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खिलेगा तो देखेंगे ( विनोद कुमार शुक्ल )- पुस्तक परिचय सह समीक्षा - सुरसेन सिंह बहादुर

विनोद कुमार शुक्ल जी का यह उपन्यास 'खिलेगा तो देखेंगे' अपने-आप में अद्भुत उपन्यास है। इसकी एक-एक पंक्ति कविता की तरह लगती है। और सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह उपन्यास पूरी तरह से कथानक पर निर्भर नहीं होते हुए भी एक कथा दृश्य बना देता है अर्थात् कोई ऐसा काथा-सूत्र नहीं है जो उपन्यास के केन्द्र में हो, बावजूद इसके ग्रामीण और सामूहिक जीवन का चित्रण बड़े ही रोचक ढंग से किया गया है। इस उपन्यास में गाँव भी है, गरीबी भी है, पीड़ा भी है और प्रसन्नता भी है। यह उपन्यास पाठकों के बीच उपन्यासों की दुनिया में एक नया अनुभव प्रदान करता है। नये पाठकों को थोड़ा कम अच्छा लगे ऐसा हो सकता है लेकिन इसकी एक-एक पंक्ति हमें गंभीर चिंतन की ओर प्रेरित करती है।

सुरसेन 


युवा साहित्यकार सुरसेन सिंह बहादुर जी, इस बात में विश्वास रखते हैं कि " भोजन, कपड़ा, मकान पैसा सब जरुरी है, सब देना, तुम मुझे कुछ देना चाहो, तो किताबें सबसे पहले देना "

 

आप एक शिक्षक हैं और देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षित हैं, आपने काव्य संग्रह -" विरोध चुप्पियों का " की रचना की है।

"यह संग्रह केवल शब्दों का संचयन नहीं है बल्कि यह उन विसंगतियों के विरुद्ध एक वैचारिक युद्ध है जिन्हें हमारा समाज अक्सर 'मौन' रहकर स्वीकार कर लेता है" - साहित्यकार संतोष पटेल जी

सुरसेन सिंह बहादुर जी का फेसबुक प्रोफाइल लिंक


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