ये समाज जिसमें आप रहते हो
ये घर जिसमें आप रहते हो
ये हवा जिसमें आप सांस लेते हो
इसकी बेहतरी के लिए काम करना ही
भगवान को समर्पित होना है |
- लवकुश कुमार
पापा में बड़ा हो गया।
अपने पैरो पर खड़ा हो गया।।
ऊंगली पकड़ कर तुमने खूब चलाया
बहुत पढ़ाया बहुत लिखाया
पापा में अब बड़ा हो गया।
तुमने हम सबके लिए बहुत कमाया।
सुख सुविधाओं को पहुंचाया।
पापा मैं भी अब बहुत कमाऊंगा।
बंगला , गाड़ी सब आपके लिए लाऊंगा।।
परंतु बहुत पैसे के लिए दूर जाऊंगा
बड़े शहर में बड़ा घर बनाऊंगा
फिर आपको बुलाऊंगा ।
पापा में अब बड़ा हो गया।
पापा शहर बहुत महंगा हो गया।
अपना घर तो जैसे सपना हो गया।
आप जो आप थोड़ा दे दे धन
छोटा ही घर बनाने का कर लूं जतन
पापा ने पूंजी का पैसा सौंप दिया।
बेटे ने 2 BHK फ्लैट खोज लिया।
पापा ये घर छोटा है इसमें कैसे आप रहेंगे
गांव में ही रहिए वही खुश रहेंगे
हम आपसे मिलने आया करेंगे
मां बाप महीनो उम्मीदों में रहने लगे
बेटा कमाता बहुत है व्यस्त है सबसे कहने लगे।
अकेले में मन ही मन उदास रहने लगे।
बेटे को फोन गया
मां का स्वर्गवास हो गया।
आकर अंतिम दर्शन कर लो
पापा में बहुत व्यस्त हूं धैर्य धर लो
जल्दी ही मैं आऊंगा।
आपके कष्ट मिटाऊंगा
पापा में बड़ा हो गया।।
डॉ अनिल वर्मा
कवि कृषि रसायन में परास्नातक हैं और गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर उत्तराखंड में कृषि रसायन पर शोध कार्य कर चुके हैं।
ये कवि के निजी विचार हैं और समाज में जागरूकता, संवेदनशीलता और बेहतरी के प्रयोजन से लिखे गए हैं।
बच्चों में कृतज्ञता (सही इंसान के प्रति) का भाव पैदा कर दीजिए, तमाम सद्गुण अपने आप आ जायेंगे।
कृतज्ञ व्यक्ति एक से एक ऊंचे काम कर सकता है, क्योंकि ् कृतज्ञता से जन्मी प्रेरणा अंदरुनी, अनवरत और स्वपोषी होती है।
-लवकुश कुमार