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स्थाई प्रेम (लघु कथा) - सौम्या गुप्ता )

मंदाकिनी ने प्रिया के कांधे पर सिर टिका दिया और रोती हुई कहती रही “प्रिया आज वो मुझे हमेशा के लिए छोड़कर दूर चला गया"।

प्रिया ने मंदाकिनी का सिर सहलाते हुए कहा- “मंदाकिनी, समय ने तुम्हारे साथ क्रूर छल किया है, बचपन से आज तक हमेशा तुमको खुशियों की ठंडी छाँव ही मिली है, दुख तो डरता था जैसे तुम्हारे पास आने से।”

मंदाकिनी - फिर मेरे साथ ही ऐसा छल क्यों हुआ?

प्रिया - उसके हाथों को थाम के रखी हुई थी, समय के क्रूर छल का उसके पास कोई जवाब न था, बस वो भी अपनी सहेली संग कुछ आंसू ही बहा सकती थी।

लेकिन उसी समय प्रिया ने मन में सोचा, मैं आज तक एकतरफा प्रेम के चलते विकल रही हूँ व वात्सल्य का अभाव भी महसूस किया है, ईश्वर से शिकायतें करती रही, पर जिनको प्रेम और वात्सल्य का समुद्र मिला है वो मुझसे भी बहुत ज्यादा दुखी लग रहे हैं, फिर स्थाई सुख क्या है? जिसको खोने का डर न हो, सभी का प्यार मिल भी जाए तो क्या वो स्थाई रहेगा? नहीं रह सकता।

उस दिन से प्रिया सभी अस्थाई प्रेम के रूपों से अलग स्थाई प्रेम को खोज रही है, वह जानती है कि क्षणिक सुख और दुख जीवन का हिस्सा हैं। वह ऐसा प्रेम चाहती है जो हमेशा फिर उसको अपने अध्यात्मिक अध्ययन से उस परम आनंद के विषय में उस स्थाई प्रेम के विषय में पता चलता है कि भौतिक जगत में सभी में ईश्वर को देखना, जब सब में ईश्वर दिखेंगे तो कोई अपना पराया नहीं होगा, या कहें कि स्थायी प्रेम एक गहरी आध्यात्मिक स्थिति है जो स्वार्थ और भावनाओं से परे है। यह प्रेम मन की हीनता या निर्भरता से नहीं, बल्कि पूर्णता और आंतरिक शक्ति से उत्पन्न होता है। यह प्रेम अहंकार के विलय से पैदा होता है और इसका उद्देश्य व्यक्ति को मुक्ति, शांति और सच्चाई की ओर ले जाना है।

सौम्या गुप्ता 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं |

: जैनेन्द्र कुमार की कहानी खेल पढ़ी जा सकती है बेहतर समझ के लिए।


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