत्र चुंबकीय क्षेत्र का स्रोत
होता है। इस प्रकार दो क्षेत्र एक दूसरे के स्रोत बन जाते हैं और तरंग दोनों क्षेत्रों के .................................. दिशा में प्रसारित होती है।
4. विद्युत चुम्बकीय तरंगें प्रकृति में अनुप्रस्थ होती हैं, अर्थात विद्युत और चुंबकीय क्षेत्र एक दूसरे के ...................................होते हैं और
तरंग प्रसार की दिशा के ........................... होते हैं
5. विद्युत चुम्बकीय तरंगों में ऊर्जा, औसतन विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों के बीच .......................रूप से विभाजित होती है।
6. रेखीय संवेग, p= U/c, जहाँ U = विद्युत चुम्बकीय तरंगों द्वारा प्रेषित कुल ऊर्जा और c = ...................................।
7. विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम: आवृत्ति या तरंगदैर्घ्य के आरोही या अवरोही क्रम में विद्युत चुम्बकीय तरंगों के व्यवस्थित
अनुक्रमिक वितरण को विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम कहते हैं। इसकी सीमा γ-किरणों से लेकर ............................तरंगों तक होती है।
8. विद्युत चुम्बकीय तरंगों के उपयोग के बारे में प्राथमिक तथ्य
रेडियो तरंगें
(i) रेडियो और टीवी संचार में। (ii) खगोलीय क्षेत्र में।
माइक्रोवेव
(i) राडार संचार में। (ii) आणविक और परमाणु संरचना के विश्लेषण में। (iii) खाना पकाने के उद्देश्य से।
अवरक्त तरंगें
(i) आणविक संरचना जानने में। (ii) टीवीवीसीआर आदि के रिमोट कंट्रोल में।
पराबैंगनी किरणें
(i) बर्गलर अलार्म में प्रयुक्त। (ii) खनिजों में कीटाणुओं को मारने के लिए।
एक्स-रे
(i) चिकित्सा निदान में क्योंकि वे हड्डियों से नहीं बल्कि मांसपेशियों से होकर गुजरती हैं। (ii) धातु उत्पादों में दोष, दरारें आदि का पता लगाने में,
γ-किरणें।
(i) खाद्य संरक्षण के रूप में। (ii) रेडियोथेरेपी में।
उत्तर :
1.विद्युत क्षेत्र 2.चुम्बकीय क्षेत्र 3. लंबवत 4.लंबवत, लंबवत 5. समान 6. विद्युत चुम्बकीय तरंग का वेग 7. रेडियो
1. प्रत्यावर्ती धारा (AC) यह वह धारा है जो परिमाण और .......................................... दोनों में बारी-बारी से और आवधिक रूप से बदलती
रहती है। I = I0 sin ωt या I = I0 cosωt जहाँ, I0 = धारा का ........................ मान या अधिकतम मान है |
2. AC का प्रभावी मान या rms मान इसे एक पूर्ण चक्र में AC उस मान के रूप में परिभाषित किया जाता है जो किसी दिए
गए प्रतिरोधक में उतनी ही ऊष्मा उत्पन्न करेगा जितनी कि एक पूर्ण चक्र के दौरान समान प्रतिरोधक में और समान समय
में ............................................ धारा द्वारा उत्पन्न होती है।
3. धारा के शिखर मान का 70.7% AC का ...................................... मान होता है।
4. AC का औसत या माध्य मान AC के उस मान के रूप में परिभाषित किया जाता है जो अर्ध-चक्र में एक परिपथ में उतनी
ही मात्रा में आवेश भेजेगा जितनी कि समान समय में ............................. धारा द्वारा भेजा जाता है।
5. AC के शिखर मान का.....................................................% AC का औसत या माध्य मान देता है।
6. प्रत्यावर्ती विद्युत वाहक बल या वोल्टेज वह विद्युत वाहक बल है जो परिमाण के साथ-साथ .............................. में भी वैकल्पिक और आवधिक रूप से
बदलता रहता है।
7. प्रेरणिक प्रतिक्रिया- धारा के प्रवाह के लिए ...................................................की विरोधी प्रकृति को प्रेरणिक प्रतिक्रिया कहा जाता है।
8. धारिता प्रतिघात (Xc) प्रत्यावर्ती धारा के प्रवाह के प्रति ................................................. की विरोधी प्रकृति को धारिता प्रतिघात कहते हैं।
9. शक्ति- एक एसी परिपथ में, विद्युत वाहक बल और धारा दोनों समय के संबंध में लगातार बदलते रहते हैं, इसलिए परिपथ में,
हमें पूर्ण चक्र (T) में ....................................... शक्ति की गणना करनी होती है।
10. शुद्ध प्रेरणिक और शुद्ध धारिता परिपथ में औसत शक्ति खपत ............................... के बराबर होती है क्योंकि ……………………….
11. एक एसी परिपथ में जब औसत शक्ति खपत .................................... होती है, तो धारा को वाटरहित धारा या निष्क्रिय
धारा कहा जाता है।
12. शक्ति गुणांक ……………….. है (प्रतीक )
13. प्रतिबाधा ……….. है (प्रतीक )
14. AC के एक पूर्ण चक्र में, AC का माध्य मान.................................. होगा।
1. दिशा, शिखर 2. दिष्ट 3. rms 4. दिष्ट 5. 63.7% 6. दिशा 7. प्रेरक (coil) 8. संधारित्र 9. औसत 10. शून्य, कालांतर शून्य 11. शून्य
12. Cos ø 13. Z 14. शून्य
A के मौखिक अनुरोध पर आप A के मार्फत (on behalf of A ) B से कोई वादा करते हैं तो कल को A के पीछे हट जाने पर आपकी बात खराब हो सकती है, आपकी छवि खराब हो सकती है B की नजरों में अतः इस जोखिम से बचने के लिए अगर संभव हो तो A और B की आपस में ही बात करा दो।
स्वर्गीय प्रदीप ताऊ जी ( पापा उन्हें पप्पू दादा कहते थे ) पापा की बुआ जी के बड़े बेटे थे |
पापा को वो बहुत स्नेह करते थे इसलिए हर होली उनका हमारे घर आना तय था, क्योंकि वो कभी पीलीभीत तो कभी बरेली पोस्टेड रहे तो त्यौहार में ही लखीमपुर आ पाते थे ( वह एक ग्रामीण बैंक में प्रबंधक थे ) त्यौहार और परिवार का क्या सम्बन्ध होता है यह वो बखूबी जानते थे इसलिए त्यौहार के लिए वो लखीमपुर आते ही थे |
यहाँ उनके बारे में लिखने का कारण उनसे मिलने वाला प्रोत्साहन, स्नेह और रिकग्निशन है :
पापा, उम्र में बड़े और पढ़े लिखे लोगों को ख़ास “अहमियत” देते थे, ये हमें ताऊजी के आने पर भी दिखता था इसिलए मेरी नज़र में भी ताऊ जी की एक अलग ही छवि थी, मेरा बालमन भी उनकी तरह ही पढ़ लिखकर मान-सम्मान पाना चाहता था|
आप लोग इस बात को जरुर महसूस किये होंगे की जब कोई आपसे बड़ा जिसे आप भी बड़ा और खुद से बेहतर मानते हो वो आपकी तारीफ कर दे या आपके काम की तारीफ कर दे तो बहुत अच्छा महसूस होता है और आपका स्वयं पर विश्वास बढ़ जाता है और आप सोंचते हैं कि हाँ "मै सही तरीके से काम कर रहा हूँ और ऐसे ही काम करता रहा तो एक दिन जरूर बेहतर करूँगा " ऐसा ही कुछ उस वक़्त भी हुआ ;
मै उस वक़्त ग्यारहवीं में था और अपने साथियों में ज्यादातर की तरह मै भी आईआईटी से इंजीनियरिंग करने के सपने संजो रहा था, उस वक़्त जब मै ताऊ जी से मिला तो उन्होने उस वक़्त की IITs के बारे मे मुझसे बात की और मेरा उत्साह बढ़ाया कि मै एक साल तैयारी कर बेहतर के लिए प्रयास करूँ, उनका मेरी क्षमताओं मे विश्वास प्रकट करना मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी, इससे मेरा पढ़ाई मे और ज्यादा मन लग गया क्योंकि अब लग रहा था कि सेलेक्शन पक्का है | हालांकि बाद मे तैयारी के दौरान मैं अपनी समझ के उस गैप को न भर सका जो ग्यारहवीं-बारहवीं के अध्ययन के दौरान रह गया था क्योंकि मेरे लिए उस गैप को एक साल मे भर पाना आसान न था, लेकिन बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा मे मैंने अखिल भारतीय रैंक 46 हांसिल की और वहाँ से मैंने भौतिकी मे बीएससी ( आनर्स ) किया और आगे चलकर आईआईटी मे पढ़ने का सपना भी पूरा किया, जॉइंट एड्मिशन टेस्ट फॉर एमएससी (JAM) मे अखिल भारतीय रैंक 75 हांसिल करके आईआईटी दिल्ली मे प्रवेश लेकर, उस वक़्त भी ताऊ जी का प्रोत्साहन मिला और पिता जी के देहांत के बाद उनकी तरफ से हर संभव मदद कि पेशकश भी, इससे मुझे अपनेपन और अकेला न होने का एहसास मिला |
उन्होने मुझे कई बार अपने पास मिलने के लिए दिल्ली से लौटते वक़्त बरेली बुलाया लेकिन मै व्यस्तता कहिए या फिर अव्यवस्था के चलते उनसे मिल न सका, अगर मिल पाता तो उनके सानिध्य मे काफी कुछ सीख पाता क्योंकि वो अपनी व्यस्तता के बावजूद भी, जो भी उन्हे अप्रोच करता उन्हे समय देते और हर संभव मदद कर जरूरी और तर्कसंगत तथा व्यावहारिक सुझाव/सलाह देते थे |
सरकारी सेवा मे आने के बाद जब मैंने उन्हे बताया कि मुझे कोलकाता क्षेत्र मिला है तो उन्होने एक बात कही थी जो मुझे आज भी याद है और मै उसका अनुसरण करने का पूरा प्रयास भी करता हूँ, वो बात थी कि, “ कहीं भी जाओ वहाँ का जो उपेक्षित तबका है उसे अगर मौका दे सको उनकी अगर तकलीफ को संबोधित कर सको तो कभी अकेले न रहोगे ”
मै अपने सिक्किम टेन्योर के दौरान सोंचा करता था कि जल्द ताऊ जी से मिलने जाऊंगा लेकिन उसी बीच कोविड की लहर ने ताऊ जी को हमसे छीन लिया, कल ताऊ जी की पुण्य तिथि थी, ताऊ जी का शरीर तो नहीं है हमारे बीच लेकिन वो अपनी बातों और एक खुशमिजाज़, उदार और मददगार व्यक्ति की मिसाल के तौर पर हमेशा हमारे बीच रहेगें, काश उनका सानिध्य पाकर मै कुछ और भी सीख पाता |
उनकी छोटी बहन, अंजना बुआ उन्हे याद करती हुयी कहती हैं कि वो उनका ऐसे ख्याल रखते थे जैसे एक जिम्मेदार पिता अपने बच्चों का ख्याल रखता है और छोटे भाई के प्रति जो उनका प्रेम था उसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उनके छोटे भाई सुनील चाचा, अपने बड़े भाई के असमय देहांत पर एक ही बात कहते हैं कि उनकी तो दुनिया ही उजड़ गयी |
कहते हैं न कि कहने से ज्यादा करने का प्रभाव पड़ता है वो मैंने ताऊ जी के घर भी देखा, अपने व्यवहार और जीवन से जो उन्होने छाप छोड़ी वो आज भी आदरणीय ताई जी, दीदी और भैया लोगों के आत्मीय व्यवहार मे दिखती है, ये देख अभी भी लगता है कि ताऊ जी हमारे बीच ही है|
स्वर्गीय ताऊ जी के बारे मे यहाँ लिखने का उद्देश्य उनकी बातों को और उस मिसाल को जिंदा रखना है जो मानवीय सदगुणो मे एक हीरे की तरह हैं जिसने भी ऐसे गुणो को खुद के व्यक्तित्व मे पिरोया वो हमेशा भीड़ से अलग चमका |
उन्ही के प्रयासों के संदर्भ मे एक शेर याद आता है :
माना कि इस जमीं को न गुलज़ार कर सके
कुछ खार कम तो कर गए गुजरे जिधर से हम " खार = काँटा "
विनम्र श्रद्धांजलि